रेत पर लकीरें (केदारनाथ 'कोमल')

रेत पर लकीरें

केदारनाथ 'कोमल'

 

वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज,

नई दिल्ली-2

प्रथम संस्करण- 1988, पृष्ठ- 60, मूल्य- 30 रुपए

 

रेत पर लकीरें काव्य संग्रह में केदारनाथ 'कोमल' की छोटी कविताएँ संग्रहीत हैं। इन्हें आधुनिक शब्द, दीवारें, सफर, सपने, जंगल, लकीरे, आइने, तस्वीरें, जीवन और सागर शीर्षकों के अंतर्गत संजोया गया है। प्रत्येक शीर्षक के अंतर्गत विभिन्न अनुभूतियों को काव्यात्मक रूप दिया गया है, किंतु  पाठक यह अनुभव किये बिना नहीं रहता कि अनुभूति वैभिन्य होते हुए भी एक शीर्षक के अंतर्गत रखी गयी कविताओं के मध्य एक ऐसा जुड़ाव सूत्र भी है, जो उन कविताओं को एक मुख्य और केंद्रीय बिन्दु के आस-पास बनाए रखता है। यह इस संग्रह की भी विशेषता है और केदारनाथ 'कोमल' की रचनात्मक प्रतिभा की भी।

केदारनाथ 'कोमल' सबसे आदमी की स्थिति पर विचार करते हैं, जिसके लिए वे एक आदमी को संबोधित न करके आदमियों के समूह को संबोधित करते हैं। कवि ने आदमी के विषय में सबसे पहले भाषा के प्रश्न को उठाया है। प्रायः ही आदमी को अनेक संदर्भों से जोड़कर परिभाषित किया जाता है। समाज, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, प्रकृति, विज्ञान, ईश्वर आदि के संदर्भ में आदमी का मूल्यांकन किया जाना या उसके व्यक्तित्व की परिभाषा दिया जाना आम बात है। हिंदी  में मुक्तिबोध ऐसे पहले कवि हुए, जिन्होंने आदमी को इन संदर्भों के अलावा भी परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया। वे आदमी के लिए एक सही भाषा की तलाश में लगे हुए कवि थे। 'कोमल' जी ने मुक्तिबोध की परंपरा का ही निर्वाह करते हुए आदमी को भाषा से जोड़ा है। वे मानते हैं कि आधुनिक सभ्यता में मनुष्यों के सामने सबसे बड़ा संकट भाषा का है; क्योंकि सही और सार्थक भाषा की तलाश बहुत कठिन है तथा जीवन खपा देने पर भी उसका चरितार्थ होना आवश्यक नहीं है। इस सबके बावजूद भाषा की तलाश का यह अभियान निरर्थक नहीं है- "लोगों ने उन/शब्दों को समझने में एक उम्र गँवा दी/जिनका कोई/अर्थ नहीं/लेकिन यह लड़ाई/व्यर्थ नहीं" (पृ. 13)। यह लड़ाई इसलिए व्यर्थ नहीं है कि सफलता न मिलने पर भी व्यक्ति निरंतर सार्थक भाषा के निकट से निकट जा रहा है। वह कम से कम संघर्ष के मार्ग पर तो डटा है। उसकी गति में नैरंतर्य तो है। वह सक्रिय बने रहने की शर्त तो पूरी कर रहा है। इस स्थिति में आज नहीं तो कल वह अपनी लड़ाई जीतेगा ही। फिर, कवि को उसके प्रति जो विश्वास है, वह भी उसके संघर्ष में होने पर ही टिका है। जिस दिन यह विश्वास डिग जाएगा, उस दिन मनुष्य की परिभाषा बदल जाएगी।

केदारनाथ 'कोमल' व्यक्ति को उसकी मिट्टी, अर्थात् उसकी असली जड़ों के संदर्भ में भी देखते हैं। यह उत्तर आधुनिकतावादी धारणा का अनुकरण है। कवि ने उसी के प्रभाव में मिट्टी और व्यक्ति दोनों के मध्य एक अंतरंग पहचान स्थापित की है। व्यक्ति मिट्टी में पलता है, मिट्टी में फलता है, मिट्टी में जीता है, मिट्टी से लड़ता है, मिट्टी में चलता है और मिट्टी के गीत गाता है (पृ. 15)।  किंतु  यह व्यक्ति एक और कार्य भी करता है। वह है, शब्दों के स्थान पर पिस्तौल से बोलने का कार्य।मिट्टी से जुड़ा हुआ आदमी अचानक अपनी शिराओं में षड्यंत्र की गंध अनुभव करता है और कवि को कहना पड़ता है- "अब वे चुपचाप हैं/वर नहीं अभिशाप हैं/अचानक पिस्तौल बोलता है/नफ़रत का तूफान सो गया है/कितनी आसानी से/सब कुछ खो गया है" (पृ. 16)। पिस्तौल से जितना कुछ किया, वह तो है ही, किंतु आदमी के साथ उसकी अपनी उत्तरदायित्वहीनता के कारण कुछ ऐसा भी घट गया है, जिसने उसे अँधेरे के गह्वर में लेटे रहने को बाध्य कर दिया है- "पीढ़ी दर पीढ़ी दर पीढ़ी/अँधेरे में/जागते हुए लेटे हैं/हम/सूरज के बेटे हैं" (पृ. 14)। यहाँ अँधेरे में जागते हुए लेटना और सूरज के बेटे होना एक ऐसी गंभीर त्रासदी का बयान करते हैं जो वर्तमान पीढ़ी के अपने दिशाहीन संघर्ष से उपजी है और जिसने उसे गौरवशाली उत्तराधिकार से संपन्न होने पर भी अंधापन जीने को विवश बना दिया है। लगता है कवि के सामने एक ओर पूरी समृद्ध परंपरा है, मानव सभ्यता के विकास से जुड़े प्रसंग हैं और दूसरी ओर वर्तमान प्रदूषित परिवेश में भटकते रहने को अभिशप्त मनुष्य है।

केदारनाथ 'कोमल' ने बहुत कम पंक्तियों में आज के जिस आदमी की दशा का बयान किया है, वह आदमी किसी एक ही देश में नहीं रहता, बल्कि वह संसार में कहीं भी देखा जा सकता है। उसकी पहचान केवल इतनी है- "पेट : अंधा कुआँ/दिल : मचलता धुआँ/दिमाग : शोलों की ज़बाँ/आदमी हूँ/मिल जायेगा हर देश में/मेरा निशाँ" (पृ. 18)। इन पंक्तियों में केदारनाथ 'कोमल' की पंक्तियाँ सार्वभौमिक अनुभूति में ढल गयी हैं। इस अनुभूति का चरमोत्कर्ष वहाँ होता है, जहाँ आदमी यह अनुभव करता है कि - "शब्दों के/अँधेरे रेगिस्तान में/अकेला ही सही/मगर/हूँ तो सही" (पृ. 20)।

आदमी को भाषा और परिवेश के संदर्भ में मूल्यांकित करने के बाद कवि ने स्वयं भाषा को भी अपने चिंतन  की कसौटी पर कसकर देखा है। वह अपनी बात शब्द की स्थिति से प्रारंभ करता है। वह मानता है कि जिन शब्दों को मनुष्य केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भर मानता है वे शब्द इतने साधारण नहीं हैं। वे अपने वास्तविक रूप में प्रकाश का स्रोत हैं। सृजन की प्रक्रिया में जहाँ-जहाँ गिरते हैं, वहाँ-वहाँ प्रकाश के निर्झर झरने लगते हैं- "सही शब्द/रौशनी के बीज हैं/धरती पर गिरेंगे जहाँ/उजाला फूटेगा वहाँ" (पृ. 23)। यह भाषा की एक दूसरी भूमिका है, जिसकी ओर बहुत कम कवियों का ध्यान जाता है। शब्द को प्रकाश से जोड़कर देखने की परंपरा वैदिक काल में भी रही है, वहाँ शब्द को दिव्य प्रकाश पुंज और हिरण्यमय आवरण को भेदकर सब कुछ प्रत्यक्ष कर देने वाला बताया गया है। केदारनाथ 'कोमल' उसी भावना को अपने ढंग से प्रस्तुत करने के साथ-साथ उन लोगों के सामने चुनौती भी खड़ी करते हैं, जो काव्य रचते समय भाषा को चेरी समझने की भूल करते हैं। भाषा चेरी नहीं है, वह सृजन के मूल आधार को संस्थापित होने में सहायता करने वाली शक्ति है और कहीं-कहीं वह स्वयं सृजन ही है। वर्ड्सवर्थ जैसे रोमानी कवियों के यहाँ कविता का सृजन भाषा का सृजन ही माना गया है। निःसंदेह यह भाषा प्रकाशवती है, प्रकाश की जनक है।

केदारनाथ 'कोमल' के यहाँ भाषा और कविता के बीच एक और रिश्ता भी कायम किया गया है। वह रिश्ता शब्दों के साथ अर्थ की भी एक सीमा निर्धारित करता है और कविता को इनसे भी अधिक व्यापक मानता है। यह रिश्ता एक प्रकार से भाषा और कविता को आमने-सामने खड़ा कर देता है। दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में एक दूसरे को बाँधने की कोशिश करते हैं। यहाँ केवल एक प्रश्न पाठक को परेशान करता है। वह है, कविता और भाषा को परस्पर विरोधी तत्त्व बना दिये जाने के संकट से जुड़ा हुआ प्रश्न। यदि कोई कविता शब्दों के काफिले और अर्थों के रेले में भी नहीं समा पाती, तो यह शब्द या अर्थ की अक्षमता नहीं है, बल्कि प्रासंगिक अर्थसंपन्न शब्द चुन पाने में असमर्थ कवि का दोष है। कविता तो अपनी भाषा के साथ ही जन्म लेती है। यह कवि पर निर्भर है कि वह उस भाषा को पहचान पाता है या नहीं? कुल मिलाकर, कविता और भाषा के मध्य दुराव या विरोध का समीकरण चिंता की बात है।

दीवारें शीर्षक के अंतर्गत कवि ने दीवारों को बड़े सफल प्रतीक के रूप में चुना है। दीवारें दृश्य और अदृश्य दोनों प्रकार की हैं। रक्त और रंग से बनी दीवारें दृश्य हैं, जबकि मानसिक कुंठाओं, विरोधी विवशताओं, ईर्ष्या-द्वेष आदि की दीवारें अदृश्य हैं। वर्तमान युग में जीने वाला व्यक्ति इन दृश्य और अदृश्य दीवारों के घेरे में क़ैद है। इनके बीच उसकी स्वतंत्रता दम तोड़ रही है। यदि वह किसी को पुकारना भी चाहे, तो पुकार भी बाहर जाने की संभावना नहीं है। मनुष्य की इस स्थिति को दीवारों के माध्यम से कवि ने इस प्रकार प्रकट किया है- "दीवारें/आगे/पीछे/दायें-बाएँ/दीवारें/दीवारों के पीछे दीवारें/दीवारों के पीछे-पीछे-पीछे और और और/दीवारें दीवारें दीवारें/किसे पुकारें?/कब तक पुकारें??

ऐसा लगता है कि कवि दीवारों के भीतर बंद होने से उत्पन्न विवशता को अनुभव करते हुए भी अपने स्वतंत्र और मुक्त अस्तित्व पर किसी भी बाहरी तत्त्व का आक्रमण सहन करने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि दीवारों से हार जाना उसके अस्तित्व का शेष हो जाना है; इसीलिए कवि अपने अस्तित्व और अपने होने की घोषणा करते हुए कहता है- "मैं/मैं/सिर्फ मैं/हूँ/हर तरफ/अब/किसी चीज का/कोई/मतलब नहीं" (पृ. 30)।

सफर शीर्षक के अंतर्गत ऐसी छोटी कवितायें हैं जो कवि के हृदय में व्याप्त रोमानी संवेदना को प्रकट करती हैं। इस शीर्षक के अंतर्गत ही एक अनुभूति ऐसी भी है, जिसमें कवि अपने आप से ही पूछता दिखाई देता है- "क्या कभी/खत्म भी होगा/ज़िन्दगी का अंधा सफ़र" (पृ. 32)। यह प्रश्न भी अपनी प्रकृति में रोमानी काव्य में प्राप्त पीड़ा से निर्मित प्रश्न ही है। सपने शीर्षक के अंतर्गत भी वही रोमानियत है, जिसमें व्यक्ति अपने को एक ऐसा सपना समझता है, जो सदियों पहले इंद्रधनुषी सपना था और एक दिन अचानक कहीं खो गया। व्यक्ति सदियों से उस सपने को खोज रहा है। यहाँ तक कि खोजते-खोजते ब्रह्मांड में ही ब्रह्मांड से बड़ा हो गया है।

जंगल शीर्षक के अंतर्गत धार्मिक वैमनस्य और सांप्रदायिकता की समस्या को बहुत सशक्त ढंग से उठाया गया है- "हर बार/भर जाते हैं घाव/जिस्म के घाव की तरह/रह जाते हैं दाग/जिस्म के घाव की तरह/कहीं मंदिर कहीं मस्जिद/कहीं गुरुद्वारे की शक्ल में" (पृ. 35)। सांप्रदायिकता की समस्या को उसकी संपूर्ण भयावहता के साथ उठाने का यह नया ढंग है। वरिष्ठ कवि शमशेर ने कहीं लिखा है कि हिंदुस्तान  पर कहीं बाहर से हमला करने की आवश्यकता नहीं है। जो शक्तियाँ इसे नष्ट करना चाहती हैं, उन्हें सिर्फ इतना करना है कि वे धर्म के अखाड़ों को आपस में लड़वा दें। हिंदुस्तान स्वतः नष्ट हो जाएगा। केदारनाथ 'कोमल' शमशेर के इस विचार को कुछ और स्पष्ट व्याख्या के साथ प्रस्तुत करते हैं।

 रेत की लकीरें काव्य संग्रह में एक पूरा खंड सागर को संबोधित कविताओं वाला है। कवि जब सागर देखता है, तो अपने को एकदम सम्मोहित अनुभव करता है- "जब से/समुद्र/देखा है/अनंत/लहरों सा/घूम रहा हूँ/नयी दिशायें/चूम रहा हूँ" (पृ 51)। प्रकृति के सान्निध्य में व्यक्ति का यह अनंत विस्तार है, जो उसे दिगंत तक ले जाता है---, किंतु  यह न समझें कि इस विस्तार में डूब कर कवि निश्चेतन हो गया है। उसकी चेतना सजग है; इसीलिए वह सागर की व्याकुलता देखकर अपने भीतर ही व्याकुलता को जागा हुआ अनुभव करता है। प्रकारांतर से कवि सागर को देख जाग्रत संवेदना वाला हो जाता है--- "सागर/क्या लिखूँ तेरे लिए/तू तो खुद/परेशान/मेरी तरफ/बेवजह (पृ. 52)। प्रकृति के साथ नई कविता का यह संबंध यथार्थ मूल्यों पर आधारित संबंध है। इस यथार्थाधारित संबंध के चलते ही कवि का प्रकृति संबंधी सौन्दर्य बोध भी स्वाभाविक और यथार्थ है। सागर के रूप को वह इस प्रकार आँकता है--- "लहर के आगे लहर/लहर के पीछे लहर/लहर के दायें लहर/लहर के बायें लहर/लहर के ऊपर लहर/लहर के नीचे लहर/तड़प तड़प तड़पती/समुद्र की लहर लहर" (पृ. 56)। रेत की लकीरें काव्य संग्रह की कविताएँ आधुनिक जीवन से जुड़ी उन संवेदनाओं से निर्मित हैं, जो व्यक्ति को उसके आसपास फैले परिवेश से प्राप्त होती हैं। इन कविताओं में ऐसी अनुभूति है, जिसे सामान्य जीवन की केंद्रीय अनुभूति कहा जा सकता है। केदारनाथ सिंह ने सही ही कहा है- ''रेत पर लकीरें की कवितायें एक शांत मगर सच्चे दर्द का अहसास कराने वाली कविताएँ  हैं" (भूमिका पृ. 8)।

इस संग्रह की चर्चा इसकी कविताओं के फार्म के कारण भी की जानी चाहिए। हिंदी में काफी वर्षों पहले ऐसी कविताओं का प्रचलन हुआ था, जो न केवल आकार में छोटी होती थीं, बल्कि अभिव्यक्ति- कौशल के आधार पर भी बड़े आकार वाली कविताओं से भिन्न थीं। इनकी रचना के मूल में यह धारणा थी कि व्यक्ति भिन्न-भिन्न क्षणों में भिन्न-भिन्न अनुभूतियाँ प्राप्त करता है। अतः वास्तविक कविता वह है, जो क्षणों की नहीं, क्षण की अनुभूति से निर्मित हो। इन कविताओं को क्षणिका, लघु कविता, छोटी कविता, क्षण की कविता, बिन्दु कविता आदि अनेक नाम दिये गए थे। केदारनाथ 'कोमल' इन नामों में से किसी के प्रति भी आग्रही दिखाई नहीं देते। वे इन से बचते हुए छोटी कविताओं की रचना करते हैं। उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने इन कविताओं के लिए उपयुक्त शिल्प को बड़ी साधना से खोजा है। उनकी कविताओं की भाषा अर्थगर्भित तथा लाक्षणिकता के गुण से युक्त है और कवि के पास शिल्प के सम्यक निर्धारण की क्षमता है। 

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