एक पल की याद में (सुमतीन्द्र)
एक
पल की याद में
सुमतीन्द्र
राजमोहन प्रकाशन, तिरुच्चिरापल्लि
प्रथम संस्करण- 1961, पृष्ठ-
232, मूल्य- 3 रुपए
रांगेय
राघव के विषय में कहा जाता है कि वे किसी लेखक की पुस्तक पर बड़ी मुश्किल से ही
टिप्पणी करते थे। ऐसा करने के पीछे उनकी धारणा यह थी कि लोग अक्सर विहंगम दृष्टि
से या फिर संबंधों के आधार पर किसी पुस्तक को देखते हैं और समयानुकूल टिप्पणी कर
देते हैं। अन्य लोगों के विषय में या उनकी रचनाओं के विषय में कोई राय प्रकट करते
समय जो लेखक इतना सावधान रहता था, उसी ने कवि सुमतीन्द्र
के काव्य संग्रह 'एक पल की याद में' पर
अपनी टिप्पणी इन शब्दों में की है- "यह कवि हिंदी में नये उपमान लाया है
इसलिए मैं इसका स्वागत करता हूँ। कवि ने भावों की अभिव्यक्ति बड़ी सक्षमता से की
है इसलिए इसे बधाई देता हूँ। कवि का भविष्य उज्ज्वलतम हो।"
रांगेय
राघव की यह टिप्पणी एक पल की याद में संग्रहीत कविताओं पर अक्षरशः लागू होती है और
उनका दिया आशीर्वाद भी फलीभूत हुआ प्रतीत होता है। वह चाँद टूटे सपने की
तररह/प्यारा है, चाहे अधूरा है। बढ़ेगा आशा की तरह—/ मेरी
बढ़ती उदासी की तरह—/ पूरा होगा। (पृष्ठ 8)। या फिर
बादल/प्रकाश के शत्रु/साम्राज्यवादी काले अजगर (पृ. 26) जैसी
पंक्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि कवि सुमतीन्द्र वर्षों पहले अपनी कविताओं के
माध्यम से हिंदी कविता के क्षेत्र में नये
उपमानों, प्रतीकों, कथन भंगिमाओं और
अभिव्यक्ति शैली के प्रति न केवल आकर्षित हो गए थे, बल्कि
उन्हें प्रतिष्ठित भी करने लगे थे। ‘एक पल की याद में’ शीर्षक काव्य-संग्रह में उनकी जो कविताएँ प्रकाशित हुई हैं, वे नवीन भावबोध और शिल्प के प्रति आग्रहशील दिखाई देती हैं। उन्होंने
अपनी एक कविता में संध्या को एक ऐसी पगडंडी के रूप में कल्पित किया है, जो रात के स्वागत में बिछी हुई है। संध्या की यह पगडंडी कुछ देर बाद
अंगूरी उजाले में मनुष्यों के हृदय-छोरों को डुबो देगी तथा रात्रि के चरणों में
नतशीश होकर सो जायेगी- "साँझ पगडंडी सी रात के स्वागत में बिछी/जो पल भर
जीकर/कोलाहल में/अंगूरी उजास में डुबोकर दिलों के छोर सो जायेगी/नत हो जायेगी/रात
के चरणों में (पृ. 49)। यहाँ साँझ का पगडंडी होना तथा उजाले
का अंगूरी होना बहुत प्रभावशाली प्रयोग हैं। कवि ने दोनों उपमानों को बिना सोचे
समझे अथवा केवल नवीनता के मोह में ही प्रयोग नहीं किया है,
बल्कि उसने इनके माध्यम से काल के एक विशेष खंड को अभिव्यक्ति दी है। साँझ और रात
का संबंध पगडंडी के सहारे बहुत प्रगाढ़ हो गया है। पगडंडी हुए बिना ये दोनों
सार्थक रूप में परस्पर निकट नहीं हो सकते। इसी प्रकार साँझ और रात के संधि बिन्दु
पर प्रकाश का अंगूरी होना उस समय संपन्न होने वाले कार्य-व्यापार की गवाही देता
है। इस समय वातावरण में जो मादकता आ जाती है, उसके प्रकटीकरण
के लिए ‘अंगूरी उजास’ से अच्छा कोई
अन्य प्रयोग कठिन है। सुमतीन्द्र वातावरण की सच्चाई को अधूरा नहीं छोड़ते। वे
थोड़ा आगे लिखते हैं--- चाँद की बिंदिया लगाकर दूधिया घूँघट निकाले/अलसाई मानिनी
सी/ रजनी आई! (पृ. 150)। यहाँ भी कवि ने प्रतीक व उपमान के
चयन और प्रयोग में गंभीर दृष्टि तथा कौशल का परिचय दिया है।
सुमतीन्द्र
की इन कविताओं का रचनाकाल वही है, जो हिंदी में नई कविता आंदोलन के प्रारंभ का काल है। 'एक पल की याद में' संग्रह की दूसरी कविता सन् 1955
की है और अंतिम कविता 1958 की। हिंदी में यह अवधि नई कविता के प्रतिष्ठित होने की
अवधि है। ऐतिहासिक दृष्टि से उन दिनों कविता में नई चेतना और नये प्रयोगों की
भरपूर वकालत की जा रही थी। अज्ञेय तो बहुत पहले ही कविता को प्रयोग का विषय घोषित
कर चुके थे। उनकी प्रतिक्रिया में छठे दशक के मध्य में नकेनवादी कवि इससे आगे
बढ़कर प्रयोग को साध्य बनाने की घोषणा कर चुके थे। इन दो धारणाओं के समांतर जगदीश
गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी, विजय देव
नारायण शाही, विपिन अग्रवाल, गिरिजाकुमार
माथुर तथा धर्मवीर भारती जैसे कवि-चिंतक नये ढंग से कविता में नूतनता के प्रवेश को
संभव बना रहे थे। ये लोग अज्ञेयवादी या नकेनवादी नहीं थे, बल्कि
कविता में सहज ढंग से वैज्ञानिक दृष्टि और आधुनिकता बोध की वकालत करने वाले
स्वतंत्रचेता थे। ये अभिव्यक्ति और शिल्प दोनों ही क्षेत्रों में कविता को नवीन संस्कारशीलता
प्रदान कर रहे थे। जिन दिनों इलाहाबाद और उत्तर भारत के कुछ अन्य स्थानों पर कविता
में इस प्रकार का आंदोलन दिखाई दे रहा था, ठीक उन्हीं दिनों
कवि सुमतीन्द्र तमिलनाडु की सुदूर दक्षिणी हवा में साँस लेते हुए कविता को अभिनव
प्रयोगों का विषय बना रहे थे। हिंदी पंडित
होने के नाते हिंदी के तत्कालीन कवियों से
उनका परिचय होना स्वाभाविक था, किंतु तत्कालीन काव्यचेतना से उनका इतना निकट संबंध
विस्मयकारी है।
नई
कविता आंदोलन के काल में कवियों के सामने एक चुनौती काव्य-समीक्षा की थी। कई बड़े
आलोचक नई कविता को कविता ही नहीं मानते थे और जो आलोचक कविता मानते भी थे, उन्हें भी वह वाग्जाल के अतिरिक्त कुछ प्रतीत नहीं होती थी। इसीलिए
कवियों को अपनी कविताओं के संबंध में टिप्पणी करना आवश्यक जान पड़ता था। इस
परिस्थिति का छद्म यह था कि कवि समीक्षक की भूमिका निभाते हुए भी प्रकट यही करते
थे कि वे समीक्षक का कार्य नहीं कर रहे हैं। कवि सुमतीन्द्र भी इस प्रारंभिक
विरोधाभास से बचे नहीं हैं। अपनी बात के अंतर्गत वे एक जगह कहते हैं-
"कविताओं की भूमि के विषय में कुछ कहना आवश्यक नहीं है। यदि कविताएँ स्वयं
नहीं कहतीं, तो कवि का कुछ कहना सार्थक नहीं है" इसके
तुरंत बाद वे कहते हैं- "फिर भी दो बातें कह देना अनुचित नहीं होगा। पहली बात,
ये कवितायें व्यक्ति केंद्रित हैं, सामाजिकता
का स्पर्श आग्रह के साथ नहीं दिया गया है। दूसरी बात, लेखक की
मातृभाषा हिंदी नहीं, तमिल है" यद्यपि यह टिप्पणी
कविताओं को समझने का अथवा उनकी भूमिकाओं को जानने का कोई बहुत समर्थ स्रोत नहीं
बनती, फिर भी तत्कालीन कवि-धर्म का एक अंतर्विरोध तो इससे
प्रकट होता ही है। हो सकता है यह तत्कालीन वातावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव हो।
एक
पल की याद में संग्रह की कविताएँ ऐसे रोमानी बोध से परिचित कराती हैं, जिसमें सहज उन्मुक्ति के साथ-साथ प्रेम तथा वासना की परिव्याप्ति भी है।
एक स्थान पर कवि कहता है- "तुम नहीं तो जीवन नहीं/नभ के सूने आँगन में/तारे
हजारों जलते हैं/चाँद की मुस्कान बिना/अँधेरा धुलता नहीं/स्पंदन है पर जीवन
नहीं" (पृ. 12)। कवि के हृदय की यह रागात्मकता जब आगे
बढ़ती है, तो वह कहता है- "चाँद उजला रात उजली/फिर भी
हम तुम दूर सजनी ! (पृ. 140)। यह भावना जब वासना में परिणत
होने लगती है, तो कवि कहता है- माना क्षुद्रता मेरी जग जानता
है/साथ चलने में तुम्हें होती शर्म है/पर तुम्हारी प्रिय याद यों मन साथ में/नयनों
के साथ ज्यों नीर औ कसक है/साथ न भी दो भाव दो साथ का/यह मौन हटे" (पृ. 206)। कवि सुमतीन्द्र की इन अभिव्यक्तियों के मर्म तक पहुँचने में संग्रह के
मुखपृष्ठ पर छपा चित्र विशेष सहायता करता है। इस चित्र के विषय में कवि की टिप्पणी
है- “आवरण पर का रेखाचित्र तिरुनेलवेली के नेल्लैयप्पर मंदिर में स्थित रति देवी
की मूर्ति की सरल अनुकृति है।" इससे यह सिद्ध होता है कि कवि की सृजनशीलता
में घोर रोमानियत का विशेष महत्त्व है- इतना विशेष कि जब उसके हृदय की रोमानियत
शब्दों में बँधकर संतुष्ट नहीं होती, तो वह चित्रकला का
सहारा लेता है। इन कविताओं के रचनाकाल को देखते हुए यह अस्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं
है। ठीक उन्हीं दिनों धर्मवीर भारती भी— "इन फीरोजी होठों पर बर्बाद मेरी
ज़िन्दगी" जैसी कविताएँ रच रहे थे।
इतना
होने पर भी ‘एक पल की याद में’
संग्रह की कविताएँ युगीन यथार्थ से कटी हुई नहीं हैं। भले ही कवि ने भूमिका में
सामाजिकता के स्पर्श से साग्रह अलगाव दर्शाया हो, किंतु अपनी
कविताओं में वह जिस पहचान की खोज में संलग्न दिखाई देता है,
वह मात्र उसकी निजी न होकर उसके जैसे असंख्य लोगों की है- "मैं बैठा यहाँ
कमरे में/खिड़की की ओर मुँह किये देख रहा हूँ चाँद/चार घंटे के पहले/आसमान के सीने
पर था/यौवन पर था/अब ढल रहा है/पर खुश है/उसका जीवन अनंत है/और/मैं/न चाँद न
आसमान/न तारा/मैं कौन?" इन पंक्तियों में कवि जिस ‘मैं’ को खोजने और समझने के लिए व्यग्र है, वह एकाकी न होकर सामूहिक है। कविता में इस मैं की खोज आज तक जारी है। इसी
के साथ इस संग्रह की कविताएँ युगीन वातावरण के प्रति भी ईमानदार रहने की कोशिश
करती हैं। सुमतीन्द्र ने जीवन के उस पक्ष का निर्भीक चित्रण किया है, जो दंभ, दैन्य, दलन, दाह, पंक, सत्य, असत्य, सुंदर, असुंदर, शुभ, अशुभ आदि के बीच झुलसते रहने को अभिशप्त है
(पृ. 85)। किंतु कवि की मौलिकता यह है,
कि वह इस संक्रांति युग में अपनी कविता पर इतनी आस्था रखता है कि उसे उद्धार कर्त्री
माने बिना नहीं रहता - "संक्रांति युग का जनमय/भँवर पड़ी नाव/कृष्ण बिना
अर्जुन/तुम पर मेरी आशा/तुम! कविता!!" (पृ. 86)।
एक
पल की याद में शीर्षक संग्रह की वह कविता भी मूलतः रोमानी ही है, जिसके आधार पर इस संग्रह का नामकरण किया गया है। कवि ने प्रेम एवं वेदना
को अभिव्यक्ति के लिए चुना है और वेदना के साथ ही जीवन जीने की आकांक्षा प्रकट की
है- "मैं जीऊँगा इस एक पल की याद में" (पृ. 133)। कवि
सुमतीन्द्र का यह संग्रह रोमान, यथार्थ तथा अभिनव
कल्पनाशीलता का मिश्रण है। इस मिश्रण के अनुरूप ही कवि की भाषा भी है। ठेठ हिंदी वातावरण
से दूर रहकर भी सुमतीन्द्र ने हिंदी के
मुहावरे को साधे रखने का प्रयास किया है।
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