त्रिवेणी (अनुवादक : कवियूर शिवरामय्यर)
त्रिवेणी
अनुवादक : कवियूर शिवरामय्यर
केरल हिंदी साहित्य अकादमी,
तिरुवनंतपुरम्- 695004
प्रथम संस्करण- 1990, पृष्ठ-
76, मूल्य- 30 रुपए
त्रिवेणी
में महाकवि उल्लूरपरमेश्वर अय्यर के प्रेमसंगीत, कर्णभूषण
तथा शिष्य और पुत्र शीर्षक से महाकवि
वल्लत्तोल नारायण मेनन की कविता ‘शिष्यनुम् मकनुम्’ का हिंदी अनुवाद संकलित है। इनमें से कर्णभूषण में कर्ण द्वारा आभूषणों
के दान से संबंधित कथा है। यह महाभारत के उस प्रसंग पर आधारित है, जिसमें दानवीर कर्ण अपने पिता सूर्यदेव के सावधान करने तथा रोकने पर भी
अपने कवच-कुंडल प्रतिज्ञाबद्ध होकर दान कर देते हैं। कथा के अनुसार कर्ण के कुंडल
और कवच प्राकृतिक रूप से उनके शरीर से जुड़े हुए हैं तथा उन्हीं के कारण वे अजेय
हैं। कोई भी शत्रु उनके रहते कर्ण को पराभूत नहीं कर सकता था। जब कर्ण के ये रक्षा-उपकरण
छलपूर्वक माँगे जाते हैं, तो सूर्य देव उन्हें समझाते हैं।
कर्ण अपने पिता को अपने जीवन का वृत्तांत सुनाते हैं, जिससे
प्रभावित होकर सूर्य अपने पुत्र का आलिंगन करते हैं।
त्रिवेणी
में महाकवि उल्लूर द्वारा रचित प्रेम संगीत का हिंदी अनुवाद भी है। यह मूलतः एक
भावगीत है, जिसमें प्रेम की दिव्यता और जगत के अनंत-अज्ञात
रहस्य का संकेत किया गया है। कविता का मूल दर्शन यह है कि जीवन का वास्तविक आधार
प्रेम है और पारस्परिक विश्वास तथा स्नेह जीवन की सार्थकता की कुंजी है- "आपस
का अनुराग जगत में/ सुकृति जाया पतिका रोपित/शुभकर कल्पद्रुम है जिसके फल उत्तम है
निज संततियाँ' (पृ. 18)। यह पारस्परिक अनुराग ही मनुष्य को
मनुष्य बनाता है। यहाँ तक कि ईश्वर तक पहुँचने का प्रशस्त मार्ग भी निर्मित करता
है। यह अनुराग प्राणियों के हृदय के संपूर्ण कलुष को धो डालता है, वासनाओं को मिटा देता है, शत्रुभाव को शेष कर देता
है और हृदय को अनंत विस्तार दे देता है। अनुराग पूजित हृदय में समस्त प्राणियों को
आत्मवत् मानने की भावना आ जाती है, जिसके कारण व्यक्ति
सृष्टि का संचालन करने वाली सत्ता के चरणों में स्थान पा लेता है--- "परसुख
ही सुख होता मेरा/पर दुःख तो दुःख अपना ही है/वास्तव में 'तू',
'परपुरुष', 'मैं'/केवल
एक अखंड नहीं है?/मेरी काया मेरी श्वासा/तेरे चरणों पर
न्योछावर/दिन-रात उन्हीं दोनों का तू/परार्थ कर दे प्रभु नमस्कार" (पृ. 23)।
यह भावगीत आधुनिक जगत में व्याप्त अविश्वास, द्वेष, नास्तिकता और अनास्था की समस्या सुलझाने की दिशा में एक समर्थ प्रयास
माना जा सकता है। यह मलयाळम भाषा का ऐसा भावगीत है, जो
सहस्रों लोगों के कंठ में स्थापित हो चुका है।
मलयाळम
भाषा के महाकवि वल्लत्तोल की प्रसिद्ध कविता’ शिष्यनुम्
मकनुम्’ का हिंदी-अनुवाद, ‘शिष्य और
पुत्र’ भी अनुदित रूप में त्रिवेणी में छपा है। यह कविता भी
एक पौराणिक प्रसंग के आधार पर रची गई है। मूल प्रसंग के अनुसार परशुराम और गणपति
के बीच द्वंद्व युद्ध छिड़ जाता है तथा गणपति का एक दाँत टूट जाता है। इस घटना से
सारा कैलाश क्षुब्ध हो जाता है। देवी पार्वती का क्रोध तो सारी सीमाएँ तोड़ने लगता
है। यह देख कर भगवान शंकर के समक्ष समस्या आ खड़ी होती है। वे अपने को ऐसी स्थिति
में पाते हैं, जहाँ उनके सामने शिष्य और पुत्र में से किसी
एक को चुनने की समस्या है। वास्तविकता यह है कि वे अपने शिष्य को पुत्र से कम
प्रेम नहीं करते। दूसरी ओर पार्वती है, जो पुत्र मोह में
शंकर को उपालंभ देती हुई कहती है- "घायल हो कि मरे सुत तो क्या?/निकट महारथ चेला है ना?/"जगती सत्तम राम वाह!
रे!/पात्र देख तो विद्या देना/कुल्हाड़ी जो मुठिया के हित/बलिष्ठ शाखा जिससे
पाती/उसी वृक्ष को काट गिराती/हाँ कृतज्ञता ही दिखलाती" (पृ. 32)। यह कलह
अनिष्ट का रूप बन जाए, इससे पहले ही वहाँ राधा और कृष्ण का
आगमन होता है। उनके आ जाने से वातावरण शांत हो जाता है। राधा मुरली से निस्सारित
मधुर स्वर के समान मधुकंठ से समझाती है- "बच्चे चापल कुछ कर डालें/मैया ऐसे
क्या चुर जाये?/जिस दिन भार्गव शिव-शिष्य बना/उस दिन तेरे
सुख तीन हुए/इस कुलीन को निज पुत्रों से/अधिक सोचकर स्नेह निभाना/दोहद, प्रसव व्यथा के बिन, यह/पाया तनय इसे अपनाना"
(पृ. 35)। ऐसा प्रतीत होता है कि महाकवि ने इस पौराणिक कथा के माध्यम से पारिवारिक
और गुरु-शिष्य संबंधों को व्याख्यायित किया है। आधुनिक काल में संबंधों में जो
शैथिल्य और परायापन आ रहा है तथा सामाजिक स्तर पर भावनात्मक गरिमा का जो ह्रास हो
रहा है, कवि उसका सटीक समाधान देना चाहता है।
जहाँ
तक अनुवाद का प्रश्न है, त्रिवेणी के अनुवादक कवियूर
शिवराम अय्यर संस्कृत एवं मलयाळम के विख्यात पंडित कवियूर वेंकटाचलन अय्यर के
पुत्र हैं। इस कारण उनके पास अद्भुत भाषा-ज्ञान तथा अनुवाद-क्षमता है। ऐसा प्रतीत
होता है कि उन्होंने इन काव्यों का अनुवाद केवल किसी परंपरा का पालन करने के लिए
नहीं, बल्कि किसी महान उद्देश्य को ध्यान में रख कर किया है।
स्मरणीय है कि शिवराम अय्यर ने देश-प्रेम से प्रेरित होकर हिंदी सीखी थी। संभवतः
उसी से प्रेरित होकर उन्होंने अनुवाद के लिए ऐसे काव्यों का चुनाव किया, जो पारस्परिक प्रेम संबंधों की मधुरता तथा त्याग-निष्ठा का पाठ पढ़ाने
वाले हैं। अनुवाद के लिए चुनी गई भाषा मूल काव्यों के केंद्रीय स्वर को आधुनिक संदर्भों
से जोड़ने में समर्थ है। अनुवादक ने हिंदी के व्यावहारिक प्रयोगों को अपनाने का प्रयास
किया है, जैसे--- मिलजुल सकल पदार्थ
बने हैं (पृ. 17), 'अगल-बगल बैठे लोग उठे' (पृ. 26) उतावली क्यों ठहरो कुछ क्षण (पृ. 27) एक झलमला कवच दूसरे (पृ. 47)
आदि। ये प्रयोग उनकी भाषायी क्षमता को पुष्ट करते हैं।
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