असमिया लोक साहित्य की भूमिका (भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी)

 

असमिया लोक साहित्य की भूमिका

भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी

 

भारती प्रकाश

रिहा बारी, गुवाहाटी-781008

संस्करण- 1978, पृष्ठ- 180, मूल्य- 20 रुपए

 

असमीया लोक साहित्य का अध्ययन प्रस्तुत करने वाले हिंदी  में बहुत कम ग्रंथ हैं। ऐसे में भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी की पुस्तक असमिया लोक साहित्य की भूमिका बहुत संतोष देती है। इसमें रायचौधुरी ने लोकगीत, लोकगाथा, लोककथा, लोकनाट्य और असम के लोकजीवन से संबंधित कई अन्य पक्षों का दिग्दर्शन कराने वाले लोक साहित्य का विश्लेषण किया है। इस ग्रंथ में असमीया लोकगीतों का विश्लेषण सबसे पहले किया गया है। यद्यपि लोक साहित्य विज्ञानी असम के लोकगीतों को वर्गीकृत करना कठिन कार्य मानते हैं, फिर भी सत्येन्द्र नाथ शर्मा, यनीन्द्र नाथ गोस्वामी और हेमंत कुमार शर्मा आदि साहसी अध्येताओं ने इन गीतों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। डॉ. हेमंत कुमार शर्मा ने असम के लोकगीतों को चार वर्गों में बाँटा है— (1) आनुष्ठानिक, (2) कर्म-विषय, (3) आख्यानमूलक, तथा (4) जूना व हँसी मज़ाक के गीत। रायचौधुरी ने वर्गीकरण की जटिलता से जूझने का प्रयास करते हुए असमीया लोकगीतों को छः वर्गों में बाँटा है— संस्कार विषयक, पूजा और धर्म-विषयक, ऋतु विषयक, कर्म विषयक, राजनीति विषयक तथा विविध विषयक। उन्होंने पूजा और धर्म विषयक गीतों के पुनः चार भेद किए हैं— वृत्त-पर्व-त्योहार संबंधी, मांगलिक, दार्शनिक-आध्यात्मिक और भक्ति विषयक। इस वर्गीकरण के पश्चात उन्होंने, वर्गीकरण के अनुसार गीतों के उदाहरण प्रस्तुत किए  हैं। उन्होंने परंपरागत गीतों के साथ ही राजनीति विषयक लोकगीत भी प्रस्तुत किए हैं। इसमें तीन प्रकार के लोकगीत दिये गए  हैं— कंपनी शासन विषयक, स्वतंत्रता तथा महात्मा गाँधी विषयक और चीनी आक्रमण विषयक। चीनी आक्रमण से उत्पन्न मानसिक हलचल एक लोकगीत में इस प्रकार दिखाई गई है— "शिवसागर शिवदौल चीना युद्ध लागि गल/टोवांगलै जाब लै/पाहारेदि रास्ता हल/चौ एन लै ओलाले/दिल्लीर चरा लै/हेन चेंक करोंगै बुलि/काशत जिलि किले/मरटार बंदुक पोर/खोच नित खार रे गुलि।" (पृ. 51 पर उद्धृत)।

असम प्रदेश में विविध प्रकार की लोकगाथाएँ भी प्राप्त होती हैं। असमीया भाषा में लोकगाथा को मालिता' कहा जाता है। इस शब्द का प्रचलन हेमचंद्र बरुआ ने किया था। असम की लोकगाथाओं का वर्गीकरण डॉ. प्रफुल्ल दत्त गोस्वामी ने किया था। उनके पश्चात् भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी ने अपना वर्गीकरण प्रस्तुत किया— (1) चमत्कारमूलक मालिता और (2) लौकिक मालिता। रायचौधुरी लौकिक मालिता को पुनः दो उपवर्गों में बाँटते हैं— इतिहासपरक तथा कल्पनापरक। अपने इस ग्रंथ में उन्होंने लोक गाथाओं के संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किए  हैं और उनमें से प्रत्येक के वर्ग का निर्धारण किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत लोकगाथाओं में मणिकोंवर की मालिता, फुलकोंवर की मालिता, चिकण सरियह की मालिता, आजान फकीर की मालिता, साऊद की मालिता आदि का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है। यहाँ उनके रेल की मालिता लोकगाथा का वर्णन भी उपलब्ध है। एक असमीया लोकगाथा में बताया गया है कि, पंजाबी मिस्त्री, बिहारी मजदूर रेल की पटरी बिछाने में जुट गए । पहाड़ों-जंगलों को काट कर रेल की पटरी बनाई गई। बहुत सारी भूमि ले ली गई। लोगों से बिना पूछे उनके आम, कटहल आदि के वृक्ष काट लिए गए। सन् 1810 में गुवाहाटी के निकट आमिन गाँव तक रेल की पटरी बिछा दी गई थी। असम के साधारण लोगों के लिए यह बहुत बड़ी घटना थी। इससे वे विस्मित भी थे और भूमि तथा पेड़ चले जाने के कारण क्षुब्ध भी। रेल की मालिता, अर्थात् रेल की लोकगाथा इस घटना और उसके प्रभाव को चित्रित करती है।

असमीया लोक कथाओं के कुछ संग्रह प्रकाश में आ गए हैं, फिर भी इस क्षेत्र में खोज और संकलन कार्य की आवश्यकता बनी हुई है। डॉ. रायचौधुरी ने असम की लोक कथाओं के विषय में प्रारंभिक, किंतु  महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करते हुए उनके दस वर्ग बनाए हैं— पौराणिक, अलौकिक, उपदेशात्मक, कौशलपूर्ण, शौर्यपूर्ण, सामाजिक, जीव-जंतु संबंधी, कौतुहलोद्दीपक, बुझौवल और मनोरंजन कथा। अपने वर्गीकरण को उन्होंने लोककथाओं के उदाहरण देकर पुष्ट किया है।

असम का लोक नाट्य भी बहुत समृद्ध है। आश्चर्य का विषय है कि लोक साहित्य के असमी अध्येताओं ने इस दिशा में कोई बहुत ठोस कार्य नहीं किया। वस्तुतः असमीया लोक नाट्य का विस्तार इतना अधिक है कि उसे वर्गीकृत करना आसान काम नहीं है। इसके बावजूद, भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी ने वर्गीकरण का प्रयास करके भविष्य के शोधार्थियों का मार्ग प्रशस्त किया है। उन्होंने असमी लोकनाट्य के पाँच वर्ग बनाए हैं— अर्द्धनाट्य, गीति-नृत्य नाट्य, स्त्री प्रधान नाट्य, यात्रा या गान और अंकिया तथा झुमरा। यह स्पष्ट है कि इस वर्गीकरण पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है, फिर भी यह एक दिशा तो देता ही है। अध्येता ने विभिन्न लोकनाट्यों का परिचय और उनके अभिनय का ज्ञान भी इस ग्रंथ में दिया है। लेखक द्वारा असम के लोक नाट्य की विशेषताओं को एक स्थान पर दिया जाना उपयोगी कहा जाएगा। उनकी यह चिंता भी सही ही कही जाएगी कि समुचित संरक्षण के अभाव में आज अनेक लोकनाट्य मृतप्राय भी हो रहे हैं। (पृ. 130)।

प्रकीर्ण साहित्य के अंतर्गत लोकोक्तियाँ, मुहावरे, पहेलियाँ, सूक्तियाँ, पालने के गीत, खेलों में वाणी विलास और कुछ दूसरे विषय आए हैं। यह प्रकीर्ण साहित्य अन्य भाषाओं के लोक साहित्य में भी इसी प्रकार अध्ययन का विषय बनता है। खेलों में वाणी विलास के अंतर्गत लेखक ने कुछ ऐसे खेलों की जानकारी भी दी है, जो असम से बाहर रहने वालों को नई लग सकती है। अलौगुटि और बाँस पेड़ संबंधी जानकारी इसी प्रकार की है।

इस ग्रंथ में मंत्र साहित्य अवश्य ही बहुत ध्यान आकर्षित करता है। लेखक ने इस साहित्य के वर्गीकरण के पूर्व यह बताया है कि मंत्र साहित्य को लोक साहित्य का अंग माना जाना चाहिए— "मंत्र साहित्य को कभी-कभी लोक साहित्य के अंतर्गत न मानने के लिए भी तर्क दिये जाते हैं कि यह गोपनीय विषय है, जबकि लोक साहित्य के अन्य विषय जनजीवन के साथ अंगीभूत हैं। परंतु मंत्र साहित्य एक विशिष्ट प्रयोक्ता के लिए होते हुए भी इसका असर जनमानस में कम नहीं है। दैहिक, दैविक, आधिभौतिक क्षेत्रों में इसका व्यापक प्रयोग उपेक्षणीय नहीं है। इसलिए मंत्र साहित्य लोक साहित्य का प्रमुख अंग नहीं होते हुए भी उससे सर्वथा भिन्न नहीं माना जा सकता।" (पृ. 161)। भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी का यह दृष्टिकोण अनुचित नहीं कहा जा सकता। लोक व्यवहार में आने वाला मंत्र साहित्य लोकसाहित्य का ही अंग है। असम प्रांत में यह साहित्य हजारों वर्ष पहले से विद्यमान है। कहा जाता है कि ऋषि वशिष्ठ और सिक्खों के नवम गुरु, गुरु तेगबहादुर को भी यहाँ मंत्र विद्या से लोहा लेना पड़ा था।

असम के लोक साहित्य की जानकारी देने वाला यह ग्रंथ असमीया जनमानस का वास्तविक चित्र भी प्रस्तुत करता है। इससे पाठक असम की प्राचीन संस्कृति का ज्ञान भी उपलब्ध कर सकते हैं। यदि लेखक ने असमीया लोकगीतों का हिंदी अनुवाद भी दे दिया होता, तो इसकी उपादेयता और बढ़ जाती ।

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