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नवंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रागमालिका (कुन्नुकुषि कृष्णनकुट्टि )

  रागमालिका कुन्नुकुषि कृष्णनकुट्टि   पी. राजेश्वरी लक्ष्मी विहार , पेरूरकड़ा (डाक) तिरुवनंतपुरम- 625005 प्रथम संस्करण- 1988, पृष्ठ- 59, मूल्य- 25 रुपए   ‘ रागमालिका ’ मिश्रित रंगों वाली उनतीस कविताओं का संग्रह है। कवि के जीवन-परिचय के अनुसार कृष्णनकुट्टि भारतीय स्वाधीनता संघर्ष से प्रभावित होकर हिंदी में लिखने को प्रेरित हुए थे। उनका जन्म गाँधीजी के प्रति निष्ठा रखने वाले परिवार में हुआ था। अपने पारिवारिक संस्कारों के प्रभाव से ही वे हिंदी प्रचारक बने और उन्होंने वर्षों विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर राष्ट्रभाषा का कार्य किया। उनका संबंध केरल की प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका ‘ केरल ज्योति ’ तथा मलयाळम पत्रिका ‘ रसिकरंजनी ’ से भी रहा। हिंदी प्रचार आंदोलन का प्रारंभ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के एक कार्यक्रम के रूप में हुआ था और वह अपने जन्म के साथ ही राष्ट्रीय-भावना , भावात्मक-एकता एवं मानवतावादी जीवन-मूल्यों की त्रिवेणी के जल का पान करते हुए बड़ा होने लगा था। गांधी जी ने ऐसे ही हिंदी आंदोलन की कल्पना की थी। भारत के अधिसंख्य हिंदी प्रचारक उस काल में राष्ट्रभाषा के ...

अपूर्व पर्व (चक्रवर्ती)

   अपूर्व पर्व चक्रवर्ती   दिग्दर्शन चरण जैन , ऋषभ चरण जैन एवं संतति 4697/5 , 21-ए , दरियागंज , नई दिल्ली-2 प्रथम संस्करण- 1988 , पृष्ठ- 110 , मूल्य- 35 रुपए   ' अपूर्व पर्व ' डॉ. चक्रवर्ती द्वारा रचित एक ऐसा काव्य ग्रंथ है , जिसका आधार पौराणिक साहित्य है। श्रीम‌द्भागवत में एक प्रसंग आता है , जिसमें आलोकनायक आदित्य का वर्णन है। यह आलोकनायक महर्षि व्यास की अ‌द्भुत कल्पना है। पौराणिक कथा के अनुसार बारह मास बारह आदित्यों से संबंधित हैं। प्रत्येक मास से जोड़कर एक-एक आदित्य का वर्णन किया गया है और माना गया है कि प्रत्येक आदित्य के साथ एक ऋषि , एक गंधर्व , एक अप्सरा , एक यक्ष , एक नाग और एक राक्षस का मंडल भी विद्यमान है। ये सब आलोकनायक आदित्य की गौरव-गरिमा के अनुसार अपने-अपने कार्य करते हैं। उसी   पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि वैदिक ऋचाओं का दिव्य गायन करते हैं , गंधर्व अपने वीणा वादन से उन ऋचाओं को संगीत की आभा से जगमगाते हैं , अप्सराएँ नृत्य रचती हैं , यक्ष रथ-श्रृंगार करते हैं , नाद के द्वारा रथ के धुरों को कठिन पाश में आबद्ध किया जाता है और रथ का गत...

त्रिवेणी (अनुवादक : कवियूर शिवरामय्यर)

  त्रिवेणी अनुवादक : कवियूर शिवरामय्यर   केरल हिंदी   साहित्य अकादमी , तिरुवनंतपुरम्- 695004 प्रथम संस्करण- 1990 , पृष्ठ- 76 , मूल्य- 30 रुपए   त्रिवेणी में महाकवि उल्लूरपरमेश्वर अय्यर के प्रेमसंगीत , कर्णभूषण तथा शिष्य और पुत्र शीर्षक से   महाकवि वल्लत्तोल नारायण मेनन की कविता ‘ शिष्यनुम् मकनुम् ’ का हिंदी अनुवाद संकलित है। इनमें से कर्णभूषण में कर्ण द्वारा आभूषणों के दान से संबंधित कथा है। यह महाभारत के उस प्रसंग पर आधारित है , जिसमें दानवीर कर्ण अपने पिता सूर्यदेव के सावधान करने तथा रोकने पर भी अपने कवच-कुंडल प्रतिज्ञाबद्ध होकर दान कर देते हैं। कथा के अनुसार कर्ण के कुंडल और कवच प्राकृतिक रूप से उनके शरीर से जुड़े हुए हैं तथा उन्हीं के कारण वे अजेय हैं। कोई भी शत्रु उनके रहते कर्ण को पराभूत नहीं कर सकता था। जब कर्ण के ये रक्षा-उपकरण छलपूर्वक माँगे जाते हैं , तो सूर्य देव उन्हें समझाते हैं। कर्ण अपने पिता को अपने जीवन का वृत्तांत सुनाते हैं , जिससे प्रभावित होकर सूर्य अपने पुत्र का आलिंगन करते हैं। त्रिवेणी में महाकवि उल्लूर द्वारा रचित प्रे...

रेत पर लकीरें (केदारनाथ 'कोमल')

रेत पर लकीरें केदारनाथ ' कोमल '   वाणी प्रकाशन , 21-ए , दरियागंज , नई दिल्ली-2 प्रथम संस्करण- 1988 , पृष्ठ- 60 , मूल्य- 30 रुपए   रेत पर लकीरें काव्य संग्रह में केदारनाथ ' कोमल ' की छोटी कविताएँ संग्रहीत हैं। इन्हें आधुनिक शब्द , दीवारें , सफर , सपने , जंगल , लकीरे , आइने , तस्वीरें , जीवन और सागर शीर्षकों के अंतर्गत संजोया गया है। प्रत्येक शीर्षक के अंतर्गत विभिन्न अनुभूतियों को काव्यात्मक रूप दिया गया है , किंतु  पाठक यह अनुभव किये बिना नहीं रहता कि अनुभूति वैभिन्य होते हुए भी एक शीर्षक के अंतर्गत रखी गयी कविताओं के मध्य एक ऐसा जुड़ाव सूत्र भी है , जो उन कविताओं को एक मुख्य और केंद्रीय बिन्दु के आस-पास बनाए रखता है। यह इस संग्रह की भी विशेषता है और केदारनाथ ' कोमल ' की रचनात्मक प्रतिभा की भी। केदारनाथ ' कोमल ' सबसे आदमी की स्थिति पर विचार करते हैं , जिसके लिए वे एक आदमी को संबोधित न करके आदमियों के समूह को संबोधित करते हैं। कवि ने आदमी के विषय में सबसे पहले भाषा के प्रश्न को उठाया है। प्रायः ही आदमी को अनेक संदर्भों से जोड़कर परिभाषित...

जीने की ललकार (पी. नारायण 'नरन')

  जीने की ललकार पी. नारायण ' नरन '   ललकार प्रकाशन , संन्यासी परम्बु , नीलिकाड , पालघाट- 678002 ( केरल) प्रथम संस्करण- 1987, पृष्ठ- 90, मूल्य- 25 रुपए   ‘ जीने की ललकार ’ काव्य संग्रह में परिशिष्ट शैली में एक लंबी कविता छपी है- "चिन्गारियाँ" यह कविता कवि के "हिन्द पुराण" नामक चम्पूकाव्य का एक भाग है। कवि ने इसे समसामयिक जीवन के विविध पक्षों को प्रस्तुत करने के लिए रचा है और कई उपशीर्षकों के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण काव्य टिप्पणियाँ की हैं। इस लंबी कविता की उल्लेखनीय विशेषता है कि इसके रचना-शिल्प का ताना-बाना लोककाव्य शैलियों से निर्मित किया गया है। इनमें भी कवि की मौलिकता यह है कि उसने लोक शैलियों का भी अंधानुकरण नहीं किया है , बल्कि अपनी ओर से भी काफी कुछ जोड़ा है। मूलरूप से चिन्गारियाँ कविता मराठी भाषा के जनकवि रामजोशी द्वारा प्रयुक्त ‘ लावणी ’ शैली और आंध्र प्रदेश में प्रचलित ‘ बुर्र ’ कथा शैली में रचित है। कवि के अनुसार यह कविता डफली और मंजीरे पर भी गाई जा सकती है। कविता का प्रारंभ कुछ इस प्रकार होता है- "अजब तमाशा देखो रे भाई!/ग़ज़...

एक पल की याद में (सुमतीन्द्र)

  एक पल की याद में सुमतीन्द्र   राजमोहन प्रकाशन , तिरुच्चिरापल्लि प्रथम संस्करण- 1961, पृष्ठ- 232, मूल्य- 3 रुपए   रांगेय राघव के विषय में कहा जाता है कि वे किसी लेखक की पुस्तक पर बड़ी मुश्किल से ही टिप्पणी करते थे। ऐसा करने के पीछे उनकी धारणा यह थी कि लोग अक्सर विहंगम दृष्टि से या फिर संबंधों के आधार पर किसी पुस्तक को देखते हैं और समयानुकूल टिप्पणी कर देते हैं। अन्य लोगों के विषय में या उनकी रचनाओं के विषय में कोई राय प्रकट करते समय जो लेखक इतना सावधान रहता था , उसी ने कवि सुमतीन्द्र के काव्य संग्रह ' एक पल की याद में ' पर अपनी टिप्पणी इन शब्दों में की है- "यह कवि हिंदी में नये उपमान लाया है इसलिए मैं इसका स्वागत करता हूँ। कवि ने भावों की अभिव्यक्ति बड़ी सक्षमता से की है इसलिए इसे बधाई देता हूँ। कवि का भविष्य उज्ज्वलतम हो।" रांगेय राघव की यह टिप्पणी एक पल की याद में संग्रहीत कविताओं पर अक्षरशः लागू होती है और उनका दिया आशीर्वाद भी फलीभूत हुआ प्रतीत होता है। वह चाँद टूटे सपने की तररह/प्यारा है , चाहे अधूरा है। बढ़ेगा आशा की तरह—/ मेरी बढ़ती उदासी की तरह...

कश्मीरी और हिंदी रामकथा-काव्य का तुलनात्मक अध्ययन (ओंकार कौल)

  कश्मीरी और हिंदी   रामकथा-काव्य का तुलनात्मक अध्ययन ओंकार कौल   बाहरी पब्लिकेशंस (प्राइवेट) लिमिटेड , दिल्ली प्रथम संस्करण- 1974, पृष्ठ- 348, मूल्य- 50 रुपए   " कश्मीरी और हिंदी   रामकथा-काव्य का तुलनात्मक अध्ययन" इन दोनों ही भाषा-क्षेत्रों में प्राप्त रामकथा संबंधी पहला ऐसा मौलिक प्रयास है , जो न केवल रामकथा-काव्य की व्यापक जानकारी देता है , बल्कि कश्मीर की रामकथा के संबंध में अनेक प्रचलित भ्रमों का निवारण भी करता है। इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ के लेखक ओंकार कौल ने अपने अध्ययन के परिप्रेक्ष्य को व्यापक और गहन बनाने के लिए सबसे पहले दोनों क्षेत्रों के लोक साहित्य में रामकथा की विद्यमानता पर प्रकाश डाला है। दोनों क्षेत्रों के लोकगीतों में जो प्रभूत लोकगीत राशि प्राप्त है , उनमें रामकथा के दो प्रकार के प्रयोग मिलते हैं। कुछ लोक गीत ऐसे हैं , जिनमें रामकथा के पात्रों का नामाल्लेख किया गया है , जैसे विवाह संस्कार के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में वर और वधू के लिए राम तथा सीता का उल्लेख अक्सर किया जाता है। इसी प्रकार जहाँ सौतियाडाह अथवा पुत्र-द्रोह...

दक्खिनी हिंदी भाषा और साहित्य : विकास की दिशाएँ (डॉ. वी.पी. मुहम्मद कुंज मेत्तर)

  दक्खिनी हिंदी भाषा और साहित्य : विकास की दिशा एँ डॉ. वी.पी. मुहम्मद कुंज मेत्तर   लोकभारती प्रकाशन , 15- ए , महात्मा गाँधी मार्ग इलाहाबाद- 1 प्रथम संस्करण- 1994, पृष्ठ- 193, मूल्य- 150 रुपए   नागरी लिपि में लिखित साहित्य को ही हिंदी का साहित्य मान कर हिंदी भाषा के साहित्य का सही व्यक्तित्व नहीं समझा जा सकता। इसका कारण यह है कि नागरी के अतिरिक्त दूसरी लिपियों में भी हिंदी   साहित्य विषयक रचनाएँ हुई हैं। गुजराती लिपि में पुरानी हिंदी संबंधी रचनाएँ   मिलती हैं। उधर अरबी- फारसी लिपि में भी हिंदी भाषा के साहित्य का सृजन हुआ है। हैदराबाद के सालार जंग म्यूजियम , स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में इन ग्रंथों को आसानी से देखा जा सकता है। यही कारण है कि हिंदी   के व्यापक और विस्तृत अध्ययन के लिए विभिन्न लिपियों में रचे गए   हिंदी   साहित्य को अपनाये जाने का भी प्रयास होना चाहिए। डॉ. वी.पी. मुहम्मद कुंज मेत्तर ने अपने दक्खिनी भाषा और साहित्य विषयक ग्रंथ में इस तथ्य पर बल दिया है कि न केवल एक भाषा के रू...