दरकते कगार (दुर्गा हाकरे)
दरकते
कगार
दुर्गा हाकरे
वाणी प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज,
नई दिल्ली-2
प्रथम संस्करण- 1988, पृष्ठ-
146, मूल्य- 30 रुपए
'दरकते कगार' जुगो के जीवन-संघर्ष की कहानी है। जुगो, अर्थात् एक ऐसी स्त्री, जो संपन्न परिवार में जन्म
लेकर भी झोंपड़ पट्टी का हिकारत भरा जीवन जीने को बाध्य होती है। उसके पति की
निर्वीर्यता उसे उस मार्ग पर धकेल देती है, जिस पर कोई
भारतीय स्त्री बढ़ना नहीं चाहती। वह मार्ग उस फिसलन से भरा हुआ है, जो स्त्री को पतन के गर्त में धकेलकर दम लेती है। लेकिन जुगो उस मिट्टी
की नहीं बनी है, जिससे दुनिया की साधारण औरतें बनी होती हैं।
जब उसका पति अमरशाह उसे गजल के सामने परोसने की तैयारी करता है और उसे घर भेजकर
खुद रात की ड्यूटी पर रह जाता है, तो जुगो समझ लेती है कि
उसे इस दुनिया का मुकाबला अकेले ही करना पड़ेगा। उसे लगता है कि उसके भाइयों ने
उसे सहारा न देकर जो अपराध किया था, उससे भी बड़ा अपराध उसे
पतन की ओर ढकेलने की कोशिश करके उसके पति अमरशाह ने किया है। ये दोनों उसके दुश्मन
बन जाते हैं और वह भाइयों तथा पति से प्रतिशोध लेने का भयंकर संकल्प कर लेती है—
"मैं भी अमरशाह तेरे से बदला लूँगी। जिस घिनौनी जिन्दगी में झोंक दिया है
तूने मुझे, तुझको सारी जिन्दगी उसका अहसास कराऊँगी ×
× × × उसकी नफरत प्रतिपल बढ़ती गई और प्रतिहिंसा की दहकती भट्टी में
सुलगते उसके विचार भी सुलग उठे × × × × इन सभी से जो उसके
भाग्य विधाता भाग्य निर्माता बन गए थे,
भाइयों की इज्जत... अमरशाह की कायरता... जेठ की लोलुपता और जिठानी
के असहयोग सबसे बदला लेगी वह।" (पृ. 46-47)। जुगो उन सबसे बदला लेती है। वह
गजल को हमेशा के लिए अपनी जीवन-यात्रा का साथी बना लेती। कहीं एक कगार जोर की आवाज
के साथ टूटता है। गजल भी ऐसा नहीं था, जो केवल उसकी देह का
भूखा हो। वह एक बार का संबंध हमेशा-हमेशा निभाता है। हर ऊँच-नीच में जुगो का साथ
देता है। जुगो उससे दो पुत्रों की माँ बनती है। गजल बाप की तरह अपना दायित्व
निभाता है। पुलिस की मार खाकर भी वह जुगो का साथ नहीं छोड़ता। उधर जुगो अमरशाह को
नहीं छोड़ती। उससे अपार घृणा होने के बावजूद जुगो उसे न तलाक देती है, न घर से निकालती है, न उसे पति के आसन से धकेलती है।
भीतर से वह भले ही किसी को पतित दिखाई दे, ऊपर से सामाजिक
व्यवस्था को नहीं तोड़ती। वैसे भी वह भीतर से पतित है ही कहाँ? और बाहर से भी सामाजिक व्यवस्था को मान्यता कहाँ दे रही है? वह तो निरंतर भीतरी व बाहरी संसार को चुनौती दे रही है, उससे बदला ले रही है। जब अमरशाह पुलिस में गजल की शिकायत करवा देता है और
पंद्रह दिन बाद घर लौटता है तो "बट्टी सिर से पाँव तक कुछ देर घूरता रहा उसे
और गजल के रोकते न रोकते उस पर पिल पड़ा था। शिव बाजार से सब्जी लेकर लौटा— पिटते
हुए अमरशाह को वह भी पीटने लगा था। गली के लोग भी अमरशाह को थू-थू कर रहे
थे।" (पृ. 71)। यह सब जुगो के सामने हुआ। आज ही नहीं रोज होने लगा। अमरशाह
पूरी तरह जुगो के रहमो-करम पर जीवित रहने लगा।
भीतरी
और बाहरी जीवन व्यवस्था से जुड़े कितने ही कगार एक साथ दरक गए। अमरशाह की स्थिति
टेरियर कुत्ते से भी बदतर हो गई । गजल जुगो के मन और शरीर दोनों पर निश्शंक शासन
करने लगा। क्या जुगो भी गजल को उसी रूप में चाहती थी, जिस रूप में गजल जुगो को? ऐसा मानना जुगो के चरित्र
को अति सरलीकृत करना होगा। घृणा भरी उपेक्षा के कारण जुगो प्रेम से अधिक प्रतिशोध
को चाहने लगी थी। उसके लिए गजल प्रतिशोध का कारगर हथियार था, उसका प्रयोग करके वह पूरी पतनशील व्यवस्था से प्रतिशोध ले रही थी,
"गजल ने चाहे उसे प्यार का नाम दिया हो लेकिन पराजित अपमानित
उस नारी जुगो को अपने पराजय और अपमान का बदला चुकाने के लिए सबसे बढ़िया औजार मिल
गया था, गजल के रूप में × × × × गजल
अपने वादे के अनुरूप सच्चा साबित हुआ था। सचमुच उसने जुगो का साथ दिया था। जितनी
ही विपत्तियाँ आयीं, सबका सामना करते हुए जुगो ने गजल को
अपने साथ-साथ पाया था। (पृ. 47)। जब जुगो को जीप में डालकर अस्पताल ले जाया जा रहा
था, गजल तब भी जुगो के सिराहने नीचे बैठा हुआ था।
दरकते
कगार में इसी जुगो की कहानी है। दुर्गा हाकरे ने सचमुच हिंदी कथा साहित्य को एक ऐसा पात्र दिया है, जो सामाजिक शोषण और अव्यवस्था के सामने यों ही सिर नहीं झुका लेता। वह
भरसक चुनौतियों का सामना करता है। जुगो के हृदय में जो ज्वाला है, वह भारतीय समाज की साधारण नारियों से बहुत अलग होते हुए भी उन्हें एक बेचैन
स्थिति में ले जाने वाली है। उसके भीतर स्त्री होने का अहसास कूट-कूटकर भरा है।
जुगो छः भाइयों और एक बहन से छोटी थी। माँ-बाप प्रारंभ में ही साथ छोड़ गए। विवाह
होकर ससुराल आई, तो शेखचिल्ली प्रकृति के पति अमरशाह के साथ
जेठ के क्वार्टर में रहना पड़ा। अमरशाह अपनी हरकतों के कारण अपनी अस्थायी नौकरी खो
बैठा। जेठ कभी उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं कर पाया। एक दिन उसने उसके
साथ जबरदस्ती करनी चाही। जुगो अमरशाह को लेकर अपने भाइयों के पास आ गई । वहाँ भी उसे
अपमान और उपेक्षा का ही सामना करना पड़ा। उसके बाद की कहानी जुगो के प्रतिशोध से
मिलकर ऐसी भयानक कहानी बन गई, जो हमारे सामने हमारे समाज का,
हमारा अपना भयानक सच प्रस्तुत करती है। यह कहानी संबंध, समर्पण, सतीत्व, नैतिकता,
विवाहेतर यौन-संबंध, अपराध, देह शोषण, निर्धनता आदि से जुड़े सैकड़ों तीखे सवाल
हमारे सामने खड़े करती है। और, केवल सवालों का जंगल खड़ा
करके विराम नहीं ले लेती, बल्कि उस सामाजिक सच को भी सामने
लाती है, जो एक स्त्री को पहले पतन की ओर धकेलता है; फिर प्रतिशोध के लिए विवश करता है। जुगो अमरशाह के सामने यही सच लेकर तन
कर खड़ी हो जाती है— "मेरा आचरण मेरा सतीत्व निर्दोष है या दागदार, इसका जिम्मेदार तू है, तू और केवल तू। तू और तेरा
समाज मुझे चाहे जो समझे, मैं अब परवाह नहीं करती। मेरे भाई
मेरे मायके के लोग, जिन्होंने तेरे जैसे महामूरख, शेखचिल्ली, सपनों में जीने वाले नामर्द पति के पल्लू
से मुझे बाँध दिया है, उनसे डरूं मैं? या
ससुराल वालों में तुझसे और तेरे उस बड़े भाई से, जिसे अपने
भोंदू भाई की पत्नी की आड़ में खूबसूरत जवान खिलौना मिल रही थी, उससे?" (पृ. 111)।
जुगो
के रूप में दुर्गा हाकरे ने एक ऐसा चरित्र गढ़ा है जो प्रतिशोध की भावना से भरा
होने के साथ-साथ बड़ा उन्मुक्त, बड़ा हँसोड़, बड़ा शालीन और बड़ा दूरदर्शी है। जुगो पूरी झोंपड़पट्टी में जुगो चाची के
नाम से प्रसिद्ध है। इस नाम से वह पूजी जाती है। बस्ती के बच्चे उससे बहुत प्रसन्न
रहते हैं। वह खुद भी सबके साथ प्रसन्न रहना और प्रसन्न रखना जानती है— "यूँ
तो इस गली टोले में कितने ही छोटे-छोटे बच्चे हैं और इन सभी से जुगो की मुँह बोली आश्नाई
चलती ही रहती है। करीब आधे से अधिक तो उसके प्रेमी हैं, बाकी
के पति का पद पाये हुए... कई तरह के चुहल मचाती फिरती है इन बच्चों के साथ
जुगो।" (पृ. 15)। बच्चों के साथ यह आश्नाई जुगो के लिए एक सहारा है, जिसके बल पर वह संघर्ष की ऊर्जा प्राप्त करती है। वह अपने मन की गाँठ
बच्चों के साथ की गई चुहलबाजी की उँगलियों से खोलती है। बच्चे उसकी आज्ञा का पालन
करने को हमेशा तैयार रहते हैं। वह बच्चों से बातें करते हुए बड़ी उन्मुक्त,
बड़ी हँसोड़ हो जाती है। "जुगो हँसी और अपने दायें हाथ की
तर्जनी व मध्यमा को जोड़ अपने होठों से छुआ कर बच्चे की तरफ चुम्बन फेंकते हुए
आवाज में मिश्री सी घोलकर कहा घासी का मटन खा लेना, जा मेरा
बिट्टू। और सुन, ठुमक-ठुमक कर न चलना मेरे कन्हैया! सरपट जा
और अपनी दुलहिन का सौदा ले आ! × × × बच्चा मारे शर्म के लाल
पड़ गया और भाग कर आँखों से ओझल हो गया।" (पृ. 9)।
जुगो
की यह उन्मुक्तता गजल के साथ भी दिखाई देती है। कारण यह, कि दुनिया में उसे गजल ही ऐसा आदमी मिला, जिसे वह
पूरा आदमी मान सकी। ऐसा आदमी, जो भारी से भारी खतरा मोल लेकर
भी जुगो के साथ खड़ा रहा। जब जुगो बिट्टी को जन्म देती है,
तो उससे पहले वह गजल के साथ सिनेमा देखने जाती है। फिल्म राजकपूर की थी, जिसे अधबीच में छोडकर वह सिनेमा हाल से उठ आई थी और बिट्टी को जन्म दिया
था। बिट्टी का चेहरा राजकपूर से मिल गया। इसे लेकर गजल ने परिहास किया, तो जुगो ने उससे पूछा कि क्या उसे और भी बच्चे चाहिए? गजल ने हामी भरी और कहा कि उसे केवल एक और बच्चा चाहिए। यह सुनकर जुगो
कहती है, "तो ठीक है, दूसरे बेटे
के समय राजेन्द्र कुमार का सिनेमा ले चलना।" (पृ. 82)।
ऐसी
थी जुगो— बच्चों के साथ भी उन्मुक्त और प्रेमी के साथ भी अकुंठ। लगता था वह आह्ल्लाद
और परिहास के एक भी पल को बेकार नहीं करना चाहती। इन कुछ क्षणों के अलावा तो उसके
जीवन में विषैली हवा और झुलसाने वाली गर्मी ही भरी थी— "मौत तो माँगती हूँ, मिले तब ना, भगवान ने दियाई का रे मेरे को... आदमी
नाग... प्रेमी नाग... औलाद नाग... घर मैके...।" (पृ. 40)। देखा जाए तो भगवान
उसे कुछ दे भी नहीं सकता था। दे सकता होता, तो उसके जीवन को
पहले ही नर्क क्यों बना देता। जुगो भी इस बात को जानती थी। उसे पता था कि भगवान
केवल मूर्तियों में बैठा देखता है, कुछ करता नहीं— "फिर
गोपालजी को कपड़ा पहनाती हुई हँस पड़ी, च् च् च् खुद तो अपने
से होकर तू कपड़े नई पहन सकता रे गोपाल। मेरे मदद के बिना वैसे ई रह जाता है...
मेरे पर तू किरपा बरसायेगा!" (पृ. 79)। जुगो ईश्वर और ईश्वरी-व्यवस्था पर
इतना सहज और स्वाभाविक व्यंग्य करती है कि उसकी एक हँसी में पूरी व्यवस्था ढहती
नज़र आती है।
उपन्यास
में जुगो के चरित्र की संघर्षशीलता से जुड़ा पक्ष अंत तक पाठक का ध्यान खींचता रहता
है। यह व्यवहार-कौशल और संघर्षशीलता ही है, जिसे वह भीतरी-बाहरी
कवच की भाँति अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाए सबसे टक्कर लेती रहती है। जीवन के
समर में वह अकेली है और उसका संघर्ष अकेले दम ही चलता है, किंतु
उसका अकेला व्यक्तित्व बड़ी-बड़ी शक्तियों
पर भारी है। कई बार वह पूरी पुरुष सत्ता को चुनौती देने के लिए खड़ी हो जाती है—
"देख, मैं कमजोर हिया की औरत हूँ,
तभी मर्दों जैसे पीती हूँ, जब जब्बर हिया की औरत होती, तो बिना दारुखोर बने सबका मुकाबला करती, बिल्कुल
बाघिन जैसे, समझी? मरदों को मजबूत
बोलने वाली तुम औरतों पर तो जूता तानने को मन करता है। अरे! मैं पूछती हूँ जो मर्द
अपने ग़म का, तकलीफ़ का मुकाबला दारू पी के करता है, वह भी भला कोई मरद हुआ? थू!" (पृ. 32)।
पुरुषों के अहम के समाज की सड़ी-गली व्यवस्था के कुछ कगार और दरक जाते हैं।
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