पीली बत्ती पर (मोतीलाल जोतवाणी)
पीली
बत्ती पर
मोतीलाल
जोतवाणी
राष्ट्रभाषा
प्रकाशन,
518/6-बी, विश्वास नगर,
शाहदरा, दिल्ली-32
प्रथम
संस्करण- 1989, पृष्ठ- 136, मूल्य- 40 रुपए
"पीली बत्ती पर" के कथानक की चर्चा
के पूर्व इस रचना की विधा पर कुछ बातें कहना जरूरी है। लेखक ने अनुक्रम के अंतर्गत
इस रचना को ‘उपन्यास’ बताया है, जबकि पुस्तक के फ्लैप पर ‘लघु उपन्यास’। पाठक के मन में इससे भ्रम उत्पन्न होता है। सवाल है कि क्या लेखक इस
रचना को पूरा करने के बाद यह निश्चय नहीं कर पाया कि उसने उपन्यास लिखा है अथवा और
कुछ? अथवा क्या उसने उपन्यास लिखने का संकल्प करके एक कथानक
पर काम करना शुरू किया था, लेकिन रचना के आकार के कारण वह
भ्रम में पड़ गया? क्या उसने भ्रम के ही कारण इस रचना को एक
जगह उपन्यास और दूसरी जगह लघु उपन्यास कह दिया? क्या यह
साहित्य की विधाओं के प्रति किसी लेखक की उदासीनता (या लापरवाही) नहीं कही जाएगी? तो, ‘पीली बत्ती पर’ को कौन-सी कथा-विधा में रखा जाए?
शिल्प की प्रचलित कसौटी पर यह रचना
उपन्यास प्रतीत नहीं होती। यद्यपि आकार को आधार बना कर हिंदी में कथा-रचनाओं को ‘लघु उपन्यास’ अथवा ‘उपन्यासिका’ कहे जाने के उदाहरण मिलते हैं, किंतु साहित्य की रचना-विधा
के रूप में इन नामों वाली किसी स्वतंत्र विधा की कोई रीत नहीं बन सकी। इसके विपरीत, कहानी के क्षेत्र में ‘लघुकथा’ और ‘लंबी कहानी’ नमक
कथा-विधाएँ प्रचलित भी हो गईं और प्रतिष्ठित भी। लघुकथा की सैद्धांतिकी के समान (लंबी
कविता की तर्ज पर) लंबी कहानी के सिद्धांत-सूत्र भी गढ़ लिये गए। उनके आलोक में
देखा जाए, तो 'पीली बत्ती पर' रचना में लंबी कहानी के तत्व ही अधिक हैं। लेखक द्वारा उत्पन्न किए गए
भ्रम के कारण ‘पीलीबत्ती पर’ का विधा-निर्धारण
किसी शोधार्थी के लिए चुनौती बन सकता है।
यहाँ इस रचना के कथानक पर ही विचार करना
उद्देश्य है।
हिंदी
कथा साहित्य सन् पचास के कुछ पहले से ही
एक नई दृष्टि से जीवन को देखने लगा था। इसके पीछे न केवल भारत, बल्कि विश्व-जीवन को प्रभावित करने वाले समाजार्थिक कारण थे। स्त्री और
पुरुष इन कारणों के गुणा-भाग की छाया में अपने-अपने ढंग से जुड़ते, टूटते, सँवरते, बिखरते जीने के
नवीन मार्ग तलाशने लगे थे। उनके सामने जीवन का अनंत विस्तार नए संदर्भों को लेकर
खुलने लगा था। यह विस्तार एकदम सरल और आसानी से पहचाना जा सकने वाला नहीं था।
इसमें बहुत जटिल सघनता थी। बहुत उलझाव। ऊपर से स्त्री और पुरुष के सहजात संस्कार
भीतर ही भीतर व्याकुलता का संकेत करने लगे थे। स्त्री संपूर्ण समर्पित होते हुए भी
अपनी स्वतंत्रता और सार्थकता के अभिप्राय और अपने अस्तित्व के मुक्त विकास के
मार्ग की बाधाओं पर विचार करने लगी थी। उधर पुरुष अपने परंपरावादी अहम् का भोग
करते हुए भी स्त्री-स्वतंत्रता का हामी और उसका सहयोगी-सहयात्री होने का नाटक करने
में ही व्यस्त था। किंतु यह नाटक कब तक स्त्री को बांधे रख सकता था? कारण, यह जिस मंच पर अभिनीत हो रहा था, उसके पर्दे पुरुष के चरित्र में व्याप्त अंतर्विरोधों की आग में जलने लगे
थे। इसके बाद वह चाह कर भी कुछ छिपा नहीं सकता था। स्वाधीनता के बाद वाले भारतीय
समाज में स्त्री-पुरुष के वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक
संबंधों को इस वातावरण ने प्रभावित किया। इसे कथा-साहित्य में देखा जा सकता है।
मोतीलाल
जोतवाणी की कथा-रचना 'पीली बत्ती पर' के मनोहर और रजनी के बीच यह जीवन-यथार्थ विद्यमान है। मनोहर एक समाचार
पत्र में सहायक संपादक है। रजनी पूरे समय घर में रहने वाली स्त्री है। मनोहर का
पत्रकारिता से जुड़ा होना यह बताता है कि वह दुनिया को और जीवन को सामान्य लोगों
से कुछ भिन्न दृष्टि से देखता होगा। विशेषकर समस्या को समझने या मानव चरित्र को
समझने के लिए वह अनुमान कल्पना या फिर पूर्वग्रह से काम नहीं लेता होगा, किंतु ऐसा पूरी तरह है नहीं।
भारतीय समाज में पुरुषत्व के साथ जो मिथकीय आडंबर जुड़ गया है, वह उससे मुक्त नहीं है। रजनी आधुनिक वातावरण में जीने वाली स्त्री है।
उसके चरित्र में पारिवारिक संस्था को समझने और सम्मान देने का विवेक विद्यमान है,
किंतु वह न अंधविश्वासी है
न अपने अस्तित्व और महत्त्व से अनभिज्ञ। इसीलिए उसमें समर्पण के साथ-साथ विद्रोह की
प्रवृत्ति भी है।
इस
रचना में रजनी और मनोहर का यह चरित्र ही आधुनिक जीवन के यथार्थ को खोलता है तथा उन
कारणों की खोज करता है, जो स्त्री-पुरुषों के बीच
तनाव की सृष्टि करते हैं। रजनी मूलतः बहुत कोमल और रोमानी परिवेश से प्रभावित होने
वाली स्त्री है। इसीलिए जब वह स्नान करके आती है, तो सोचती
है— "आज फिर मनोहर उसे कहेगा, नहाकर साफ तो हरेक रोज़
होता है, तुम आज साफ होकर आई हो, तुम्हारे
शरीर से फूलों की सुगंध आ रही है। तुम महीने के इस दिन तरोताजा फूल हो जाती
हो।" (पृ. 9), किंतु मनोहर अपने दफ्तर से सीधे घर नहीं
आता। वह 'सफीना' में कैबरे डांस देखकर
घर लौटता है। रजनी के हृदय पर पहला आघात लगता है। वह पहली बार मनोहर को अन्य
पुरुषों की श्रेणी में खड़ा हुआ देखती है। मनोहर उसे अपने दफ्तर की घटना सुनाता है
और बताता है कि किस प्रकार एक दूसरे सहायक संपादक गोपाल ने एक लड़की कु. डिसुजा को
अपने जाल में फँसाने का षड्यंत्र रचा। रजनी के सामने पुरुष का हिंस्र चेहरा आ खड़ा
होता है। जब मनोहर उसके साथ जबरदस्ती करना चाहता है, तो उसके
मुख से अचानक निकल जाता है- "प्रत्येक पुरुष स्त्री को एक्सप्लाइट करता
है।" (पृ. 16)। मनोहर यह आघात सहन नहीं करता और रजनी को अपनी पत्नी होने का
एहसास दिलाता है। यह वास्तव में उसकी परंपरावादी और सामंती कीटाणुओं की खाई हुई
ऐसी विद्रूप मानसिकता है, जिसके सहारे वह अपनी पत्नी का ही
मुख बंद नहीं करना चाहता, बल्कि उसके स्त्री होने और उस नाते
पुरुष से स्वतंत्र इकाई होने की भावना को भी कुचलना चाहता है। रजनी इसका मुँह तोड़
जवाब देती है— "लेकिन बेजान मिल्कियत नहीं हूँ। मेरा भी अपना एक अलग
व्यक्तित्व है। मेरी भी अलग इच्छाएँ, आकांक्षाएँ हैं। इस युग
में भी पुरुष स्त्रियों का किसी न किसी तरह शोषण करते हैं। तुम पुरुषों के लिए कोठे
सजते हैं... मुजरे होते हैं। कैबरे डांस भी तो एक प्रकार का मुजरा ही है... और कुछ
न भी हो, तो पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापन में अधनंगी औरतों की
नुमाइश होती है...।" (पृ. 16)।
पुरुष-सत्ता, पुरुष निर्मित व्यवस्था और स्वामित्व-प्रवृत्ति वाले संस्कारों पर एक
स्त्री का यह जोरदार आक्रमण था। इसका प्रभाव पड़ना चाहिए था, किंतु पुरुष-सत्ता ने अपने विषय
में सोचने के बदले, प्रतिशोध के मार्ग पर कदम बढ़ाया। मनोहर
"रात को मेरा इंतजार न करना" (पृ. 17) कहते हुए ब्लू फिल्म देखने चला
गया। क्षण भर के लिए उसने समझा कि वह एक ऐसे संसार में आ गया है, जहाँ अपनी कल्पना के अनुसार जी सकता है,
"मनोहर रोमांचित हो उठा था, उसे लगा, एक साथ तीन मोर्चे खुल गए थे, देखने के लिए ब्लू
फ़िल्म, पीने के लिए बीयर, छूने के लिए
औरत। तीनों मोर्चों पर दुश्मन की आग बरस रही थी वह सचेत हो गया।" (पृ. 19)।
वहाँ
एक अजीब दुनिया थी। एक ऐसी दुनिया, जिसका
परिवेश कुछ प्राइवेट फ्लैटों तक सीमित रहता है। जहाँ सब कुछ भोगने की अमिट चाह
शासिका के पद पर प्रतिष्ठित होती है— "हाँ, परदे पर
देखने या किताबों में पढ़ने से ऐसे दृश्य से वाइकेरियस प्लेजर मिलता है, जब तक हमारा अपना 'स्व', हम
स्वयं उसके बीच में न हों, तब तक उससे क्या आनंद मिलेगा?"
(पृ. 20)। मनोहर का रोमांच और बढ़ जाता है किंतु कुछ ही क्षणों के
पश्चात् उसे पता चलता है कि दरवाजे पर कोई हल्की-सी हरकत हो रही है। उसका पत्रकार
मस्तिष्क झनझना उठता है। एक भयंकर शब्द उसकी चेतना पर भालू की तरह हमला करता है—
ब्लैकमेल। और वह ब्लैकमेल नहीं होना चाहता। घर लौट आता है। वहाँ उसे रजनी का वही
मधुर स्वर सुनने को मिलता है, "काफी देर जागती रही हूँ, अब मैं सोऊँ? हर रोज़ तुमसे पूछ कर ही सोने की
तैयारी करती हूँ न?" (पृ. 25)।
यह
माधुर्य सुबह तक जीवित नहीं रह सका। मनोरंजन के लिए मनोहर द्वारा चुकाये गए शुल्क
की रसीद ने रजनी के मन में छिपे हुए क्षोभ को सक्रिय विद्रोह का रूप दे दिया। उसने
अपने नारी व्यक्तित्व को तथा अपनी स्वतंत्रता के नैसर्गिक अधिकार को सुरक्षित रखने
के लिए इंडस्ट्रीज एम्पोरियम में सेल्स लेडीज़ की नौकरी के लिए साक्षात्कार देने
का निश्चय कर लिया।
पुरुष
को स्त्री से ऐसे व्यवहार की आशा नहीं होती। वह नहीं चाहता कि स्त्री का मुँह खुले
या उसका पैर घर से बाहर निकले, लेकिन स्त्री की सहन-शक्ति
की भी सीमा है। रजनी मनोहर के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहती है, "मैं तुम्हारी तरह तुम्हें यह नहीं कहती कि तुम रात को मेरा इंतज़ार न करना।
इंतज़ार जरूर करना। यदि मुझे नौकरी मिल गई तो मैं रात होने से पहले ही शाम को घर
लौटूँगी, नहीं मिली तो अभी जल्दी ही वापस आऊँगी।" (पृ. 33)।
मनोहर
अब पुरुष मानसिकता के एक दूसरे पक्ष का प्रदर्शन करता है। इस मानसिकता के कारण
पुरुष यह तो चाहता है कि वह दुनिया भर की सुंदर स्त्रियों को देखे, उनका भोग करे, किंतु उससे यह सहन नहीं होता कि कोई दूसरा उसकी सुंदर
पत्नी की ओर आँखें उठा कर देखे। मनोहर सोचता है "अवश्य ही कुछ पुरुष महिलाओं
के लिए आरक्षित डिब्बे में ताक-झाँक करके उसे घूर-घूर कर देखेंगे। इंडस्ट्रीज
एम्पोरियम में सेल्स लेडी होकर काम करना भी कोई खास अच्छी बात नहीं है। कितने ही
लोग महज़ उसके शरीर की बनावट निगलने के लिए और चेहरे की खूबसूरती पीने के लिए वहाँ
जायेंगे।" (पृ. 34-35)।
यह
एक मानसिकता है, जो अक्सर पति-पत्नी को एक दूसरे के प्रति
अविश्वास और संदेह से भर देती है। सोचने का विषय है कि क्या इस सबके लिए केवल
स्त्री उत्तरदायी है? अथवा क्या केवल इसी कारण स्त्रियों को
घर से बाहर कदम नहीं रखना चाहिए? इन सवालों का उत्तर रजनी के
नौकरी करने से मिल जाता है। वह सेल्स लेडी की नौकरी पा लेती है। मनोहर को यह समझने
के लिए बाध्य होना पड़ता है कि प्रत्येक स्त्री पत्नी या और कुछ होने के साथ-साथ
स्त्री भी है। उसे अपने स्त्री होने के अधिकार को जीने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
यह चारित्रिक परिवर्तन रजनी और मनोहर को फिर से उसी पुराने प्रेम भरे परिवेश में
ले जाता है। इस परिवेश में रजनी कुछ अधिक समझदार होकर लौटती है; क्योंकि वह पारिवारिक विघटन की दशा में नीटू के जीवन पर पड़ने वाले
प्रभाव की कल्पना करके, उन सभी बच्चों के विषय में सोचने
लगती है, जिनके माता-पिता अलग हो जाते हैं, "लेकिन अचानक वह किसी अनजाने डर से भर उठी क्या टूटे परिवारों के बच्चे भी
इतने शरारती और साथ-साथ इतने समझदार होते हैं? क्या वे
डरे-डरे से नहीं रहते...?" (पृ. 49)।
कहानी
में सर्वथा अप्रत्याशित मोड़ उस समय आता है जब तनाव और संघर्ष का तूफान गुजर जाने
के बाद मनोहर कहता है— "सोच रहा हूँ कि जीवन में सफल पुरुष के लिए उसके घर
में फुल टाइम स्त्री का होना शायद बहुत ज़रूरी है" (पू. 51)। रजनी को इस बात
से फिर एक झटका लगता है— "कल नौकरी का अभी दूसरा ही दिन होगा। वह कल काम पर
जाए अथवा नहीं? उसने अपने आपको अचानक ही चौराहे की पीली
बत्ती पर अटकी-सी पाया। अब पता नहीं कौन सी—हरी या लाल—बत्ती होगी? हरी बत्ती हुई तो न जाने कौन-सा रास्ता खुलेगा? आगे
चलकर भी ऐसे चौराहे कई हैं।" (पृ. 52)।
यहाँ
से स्त्री-जीवन का एक दूसरा संघर्ष प्रारंभ होता है। अभी कम से कम भारतीय समाज में
पढ़ी-लिखी स्त्रियों की भी यही दशा है। वे बहुत हद तक विद्रोह करने में सफल हैं, किंतु उनके संस्कार उन्हें
फिर-फिर वापस लौटने को विवश कर देते हैं। वे वापस लौट आती हैं और फिर-फिर अपने को
अज्ञात, किंतु क्रूर
झंझा के शोर में घिरा हुआ पाती हैं। मोतीलाल जोतवाणी ने कथानक को यह मोड़ देकर
भारतीय सामाजिक जीवन और भारतीय स्त्री के यथार्थ को सहानुभूति, समझ व सच्चाई के साथ चित्रित किया है।
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इस
संग्रह में ‘पीली बत्ती पर’ के
अतिरिक्त बारह कहानियाँ भी हैं। इनमें से अधिकांश कहानियाँ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण,
आधुनिक सभ्यता, मनुष्य की स्वार्थ प्रधान प्रवृत्ति
और आदमी की पहचान की खोज से जुड़ी हुई हैं। इन कहानियों की प्रतीकात्मकता यह सिद्ध
करती है कि मोतीलाल जोतवाणी के पास कथानक का ताना-बाना बुनने की अपूर्व क्षमता ही
नहीं है, बल्कि वे उसे पूर्णता तक पहुँचाने वाले शिल्प के भी
अधिकारी प्रयोगकर्ता हैं। ‘चाय की प्याली’ प्रेम के क्षेत्र में विद्यमान एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक तंतु पर टिकी है।
पुरुष द्वारा किसी दूसरी स्त्री की प्रशंसा कितना बड़ा संकट कर देती है, यह चाय की प्याली में दिखाया गया है। नायक के शब्द— "मैंने जब उसे
ऐसा कहा था, तो सुदर्शन ने उसकी ओर भरपूर निगाह से निहारा
था। उसके शरीर और आँखों को देखा था।" (पृ. 57) इस संकट को साफ-साफ प्रदर्शित
कर देते हैं। ‘लाटरी का टिकट’ एक दूसरे
स्तर पर व्यक्ति मनोविज्ञान का प्रस्तुतीकरण करती है। सतीश कुमार टिकट के लिए
मानसिक रूप से विक्षिप्त होने की हद तक पहुँच जाता है, किंतु
लाटरी के टिकट से उसका मोह फिर भी नहीं
छूटता।
संग्रह
में ‘पहचान का संकट’ कहानी पाठक को भीतर तक झकझोर डालती
है। नायक के पास दो व्यक्ति मामाजी की मृत्यु का समाचार लेकर आते हैं। इसके बाद
व्यक्ति की पहचान और उससे जुड़े संबंधों की परतें एक के बाद एक खुलती व एक व्याकुल
शून्य में विलीन होती दिखाई देने लगती हैं। मामा भगतराम की मृत्यु वर्षों बाद माँ
और बेटे को फोन पर मिलाती है, किंतु वे दोनों एक दूसरे के निकट नहीं आ पाते। उधर भाई
का शव भी बहिन के हृदय में छिपी आत्मीयता पर से पूरा पर्दा नहीं उठा पाता। एक
अजीब-सी व्याकुलता और क्षोभ माताजी को घेरे रहता है। वे कहती हैं, "हाँ वे मेरे भाई थे, मैं उनकी बहिन थी...न वे मेरे
भाई थे, न मैं उनकी बहिन थी, यहाँ कौन
किसका है?" (पृ. 133)। यही भावना सामाजिक धरातल पर सब
लोगों को आशंका मिश्रित अजनबीपन के धुएँ में घेर लेती है।
‘लेनदेन’ कहानी आधुनिक सभ्यता के उस पक्ष को
प्रदर्शित करती है, जिसमें पारस्परिक संबंध स्वार्थ सिद्धि
पर टिके हुए होते हैं। प्रतिमा, डॉ. शुक्ल, शर्मा आदि सभी एक दूसरे के प्रति बहुत निजता दिखाते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि उनकी
यह निजता, निकटता और उन्मुक्तता नितांत स्वार्थपूर्ति पर
आधारित है। जब प्रतिमा डॉ. शुक्ल के साथ चली जाती है, तो
शर्मा कथा-नायक को बताता है, "आज सुबह को एक समारोह में
उसके प्रांत के मुख्यमंत्रीजी ने सूखाग्रस्त किसान भाइयों को सरकारी सहायता दी है।
वे नए-नए मुख्यमंत्री बनाए गये हैं, चाहते हैं कि
केन्द्रीय सरकार पर उसका अच्छा प्रभाव पड़े और आज रात को नेशनल हुक-अप पर समाचार
बुलेटिन में उस समारोह का सचित्र समाचार अवश्य दिया जाए ।" (पृ. 128)। शुक्ल
का यह स्वार्थ प्रतिमा और शर्मा के माध्यम से पूरा हो सकता है; इसीलिए वे इनके चक्कर लगा रहे हैं।
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