दक्खिनी हिंदी भाषा और साहित्य : विकास की दिशाएँ (डॉ. वी.पी. मुहम्मद कुंज मेत्तर)
दक्खिनी
हिंदी भाषा और साहित्य : विकास की दिशाएँ
डॉ. वी.पी. मुहम्मद कुंज मेत्तर
लोकभारती प्रकाशन,
15-ए, महात्मा गाँधी मार्ग
इलाहाबाद-1
प्रथम संस्करण- 1994, पृष्ठ-
193, मूल्य- 150 रुपए
नागरी
लिपि में लिखित साहित्य को ही हिंदी का साहित्य मान कर हिंदी भाषा के साहित्य का
सही व्यक्तित्व नहीं समझा जा सकता। इसका कारण यह है कि नागरी के अतिरिक्त दूसरी
लिपियों में भी हिंदी साहित्य विषयक रचनाएँ
हुई हैं। गुजराती लिपि में पुरानी हिंदी संबंधी रचनाएँ मिलती हैं। उधर अरबी- फारसी लिपि में भी हिंदी भाषा
के साहित्य का सृजन हुआ है। हैदराबाद के सालार जंग म्यूजियम, स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में इन
ग्रंथों को आसानी से देखा जा सकता है। यही कारण है कि हिंदी के व्यापक और विस्तृत अध्ययन के लिए विभिन्न
लिपियों में रचे गए हिंदी साहित्य को अपनाये जाने का भी प्रयास होना
चाहिए।
डॉ.
वी.पी. मुहम्मद कुंज मेत्तर ने अपने दक्खिनी भाषा और साहित्य विषयक ग्रंथ में इस
तथ्य पर बल दिया है कि न केवल एक भाषा के रूप में, बल्कि
राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की भूमिका
को समझने के लिए उसके साहित्यिक पक्ष का विस्तृत अध्ययन होना चाहिए। वे कहते हैं---
"हिंदी का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हिंदी
प्रदेश की जनता का व्यक्तित्व ही नहीं, वरन् भारत वर्ष के
समस्त जनसमुदाय का सम्मिलित व्यक्तित्व है। भावात्मक ऐक्य को सुदृढ़ करने के लिए
भी अनिवार्य है कि हिंदी के देशव्यापी
स्वरूप को पोषित करें, उसको अपनाएँ और उसका प्रचार करें। समय
की यह बहुत बड़ी माँग है कि युगों पहले दक्षिण भारत में निर्मित हिंदी साहित्य का अध्ययन अनुशीलन करें। इधर दक्षिण की
तेलुगु, कन्नड तमिल और मलयाळम भाषाओं के बीच में हिंदी सृजन
का माध्यम बन कर विकास करती गई।" (पृ. 13)। हिंदी के
संबंध में यह बहुत सुलझी हुई, उदार और आवश्यक दृष्टि है। इसे
अपनाए बिना हिंदी साहित्य का इतिहास संकुचित दृष्टि वाला ही रहेगा।
डॉ.
मेत्तर ने अपने अध्ययन का आधार दक्खिनी हिंदी को बनाया है। ऐसा माना जाता है कि दक्खिनी शब्द
संस्कृत के दक्षिणी शब्द से बना है। प्राकृत में इसे दक्खिन और फारसी में दकन कहा
गया। दक्खिनी हिंदी का ऐतिहासिक संबंध दक्खिनी
भूगोल से है। डॉ. हेमचंद्रराय चौधरी मानते थे कि दक्खिनी भूभाग सहयाद्रि पर्वत
माला से दक्षिण की तरफ फैला हुआ है। डॉ. श्रीराम शर्मा दक्खिनी शब्द से वर्तमान
बरार,
हैदराबाद राज्य, महाराष्ट्र और मैसूर तक का
क्षेत्र ग्रहण करते थे। दक्खिनी हिंदी का
विकास इसी भूभाग में हुआ। डॉ. मेत्तर ने सिद्ध किया है कि इस भूभाग में विकसित
होने वाली दक्खिनी हिंदी समृद्ध साहित्यिक
परंपरा की स्वामिनी है। यदि काव्य परंपरा को ही लें तो दक्खिनी हिंदी में फखरुद्दीन निज़ामी, मीराँजी
शमशुल उश्शाक, शेख़ अशरफ कुत्बुद्दीन कादरी, फीरोज बीदरी, शेख़ बुरहानुद्दीन जानम, अमीनुद्दीन अली आला, काज़ी महमूद बहरी, शाह तुराब अब्दुल, वजही गवासी, इब्नेनिशाती, नुस्रती आदि अनेक ऐसे कवि प्राप्त होते
हैं, जिन्होंने विभिन्न विषयों पर काव्य रचना करके हिंदी साहित्य का भंडार बढ़ाया। उदाहरण के लिए फख़रुद्दीन
निज़ामी के नीति संबंधी पद्य लिए जा सकते हैं- "असंगत बहुत बोल न देक
बोल/प्राप्त शब्द की सब बार देक तोल।" (पृ. 136 पर
उद्धृत)। डॉ. मेत्तर ने अपने इस महत्त्वपूर्ण शोध ग्रंथ के अंत में बहुत सारे
दक्खिनी कवियों की कविताएँ भी प्रस्तुत की हैं। उन्होंने दक्खिनी हिंदी के विकास में योग देने वाली परिस्थितियों का भी
लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।
इस
कार्य का महत्त्वपूर्ण पहलू है, दक्खिनी हिंदी के
व्याकरण का अध्ययन। इसके अंतर्गत दक्खिनी की पहचान के चिह्न बताये गए हैं और दक्खिनी भाषा के शब्द स्रोतों का संकेत
किया गया है। संज्ञा, विभक्ति, लिंग
व्यवस्था, सर्वनाम, विशेषण पर भाषा
वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया है तथा मुहावरे और लोकोक्तियों पर प्रकाश डाला गया
है। दक्खिनी हिंदी में 'ही' के अर्थ में मराठी के 'च'
नहीं के अर्थ में 'नको' और
वाला के लिए 'हारा' का प्रयोग किया
जाता है। दक्खिनी हिंदी के निर्माण में
शब्दों का ग्रहण मध्य भारतीय आर्य भाषा, नव्य भारतीय आर्य
भाषा के अतिरिक्त संस्कृत, अरबी के तत्सम शब्द भंडार तथा
द्रविड़ भाषाओं की शब्द संपदा से किया गया है। दक्खिनी हिंदी में मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी विशेष आकर्षित
करने वाले हैं। डॉ. मेत्तर ने कुछ प्रमुख मुहावरों और लोकोक्तियों के उदाहरणं दिए
हैं, जैसे "छुरी अत कुंदन सी कि जे होए/असंगत न तिस घाल
ले पेट होय" और "बड़े साच कह कर गए बोल अचूक/ दधा दूद का छाचहा पीवे फूक" (पृ.
36 पर उद्धृत)। इनमें से पहली लोकोक्ति का अर्थ है कि छुरी
स्वर्ण निर्मित होने पर भी कोई उसे पेट में नहीं मार लेता, जबकि
दूसरी लोकोक्ति में कहा गया है कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है।
डॉ.
मेत्तर ने 'मसनवी कदमराव पदमराव' इर्शादनामा' तथा 'गुलशनेइश्क'
की भाषा का भी व्यापक अध्ययन किया है। उनके अनुसार मसनवी कदमराव पदमराव
में हरियाणवी, ब्रज, अवधी, राजस्थानी, पंजाबी, सिंधी,
मराठी, गुजराती, तेलुगु,
अरबी-फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रयोग मिलता है। इस ग्रंथ की
भाषा का महत्त्व यह है कि दक्खिनी हिंदी के प्रथम प्रामाणिक और खड़ी बोली के प्रथम
आख्यान काव्य की भाषा होने के कारण इस भाषा में आधुनिक हिंदी के सूत्र खोजे जा सकते हैं। लेखक ने अन्य
ग्रंथों की भाषा का अध्ययन भी इसी परंपरा और महत्त्व को ध्यान में रखते हुए किया
है। स्मरणीय है कि लेखक ने जिन ग्रंथों को चुना है उनका हिंदी काव्य भाषा के विकास में ऐतिहासिक महत्त्व है।
दक्खिनी
हिंदी भाषा और साहित्य संबंधी इस ग्रंथ
में एक महत्त्वपूर्ण निबंध है- 'हिंदी काव्य भाषा के विकास में दक्खिनी हिंदी का योग'। इस लेख में अनेक कवियों के काव्य का विश्लेषण करके लेखक इस निष्कर्ष पर
पहुँचा है कि हिंदी के पास जो अपनी काव्य
परंपरा है, उसका गठन दक्खिनी हिंदी के कवियों के बिना नहीं हो सकता था। अमीर खुसरो,
शेख़ फ़रीदुद्दीन, गंज शकर, शेख़ हमीदुद्दीन नाबूरी, शेख़ अब्दुल खुद्दूस गंगोहि,
कबीर, संत गंगादास आदि कवियों की भाषा का
तुलनात्मक अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि हिंदी काव्य भाषा दक्खिनी हिंदी के
योग से ही आगे बढ़ी है। उदाहरण के लिए संत गङ्गादास की भाषा पर खड़ी बोली के
दक्खिनी रूप का प्रभाव है। वैसे, खड़ी बोली की दृष्टि से तो
यह जानकारी भी महत्त्वपूर्ण है कि जब उत्तर में खड़ी बोली में काव्य नहीं रचा जा
रहा था, तब भी दक्षिण में वह अस्तित्व में था।
डॉ.
मेत्तर ने ‘सबरस’ नामके एक ऐसे
गद्य ग्रंथ का परिचय भी दिया है, जो हिंदी गद्य का अनुपम उदाहरण है। यह गोलकुंडा के
मुल्लावजही द्वारा रचा गया था। इसकी विशेषता यह है कि इसमें लेखक ने अलंकृत गद्य
शैली का निर्माण किया है। गद्यात्मक वाक्यों को तुकांत रूप देने की प्रवृत्ति भी
सबरस में मिलती है। इस ग्रंथ की रचना सन् 1636 में हुई थी।
विद्वान
लेखक ने इस पक्ष पर भी विचार किया है कि दक्खिनी हिंदी उर्दू का पूर्वरूप है या
आधुनिक हिंदी का? इस प्रश्न पर विचार करना
इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि लेखकों के धर्म और लिपि की भिन्नता के कारण अरबी-फारसी
लिपि में लिखित बहुत सारे हिंदी साहित्य
को उर्दू का साहित्य घोषित कर दिया गया है। इसका ज्वलंत प्रमाण है मसनवी कदमराव
पदमराव नामक ग्रंथ। इस ग्रंथ को उर्दू की पहली तसमीस घोषित करके उर्दू साहित्य के
विकास में स्थान दिया गया है, जबकि यह ग्रंथ दक्खिनी हिंदी का ऐसा गौरव ग्रंथ है,
जिसकी आधार-भाषा खड़ी बोली है तथा जिसमें अन्य भाषाओं के भी अनेक शब्द हैं। डॉ.
मेत्तर के अनुसार इस ग्रंथ में कुल बारह हजार शब्द हैं, जिनमें
से दस हजार शब्द संस्कृत मूलक हैं और लगभग 150 शब्द
अरबी-फारसी के हैं। यदि इस ग्रंथ को उर्दू का ग्रंथ माना जाए तो यह मानना पड़ेगा
कि उर्दू हिंदी की ही एक शैली है, जबकि उर्दू और हिंदी का अलगाव मुख्यतः अरबी-फारसी शब्दों के अधिक
प्रयोग तथा लिपि की भिन्नता के कारण है। उस स्थिति में मसनवी कदमराव पदमराव उर्दू
का ग्रंथ नहीं ठहरता। इसी तर्क के आधार पर इर्शादनामा और गुलशने इश्क भी हिंदी के ग्रंथ ही ठहरते हैं। डॉ. मेत्तर ने अपनी
पुस्तक में इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया है कि दक्खिनी के किसी लेखक ने अपनी भाषा
को उर्दू नहीं माना। उन्होंने हिंदी , हिन्दवी, दक्खिनी, गूजरी, रेख्ता आदि
शब्दों का प्रयोग तो किया, किंतु उर्दू का नहीं। ऐसा करना
उचित भी नहीं था। केवल थोड़े से अरबी-फारसी शब्दों, लिपि तथा
लेखकों के मुसलमान होने भर से वह साहित्य उर्दू का नहीं हो जाता। दक्खिनी के
लेखकों के गद्य और पद्य की भाषा का विश्लेषण करने से यह सिद्ध हो जाता है कि दक्खिनी
हिंदी का मूल ढाँचा खड़ी बोली हिंदी है; इसीलिए दक्खिनी हिंदी
उर्दू का पूर्वरूप न होकर आधुनिक हिंदी का
पूर्वरूप है। डॉ. मेत्तर का यह कथन बहुत प्रभावित करने वाला है कि "धर्म या
मज़हब के नाम पर भाषा का संबंध जोड़ा नहीं जा सकता। यह तो सर्वविदित है कि हिंदी के साहित्यकार केवल हिंदू ही नहीं है और न उर्दू
के साहित्यकार केवल मुसलमान ही।" (पृ. 46)।
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