अपूर्व पर्व (चक्रवर्ती)

  

अपूर्व पर्व

चक्रवर्ती

 

दिग्दर्शन चरण जैन, ऋषभ चरण जैन एवं संतति

4697/5, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-2

प्रथम संस्करण- 1988, पृष्ठ- 110, मूल्य- 35 रुपए

 

'अपूर्व पर्व' डॉ. चक्रवर्ती द्वारा रचित एक ऐसा काव्य ग्रंथ है, जिसका आधार पौराणिक साहित्य है। श्रीम‌द्भागवत में एक प्रसंग आता है, जिसमें आलोकनायक आदित्य का वर्णन है। यह आलोकनायक महर्षि व्यास की अ‌द्भुत कल्पना है। पौराणिक कथा के अनुसार बारह मास बारह आदित्यों से संबंधित हैं। प्रत्येक मास से जोड़कर एक-एक आदित्य का वर्णन किया गया है और माना गया है कि प्रत्येक आदित्य के साथ एक ऋषि, एक गंधर्व, एक अप्सरा, एक यक्ष, एक नाग और एक राक्षस का मंडल भी विद्यमान है। ये सब आलोकनायक आदित्य की गौरव-गरिमा के अनुसार अपने-अपने कार्य करते हैं। उसी  पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि वैदिक ऋचाओं का दिव्य गायन करते हैं, गंधर्व अपने वीणा वादन से उन ऋचाओं को संगीत की आभा से जगमगाते हैं, अप्सराएँ नृत्य रचती हैं, यक्ष रथ-श्रृंगार करते हैं, नाद के द्वारा रथ के धुरों को कठिन पाश में आबद्ध किया जाता है और रथ का गति-संचालन राक्षस द्वारा होता है। इस प्रकार जब इतने भव्य और झिलमिलाते रूप में आदित्य की यात्रा निकलती है, तो प्रतीत होता है कि जैसे संपूर्ण सृष्टि अपूर्व और दिव्य वरयात्रा को देखकर प्रफुल्लित हो रही है।

यह दैवी प्रफुल्लता किसी को भी अपने सम्मोहन में बाँधे बिना नहीं छोड़ती, किंतु उस सम्मोहन का ताप कोई साधारण शक्ति तो झेल नहीं सकती। उस ताप को सहने के लिए भी अतल शीतलता दीप्ति, सौन्दर्य, निस्सीम गरिमा और अकूत लालित्य की आवश्यकता है। यह सब वसुंधरा के अतिरिक्त और किसमें मिलेगा। फलतः वसुंधरा ही आदित्य के प्रभाव से उत्पन्न भाव-माधुरी के समक्ष ठहर पाती है और वही सम्मोहन के ताप को सहन करती है। इस बिन्दु पर मृणमयी वसुंधरा नववधू बन जाती है।

पौराणिक साहित्य की यह प्रतीक-कथा वस्तुतः निष्काम-सृष्टि-रहस्य की कथा है। इसमें भाग लेने वाले सभी पात्र विभिन्न मनोवृत्तियों, शक्तियों, विविध प्रकार की ऊर्जाओं और इस सबके परे इंद्रधनुषी रचना ईप्साओं के प्रतिनिधि हैं। नववधू वसुंधरा सृष्टि के लिए व्याकुल शक्ति है। मूल कथा में कहा गया है कि आदित्य और वसुंधरा के मध्य यह संबंध अपेक्षित परिवर्तन और भिन्नता के साथ बारहों मास चलता है। अभिप्राय यही है कि सृष्टि रचना नैरंतर्य में बँधी हुई है। वह कभी न खंडित होती है और न विराम लेती है।

कवि चक्रवर्ती ने अपने काव्य में इस कथा को ज्यों का त्यों स्वीकार किया है। फिर भी ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने इसका काव्यानुवाद भर प्रस्तुत कर दिया है, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने अपनी रचना विधायिनी कल्पना शक्ति का प्रयोग करके मूल कथा को अतुल सौन्दर्य से मंडित कर दिया है। काव्य का प्रारंभ इन पंक्तियों से होता है- "रश्मि स्निग्ध/नीलाम्बर में/कितनी विराट/आलोक लीला/हो उठी/तरंगायित है" (पृ. 9)। इसके पश्चात भव्य यात्रा दिव्य परिवेश से घिरी प्रारंभ होती है--- "मधुमास/चेतना उल्लसित/ आनंदोत्सव/अनंत अनगढ़/मेष के/व्योम कांतार में/लोकनायक धातादित्य/का श्वेताश्व स्यंदन/निशा के जड़ तमिस्र से/उद्भूत चल पड़ा/उदयाचल पर हैं" (पृ. 10)। इन पंक्तियों में उस अद्भुत यात्रा का ऐसा बिम्ब निर्मित किया गया है कि पाठक उसकी शोभा को नेत्रों के समक्ष अनुभव करने लगता है। इसी प्रकार का अ‌द्भुत सौन्दर्य चित्र वसुंधरा का भी है--- "और/चित रश्मि/की स्वर्णोज्ज्वल/धारा झरती है/और पूर्ण समर्पिता/स्वर्ण रंजिता भू/के अंग-अंग/पर चिन्मय प्रकाश/वसंत संपात/का निर्झर/होता/प्रवाहित है" (पृ. 17)। इस अद्भुत चिन्मय प्रकाश से आलोकित धरा एक क्षण पुण्य पराशक्ति-सी हो जाती है। कवि ने अत्यंत मधुर और ललित कल्पना की तूलिका से उसमें प्रकाश के रंग उलीचे हैं। यह सृष्टि रचना की भूमिका है या कहें कि सृष्टि में जो कुछ सृजित हो रहा है, उसकी पूर्व पीठिका है। इसी के पश्चात् आलोक प्रिया अभिसार को व्याकुल होती है और सृष्टि का संकल्प पूरा करती है- "शस्य श्यामल/वसना/चिर मुग्धा/प्रिया वसुंधरा/पूर्वोन्मुख/सहस्र/पुष्पांजलियाँ/लिये/समर्पण को/चिर विह्वल/रहती खड़ी/प्रतीक्षित" (पृ. 72)।

डॉ. चक्रवर्ती ने स्थान-स्थान पर इसी प्रकार के प्रभावशील और सम्मोहक कथा-बिंब निर्मित किए हैं। यहाँ इस काव्य की प्रासंगिकता की चर्चा करना भी आवश्यक है। आधुनिक साहित्य में ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों तथा घटनाओं को ग्रहण करके काव्य रचना किये जाने की समृद्ध परंपरा विद्यमान है। सामान्यतः ऐसा दो उद्देश्यों से किया जाता है। एक यह कि कवि पुराण और इतिहास को केवल प्रतीक स्रोत के रूप में ग्रहण करता है तथा उससे आधुनिक संदर्भों को प्रस्तुत करता है। पुराण और इतिहास को ग्रहण करने का दूसरा उद्देश्य लेखक द्वारा इनके मर्म को पाठकों के सामने लाना भर होता है। ऐसे अवसरों पर ग्रहणकर्ता पौराणिक संदर्भों के मूल दार्शनिक सौन्दर्य से इधर-उधर नहीं हटता। वह दर्शन, रहस्य आदि की गंभीरता को बनाये रखते हुए उसे अपनी कल्पना के सहारे पुनर्प्रस्तुत करता है। अपूर्व पर्व में इस दूसरे उद्देश्य की ही प्रमुखता दिखाई देती है। कवि ने दार्शनिकता और आधुनिक संदर्भ के साथ उसकी प्रतीकात्मक व्याख्या को गड्ड-मड्ड नहीं किया है। इससे संपूर्ण काव्य में पौराणिक कथा का विस्तार अपने मूल रूप में बना रह सका है।

दर्शन और सृष्टि रहस्य को प्रस्तुत करने के साथ ही साथ अपूर्व पर्व की बहुत बड़ी देन भाषा और शिल्प के क्षेत्र में हैं। काव्य की रचना में अपूर्व पर्व जैसा समर्थ, सबल, सुंदर, संस्कृत और मोहक भाषा-शिल्प बहुत कम दिखाई देता है। प्रसंग की गंभीरता और प्रसंगों के अनुकूल कवि ने भाषा के सृजन तथा शब्दों के स्वीकार में किसी योगी की भाँति संयम और साधना से काम लिया है। कवि को बिंब-निर्माण का इतना कौशल प्राप्त है कि वह प्रत्येक बिम्ब में एक-एक कथा सूत्र को पूरा करता चलता है; इसीलिए काव्य का कोई भी पाठक कथा के प्रभाव स्पर्श से बच नहीं पाता।

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