कश्मीरी और हिंदी रामकथा-काव्य का तुलनात्मक अध्ययन (ओंकार कौल)

 

कश्मीरी और हिंदी  रामकथा-काव्य का तुलनात्मक अध्ययन

ओंकार कौल

 

बाहरी पब्लिकेशंस (प्राइवेट) लिमिटेड, दिल्ली

प्रथम संस्करण- 1974, पृष्ठ- 348, मूल्य- 50 रुपए

 

"कश्मीरी और हिंदी  रामकथा-काव्य का तुलनात्मक अध्ययन" इन दोनों ही भाषा-क्षेत्रों में प्राप्त रामकथा संबंधी पहला ऐसा मौलिक प्रयास है, जो न केवल रामकथा-काव्य की व्यापक जानकारी देता है, बल्कि कश्मीर की रामकथा के संबंध में अनेक प्रचलित भ्रमों का निवारण भी करता है।

इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ के लेखक ओंकार कौल ने अपने अध्ययन के परिप्रेक्ष्य को व्यापक और गहन बनाने के लिए सबसे पहले दोनों क्षेत्रों के लोक साहित्य में रामकथा की विद्यमानता पर प्रकाश डाला है। दोनों क्षेत्रों के लोकगीतों में जो प्रभूत लोकगीत राशि प्राप्त है, उनमें रामकथा के दो प्रकार के प्रयोग मिलते हैं। कुछ लोक गीत ऐसे हैं, जिनमें रामकथा के पात्रों का नामाल्लेख किया गया है, जैसे विवाह संस्कार के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में वर और वधू के लिए राम तथा सीता का उल्लेख अक्सर किया जाता है। इसी प्रकार जहाँ सौतियाडाह अथवा पुत्र-द्रोहिणी माता का प्रसंग आता है, वहाँ अनायास अनाम लोकगीत कैकेयी का उल्लेख करने से नहीं चूकते। दूसरे प्रकार के लोकगीत वे हैं, जिनमें रामकथा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख प्राप्त होता है। कश्मीरी और हिंदी  लोकगीतों में वन-गमन, कौशल्या विलाप, दंडकारण्य में राम और सीता का विचरण, राम-जन्म, सीता-जन्म, धनुष-यज्ञ, राम-बनवास आदि प्रसंग बहुतायत से आते हैं। लोकगीतकारों ने अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए अनेक ऐसे प्रसंगों को भी रामकथा से जोड़ दिया है, जो उस युग में भले ही प्रचलित न रहे हों, किंतु  गीत रचयिता के युग में वे विभिन्न संस्कारों का अंग बने। उदाहरण के लिए, हिंदी  में राम के विवाह से जुड़े हुए कुछ ऐसे गीत मिलते हैं, जिनमें वे कंगने की गाँठ नहीं खोल पाते। इसी प्रकार कुछ ऐसे लोकगीत भी हैं, जिनमें रावण का वध सीता द्वारा दिखाया गया है। ओंकार कौल के अनुसार, "एक ब्रज लोकगीत के अनुसार लंका में रावण मृत्यु उपरान्त राम-सीता अयोध्या पहुँचे, तो सीता राम से कहती हैं कि अभी उन्होंने 'रमनियाँ' मारी हैं रावण नहीं। रावण की दो सहस्र भुजायें हैं, जो लंका में वास करता है। भरत, शत्रुघ्न सेना समेत लंका गए। उन्हें नाकासुर ने अयोध्या में उठाकर पटक दिया, तो सीता स्वयं रण क्षेत्र में जाकर रावण को खा जाती हैं। लंका से सीता अयोध्या न लौटकर कलकत्ता में काली माई हो गई।" (पृ. 17)। लेखक ने इस लोकगीत का उदाहरण प्रस्तुत करके अपनी बात की पुष्टि की है। लोक साहित्य में रामकथा लोकमानस में बसी आस्था का एक अंग है लोक ने अपनी शक्ति, आत्मबल और सहजता के बल पर रामकथा के अलौकिक पात्रों तथा प्रसंगों को मानवीय धरातल छोड़ने की अनुमति नहीं दी है और विस्मयकारी तथ्य यह है कि लोक रामकथा की अलौकिक दीप्ति को भी बनाये रख सका है। ऐसा लगता है कि लोक साहित्य की ही इतनी शक्ति थी, कि वह रामकथा को अकृत्रिम और सहज बनाये रख सका।

गंभीर समीक्षक-प्रतिभा के धनी ओंकार कौल ने कश्मीरी और हिंदी  राम कथा काव्य की परंपरा का अवलोकन तथा मूल्यांकन भी किया है। अठारहवीं शताब्दी तक कश्मीरी में रामकथा प्रस्तुत करने वाली कोई महत्त्वपूर्ण रचना उपलब्ध नहीं होती। इसके पीछे ऐतिहासिक कारण हैं। बड़शाह के पश्चात् कश्मीर में कश्मीरी के स्थान पर फारसी प्रतिष्ठित हो गई। सत्ता की भाषा होने के कारण लोगों ने फारसी की ओर अधिक ध्यान दिया तथा मातृभाषा को गवाँरू-भाषा कहकर उपेक्षित किया। परिणाम यह हुआ कि कश्मीरी में रचना कार्य की धारा उपेक्षित हो गई। इस काल में फारसी और संस्कृत में रचना कार्य होता रहा। 18वीं शताब्दी के आसपास वैष्णव रामभक्ति परंपरा ने कश्मीरी भक्त कवियों को रामकाव्य की ओर आकृष्ट किया, दूसरी ओर सिक्ख और डोगरा शासकों ने भी कश्मीरी को प्रोत्साहन दिया तथा उस भाषा में रामकथा संबंधी ग्रंथ रचना प्रारंभ हुई।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर 'प्रकाश रामायण' उस भाषा का प्रथम रामकथा काव्य ग्रंथ है। इसके रचनाकार प्रकाश राम थे। उसकी कथावस्तु का मुख्य आधार 'वाल्मीकि  रामायण' है, किंतु  प्रकाश राम ने मूल कथा में रंग भरने के लिए लौकिक परंपराओं और उपकरणों का बहुतायत से उपयोग किया है। ओंकार कौल कहते हैं, "इसे लौकिक कथानक परंपरा का ही विकसित महाकाव्य कहा जा सकता है। महाकाव्योचित परंपरागत प्रकृति एवं वस्तु दृश्य वर्णन में क्षेत्रीय विशेषताओं के प्राधान्य के अतिरिक्त इसमें कश्मीरी वेश-भूषा, भोजन-आहार, रहन-सहन और कश्मीर के ही प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों, देवालयों, मंदिरों और यहाँ तक कि सीता के पृथ्वी प्रवेश प्रसंग में शंकरपुर गाँव के स्थान का नामाल्लेख मिलता है।" (पृ. 26)। स्मरणीय है कि कश्मीर में आज भी यह लोक विश्वास प्रचलित है कि सीता ने शंकरपुर में ही पृथ्वी प्रवेश किया था।

डोगरा शासक रणवीर सिंह के शासन काल में शंकर रामायण की रचना हुई। इस रामायण का मुख्य आधार तो वाल्मीकि  रामायण है, किंतु  उस पर 'अध्यात्म रामायण' का बहुत प्रभाव है। इसकी कथा मुख्य रूप से शिव-पार्वती-संवाद के रूप में है। स्थानीय लोक संपदा का उपयोग इस रामायण में भी है तथा इसकी भाषा भी साधारण बोलचाल के निकट तथा बोधगम्य है।

'आनंद रामावतार चरित्र' 1888 की रचना है। इसकी विशेषता यह है कि कवि ने वेदों को कथानक का मुख्य आधार बनाया है, किंतु वेदों से उसका अभिप्राय परंपरा से चला आने वाला लोक विश्रुत कथानक ही है। उसके रचयिता आनंदराम ने कथा की अभिव्यक्ति के लिए इतिवृत्तात्मक और गीति शैली का प्रयोग किया है। इसकी भाषा में फ़ारसी के सरल शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। ओंकार कौल के अनुसार इस रामायण पर शाक्त प्रभाव भी स्पष्ट होता है। (पृ. 30)।

विष्णु प्रताप रामायण 347 अध्यायों का पाँच कांडों में विभक्त विशाल महाकाव्य है। उसके मूल रचयिता पं. विष्णु कौल थे, जो डोगरा शासक महाराजा प्रताप सिंह के विशेष कृपापात्र थे। कवि ने अपने नाम का विष्णु और राजा के नाम का प्रताप शब्द लेकर इसका नाम विष्णुप्रताप रामायण रखा। इसके कथानक का मुख्य आधार भी 'वाल्मीकि  रामायण' ही है, किंतु  इसमें कवि ने राम की कश्मीर-यात्रा का प्रसंग भी चित्रित किया है। इस रामायण में विपुल साहित्यिक सौन्दर्य समाविष्ट हुआ है। डॉ. कौल ने गंभीर अध्ययन के पश्चात् यह तथ्य उद्घाटित किया है कि "प्रकाश रामायण के पश्चात् विष्णु प्रताप रामायण में ही वस्तु-विन्यास एवं काव्य शैली में क्षेत्रीय, साहित्यिक, सामाजिक और प्राकृतिक विशेषताओं का अधिक समावेश हुआ है।' (पृ. 32)

शर्मा रामायण की रचना श्री नीलकंठ शर्मा ने की। आठ कांडों में विभक्त इस रामायण का रचनाकाल 1919 से 1926 ई. के बीच माना जाता है। नीलकंठ शर्मा 'अध्यात्म रामायण और रामचरित मानस' से विशेष रूप से प्रभावित हुए; फिर भी उन्होंने अनेक मौलिक उद्‌भावनाएँ की हैं। साहित्यिक दृष्टि से इसकी भाषा में उर्दू, हिंदी  और फारसी के शब्द बहुतायत से हैं। चमत्कारपूर्ण अलंकार योजना भी इस ग्रंथ में प्राप्त होती है।

'ताराचंद रामायण' सन् 1927 की रचना है। इस पर भी 'रामचरित मानस' और 'अध्यात्म रामायण' का विशेष प्रभाव है, किंतु कवि ने अंधानुकरण न करके अपनी मौलिक सृजनशीलता के उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। इसकी भाषा में फारसी शब्दों का बहुत कम प्रयोग मिलता है।

'अमर रामायण' की रचना सन् 1940 ई. में श्री अमरनाथ द्वारा की गई। इसकी कथा का मुख्य आधार वाल्मीकि रामायण है। इस रामायण की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि कवि ने इसके कथानक को आधुनिक अर्थ भी प्रदान करने का प्रयास किया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कवि ने कुछ घटनाओं को परिवर्धित भी किया है। सुग्रीव-तारा विवाह, मंदोदरी-विभीषण विवाह इसका प्रमाण है। इस रामायण पर प्रकाश रामायण का भी प्रभाव है। इसमें सीता के पृथ्वी-प्रवेश प्रसंग में शंकरपुर का ही उल्लेख मिलता है।

कश्मीरी में रामकथा काव्य संबंधी इन ग्रंथों के अतिरिक्त बहुत बड़ी संख्या में ऐसे गीत भी रचे गए  हैं, जिनमें रामकथा से जुड़े पात्रों की लीलाओं का चित्रण है। इन गीतों में राम और लक्ष्मण आध्यात्मिक तथा नैतिक विषयों पर ज्ञानोपदेश करते दिखाए गए हैं।

जहाँ तक हिंदी में राम कथा संबंधी काव्य परंपरा का प्रश्न है, वह सही रूप में गोस्वामी तुलसीदास से ही प्रारंभ हुई मानी जा सकती है। डॉ. ओंकार कौल ने लिखा है कि "गोस्वामी तुलसीदास से पूर्ववर्ती हिंदी रामकाव्य में रामानंद के भक्ति विषयक पदों, सूरसागर में वर्णित रामकथा संबंधी पदों, पृथ्वीराज रासो की दशावतार कथा के अंतर्गत रामकथा के अतिरिक्त ईश्वरदास द्वारा रचित भरत-मिलाप राम-जन्म तथा अंगद पैज रचनाओं का उल्लेख किया गया है।" (पृ. 37)। यहीं डॉ. कौल यह भी मानते हैं कि रामानंद के पदों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। पृथ्वीराज रासो में प्राप्त रामकथा विषयक छंद प्रक्षिप्त सिद्ध हो चुके हैं और "कथा निरूपण की दृष्टि से सूरदास द्वारा रचित पद भी विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहे जा सकते।" (पृ. 37)

गोस्वामी तुलसीदास को डॉ. कौल पहला ऐसा कवि मानते हैं, जिन्होंने रामकथा को न केवल एक व्यवस्थित परंपरा का रूप दिया, बल्कि उसे लोकप्रिय भी बनाया। उनका रामचरितमानस विश्व का अनूठा रामकथा विषयक ग्रंथ है। इसके पश्चात् श्री कौल ने रामचंद्रिका, गोविन्द रामायण, साकेत, वैदेही वनवास, साकेत संत के विस्तृत परिचय के साथ रामचरित चिन्तामणि, रामचंद्रोदय, कौशल किशोर, उर्मिला और कैकेयी आदि रचनाओं का भी उल्लेख किया है। लेखक के विवेचन में गोविन्द रामायण और साकेत की चर्चा ध्यान आकर्षित करती है। सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित गोविन्द रामायण जहाँ राम को एक ऐसे लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित करती है, जो दुष्टों का दलन करने वाला योद्धा है, वहीं साकेत उर्मिला के जीवन का उद्धार और कैकेयी के चरित्र का परिष्कार करता है।

इस ग्रंथ में कथा विवेचन, चरित्र-चित्रण, धार्मिक नैतिक स्थापनाओं, रस निरूपण और काव्य शैली के आधार पर किये गए  तुलनात्मक अध्ययन को मुख्य सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। रामकथा के कथा-विवेचन संबंधी अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दोनों भाषाओं के काव्य की रामकथा का मुख्य आधार वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण हैं। दोनों भाषाओं के कवि लोक सम्पत्ति, उपनिषद, पुराण आदि का पर्याप्त उपयोग करते हैं। इसी के साथ वे विभिन्न अवसरों पर मौलिक उद्भावना शक्ति का परिचय भी देते हैं। रामकाव्य के रचनाकारों ने दोनों भाषाओं में कुछ ऐसी विशिष्टताओं का समावेश भी किया है, जो इन्हें एक दूसरे से अलग करती हैं। उदाहरण के लिए, 'प्रकाश रामायण' में सीता को ननद के अनुरोध पर रावण का चित्र बनाते दिखाया गया है, किंतु  यह वृत्तांत अन्यत्र प्राप्त वृत्तांतों से मेल नहीं खाता। इसी प्रकार रामकथा के अनेक प्रसंग ऐसे हैं, जो कश्मीरी रामकथा काव्यों में विस्तार से चर्चित हुए है, जबकि हिंदी  में उनका उल्लेखमात्र हुआ है। "दोनों भाषाओं के रामकथा काव्यों में कई प्रसंगों के चित्रण में अलग-अलग से आदि काव्य से लेकर समस्त पूर्ववर्ती संस्कृत एवं अन्य भाषाओं के राम साहित्य के आधार पर तथा नवीन उ‌द्भावनाओं के परिणामस्वरूप वैषम्य भी मिलता है।"

रामकथा के चरित्र दोनों ही भाषाओं के काव्यों में अलौकिक के साथ लौकिक रूप भी रखते हैं। इनमें से दोनों ही कवियों ने राम के चरित्र में लौकिक आदर्शों की जो प्रतिष्ठा की है, वह दर्शनीय है। यह कवि-कौशल का उदाहरण ही कहा जाएगा कि वे राम को सर्वोच्च अलौकिक शक्ति के स्तर पर प्रतिष्ठित करने के बाद भी मर्यादा पुरुषोत्तम के स्तर पर ले आए हैं। अन्य पात्रों के माध्यम से भी इन कवियों ने ऐसे ही प्रयास किए हैं। डॉ. कौल ने एक प्रशंसनीय कार्य रामकथा के पात्रों की प्रतीकात्मक व्याख्या का किया है। यदि ध्यान से देखें, तो ये पात्र हमें सार्वकालिक सद् और असद् प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी खड़े दिखाई देते हैं। कश्मीरी और हिंदी  दोनों ही कवियों ने इस ओर ध्यान दिया है।

डॉ. कौल मानते हैं कि, "रामकथा की मूल चेतना धर्ममयी है, अतः रामकाव्य को धर्म काव्य कहना अनुचित न होगा। आदि कवि की रामायण में यह लोकोत्तर धार्मिक भावना किसी  संप्रदाय विशेष से मुक्त होकर पूरे जनमानस में व्याप्त है।" (पृ. 188)। इस निष्कर्ष का पूर्वार्ध बौद्धिक क्षेत्रों में कई विवाद पैदा कर सकता है; विशेष रूप से स्वाधीन भारत जिस प्रकार पुनरुत्थानवादी सोच और उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया के उत्पन्न एक जटिल सामाजिक-वातावरण का शिकार हुआ है, वह इस निष्कर्ष को सवालों के घेरे में खड़ा कर सकता है। वैसे भी रामकाव्य मूलत; धार्मिक-काव्य न होकर समाज-सांस्कृतिक काव्य है। भारत के लोक ने जिस रूप में राम को आनाया है, वह दैनंदिन जीवन के लिए अनिवार्य आस्थाओं के पालन और कालजीवी जीवन-मूल्यों के विलक्षण समन्वय का ही रूप है। यही कारण है कि धर्म के क्षेत्र में भी राम किसी रूढ धार्मिक विश्वास पर खड़े न होकर धार्मिक-समन्वय की पुष्ट भूमि पर विराजमान हैं। तुलसी सहित भारतीय भाषाओं की सभी रामकाव्य कृतियों में इसे खोजा जा सकता है।

ओंकार कौल के अध्ययन से भी यही स्पष्ट होता है कि समस्त भेदों, उपभेदों और विषमताओं के परे हटकर विकसित होने वाला यह दृष्टिकोण कश्मीरी तथा हिंदी  रामकथा काव्य में विद्यमान है। दोनों ओर ही धार्मिक सामंजस्य का प्रयास किया गया है। कश्मीर में जिस समय शैव, शाक्त, वैष्णव, सूफ़ी आदि अपने-अपने संप्रदाय के प्रचार-प्रसार में लगे थे और धर्म की परिभाषा संकीर्णता का शिकार हो गई थी, उस समय कश्मीरी रामकथाकारों ने विभिन्न धार्मिक विचारों को एकाकार करने का प्रयत्न किया। प्रकाश रामायण में यह प्रयास कुछ अधिक ही हुआ। हिंदी  में भी समन्वयात्मक विचारधारा रामकाव्य की प्रमुख विशेषता बन गई। इस दोनों कवियों ने धर्म और मानव-मूल्यों को एक बनाया। इन्होंने अध्यात्म और भक्ति के साथ-साथ नीति, नैतिकता तथा सामाजिकता का पाठ विशाल पैमाने पर पढ़ाया। डॉ. कौल के अनुसार, "दोनों भाषाओं की रामायण में सामान्य लोकनीति के अंतर्गत कवियों द्वारा निर्दिष्ट अनुदात्त मानसिक प्रवृत्तियों के बहिष्कार और उदात्त गुण तत्त्वों के ग्रहण करने से संबंधित नीति कथनों की ही विवेचना की गई है।" (पृ. 213)। लेखक ने दोनों में एक अंतर भी बताया है। वह यह, कि तुलसी ने तत्कालीन समाज में कुत्सित वृत्तियों के आधिक्य के यथार्थ को दर्शाने के लिए नारी की निंदा की है, जबकि कश्मीरी रामकथा काव्यों में कहीं भी ऐसा नहीं किया गया है। रामकाव्य के अध्येताओं के लिए यह निष्कर्ष भी विचारोत्तेजक सिद्ध हो सकता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आंध्र के लोकगीत (डॉ. कर्ण. राजशेषगिरि राव)

कन्नड साहित्य का वृहद् इतिहास (लेखक - त.सु. श्यामराव एवं मे. राजेश्वरय्या, हिंदी रूपांतर - डॉ. मे. राजेश्वरय्या)

असमिया लोक साहित्य की भूमिका (भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी)