कन्नड साहित्य का वृहद् इतिहास (लेखक - त.सु. श्यामराव एवं मे. राजेश्वरय्या, हिंदी रूपांतर - डॉ. मे. राजेश्वरय्या)
कन्नड
साहित्य का वृहद् इतिहास
लेखक - त.सु. श्यामराव एवं
मे. राजेश्वरय्या
हिंदी रूपांतर - डॉ.
मे. राजेश्वरय्या
वाणी प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज,
नई दिल्ली-2
प्रथम संस्करण- 1982, पृष्ठ-
401, मूल्य- 125 रुपए
भाषाओं
की समृद्धि की प्रारंभिक, किंतु अति महत्वपूर्ण कसौटी
यह है कि उन्हें संसार भर की भाषाओं से उदारतापूर्वक साहित्य-शैलियाँ, परंपराएँ और भाषिक-तत्व ग्रहण करने की नीति के प्रकाश में देखा जाए। जो
भाषा अपनी खिड़कियाँ-दरवाजे बंद करके अपने महल के भीतर बैठ जाती है, वह धीरे-धीरे उन्नति-विमुख हो जाती है। इसके विपरीत जो भाषा अपने द्वार
खुले रखती है और अन्य भाषाओं से अपने विकास के उपयोगी तत्व ग्रहण करती जाती है, वह प्रारंभ में यदि अशक्त भी रही हो, किंतु शनैः शनैः शक्तिशाली और समृद्ध होती जाती है।
अंग्रेजी और हिंदी इसके दो ठोस उदाहरण हैं। अंग्रेजी का इतिहास कोई बहुत पुराना
नहीं है। वह कुछ शताब्दियों की ही भाषा है। प्रारंभ में उसे पसंद करने वाले लोगों
की संख्या भी उँगलियों पर गिने जाने लायक थी। उन दिनों इंग्लैंड में ग्रीक,
इतालवी और फ्रेंच भाषाओं का बोलबाला था, किंतु
जैसे ही अंग्रेजी ने अपने द्वार सबके लिए
मुक्त किए, वैसे ही वह भाषा दिन दूनी,
रात चौगुनी गति से बढ़ने लगी। हिंदी के
साथ ठीक वही घट रहा है। घटने की गति अवश्य ही कुछ धीमी है, किंतु
हो वही रहा है, जो कभी अंग्रेजी के साथ हुआ था। अंग्रेजी ने
अपनी यात्रा सामाजिक स्वाधीनता और रूढ़ि भजन से प्रारंभ की थी। आधुनिक हिंदी की यात्रा भी राजनैतिक व सामाजिक स्वाधीनता से
जुड़कर ही तीव्र गति प्राप्त कर सकी। आज हिंदी अपनी सीमाओं के बावजूद, भारतीयता के केंद्रीय स्वर की प्रवक्ता बन गई है और उसने सभी भाषाओं के
लिए अपने द्वार खोल दिए हैं। डॉ. मे. राजेश्वरय्या व श्यामराव द्वारा लिखित तथा
स्वयं राजेश्वरय्या द्वारा अनूदित ‘कन्नड साहित्य का वृहद्
इतिहास’ जिस प्रकार हिंदी जगत में समाद्रित हुआ, उससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।
इस
ग्रंथ में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत कन्नड साहित्य और उसके विकास का ज्ञान
कराया गया है। पम्पपूर्व युग, पम्प युग और पम्प परवर्ती
युग के साहित्य का इतिहास इस ग्रंथ को पढ़कर जाना जा सकता है। शिवकोट्टियाचार्य
महाकवि पम्प से पहले हुए। उनका ग्रंथ बड्डाराधन गद्य काव्यशैली का ऐसा ग्रंथ है, जिसे कन्नड साहित्य का सबसे पहला गद्य-काव्य कहा जाता है। इस ग्रंथ में
19 कथाएँ हैं। प्रत्येक कहानी के प्रारंभ में एक प्राकृत गाहा है, जो कहानी के कथानक को संक्षेप में प्रस्तुत करती है। ऐसा कहा जाता है कि
इस ग्रंथ की कथाएँ वैराग्य बोधक होने के साथ-साथ मनोरंजक भी हैं।
कन्नड
भाषा में दसवीं शताब्दी में महाकवि पम्प का जन्म हुआ। इन्होंने कन्नड भाषा के
सार्वकालिक सत्कवि की उपाधि प्राप्त की। महाकवि पम्प ने ‘आदिपुराण’ जैसे महान ग्रंथ की रचना की। स्मरणीय है
कि पम्प से ही कन्नड साहित्य का स्वर्णयुग प्रारंभ हुआ और परवर्ती कई शताब्दियों
पर पम्प कवि का प्रभाव बना रहा। कन्नड साहित्य में हरिहर-युग या स्वतंत्र-युग नाम
का भी एक काल है। इसके प्रमुख कवि हैं, हरिहर, देव, राघवाङ्क आदि। इतिहास लेखकों ने इन कवियों के
स्वतंत्र महत्त्व का प्रतिपादन किया है। इसी के साथ कुमार व्यास युग और ओडयरकालीन
कन्नड साहित्य का भी विस्तृत परिचय दिया गया है। वीर शैव साहित्य तथा वीर शैव कवि
भी अपने पूरे व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ इस ग्रंथ में विद्यमान हैं।
हिंदी
पाठकों के लिए तो यह ग्रंथ उपयोगी है ही, स्वयं कन्नड लोगों के लिए भी इसका महत्त्व है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि
इस ग्रंथ का महत्त्व भारतीय साहित्य को विश्व भाषाओं के साहित्य के सामने गर्व से
सिर ऊँचा उठाने की दृष्टि से भी है। कर्नाटक के राष्ट्रकवि माने जाने वाले, के.वी. पुय्यप्पआ ने भी यही धारणा प्रकट की है। कुवेम्पु ने इस ग्रंथ की
भूमिका लिखते हुए कहा है— "हममें से कुछ समीक्षक अपने आत्म गौरव की स्थापना
हेतु हमारे साहित्य की तुलना अंग्रेजी साहित्य से करने के अभ्यस्त हैं। यह समीक्षा
की दृष्टि से अप्राकृत है। काश कि हमारे ग्रंथकार कम से कम ग्रंथ के अंत में
परिशिष्ट के तौर पर हमारे साहित्य की प्राचीनता, विविधता तथा
उत्तरमता आदि का विवरण देकर हमारे साहित्य की परिसीमाओं का निर्धारण तो करते!
अंग्रेजी काव्य के प्रपितामह कवि चौसर ने 1340 ई. में जन्म लिया, जबकि हमारे महाकवि पम्प उसके 500 वर्षों के पहले ही 902 में जन्म ले चुके
थे।" यह तथ्य हिंदी पाठकों सहित सभी
भाषाओं के लोगों की आँखें खोलने वाला है। इतना ही क्यों, अंग्रेजी
ने शेक्सपीयर को 1564 ई. में जन्म दिया जबकि, पम्प, रन्न, जन्न, नागवर्म, हरिहर, राघवाङ्क, वारणप्पा और
रत्नाकर जैसे युग प्रवर्तक कवि उससे बहुत पहले कन्नड भाषा में समर्थ रचनाएँ कर
चुके थे। इस तथ्य से यह समझा जाना चाहिए कि भारतीय भाषाओं का साहित्य गुणवत्ता और
प्राचीनता आदि किसी में भी विश्व साहित्य से पीछे नहीं है।
साहित्य
के इस इतिहास का हिंदी में आना हिंदी की विकास यात्रा को गति प्रदान करना है। इससे
हिंदी भाषा को वैचारिक और अनुभव संबंधी
संपन्नता मिलेगी। इस इतिहास का स्वागत करके हिंदी भारतीय भाषाओं के विकास में
सहायक भी बनेगी।
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