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अनुवाद : सिद्धांत और प्रयोग (जी. गोपीनाथन)

  अनुवाद : सिद्धांत और प्रयोग जी. गोपीनाथन   लोक भारती प्रकाशन , 15-ए , महात्मा गाँधी मार्ग , इलाहाबाद-1 प्रथम संस्करण- 1985 , पृष्ठ- 106 , मूल्य- 25 रुपए   बीसवीं शताब्दी समाप्त होते-होते अनुवाद को एक ऐसा विज्ञान माने जाने लगा , जिसका संबंध रचनात्मकता से भी होता है। इसीलिए यह धारणा भी टूटने लगी कि जो असफल लेखक होता है , वह अनुवादक हो जाता है। इसके विपरीत , इस धारणा ने बल पकड़ा कि अनुवाद मूल रचना से भी कहीं अधिक कौशल की माँग करता है , साथ ही वह रचनात्मकता के बिना संभव नहीं है। अनुवाद के विषय में पहले जो धारणा प्रचलित थी , उसके पीछे यह कारण था कि प्रारंभ में अधिकांशतः दस्तावेजों और कार्यालय संबंधी कागजों के अनुवाद अधिक संख्या में किए गए। सरकारी स्तर पर अनुवाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भी जो योजनाएँ लागू हुईं , उनमें भी साहित्येतर सामग्री का ही बोलबाला था। सरकारी प्रतिष्ठानों में अनुवाद-कर्म को उच्च श्रेणी का कार्य नहीं माना जाता था। लोगों के सामने अनुवाद का यही रूप अधिक था। यही कारण है कि अनुवाद के संबंध में धारणाएँ बहुत अच्छी नहीं थीं। धीरे-धीरे ...

कन्नड साहित्य का वृहद् इतिहास (लेखक - त.सु. श्यामराव एवं मे. राजेश्वरय्या, हिंदी रूपांतर - डॉ. मे. राजेश्वरय्या)

  कन्नड साहित्य का वृहद् इतिहास लेखक -   त.सु. श्यामराव एवं मे. राजेश्वरय्या हिंदी   रूपांतर - डॉ. मे. राजेश्वरय्या   वाणी प्रकाशन , 21-ए , दरियागंज , नई दिल्ली-2 प्रथम संस्करण- 1982 , पृष्ठ- 401 , मूल्य- 125 रुपए   भाषाओं की समृद्धि की प्रारंभिक , किंतु अति महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि उन्हें संसार भर की भाषाओं से उदारतापूर्वक साहित्य-शैलियाँ , परंपराएँ और भाषिक-तत्व ग्रहण करने की नीति के प्रकाश में देखा जाए। जो भाषा अपनी खिड़कियाँ-दरवाजे बंद करके अपने महल के भीतर बैठ जाती है , वह धीरे-धीरे उन्नति-विमुख हो जाती है। इसके विपरीत जो भाषा अपने द्वार खुले रखती है और अन्य भाषाओं से अपने विकास के उपयोगी तत्व ग्रहण करती जाती है , वह प्रारंभ में यदि अशक्त भी रही हो , किंतु   शनैः शनैः शक्तिशाली और समृद्ध होती जाती है। अंग्रेजी और हिंदी इसके दो ठोस उदाहरण हैं। अंग्रेजी का इतिहास कोई बहुत पुराना नहीं है। वह कुछ शताब्दियों की ही भाषा है। प्रारंभ में उसे पसंद करने वाले लोगों की संख्या भी उँगलियों पर गिने जाने लायक थी। उन दिनों इंग्लैंड में ग्रीक , इत...

अपराध : कारण और निवारण (गिरिराज शाह)

  अपराध : कारण और निवारण गिरिराज शाह   विश्वविद्यालय प्रकाशन चौक , वाराणसी। प्रथम संस्करण- 1985 , पृष्ठ- 168 , मूल्य- 50 रुपए   हिंदी भाषा की कुछ गिनी-चुनी कमियों में से एक बड़ी कमी इस भाषा में अभी भी विषय वैविध्य पर भरपूर ध्यान न दिया जाना है। इसका हिंदी के वैश्विक व्यक्तित्व पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। हिंदी में ऐसे विषयों पर कम स्तरीय लेखन हुआ है , जिनका संबंध सीधे-सीधे शान्ति व्यवस्था और सामाजिक उन्नति से है और जो आम पाठक के साथ ही विज्ञान अथवा समाजविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए गंभीर अध्ययन-सामग्री-स्रोत बन सकते हैं। पर्यावरण , प्राणी विज्ञान , न्यायशास्त्र , नृविज्ञान , पुरातत्व , वनस्पतिशास्त्र और अपराध विज्ञान ऐसे ही कुछ विषय है। जिन्हें हिंदी का लेखक कहा जाता है और जो हिंदी के नाम पर बड़ी-बड़ी सुविधाएँ प्राप्त करने को लालायित रहते हैं , उनके भी साहित्य की सूची उठाकर देखें , तो पता चलेगा कि उनके यहाँ कविता , कहानी , नाटक , निबंध आदि की भरमार है , जबकि समाज वैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन संबंधी लेखन लगभग अनुपस्थित है। हिंदी के लेखकों का स्वयं हिंदी क...

असमिया लोक साहित्य की भूमिका (भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी)

  असमिया लोक साहित्य की भूमिका भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी   भारती प्रकाश रिहा बारी , गुवाहाटी- 781008 संस्करण- 1978, पृष्ठ- 180, मूल्य- 20 रुपए   असमीया लोक साहित्य का अध्ययन प्रस्तुत करने वाले हिंदी   में बहुत कम ग्रंथ हैं। ऐसे में भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी की पुस्तक ‘ असमिया लोक साहित्य की भूमिका ’ बहुत संतोष देती है। इसमें रायचौधुरी ने लोकगीत , लोकगाथा , लोककथा , लोकनाट्य और असम के लोकजीवन से संबंधित कई अन्य पक्षों का दिग्दर्शन कराने वाले लोक साहित्य का विश्लेषण किया है। इस ग्रंथ में असमीया लोकगीतों का विश्लेषण सबसे पहले किया गया है। यद्यपि लोक साहित्य विज्ञानी असम के लोकगीतों को वर्गीकृत करना कठिन कार्य मानते हैं , फिर भी सत्येन्द्र नाथ शर्मा , यनीन्द्र नाथ गोस्वामी और हेमंत कुमार शर्मा आदि साहसी अध्येताओं ने इन गीतों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। डॉ. हेमंत कुमार शर्मा ने असम के लोकगीतों को चार वर्गों में बाँटा है— ( 1) आनुष्ठानिक , (2) कर्म-विषय , (3) आख्यानमूलक , तथा ( 4) जूना व हँसी मज़ाक के गीत। रायचौधुरी ने वर्गीकरण की जटिलता से जूझने का प्...

सामाजिक पटभूमि सहित असम के बरगीत (आलोचक और संपादक - बापचंद्र महंत)

  सामाजिक पटभूमि सहित असम के बरगीत आलोचक और संपादक - बापचंद्र महंत   कमल कुमारी फाउण्डेशन द्वारा- बरुआ एण्ड एसोसियेट्स   प्रा. लि. जोरहाट-1 (असम) प्रथम संस्करण- 1988 , पृष्ठ- 421 , मूल्य- 150 रुपए   भारत के असम प्रांत में बरगीत नायक पंद्रहवीं शताब्दी से 400 वर्ष तक भक्ति धारा प्रवाहित करते रहे। उन्होंने वहाँ ठीक उसी प्रकार जनता को भक्ति रस का पान कराया , जैसे अष्टछाप के कवियों ने उत्तर भारत की जनता को और बाउलों ने बंगाल की जनता को। शंकर देव और माधव देव ने बरगीतों की रचना में किसी प्रकार की सांप्रदायिक या संकुचित दृष्टि का अनुसारण नहीं किया , बल्कि उन्होंने अखिल मानवीय दृष्टि से इन गीतों को रचा। इन गीतों में आध्यात्मिक और दार्शनिक तत्त्व के साथ ही सामाजिक अनुभूति की जो संपत्ति भरी पड़ी है , वह संसार के किसी भी मनुष्य को जीवन का सही मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि असम में प्रचलित ये बरगीत अभी तक असम के बाहर नहीं पहुँच सके थे। विशेषकर हिंदी   में न ये बरगीत उपलब्ध थे और न उनमें छिपी भाव संपदा की व्याख्या। वयोवृद्ध हिंदी ...

आंध्र के लोकगीत (डॉ. कर्ण. राजशेषगिरि राव)

   आंध्र के लोकगीत डॉ. कर्ण. राजशेषगिरि राव   रामनारायण लाल बेनी प्रसाद इलाहाबाद-211002 संस्करण- 1987 , पृष्ठ- 400 , मूल्य- 40 रुपए   लोकगीत लोकमनस के सच्चे प्रतिनिधि ही नहीं होते , लोक हृदय को जीवंत बनाये रखने वाले भी होते हैं। इनमें किसी जाति या समाज का सुख और दुःख उसी प्रकार व्याप्त होता है , जैसे मनुष्य के शरीर में प्राणशक्ति। ये निरंतर समाज की शिराओं में धमनियों के रक्त की भाँति प्रवाहित होते हैं। लोकगीत लोकजीवन की आशा-निराशा , कल्पना , आकांक्षा सभी कुछ को प्रकट करते हैं। इसी के साथ इनमें लोकजीवन का यथार्थ भी विद्यमान होता है। लोकजीवन में जहाँ एक ओर सौन्दर्य और सहजता का निवास होता है , वहीं उसमें कई प्रकार की जटिलताएँ भी पायी जाती हैं। मनुष्य के प्रकृत व्यवहार में जो और जीतने वैशिष्ट्य संभव हैं , वे सब अपने प्रभाव के साथ लोकगीतों में भी विद्यमान होते हैं। लोक जीवन में वैयक्तिक और सामाजिक संबंधों का जो मधुर-तिक्त रूप मिलता है , वह बिना किसी परिवर्तन के लोकगीतों में चला आता है। इसीलिए लोकगीतों को लोकजीवन का ऐसा इतिहास कह सकते हैं , जो भूतकाल की...

भूख हड़ताल (शंकर पुणताम्बेकर)

  भूख हड़ताल शंकर पुणताम्बेकर   संचयन 124/152-सी , गोविन्द नगर कानपुर-6 प्रथम संस्करण- 1986 , पृष्ठ- 86 , मूल्य- 30 रुपए   ' भूख हड़ताल ' एकांकी संग्रह में चार एकांकी हैं। इनकी रचना हिंदी व्यंग्य विधा को गतिशील बनाने वाले प्रसिद्ध व्यंग्यकार शंकर पुणताम्बेकर ने की है।   पहला एकांकी ' ऐसा भी पतित ' स्वयं एकांकीकार के अनुसार बिल्कुल पुराने ढंग का है। लेखक ने पहले इसका शीर्षक ' सबसे छोटा आदमी ' रखा था। एकांकी का मूल विषय दाम्पत्य संबंधों में पारस्परिक विश्वास को सर्वोत्कृष्ट तत्व सिद्ध करना और उस विश्वास को तोड़ने वाले व्यक्तियों को बुरी अवस्था में दिखाना है। इसमें लेखक ने एक प्रेम त्रिकोण निर्मित करने का प्रयास भी किया है। महेन्द्र एक विशाल हृदय व्यक्ति है , जो अपनी पत्नी रंजना द्वारा आँखों में गलत दवा लगा दिये जाने के कारण अपनी दृष्टि खो बैठता है। उसके बाद भी रंजना के प्रति उसका प्रेम कम नहीं होता। अविनाश महेन्द्र के घर में शरण लेकर रहता है , जिसे महेन्द्र अपने छोटे भाई की तरह रखता है। यही अविनाश रंजना को अपने जाल में फँसाता है। अंततः ब्लैकम...