जीने की ललकार (पी. नारायण 'नरन')
जीने
की ललकार
पी. नारायण 'नरन'
ललकार प्रकाशन, संन्यासी
परम्बु,
नीलिकाड, पालघाट- 678002
(केरल)
प्रथम संस्करण- 1987, पृष्ठ-
90, मूल्य- 25 रुपए
‘जीने की ललकार’ काव्य संग्रह में परिशिष्ट शैली में
एक लंबी कविता छपी है- "चिन्गारियाँ" यह कविता कवि के "हिन्द
पुराण" नामक चम्पूकाव्य का एक भाग है। कवि ने इसे समसामयिक जीवन के विविध
पक्षों को प्रस्तुत करने के लिए रचा है और कई उपशीर्षकों के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण
काव्य टिप्पणियाँ की हैं। इस लंबी कविता की उल्लेखनीय विशेषता है कि इसके रचना-शिल्प
का ताना-बाना लोककाव्य शैलियों से निर्मित किया गया है। इनमें भी कवि की मौलिकता
यह है कि उसने लोक शैलियों का भी अंधानुकरण नहीं किया है,
बल्कि अपनी ओर से भी काफी कुछ जोड़ा है। मूलरूप से चिन्गारियाँ कविता मराठी भाषा
के जनकवि रामजोशी द्वारा प्रयुक्त ‘लावणी’ शैली और आंध्र प्रदेश में प्रचलित ‘बुर्र’ कथा शैली में रचित है। कवि के अनुसार यह कविता डफली और मंजीरे पर भी गाई
जा सकती है। कविता का प्रारंभ कुछ इस प्रकार होता है- "अजब तमाशा देखो रे
भाई!/ग़ज़ब तमाशा देखो!/हिंदू घंट हिलाता है मुसलमान चिल्लाता है/अर्थ न जाने वेद
पुराने मेघ ज्यों टर्राता है/तुर्कों की भी टोली देखो!/ऊँटों जैसी बोली देखो/कान
ढाँपे बाँग देते करीम को भी बहरा करते/अल्लाह! अल्लाह! बिस्मिल्ला!" (पृ. 73)। स्पष्ट है कि कवि यहाँ सीधे-सीधे कबीर से प्रभावित है। यह प्रभाव इतना
अधिक है कि कवि के समस्त कथन कबीर के यहाँ से आते हुए प्रतीत होते हैं। प्रश्न यह
है कि आज जब कविता ने आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता और ऐसे ही
अनेक विमर्श-बिन्दुओं को अपना विषय बना लिया है, तब कबीर की
शैली में धार्मिक पाखंडों का विरोध करने वाली कविताएँ रचने की सार्थकता क्या है?
वर्तमान कविता के केंद्रीय चरित्र को देखते हुए यह प्रश्न
महत्त्वपूर्ण भी लगता है, किंतु पी. नारायण 'नरन' की कविताओं के संदर्भ में बात करते समय कुछ
अन्य बिन्दुओं पर भी विचार करना होगा। यह तो सही है कि धर्म की भूमिका निरंतर
प्रश्नों से घिरती जा रही है। औद्योगिक तथा अंतरिक्ष विज्ञान से प्रभावित सभ्यता
के युग में धार्मिक विषयों पर रची गई कविताएँ प्रभावित नहीं करतीं, किंतु हमें इस प्रश्न पर भी विचार
करना होगा कि क्या सचमुच धर्म की भूमिका समाप्त हो गई है? यदि
ध्यान से देखें तो ऐसा नहीं है। इस सभ्यता का विषम और त्रासद पहलू यह है कि इसका
एक पहिया विज्ञान तथा तकनालॉजी से निर्मित है और दूसरा धर्म के नाम पर प्रचलित
पाखंडपूर्ण कर्मकांड से— औद्योगिक दृष्टि से उन्नत समाज के सदस्य भी कोई कार्य प्रारंभ
करने से पहले मुहूर्त निकलवाने में विश्वास रखते हैं। इसके अतिरिक्त जो लोग
सामाजिक दृष्टि से पिछड़े इलाकों में रहते हैं अथवा जिन्होंने आधुनिक उन्नति का
स्वाद अधिक नहीं चखा है, वे अभी भी पाखंडी साधुओं, पुजारियों, टोना-टोटका करने वालों, तात्रिकों आदि से भयभीत देखे जाते हैं। धार्मिक वैमनस्य की घटनाएँ तो
सामान्य जीवन-क्रम का हिस्सा बनने लगी हैं।
पी. नारायण 'नरन' के लिए यह परिस्थिति एक बड़ी चिंता का विषय है और यही चिंता इस लंबी कविता की पृष्ठभूमि भी है। कवि के जीवनवृत्त
के अनुसार 'नरन' जी प्रारंभ से ही
सामाजिक सुधार आंदोलनों में भाग लेने लगे थे। वे केरल के जिस समाज में जन्मे, वह आज भी धार्मिक रूढ़ियों में जकड़ा हुआ है। सामाजिक और सामंतवादी जकड़न
के विरोध में कवि को अनेक संकटों का सामना भी करना पड़ा। यही कारण है कि प्रत्येक
प्रकार की रूढ़ि, शोषण, विषमता,
अव्यवस्था, अन्याय, अनौचित्य
का विरोध करना कवि का संस्कार बन गया है। "ज़िन्दगी की गंदगी सब तीर्थों में
आ उतरी है" (पृ. 74)/ "मजहब के इन अंधों की चारों
आँखें गायब हैं" (पृ. 75)/ "गिरिजाघर के तहखानों
में सिस्टर मद्दर होती हैं" (वही) जैसी पंक्तियाँ कवि के स्वभाव को प्रकट
करती हैं। ऐसा लगता है जैसे 'नरन' केरल
की हिंदी कविता के कबीर बन गए हों। सत्य है, घर फूँक तमाशा
देखने वाला कबीर ही इतनी कठोर बातें कह सकता है। कवि ने भारतीय लोगों की मानसिकता
का परिचय इन शब्दों में दिया है- "इंडिया में तहज़ीब कहाँ लंदन के दीवाने
हैं/मैकाले के काले बाबू अंग्रेजी परवाने हैं/शाकुंतल से हेट है शैक्सपीयर दी
ग्रेट है/ भोजन घर में कौन करे? होटल में जब प्लेट है/बोतल
आमलेट है" (पृ. 78)। 'नरन'
जी ने बहुत तीक्ष्ण रूप में उन लोगों पर व्यंग्य किया है, जिनके लिए भारतीयता केवल फैशन या दिखावे की वस्तु है। ऐसे लोग मोटी खादी
को कैदी की पोशाक समझते हैं। संबंधों की सूचना देने वाले सांस्कृतिक शब्दों के
स्थान पर अंग्रेजी से उधार लिए हुए शब्दों का प्रयोग करते हैं तथा आत्म-प्रदर्शन
के वशीभूत अपने सामर्थ्य से अधिक व्यय करते हैं। कवि ने उन लोगों को भी नहीं छोड़ा
है, जो गाँधी के ही देश में गाँधीजी के सिद्धांतों की हत्या
कर रहे हैं। एक स्थान पर कवि ने कहा है- "गाँधीजी थे कर्मवादी गाँधीवादी
बकवादी/रचनाओं की योजनायें राजघाट में दफना दीं/बुनियादी तालीम तो प्राणों से भी
प्यारी है/बेटे को बनाना ही कैम्ब्रिज डिग्रीधारी है/नेतागिरी न्यारी है/ग्रामीणों
का प्राण हूँ ज़मींदारी साथ है/पुजारी में समता का कारखानों का मालिक भी/जनता का
मैं बंदा हूँ मंत्री तो बनना ही है/रिश्वत केवल लेता हूँ चंडु छिपकर पीता
हूँ" (पृ. 86-87)। यह सरलता से कहा जा सकता है कि कवि
अपने शब्द-बाणों से जनता का शोषण करने वाली किसी भी संस्था या व्यक्ति पर वार करने
से नहीं घबराता। यह उसके दायित्व-बोध, समाजबोध और सही अर्थों
में कवि होने का प्रमाण है। इन्हीं विशेषताओं के सहारे उसने इस संग्रह की अन्य
कविताओं में भी समाजव्यापी तथा राष्ट्र को पतन के गर्त में ले जाने वाली बुराइयों पर
सटीक प्रहार किया है। ताजमहल देखकर भी कवि किसी काल्पनिक सौन्दर्य बोध या रोमानी
भावुकता का शिकार नहीं होता, बल्कि वह उस इंसान के मूल्य के
विषय में सोचता है, जिसे पत्थर के समक्ष अपमानित होना पड़ा।
इसी प्रकार स्वतंत्र भारत पर विचार करते हुए कवि ने कहा है- "जानता कौन
नहीं/कि/इतिहास स्वतंत्र भारत का है ह्रास मूल्यों का" (पृ. 53)। उसकी चिंता है
कि स्वतंत्र भारत में वे समस्त तत्त्व पतन को प्राप्त हो रहे हैं, जो पूर्व संचित सिद्धियों के पुरस्कार के रूप में मिले थे। आज यदि कुछ
बचा है, तो वह है, मनुष्य के द्वारा
मनुष्य का शोषण। इसीलिए कवि एक अव्याख्येय ग्लानि तथा पीड़ा अनुभव करता है-
"प्राण की यह सस्ती समझ/हिजड़ापन न्याय का/देख मैं शर्मिन्दा हूँ/विवशता अपनी
कि/इस देश का बाशिन्दा हूँ/और जिन्दा हूँ" (पृ. 46)।
पी.
नारायण 'नरन' गाँधीजी के शिष्य और राष्ट्रभाषा के आदर्श
प्रचारक थे; इसीलिए उनके मन में देशी भाषाओं के प्रति बहुत
लगाव है। जीने की ललकार में संकलित पहली कविता ही राष्ट्रभाषा और मातृभाषा से
संबंधित है। वे मानते हैं कि राष्ट्र का सही विकास और भाषाई समृद्धि तब तक संभव
नहीं है, जब तक कि भारतवासी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा दोनों
का सम्मान न करें। दरअसल 'नरन' जी के
लिए भाषा का प्रश्न राष्ट्रीयता का प्रश्न है। उनके लिए मातृभाषा व्यक्ति और उससे
जुड़े समाज की अस्मिता की प्रतीक है तथा राष्ट्रभाषा राष्ट्र की अस्मिता की। उनके
अनुसार यदि देश की राष्ट्रभाषा का अपमान होता है तो यह राष्ट्रीय सम्मान के समाप्त
होने की घटना होगी। कवि को दुःख है कि भारत पर अंग्रेज़ी थोप दिये जाने से राष्ट्र
के सम्मान को ठेस पहुँची। इसीलिए कवि अंग्रेजी थोपे जाने का विरोधी है। वह स्वभाषा
प्रेम और अंग्रेजी समर्थकों का विरोध इन शब्दों में प्रकट करता है-
"दुहितायें हैं चौदह प्यारी दुलहिन हिंदी राणी है/विषकन्या थी अंग्रेजी तू अब तो नौकरानी
है/अंग्रेजों के मानस पुत्रों मरती तेरी नानी है/स्वर गंगा की धारा हिंदी प्राणों ने पुकारा है/राष्ट्रभाषा जिन्दाबाद!
मातृभाषा जिन्दाबाद" (पृ. 2)। यह अभिव्यक्ति गाँधीजी के
हिंदी आंदोलन की मूल भावना से प्रभावित है। गाँधीजी ने दक्षिण में हिंदी के समर्थन
में अनेक भाषण दिये थे। राजगोपालाचार्य उनका अनुवाद करके जनता को सुनाते थे। उन
दिनों दक्षिण की जनता गाँधीजी के विचारों से अपने को उद्वेलित अनुभव करती थी। 'नरन' जी भी उनमें से एक थे। उन्होंने स्वाधीनता
संग्राम और हिंदी भाषा के संबंध में गाँधीजी के प्रभाव को अनेक बार स्वीकार किया
है। इस संकलन की कविताओं पर भी वे गाँधी दर्शन और चिन्तन का प्रभाव स्वीकारते हैं-
"इतिहास साक्षी है कि अहिंदी भारत ने, विशेषकर दक्षिण
ने हिंदी को महज़ भाषा नहीं, प्रत्युत परसत्ता के प्रति विद्रोह की चेतना के रूप में अपनाया था,
जिसके सूत्रधार राष्ट्रपिता रहे थे। अतएव मेरे लिए भी हिंदी स्वतंत्रता
संग्राम की, राष्ट्र की एकसूत्रता की,
सर्वोपरि भारतीय जीवन में समग्र वैचारिक विप्लव की जुबान बनी। इससे स्पष्ट है कि
जीवन के प्रति प्रतिबद्धता मेरे चिंतन व प्रतिपादन की अनिवार्य शर्त रही है।
प्रस्तुत कविता संकलन में उक्त शर्त का निर्वाह सयत्न किया गया है" (अपनी
बात)।
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