वीर टिकेंद्रजीत (के.वाई. शर्मा 'मणिपुरी')

वीर टिकेंद्रजीत

के.वाई. शर्मा 'मणिपुरी'

 

शर्मा बुक एजेंसी,

पाओना बाजार, इम्फाल- 795001

प्रथम संस्करण- 1987, पृष्ठ- 144, मूल्य- 15 रुपए

 

इतिहास को आधार बनाकर कुछ ऐसे नाटक भी रचे गए  हैं, जिनका लक्ष्य इतिहास की किसी घटना या कथा प्रसंग को उसी रूप में प्रस्तुत करना भर होता है। ऐसे नाटकों में नाटककार अपनी रचना विधायिनी कल्पना को अधिक मुक्त नहीं छोड़ता। वह अपनी दृष्टि निरंतर इतिहास पर टिकाये रहता है। ऐसा करने में कई बार साहित्य के नाम पर शुद्ध इतिहास ही पढ़ने को मिलता है। साहित्य से उसकी दूरी साहित्य रसिक पाठकों को थोड़ी खलती भी है, फिर भी किसी लेखक पर यह प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता कि वह साहित्य के नाम पर इतिहास न लिखे।

के.वाई. शर्मा 'मणिपुरी' द्वारा रचित वीर टिकेंद्रजीत एक ऐसा ही ऐतिहासिक नाटक है। मणिपुर के इतिहास में टिकेंद्रजीत, थाङाल और पाओना ब्रजवासी का बहुत अधिक महत्त्व है। इनका संबंध मणिपुर की स्वतंत्रता से बहुत गहरे जुड़ा हुआ है। मणिपुर में अंग्रेजी साम्राज्यवाद का प्रवेश राजनीतिक संबंधों के छद्मवेष में सन् 1835 में ही हो गया था। ये संबंध धरि-धीरे शक्तिशाली और अपेक्षाकृत कम शक्ति वाले राजाओं के संबंधों के रूप में बदलने लगे। 1870 के पश्चात एक समय ऐसा आया, जब अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने स्वतंत्र मणिपुर को निगलने का मन बना लिया। इस अवधि में, एक ओर अंग्रेज मणिपुर के राज-परिवार में फूट डाल चुके थे, दूसरी ओर युवराज टिकेंद्रजीत और सेनानायक थाङाल साम्राज्यवाद की चालों को समझ कर उसका मुकाबला करने का मन बना चुके थे।

यह संघर्ष की भूमिका थी। अंग्रेजों ने अपने पॉलिटिकल एजेंट के माध्यम से मणिपुर को निगलना चाहा और अपने विरोधी टिकेंद्रजीत को देश-निकाला देना चाहा। टिकेंद्रजीत और थाङाल इन चालों को समझ गए। राजदरबार के अवसर पर अनेक अंग्रेज अधिकारी जनता द्वारा मार डाले गए । इसके बाद अंग्रेजों ने मणिपुर पर आक्रमण कर दिया, जिसका मणिपुर की सेना ने पाओना के नेतृत्व में मुकाबला किया। दुर्भाग्यवश पाओना वीरगति को प्राप्त हुए। अंग्रेजों ने अस्वस्थ टिकेंद्रजीत को पकड़ लिया। थाङाल भी पकड़ लिये गए । इन दोनों वीरों को 13 अगस्त 1891 को इम्फाल के कांगजईबुंग (वर्तमान पोलोग्राउंड) में फाँसी पर लटका दिया गया।

प्रस्तुत नाटक इस संपूर्ण पृष्ठभूमि को अपने में समेटे हुए है, किंतु  नाटककार ने सबसे अधिक ध्यान वीर टिकेंद्रजीत पर केंद्रित  किया है। अतः इसका नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है। नाटक में टिकेंद्रजीत की बुद्धि, वीरता, साहस, देशभक्ति, उदारता, बलिदानी भावना, दूरदर्शिता आदि का विस्तार से गुणगान किया गया है। हिंदी  में टिकेंद्रजीत के ऐतिहासिक चरित्र को प्रस्तुत करने वाली यह प्रथम नाट्य-रचना है।

के.वाई. शर्मा ने इस नाटक में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के वास्तविक चरित्र को प्रस्तुत करने पर भी ध्यान दिया है। वे थाङाल से कहलवाते हैं— "अंग्रेजों ने भेदनीति से ही सारे भारत को अपने वश में कर लिया है। हमारी बात तो छोड़ दीजिए, शक्तिशाली राजपूतों को परस्पर लड़ाकर अंग्रेजों ने अपना राज कायम किया है।" (पृ. 3)। फूट डालो और राज करो की यह नीति अंग्रेजों ने हर उस देश में चलाई जहाँ-जहाँ वे थोड़े शक्तिशाली हुए और राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित करने में सफल रहे। वैसे यह केवल अंग्रेजों का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण साम्राज्यवाद का संस्कार होता है। लेखक ने एक प्रसंग में यह बताया है कि कैसे महाराज सूरचंद को अंग्रेजों की कुचालों के कारण भागना पड़ा और कैसे भाइयों में वैमनस्य के बीज पनपे (पृ. 47)। एक अन्य प्रसंग में नाटककार साम्राज्यवादी अंग्रेजों की उस नीति का पर्दाफाश करता है, जिसके सहारे वे राजाओं से उनका राज्य छीन लेते थे तथा उन्हें कहीं अन्यत्र भेजकर जीवन-यापन लायक पैसा देने का प्रबंध कर देते थे। अंग्रेज टिकेंद्रजीत के साथ भी यही व्यवहार करना चाहते थे—

ग्रीनवुड— हम आपको बचाने आए  हैं। गलत फहमी में न पड़ें। हम लोग मणिपुर से दोस्ती चाहते हैं। एक दूसरे को समझकर काम करने से ही शांति रहेगी।

टिकेंद्रजीत— कैसे बचायेंगे, क्या हम अपाहिज हैं, जो हिलडुल नहीं सकते। अच्छा सुनाइये, आप हमको कैसे बचायेंगे?

ग्रीनवुड— चीफ कमिश्नर का आदेश है कि आप मणिपुर के बाहर रहें। आपको नौकर-चाकर दिये जायेंगे। आपको कोई कष्ट नहीं दिया जाएगा। (पृ. 84)

यह नीति इतिहास में अंग्रेजों की 'हड़पनीति' के नाम से प्रसिद्ध है। इसका सहारा लेकर अंग्रेजों ने अनेक राज्यों को अपने साम्राज्य का भाग बना लिया था।

नाटककार ने इस साम्राज्यवाद का मुकाबला करने वाले राष्ट्रीयता बोध को शक्तिशाली बनाकर प्रस्तुत किया है। जब कुलचंद्र यह सूचना देते हैं कि अंग्रेज पहले की तरह संधि करना चाहते हैं, किंतु बदले में आत्म समर्पण की माँग कर रहे हैं, तो टिकेंद्रजीत कहते हैं— "जब तक हमारा शरीर है, अंतिम श्वास है, तब तक हम मातृभूमि की रक्षा करेंगे। हम मातृभूमि की रक्षा में मर सकते हैं, लेकिन आत्म-समर्पण नहीं कर सकते। (पृ. 127)। राष्ट्रवाद के कारण ही लेखक ने ऐसे लोगों से भी सटीक प्रश्न पूछे हैं, जो साम्राज्यवाद के हाथों बिक कर अपनी मातृभूमि को पद-दलित बनाने से नहीं हिचकते (पृ. 140)।

यद्यपि यह संपूर्ण नाटक इतिहास की पाठ्य-पुस्तक की भाँति लगता है, लेकिन कहीं-कहीं इसमें कल्पना-शक्ति का छिटपुट प्रयोग भी देखने को मिलता है। नाटककार ने पोलिटिकल एजेंट ग्रीनवुड की पत्नी को मणिपुरी जीवन, संस्कृति, जनता और प्रकृति के प्रति कोमल व प्रेमपूर्ण भावनाओं से संपन्न पात्र के रूप में प्रदर्शित किया है। उसके माध्यम से कई जगह सांस्कृतिक, सामाजिक और भौगोलिक विशेषताओं को भी प्रस्तुत किया गया है। एक प्रसंग में रसिकलाल नाम का पात्र श्रीमती ग्रीनवुड को समझाता है— "मणिपुरियों के 'षलाई' नाम के साथ गोत्र होते हैं। सम षलाई के लड़का-लड़की परस्पर विवाह नहीं कर सकते।" (पृ. 23)। इसी प्रकार नाटककार ने श्रीमती ग्रीनवुड के मन में टिकेंद्रजीत के प्रति कोमल भावनायें भी दिखाई हैं। यहाँ भी कल्पना से थोड़ा बहुत काम लिया गया है। नाट्यशिल्प की दृष्टि से इस नाटक में कोई भी नवीनता देखने को नहीं मिलती। सामान्य रूप से प्रचलित शास्त्रीय नियमों के आधार पर मंचित होने वाले नाट्यशिल्प को ही अपनाया गया है। इसी कारण यह नाटक विद्यालयीन रंगमंच पर खेले जाने के सर्वथा उपयुक्त है। 

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