अपराध : कारण और निवारण (गिरिराज शाह)
अपराध
: कारण और निवारण
गिरिराज शाह
विश्वविद्यालय प्रकाशन
चौक, वाराणसी।
प्रथम संस्करण- 1985, पृष्ठ-
168, मूल्य- 50 रुपए
हिंदी
भाषा की कुछ गिनी-चुनी कमियों में से एक बड़ी कमी इस भाषा में अभी भी विषय वैविध्य
पर भरपूर ध्यान न दिया जाना है। इसका हिंदी के वैश्विक व्यक्तित्व पर निर्णायक
प्रभाव पड़ता है। हिंदी में ऐसे विषयों पर कम स्तरीय लेखन हुआ है, जिनका संबंध सीधे-सीधे शान्ति व्यवस्था और सामाजिक उन्नति से है और जो आम
पाठक के साथ ही विज्ञान अथवा समाजविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए गंभीर
अध्ययन-सामग्री-स्रोत बन सकते हैं। पर्यावरण, प्राणी विज्ञान,
न्यायशास्त्र, नृविज्ञान, पुरातत्व, वनस्पतिशास्त्र और अपराध विज्ञान ऐसे ही
कुछ विषय है। जिन्हें हिंदी का लेखक कहा जाता है और जो हिंदी के नाम पर बड़ी-बड़ी
सुविधाएँ प्राप्त करने को लालायित रहते हैं, उनके भी साहित्य
की सूची उठाकर देखें, तो पता चलेगा कि उनके यहाँ कविता,
कहानी, नाटक, निबंध आदि
की भरमार है, जबकि समाज वैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन संबंधी
लेखन लगभग अनुपस्थित है। हिंदी के लेखकों का स्वयं हिंदी के प्रति यह व्यवहार भाषा
के मोर्चे पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को अक्सर परेशानी में डाल देता है।
तस्वीर
का एक दूसरा रुख भी है। कई बार कुछ विशेषज्ञ (?) लेखक दिखाई
दे जाते हैं, जो समाजा-विज्ञान संबंधी विषयों पर अप्रामाणिक
और स्तरहीन सामग्री निर्मित करना ही अपनी विशेषज्ञता मान लेते हैं। इसका नजारा
देखना हो, तो अपराध के क्षेत्र में देखिए। हिंदी में अपराधों पर आधारित ऐसी कई पत्रिकायें निकलती
हैं, जिनकी प्रसार संख्या लाखों में है, किंतु इनकी सामग्री का स्तर क्या
है? ये किस उद्देश्य से छप रही है? सामाजिक
वातावरण पर इनका कैसा प्रभाव पड़ रहा है? अध्ययन करने पर पता
चलता है कि ये ऐसे स्वनामधन्य लेखकों के बल पर चल रही है, जिनका
उद्देश्य मन में छिपी वासनाओं को उभारना, मन में रोमांचक
वातावरण पैदा करना, झूठी बातें लिखना और पैसा कमाना है। अवसर
मिल जाए, तो इनके आधार पर फ़िल्में भी बन जाती हैं और समाज
के वातावरण को दूषित करने के रास्ते तैयार हो जाते हैं।
क्या
ऐसा नहीं लगता कि सामाजिक-मूल्यों की बातें करके वाहवाही लूटने वाले लेखक यदि
अपराध जैसे विषयों पर उद्देश्यपूर्ण ढंग तथा निष्ठा के साथ लिखें, तो सस्ते फुटपाथीय लेखन पर थोड़ा अंकुश लग सकता है। आर्थर कान्त डायल,
सागर सेट माम, विलियम फाकनर, जॉन गाल्सवर्दी, रिचर्ड राइट तथा दोस्तोवस्की जैसे
विश्व प्रसिद्ध लेखकों ने अपराध शास्त्र को अपने लेखन का विषय बनाया है। हिंदी के सचेत लेखकों को भी इस ओर ध्यान देने की
आवश्यकता है।
‘अपराध : कारण और निवारण’ ग्रंथ के लेखक गिरिराज शाह
ने इस अभाव की पूर्ति की चेष्टा की है। उन्होंने जहाँ प्रतिद्वंद्वी, रिपोर्टर, तीसरे शहर की तलाश जैसे चर्चित उपन्यास
लिखे हैं, वहीं अपराधों पर केंद्रित पुस्तक भी लिखी है। इसकी बहुत बड़ी विशेषता यह
है कि गिरिराज शाह ने अपराधशास्त्र से जोड़कर किसी गंभीर दर्शन की जुगाली नहीं की
है, बल्कि अपराध को व्यावहारिक और समाजशास्त्रीय दृष्टि से
देखा है। इसमें उनके पुलिस जीवन के अनुभव हर स्थान पर काम आये हैं। पुस्तक में
संग्रहीत निबंध समय-समय पर लिखे गए है और
उन्हें अपराध, कारण और निवारण नामक तीन शीर्षकों में बाँटा
गया है। इतने पर भी पुस्तक के तेईस निबंध किसी कथाक्रम का आभास देते हैं। यहाँ
गिरिराज शाह का कथाकार व्यक्तित्व काम आया है।
लेखक
ने अपराध और पुलिस शीर्षक निबंध में पुलिस का प्राचीन और वर्तमान इतिहास दिया है
तथा पुलिस और समाज के वर्तमान संबंधों का आकलन प्रस्तुत किया है। इसी निबंध के एक
प्रसंग में गिरिराज शाह आज के अपराध साहित्य की वास्तविकता भी प्रकट करते हैं। वे
कहते हैं—"अक्सर देखा गया है कि अपराध कथाओं के नाम पर सनसनीखेज और मसालेदार
घटनाएँ प्रकाशित होती हैं, जो पाठकों के मन में अश्लील व
आपराधिक जुगुप्सा पैदा करती हैं। ऐसी घटनाओं का बेबाक वर्णन तथा सिनेमा के पर्दे
पर उन्मुक्त व अश्लील प्रदर्शन और अपराध की रहस्यमय प्रस्तुति अबोध बालक व
बालिकाओं की आपराधिक जुगुप्साओं को कुरेदती हैं और उनके अपरिपक्व मानस पटल पर शनैः
शनैः अंकित होती चली जाती हैं, फलतः उन्हें ऐसा कुछ कर
गुजरने के लिए बाध्य करती हैं, जिसमें कुछ नयापन हो और लीक
से हटकर हो, ताकि आम लोगों पर रुतबा गालिब हो।" (पृ. 5)।
प्रस्तुत
पुस्तक इसी चिंता का परिणाम है तथा
मसालेदार लेखन का सटीक उत्तर है। ऐसा लेखन ही हमें बताता है कि अपराध एक ऐसी बुराई
है, जिसका प्रभाव केवल व्यक्ति पर नहीं पड़ता, वरन्
उससे जुड़े घर, परिवार, जनजीवन,
समाज यहाँ तक कि राष्ट्र और विश्व पर भी पड़ता है। अपराध जितना
भौतिक नुकसान करता है, उससे अधिक व्यक्ति और समाज के मन को
आहत करता है। अपराध संगठित होकर एक ऐसी मनःस्थिति बनाता है,
जो समाज में अनास्था, अविश्वास, घुटन
तथा मृत्यु भय को जन्म देती है। इसी कारण अपराध होने से पहले अपराधी मनोवृत्ति का
सामना करने के लिए तैयार होना चाहिए। अपराध शारीरिक या मानसिक दोष या फिर परिवेश
से जुड़े कारणों से हो सकते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखकर अपराधों के विरुद्ध
सामाजिक जागरण आंदोलन चलाने की भी आवश्यकता है।
गिरिराज
शाह ने भारतीय कानून के विषय में भी अनुभवों पर आधारित विश्लेषण किया है। कानून का
काम है, अपराध होने से पहले उसे रोकने का प्रयास करना और यदि अपराध न रुक सके, तो सही अपराधी को उचित दंड देना। कानून शांति का रखवाला व सुरक्षा की
गारंटी होता है। इस दृष्टि से भारतवर्ष में भी भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम तथा पुलिस ऐक्ट के अनुसार कानून बने हुए हैं। ये
तीनों सन् 1860 से 66 के मध्य बने थे। तब से लेकर आज तक इनका बुनियादी ढाँचा वही
का वही बना हुआ है। समय-समय पर शासन-सत्ताएँ परिवर्तन के नाम पर इनमें जो
जड़ती-घटाती रही हैं, वह उनके हित में भले ही रहा हो, जनता को अपराध का शिकार होने से बचाने अथवा न्याय दिलाने की दिशा में कोई
ठोस कदम साबित नहीं हो सका। यह भारतीय जनता की चिंता का विषय है। गिरिराज शाह कहते
हैं— "तब से अब तक उक्त कानून बेबाक, बेधड़क तथा बगैर
किसी परिवर्तन के चले आ रहे हैं और यदि स्वतंत्रता के पश्चात् कहीं तनिक परिवर्तन
करने का प्रयास किया भी गया, तो वह आधा-अधूरा ही रहा।"
(पृ. 85)। गिरिराज शाह का यह बेबाक कथन वर्तमान भारतीय कानून व्यवस्था पर एक गंभीर
टिप्पणी है। कानून के विषय में आम जनता का यह विश्वास भी तो टिप्पणी ही है कि
कानून अक्सर वास्तविक अपराधी को दंड देने में असफल रहता है।
प्रश्न
यह भी है कि क्या केवल कानून को पहरेदारी सौंप कर अपराधों की रोकथाम की जा सकती है? यह मान लेना अथवा इस प्रश्न का उत्तर हाँ में देना अधूरे सच को पूरा बताना
होगा। वास्तविकता यह है कि कानून की सजगता से भी अधिक महत्वपूर्ण है नागरिक का
कर्तव्य बोध। गिरिराज शाह मानते हैं कि यदि नागरिक सामान्य नागरिक संहिता का पालन
करें, तो अपराधों और दुर्घटनाओं को बहुत कुछ रोका जा सकता
है। लेखक ने इस विषय में अपने छः सुझाव दिये हैं, जिनका
निचोड़ यह है कि नागरिक को कोई भी काम करने से पहले यह सोचना चाहिए कि उसका कार्य
सामाजिक दृष्टि से उचित है या अनुचित। वह किसी का अकारण अहित तो नहीं कर रहा और
अपने उद्देश्य को पाने के लिए कहीं अनुचित मार्ग का अवलंबन तो नहीं ले रहा है।
नागरिकों
को एक तथ्य यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि राज्य पर जितना अधिक निर्भर रहा जाएगा, उतना ही वह हमारा शोषण करेगा और हमारी स्वतंत्रता को बंधक बनाने का प्रयास
करेगा। अपराध तथा न्याय के संबंध में भी यह तथ्य पूरी तरह लागू होता है। बहुत सारे
ऐसे मामले होते हैं, जिनको आत्मानुशासन, दूरदर्शिता, सहिष्णुता और पारस्परिक समझदारी के आधार
पर निपटाया जा सकता है। ऐसे मामले न्यायालय में पहुँचकर अनेक दुष्परिणाम देते हैं।
गिरिराज शाह अपना सुझाव देते हुए कहते हैं— "आज आवश्यकता इस बात की है कि
नागरिक स्थानीय समितियाँ बनाकर आपसी विवादों को यदा संभव स्थानीय स्तर पर भी
सुझाने का प्रयास करें, जिससे मुकदमों के बोझ से मुक्ति मिल
सके।" (पृ. 101) हमारी प्राचीन ग्राम व्यवस्था इसी प्रकार की थी। उस समय अनेक
मामले बड़े बूढ़ों के द्वारा ही निबटा दिए जाते थे।
गिरिराज
शाह पुलिस और जन सहयोग पर भी अपने विचार प्रकट करते हैं। वे मानते हैं कि पुलिस को
जन सहयोग की भारी आवश्यकता है। अतः जब भी कोई घटना घटे तो नागरिक को साथ कार्य
करने चाहिए— “पुलिस को घटना की संक्षिप्त सूचना देना, अपराधियों के विषय में बताना, प्रयोग किए गए हथियारों
की जानकारी देना, अपराधियों के भागने की दिशा व शैली बताना।
भागते हुए अपराधियों का पीछा करना और उन्हें पकड़ना, घटना-स्थल
पर छेड़-छाड़ न करना तथा उपलब्ध सूचना पुलिस अधिकारी को बतलाना।” ये सुझाव निश्चय
ही पुलिस अधिकारी गिरिराज शाह के हैं, लेखक गिरिराज शाह के
नहीं। भारत की पुलिस का मानसिक गठन अभी तक भी ऐसा बना हुआ है कि इनमें से थोड़े से
सुझावों का पालन करने वाला नागरिक ही अपनी सुख-शांति खो बैठता है। तो फिर सारे
सुझावों का पालन कौन करेगा? इस पक्ष पर नागरिकों से अधिक
पुलिस को विचार करना चाहिए; क्योंकि अधिकांश अवसरों पर पुलिस
कर्मचारी ही आम आदमी को सुरक्षा देने में असमर्थ रहते हैं।
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