भूख हड़ताल (शंकर पुणताम्बेकर)

 

भूख हड़ताल

शंकर पुणताम्बेकर

 

संचयन

124/152-सी, गोविन्द नगर

कानपुर-6

प्रथम संस्करण- 1986, पृष्ठ- 86, मूल्य- 30 रुपए

 

'भूख हड़ताल' एकांकी संग्रह में चार एकांकी हैं। इनकी रचना हिंदी व्यंग्य विधा को गतिशील बनाने वाले प्रसिद्ध व्यंग्यकार शंकर पुणताम्बेकर ने की है।

 पहला एकांकी 'ऐसा भी पतित' स्वयं एकांकीकार के अनुसार बिल्कुल पुराने ढंग का है। लेखक ने पहले इसका शीर्षक 'सबसे छोटा आदमी' रखा था। एकांकी का मूल विषय दाम्पत्य संबंधों में पारस्परिक विश्वास को सर्वोत्कृष्ट तत्व सिद्ध करना और उस विश्वास को तोड़ने वाले व्यक्तियों को बुरी अवस्था में दिखाना है। इसमें लेखक ने एक प्रेम त्रिकोण निर्मित करने का प्रयास भी किया है। महेन्द्र एक विशाल हृदय व्यक्ति है, जो अपनी पत्नी रंजना द्वारा आँखों में गलत दवा लगा दिये जाने के कारण अपनी दृष्टि खो बैठता है। उसके बाद भी रंजना के प्रति उसका प्रेम कम नहीं होता। अविनाश महेन्द्र के घर में शरण लेकर रहता है, जिसे महेन्द्र अपने छोटे भाई की तरह रखता है। यही अविनाश रंजना को अपने जाल में फँसाता है। अंततः ब्लैकमेल करने वाले नंदलाल के द्वारा यह भेद खुल जाता है। अविनाश आत्मग्लानि के कारण आत्महत्या कर लेता है। वह अपनी आँखें महेन्द्र के लिए दान कर जाता है।

एकांकी अपने कलेवर और तकनीक में बहुत साधारण है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह किसी उपदेशात्मक और सुधारात्मक दृष्टि से लिखा गया है। फिर भी महेन्द्र के चरित्र के माध्यम से शंकर पुणताम्बेकर ने कुछ स्थानों पर महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं, जैसे- "गरीब यदि चोर नहीं है, तो वह महान है। परिस्थितियों की गतिविधियाँ मनुष्य को इस प्रकार झकझोर देती हैं कि उसमें वह नीति-अनीति को भूल जाता है।" (पृ. 16)।

'खंडहर की एक शाम' मेवाड़ से जुड़ी घटना पर आधारित है। सन् 1536 में बनवीर सिंह नाम के सामंत ने मेवाड़ की सत्ता पर अधिकार करने के लिए वृद्ध महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी थी। वह राज्य के उत्तराधिकारी कुँअर उदय सिंह को भी मार्ग से हटाना चाहता था। पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह की रक्षा की थी। कीरत वारी के माध्यम से महल से भागकर वह कुम्भलगढ़ की ओर चली गई थी। इस एकांकी का कथानक इस पूरे घटनाक्रम को पृष्ठभूमि में संजोये हुए है और राजमहल से निकलने के दूसरे दिन की शाम वाली घटना को प्रस्तुत करता है।

एकांकी की घटना जंगल की किसी छोटी-सी बस्ती के पास वाले खंडहर में घटित होती है। पन्ना चंदन को खोकर मातृ सुलभ व्याकुलता से पीड़ित है। उसने अपने कर्तव्य के वशीभूत अपने पुत्र का बलिदान तो कर दिया, किंतु  वह एक माँ के रूप में उस बलिदान की गर्मी को सहन नहीं कर पायी। उसका पुत्र चंदन हर क्षण उसके नेत्रों में घूमता रहा। वह निरंतर बेचैन बनी रही, यहाँ तक कि उसे आत्मविश्वास टूटता हुआ सा लगा। वह सामली से कहती है, "सामली कल की वह रात कैसी भयावनी थी! अपनी ही आँखों मैंने अपने बच्चे के टुकड़े होते देखा। चित्तौड़ से हम इतनी दूर आ गए हैं, फिर भी वह भयावना दृश्य मेरी आँखों के सामने से नहीं हट रहा है। दिन भर से कोशिश कर रही हूँ... मुझे लगता है सामली कहीं मैं बीच ही में तो नहीं टूट जाऊँगी। कुंभलगढ़ तो अभी बहुत दूर है।" (पृ. 36)। इसके पश्चात् एकांकी में पन्ना के भीतर एक माँ और एक कर्तव्यनिष्ठ राज्य सेविका के मध्य व्यापक संघर्ष चलता है। कुछ देर बाद राज्य के उत्तराधिकारी उदय की भावनाएँ प्रभावशाली विस्तार पाती हैं। वह चंदन और पन्ना दोनों के प्रति भावाकुल हो जाता है। उदय चंदन को स्मरण करता है और पन्ना आँखों में आँसू लिए सब कुछ देखती है।

यह एकांकी इस दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इसमें पन्ना की वह मानसिकता दिखाई गई है, जो मूल ऐतिहासिक घटना के बाद बनी थी। पन्ना की उस दशा की कल्पना लेखक की मौलिक रचना दृष्टि का प्रमाण प्रस्तुत करती है। साथ ही लेखक ने चंदन के बलिदान का उदय के मानस पर जो प्रभाव दिखाया है, वह भी लेखक के रंग-कर्म को नया आयाम प्रदान करता है।

'भूख हड़ताल' पाखंडी और स्वार्थी श्रमिक नेताओं के यथार्थ को प्रस्तुत करता है। चैनपाल मिल मजदूरों का नेता है, किंतु उसका ध्यान मजदूरों के हित से अधिक अपने और मिल मालिकों के हित पर रहता है। मालिकों से माँगें मनवाने के लिए मजदूर भूख हड़ताल का निश्चय करते हैं और चाहते हैं कि मजदूर नेता चैनपाल ही भूख हड़ताल पर बैठे। चैनपाल को लगता है कि यदि वह भूख हड़ताल पर बैठा, तो मिल मालिकों की दृष्टि में गिर जाएगा तथा उसका धंधा चौपट हो जाएगा। वह मजदूरों को तरह-तरह से बरगलाता है और किसी तरह बच निकलने की कोशिश करता है। वह कहता है, "मैं मर कर भी अमर हो जाऊँगा। आकाश मेरे नाम की जय-जयकार से गूँज उठेगा। पर भाई लोगो, आप लोगों ने अपना नेता बनाकर मुझे जो बड़प्पन दिया है, उससे ज्यादा और बड़प्पन मैं आप लोगों से छीन लूँ, अच्छा नहीं लगता।" (पृ. 48)।

इस भावनात्मक भाषण का प्रभाव एक मजदूर दुःखीराम पर पड़ता है। वह चैनपाल के स्थान पर हड़ताल पर बैठने के लिए तैयार हो जाता है। दुःखीराम की पत्नी जानकी उसे अपना कदम वापस लेने को कहती है। वह इन नेताओं का यथार्थ प्रकट करते हुए कहती है, "ये नेता कहते हैं कुएँ में कूद पड़ो और तुम जैसे अंधविश्वासी कुएँ की खोज में निकल पड़ते हैं... न मिला तो खुद खुदवाते हैं, सरकार से राशि मंजूर कराकर... और तब संतोष मिलता है जब कूद पड़ते हैं।" (पृ. 51)। सचमुच दुःखीराम हड़ताल पर बैठकर कुएँ में कूद पड़ता है। वही क्या सारे मजदूर कुएँ में कूद पड़ते हैं। चैनपाल हड़ताल का पूरा फायदा उठाता है और मिल मालिकों से पैसा खाकर हड़ताल तुड़वा देता है। तीन दिन का भूखा दुःखीराम शराब पीकर अकाल मृत्यु का शिकार हो जाता है। चैनपाल की नेतागीरी वैसी की वैसी ही बनी रहती है। ऐसे स्वार्थी नेताओं का चरित्र चैनपाल के इस संवाद से एकदम साफ हो जाता है— "दुःखीराम की मौत अभी नई-नई है डाइरेक्टर साहब। लोग देखते-देखते झोली भर देंगे। अब मरा है, तो उसकी मौत ऐसे ही क्यों चली जाएगी?" (पृ. 62)।

'शेष-अशेष' लेखक के अनुसार मंचीय दृष्टि से सर्वथा नया प्रयोग है। इसमें मात्र दो पात्र हैं, जो मंच पर आते हैं। शेष पात्र डमी पात्रों की श्रेणी के हैं। एकांकी का कथानक भूतपूर्व प्रेमी-प्रेमिका के अकस्मात् टकरा जाने का है। सत्यव्रत और कुसुम पहले एक दूसरे को प्यार करते थे, किंतु  सत्यव्रत की कायरता के कारण उनका विवाह नहीं हो पाता। वह आशा से विवाह करता है। उधर कुसुम का विवाह केशव से हो जाता है। एक दिन कुसुम अपने पति के साथ उसी शहर में आती है, जहाँ सत्यव्रत पहले से ही है। दोनों एक दूसरे को देखकर सकते की हालत में आ जाते हैं। उन दोनों की जो मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है, वही 'शेष-अशेष' एकांकी में है।

'शेष-अशेष' की मौलिक विशेषता है, उसका रंगमंचीय प्रयोग। लेखक ने इसके माध्यम से नवीन मंचीय तकनीक का परिचय दिया है। मंच पर केवल दो पात्र आते हैं, शेष पात्रों का प्रवेश केवल अनुमानित होता है। इतना ही नहीं, चाय की प्यालियाँ और अखबार आदि भी अनुमानित ही होते हैं। बहुत सारे मंचीय कार्य ध्वनि- प्रयोगों से लिए जाते हैं। इसी प्रकार प्रकाश व्यवस्था भी इसके मंचन में बहुत प्रभावशाली भूमिका अदा कती है। इस तकनीक के आधार पर यह एकांकी एक श्रेष्ठ प्रयोगधर्मी एकांकी बन जाता है। वैसे लेखक को इस बात में भी कोई आपत्ति नहीं है कि डमी पात्रों को मंच पर ले आया जाए और इसे खेला जाए।

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