सामाजिक पटभूमि सहित असम के बरगीत (आलोचक और संपादक - बापचंद्र महंत)
सामाजिक
पटभूमि सहित असम के बरगीत
आलोचक
और संपादक - बापचंद्र महंत
कमल
कुमारी फाउण्डेशन
द्वारा-
बरुआ एण्ड एसोसियेट्स प्रा. लि.
जोरहाट-1
(असम)
प्रथम
संस्करण- 1988, पृष्ठ- 421, मूल्य- 150 रुपए
भारत
के असम प्रांत में बरगीत नायक पंद्रहवीं शताब्दी से 400 वर्ष तक भक्ति धारा
प्रवाहित करते रहे। उन्होंने वहाँ ठीक उसी प्रकार जनता को भक्ति रस का पान कराया, जैसे अष्टछाप के कवियों ने उत्तर भारत की जनता को और बाउलों ने बंगाल की
जनता को। शंकर देव और माधव देव ने बरगीतों की रचना में किसी प्रकार की सांप्रदायिक
या संकुचित दृष्टि का अनुसारण नहीं किया, बल्कि उन्होंने
अखिल मानवीय दृष्टि से इन गीतों को रचा। इन गीतों में आध्यात्मिक और दार्शनिक
तत्त्व के साथ ही सामाजिक अनुभूति की जो संपत्ति भरी पड़ी है, वह संसार के किसी भी मनुष्य को जीवन का सही मार्ग दिखाने में सक्षम है।
यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि असम में प्रचलित ये बरगीत अभी तक असम के बाहर नहीं
पहुँच सके थे। विशेषकर हिंदी में न ये
बरगीत उपलब्ध थे और न उनमें छिपी भाव संपदा की व्याख्या। वयोवृद्ध हिंदी सेवी एवं
लोक-जीवन व साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान श्री बापचंद्र महंत के दीर्घकालिक प्रयास
से ये बरगीत हिंदी में प्रकाशित हो सके। उन्होंने न केवल गीतों का संग्रह और
अनुवाद किया, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और शंकरदेव, माधवदेव के संबंध में भी अध्येताओं के लिए ऐतिहासिक महत्व की सामग्री विस्तारपूर्वक
प्रस्तुत की।
सहज
जिज्ञासा हो सकती है कि बरगीत किसे कहते हैं? इसमें दो
शब्द हैं-- बर और गीत। इनमें से ‘गीत’ शब्द
की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि गीत का
अभिप्राय अपने आप में स्पष्ट है। ‘बर’
शब्द संस्कृत के वर शब्द से निर्मित है। असमिया में शब्द के प्रथम वर्ण 'व' को 'ब' पुकारे जाने की भाषिक व्यवहार परंपरा है। इस आधार पर बर शब्द श्रेष्ठता का
द्योतक है। अत: बरगीत का अर्थ हुआ, श्रेष्ठ गीत। ऐसे श्रेष्ठ
गीत, जिनकी रचना महापुरुष शंकरदेव और उनके शिष्य माधवदेव ने
की थी। इतिहासकारों का अनुमान है कि महापुरुषों के जीवन काल में बरगीत शब्द का
प्रचलन नहीं था। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके गीतों के वैशिष्ट्य को बनाए रखने के
लिए बरगीत संज्ञा का प्रचलन प्रारंभ हुआ। इस संबंध में दो अनुमान और भी हैं। एक के
अनुसार, बरगीत संपूर्ण शास्त्रीय रीति से जुड़े हुए थे। इनकी
रचना और गायन में शास्त्रीय पद्धति के सभी अंग प्रयुक्त होते थे। यह वैशिष्ट्य भी
इन गीतों के नामकरण का कारण हो सकता है। दूसरे अनुमान के अनुसार, सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में असम के कुछ भागों में मनसा देवी की कथा का
प्रचार हो गया था। मनसा कथा के गायक शास्त्रीय रागों का प्रयोग करते थे। किंतु यह
भी सत्य है कि किसी राग के प्रयोग मात्र से ही कोई गायन पद्धति संपूर्ण शास्त्रीय
नहीं हो जाती, इसलिए अंकीया नाटक तथा मनसा कथा के ओजापालि
गीतों से पार्थक्य सिद्ध करने के लिए बरगीत संज्ञा का प्रचलन हुआ होगा। बरगीतों के
संग्रहकर्ता तथा विश्लेषक बापचंद्र महंत ने यह माना है कि— "बरगीत शब्द में
बर विशेषण जोड़ने के प्रमुख दो कारण हैं। इनमें एक तो है— धर्म की परंपरा या साधना
मार्ग में विशिष्ट स्थान। साधना मार्ग में एक विशिष्ट विधान के अनुसार इसके गाने
की परंपरा चल रही है, इसलिए इस परंपरा के बाहर के लोग दूसरे
संगीत शास्त्र की पद्धतियों से ठीक-ठीक इस विषय में निर्णय नहीं दे सकेंगे। दूसरा
कारण यह है कि ये गीत स्थानीय लोक परंपरा के विधानों से अनुशासित या देशीय नहीं
है।" (पृ. 68)।
बापचंद्र
महंत ने बरगीतों के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए उनकी कुछ विशेषताओं पर विचार
किया है। वे मानते हैं कि हर बरगीत के लिए एक निर्दिष्ट शास्त्रीय राग होता है।
बरगीत में कुछ विशेष तालों का उपयोग किया जाता है, जिस
कारण ध्वनि और मात्रा विभाजन आदि में मौलिकता तथा विशिष्टता आ जाती है। बरगीत में
दो अंश होते हैं, एक निबद्ध और दूसरा अनिबद्ध। अनिबद्ध अंश
को रागतना अथवा रागमालिता कहा जाता है। बरगीतों के गायन में यह भी निर्धारित रहता
है कि किस काल में बरगीत गायन करते समय किस राग का उपयोग होना चाहिए। उदाहरण के
लिए प्रातःकाल, अहिर, कल्याण, संध्याकाल, अशोवारि रात के पहले भाग में कानड़ा,
मल्लार और सुबह से पहले धूपाली श्याम आदि का प्रयोग होना चाहिए।
बरगीतों को राग के अनुसार अनेक तालों में गाया जा सकता है।
बरगीत
की इन विशेषताओं तथा लक्षणों की चर्चा के साथ ही बापचंद्र महंत ने यह तथ्य भी
उद्घाटित किया है कि पहले बरगीत को संपूर्ण उच्चाङ्ग या शास्त्रीय संगीत के अनुसार
गाया जाता था, किंतु बाद में उसमें कुछ दोषों का भी प्रवेश हुआ। इन
दोषों के दो कारण रहे— बरगीत गायकों पर पड़ने वाले बाहरी प्रभाव तथा समर्पणयुक्त
साधना का अभाव।
जहाँ
तक वर्ण्य विषय का प्रश्न है, बरगीतों को दो दृष्टियों
से विश्लेषित किया जा सकता है। एक, रस के आधार पर और दूसरा, मूल विषय के आधार पर। बरगीतों को छः रसों वाला कहा जाता है। इनमें बरगीत
का मुख्य रस भक्ति है। करुण, वीभत्स और रौद्र का प्रयोग
बरगीत में नहीं किया जाता। बरगीतों का मुख्य विषय भक्ति होने के कारण इनमें जो
चित्रण प्राप्त होता है, वह विभिन्न विषयों का स्पर्श करते
हुए पुनः पुनः भक्तिगीतों की ओर लौट आता है। यहाँ तक कि शृंगार का वर्णन भी रस दशा
को प्राप्त होते-होते भक्ति की ओर मुड़ जाता है। बापचंद्र महंत के अनुसार,
"भगवान की महिमा का वर्णन, महिमा को
समझने के लिए तत्त्व ज्ञान का उपदेश तथा भगवान की लीला का वर्णन, ये तीन बरगीतों के प्रमुख विषय बने हैं। भागवत दशम स्कंध के पूर्वार्द्ध
के कृष्ण की लीला की यहाँ लीला वर्णन के लिए विशेष रूप से अपनायी गई है।"
(पृ. 77)। समीक्षक ने इस निष्कर्ष के अतिरिक्त बरगीतों की चार श्रेणियाँ निर्धारित
की हैं— (1) ऐसे गीत जिनमें रसमयी भक्ति की प्रार्थना मुख्य होती है और भक्त भगवान
से प्रार्थना करता है कि वे उसके मन को अपने महिमा कीर्तन के लिए प्रेरित करते
रहें, (2) ऐसे गीत जिनमें तत्त्व ज्ञान और उपदेश भरा हुआ है
तथा जो विषय भोग के दोषों को दिखाकर भक्त के मन को भक्ति के प्रति आकृष्ट करते हैं,
(3) लीला विषयक गीत जिनमें श्रीकृष्ण की ब्रज लीला और गोपियों की
प्रेम भक्ति मुख्य रूप से वर्णित होती है। इस प्रकार के गीतों में अद्भुत, वीर, श्रृंगार आदि रसों का स्वाभाविक समावेश मिलता
है और (4) मिश्रित गीत जिनमें पहले बताए गए तीन वर्गों में से प्रायः दो का मिश्रण
होता है। शंकरदेव के कुछ गीतों में लीला, प्रार्थना या उपदेश
का मिश्रण पाया जाता है। माधवदेव के यहाँ दीनता और वात्सल्य मिले हुए हैं।
इस
विश्लेषण के साथ ही बापचंद महंत ने बरगीतों का सटीक मूल पाठ और भावानुवाद प्रस्तुत
किया है। इस मूल पाठ में पूर्व संकेतित चारों श्रेणियों के गीतों का उल्लेख किया
गया है। राग और गायन का समय भी बताया गया है। इससे ये बरगीत अध्येताओं के लिए सरल
हो गए हैं। पुस्तक में अप्रकाशित और मौखिक परंपरा से प्राप्त गीत भी दिये गए हैं।
संपादक और आलोचक ने कुछ गीतों की स्वर लिपि देकर तथा उच्चारण संबंधी जानकारी
प्रस्तुत करके इस पूरे ग्रंथ को उपयोगी बना दिया है।
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