आंध्र के लोकगीत (डॉ. कर्ण. राजशेषगिरि राव)
आंध्र
के लोकगीत
डॉ.
कर्ण. राजशेषगिरि राव
रामनारायण
लाल बेनी प्रसाद
इलाहाबाद-211002
संस्करण-
1987, पृष्ठ- 400, मूल्य- 40
रुपए
लोकगीत
लोकमनस के सच्चे प्रतिनिधि ही नहीं होते, लोक हृदय को
जीवंत बनाये रखने वाले भी होते हैं। इनमें किसी जाति या समाज का सुख और दुःख उसी
प्रकार व्याप्त होता है, जैसे मनुष्य के शरीर में प्राणशक्ति।
ये निरंतर समाज की शिराओं में धमनियों के रक्त की भाँति प्रवाहित होते हैं। लोकगीत
लोकजीवन की आशा-निराशा, कल्पना, आकांक्षा
सभी कुछ को प्रकट करते हैं। इसी के साथ इनमें लोकजीवन का यथार्थ भी विद्यमान होता
है। लोकजीवन में जहाँ एक ओर सौन्दर्य और सहजता का निवास होता है, वहीं उसमें कई प्रकार की जटिलताएँ भी पायी जाती हैं। मनुष्य के प्रकृत
व्यवहार में जो और जीतने वैशिष्ट्य संभव हैं, वे सब अपने
प्रभाव के साथ लोकगीतों में भी विद्यमान होते हैं। लोक जीवन में वैयक्तिक और
सामाजिक संबंधों का जो मधुर-तिक्त रूप मिलता है, वह बिना
किसी परिवर्तन के लोकगीतों में चला आता है। इसीलिए लोकगीतों को लोकजीवन का ऐसा
इतिहास कह सकते हैं, जो भूतकाल की सच्चाई के साथ लोकजीवन के
वर्तमान को भी अपने में समेटे हुए होता
है।
डॉ.
कर्ण. राजशेषगिरि राव ने ‘आंध्र के लोकगीत’ ग्रंथ में लोकगीतों को लोक हृदय से जोड़ा है। उन्होंने तेलुगु लोकगीतों
के विषय में कहा है कि ये लोकगीत तेलुगु लोक हृदय के उद्गार हैं। डॉ. राव का यह
कथन तनिक-सी भी अतिशयोक्ति का शिकार नहीं है। संग्रह का पहला लोकगीत आनुष्ठानिक
गीत के अंतर्गत आता है, जिसमें एक कन्या से कहा गया है—
"छोटी बिन्दी धारण करनी है, श्री संपन्न गृह में पैदा
होना है/रेशमी कपड़े पहनने हैं, स्वर्ण के गहने सजाने हैं/सात
भाइयों के साथ पैदा होना है, उपाधि धारी से विवाह करना है।
(पृ. 1)। यह लोकगीत आंध्र के सामाजिक परिवेश को तथा एक आंध्र माँ के हृदय को प्रकट
करता है। परंपरा से माना जाता है कि सात भाइयों की बहन भाग्यशीला होती है। ऐसी
कन्या भला किसी सामान्य व्यक्ति से विवाह क्यों करेगी, उसका
विवाह तो किसी बड़े पद पर आसीन, बड़ी उपाधि धारण करने वाले
से ही होना चाहिए।
लोकगीतों में विवाह संबंधी गीतों का बहुत
महत्त्व होता है। संख्या की दृष्टि से भी इस वर्ग में ही सबसे अधिक लोकगीत प्राप्त
होते हैं। अलग-अलग समाजों में कन्याएँ अपने विवाह के संबंध में भिन्न-भिन्न कल्पनाएँ
करती हैं। ऐसे ही एक गीत में एक कन्या कहती है— "जीजाओं के शासन मे रहने न
दो/कुआँ कितना गहरा है उतरकर देखो/जेठों के घर में मुझे मत दो भाई/नदिया कितनी
दूरी पर है पार कर देखो भाई/देवरों के घर में मुझे मत दो भाई/तालाब कितना गहरा है
उतरकर देखो भाई/सौतों के घर मुझे मत दो भाई/समुद्र कितनी दूर पर है तैर कर देखो
भाई।" (पृ. 22)। यहाँ स्पष्ट है कि कन्या न तो ऐसे घर में जाना चाहती है, जहाँ उसे अनेक जेठों का अनुशासन मानना पड़े, और न
ऐसे घर में जाना चाहती है, जहाँ देवरों की हर समय की
चुहलबाज़ियों से तंग आ जाए । सौतों वाले घर में तो वह जाना ही नहीं चाहती। इस
अभिव्यक्ति में लोक साहित्य के अध्येता मानव के उस मन का चित्र देख सकते हैं, जो अपनी स्वतंत्रता और अपना सुख किसी के भी पास गिरवीं नहीं रखना चाहता।
आंध्र
में विवाह संस्कार बड़े सुसंस्कृत ढंग से संपन्न होता है। बहुत पहले से वर और
कन्या दोनों को तरह-तरह की तैयारियाँ कराई जाती हैं। बाराती उल्लासमय वातावरण में
वर को लेकर आते हैं। लोकगीतों में कल्पना की गई है कि सजे-धजे बाराती वर को घोड़े
पर बैठा कर जुलूस की शक्ल में हरे-भरे शामयाने में आए हैं। इसके पश्चात विवाह
संस्कार होता है। आंध्र समाज में अनेक लोकगीत ऐसे हैं, जिनमें वर-कन्या को राम और सीता के रूप में चित्रित किया गया है। ऐसा ही
एक लोकगीत इस प्रकार है— "आनंद ही आनंद है/हमारा राम वर बन गया है/हमारी
जानकी वधू बन गई है/कौशल्या का व्रत सफल हो गया है/रत्न वेदिका पर राम और
सीता/दोनों आसीन हैं/सखियों ने शीघ्र सजाया है/प्रीतिपूर्वक राम उठ खड़े हुए
हैं/पहले पुरोहितों ने मंत्रोच्चार किया/मंगल वाद्य बजाते ही/मंद-मंद चलने वाली
स्त्रियों के सुंदर गीत गाने पर/राम ने अच्छी तरह मंगल सूत्र बाँध दिया/सम्मुख ही
पार्वती सरस्वती/इंद्राणी देवी अरुन्धती/मोतियों जैसे अक्षत बिखेर/अतुल रत्न जैसे
अक्षत डाले/आनंद ही आनंद है। (पृ. 42-43)।
विवाह
जैसे विशिष्ट अवसर पर व्यंग्य विनोद का वातावरण होता है। यह ऐसा अवसर होता है जब
मनुष्य अवसर का लाभ उठाकर अपनी समस्त काम कुंठाओं की अभिव्यक्ति करता है और
सामाजिक संबंधों की सरसता का भोग करता है। जब वर पक्ष के लोग कन्या पक्ष के यहाँ
पहुँचते हैं, तो कन्या पक्ष की स्त्रियाँ व्यंग्य-
विनोद की मार से उनकी खूब खबर लेती हैं। वे वर और उसके मित्रों, वर के पिता तथा अन्य लोगों पर शब्द- प्रहार करती हैं। आंध्र में यह
व्यंग्य-विनोद कुछ अधिक ही किया जाता है। ऐसा ही एक गीत इस प्रकार है—"कहाँ
से प्राप्त हुआ है यह वर/सेर दो सेर खर्च कर पूप बनाये हैं/खाता ही नहीं यह आधे
मुँह वाला यह वर/पाँच हजार खर्च कर इत्र गुलाब जल लाये हैं/छिड़काने का ज्ञान ही
नहीं है मूर्ख वर को/छः हजार खर्च कर पान सुपारी लाये है/पान खाना मालूम नहीं इस
पगले वर को × × × × लाख खर्च कर लक्ष्मी जैसी कन्या दी/पोषण
करना मालूम नहीं इस बेकार वर को। (पृ. 68)।
कृषि
संबंधी लोकगीत कृषक जीवन और फसलों के संबंध में बहुत गंभीर जानकारी प्रस्तुत करते
हैं। आंध्र में कृषि संबंधी लोकगीतों में हल चलाने, वर्षा
होने, नदी-नाले उमड़ आने, रेतीली नदी
के जल से भर जाने, बिजली चमकने और किसान के बच्चों के हर्ष
से पुलकित होने के संबंध में अनेक गीत हैं। लोकगीत की यह अभिव्यक्ति बहुत समर्थ है—
"आसमान में बादल उमड़-घुमड़ आए /बिजली एक चमक उठी उसी समय/किसान के बच्चे
हर्ष से पुलकित हुए × × × × जोत लो रे बाबू जुताई तुम/एक बीज
कोटि रूपों में बढ़े/हल पर्व आया वर्षा आयी/नई फसलें ही हमें चाहिए" (पृ. 87)।
इससे भी कहीं अद्भुत प्रभाव वाली अभिव्यक्ति इस लोकगीत में है— "हल देवता
(पर्व) को क्या चाहिए?/लाल-लाल फूलों की माला चाहिए/लाल उजली
धूप चाहिए" (पृ. 88)। इस प्रकार के गीत कृषि जीवन और लोक की आस्थावादी
अनुभूति को प्रकट करते हैं। लोक में कृषि कार्य का संबंध किसी देवता की आराधना से
कम नहीं माना जाता। सच्चाई भी यही है कि कृषि कार्य जीवन रूपी देवता की सक्रिय
आराधना ही है। बीज बोने से लेकर फसल काटने तक और फसल घर में आ जाने से लेकर उसके
उपभोग तक संपूर्ण कृषि कर्म किसी पूजा से कम नहीं है। डॉ. राव ने कृषि गीतों के
क्रम में हर चरण और हर प्रक्रिया से संबंधित गीत संग्रहीत किए हैं। यहाँ तक कि फसल
काटने, खेत की रखवाली करने जैसे कार्यों से संबंधित गीत भी
उनके द्वारा संकलित किए गए हैं।
उन्होंने
काफी संख्या में ऋतु संबंधी गीतों का संग्रह भी किया है। विभिन्न ऋतुओं को आधार
बनाकर जो गीत रचे गए हैं, उनमें वर्षा गीत बहुत आकर्षक होते हैं। ऐसा ही एक गीत इस प्रकार है—
"पानी बरसे हे वरुण देव/धान के खेत पके हे वरुण देव/काले बादल हे वरुण देव/
रिमझिम बरसे हे वरुण देव/खेत सब भर जायें हे वरुण देव/पौधे बढ़े हे वरुण देव ×
× × × गाँव का तालाब हे वरुण देव/लवालब भर जाए हे वरुण देव/मेढ़कों की शादी हे वरुण
देव/ठाठ-बाट से हो हे वरुण देव' (पृ. 180-181)। यह गीत वर्षा
की उपयोगिता, उससे जुड़े विभिन्न विश्वासों और लोक हृदय के
उल्लास को प्रकट करता है।
कर्ण
राजशेषगिरि राव ने बड़ी मात्रा में ऐसे गीतों का संग्रह भी किया है, जो विभिन्न जातियों और व्यवसायों से संबंधित हैं। कोय, गोडु, ग्वालिन, धोबिन, कर्घा, मछुआ, चरवाहा, चर्मकार, मदारिन, जादूगर,
गोसाईं, तुरक, ब्राह्मण,
भिक्षुक आदि से संबंधित गीत विभिन्न जातियों, उपजातियों
तथा उनसे जुड़े व्यवसायों की जानकारी देते हैं। उनके संग्रह में भिक्षुक गीत भी
हैं। ऐसे एक लोकगीत में कहा गया है— "न पैर हैं न हाथ हैं रे नारायण/अन्न दो
रे नारायण/पेट की आग रे नारायण/आँखों न देख पाता हूँ/अंधा हूँ। रे नारायण/दमड़ी दे
रे नारायण/दान करें रे नारायण" (पृ. 254)।
लोक
जीवन में अनेक प्रकार के खेल खेले जाते हैं। ये सभी खेल सामुदायिक भावना और
सहयोगिता पर आधारित होते हैं। डॉ. राव ने इनमें से अनेक खेलों से संबंधित गीत संकलित
किए हैं। खेलों के साथ ही लोक में पूजे जाने वाले देवी-देवताओं के संबंध में भी
अनेक गीत हैं। श्रीकृष्ण, लक्ष्मी, राम, शिव, गौरी, चंडिश्वरी, राज-राजेश्वरी आदि देवी देवताओं से
संबंधित गीत ध्यान आकर्षित करते हैं।
लोक
साहित्य के इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ में भारत माता और महात्मा गाँधी से जुड़े हुए
गीत लोक साहित्य के अध्येताओं के लिए पर्याप्त महत्त्वपूर्ण हैं। भारत के लगभग सभी
क्षेत्रों में महापुरुषों को लोकगीतों का विषय बनाया गया है, किंतु आंध्र लोकगीतों में भारत माता के लिए जो भावनाएँ प्रकट की गई हैं, वे अनूठी हैं। एक गीत में भारत माता के लिए कहा गया है— "हे भारत
भूमि! जय हो तेरी जय हो! भारत देवी तेरा मंगल हो/वेद धर्मों को सुनाया है और कहा
कि संतति की कोई हानि नहीं होगी / × × × × भारत पुत्रों की
वीर वाहिनी में विक्रम क्रमरेखा विलसित है/हमारी माता को कोई कष्ट (नाश) न होगा।
इसका साक्षी अभिमन्यु बताया/सुख समृद्धिपूर्वक जीवन गुजरेगा यों सुखपूर्वक भाग्य
देखेगा/युवतियाँ तेरी आरती उतारेंगी सबको मेरे आशीर्वाद हो यों बताया।" (पृ.
323)। इस प्रकार के गीतों की रचना संभवतः स्वाधीनता संग्राम काल में हुई होगी।
आंध्र के इतिहास से यह ज्ञात होता है कि आंध्र के लोग अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष
करने में बहुत बढ़े-चढ़े थे। वहाँ के गाँवों में गाँधीजी के आदर्शों पर चलने की
होड़ लगी हुई थी। इसी का प्रभाव लोकगीतों पर भी पड़ा और ऐसे गीत जन कंठों में
गूंजने लगे।
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लोकगीतों का यह विशाल संग्रह तेलुगु के साथ-साथ अब हिंदी लोक साहित्य की समृद्ध
परंपरा में महत्त्वपूर्ण कड़ी का स्थान प्राप्त कर चुका है। डॉ. राव ने मूल
लोकगीतों को नागरी लिपि में तैयार किया है और प्रत्येक गीत के नीचे उसका अनुवाद
प्रस्तुत कर दिया है। यद्यपि अनुवाद की भाषा में कुछ शिथिलताएँ खटकती है, किंतु वे ऐसी हैं, जिनसे बचना संभव नहीं था। डॉ.
राव तेलुगु के लोक मुहावरे से तो परिचित थे, किंतु उनके पास हिंदी का लोक मुहावरा पकड़ने और उसका
प्रयोग करने का कोई अवसर नहीं रहा था; अतः वे लोकसाहित्य के अनुवाद
की भाषा का चुनाव करने में उतने सक्षम नहीं थे। फिर भी अनुवाद भाषा का शैथिल्य मूल
लोकगीतों के संवेदन संसार तक पहुँचने में कोई बहुत बड़ी बाधा नहीं डालता। लोकगीतों
की और लोकमानस की जो सामान्य संवेदना हर जगह पाई जाती है, वह
इन गीतों के सौंदर्य को पहचानने में भी सहायक बनती है।
डॉ.
कर्ण राजशेषगिरि राव ने कुछ लोकगीतों की स्वरलिपि का अंकन भी किया है। लोकगीतों की
यह सांगीतिक प्रस्तुति इनके सौंदर्य में और अधिक अभिवृद्धि कर देती है। लोक
साहित्य के अध्येताओं की सुविधा के लिए डॉ. राव ने संक्षिप्त तेलुगु हिंदी शब्द
कोश भी दे दिया है। इसका उपयोग करके मूल लोकगीतों का विश्लेषण और अधिक सरलता व
गहराई से किया जा सकता है।
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