इतिहास साक्षी है (पं. सुधाकर शास्त्री सांगलीकर)

  

इतिहास साक्षी है

पं. सुधाकर शास्त्री सांगलीकर

 

राज पब्लिशिंग हाउस

9/5123, पुराना सीलमपुर, पूर्व दिल्ली-31

प्रथम संस्करण- 1988-89, पृष्ठ- 136, मूल्य- 35 रुपए

 

हिंदी में ऐतिहासिक महत्व के ऐतिहासिक नाटक जयशंकर प्रसाद ने रचे हैं। उन्होंने इतिहास का शोधपूर्ण दृष्टि से उत्खनन किया है और इतिहास के उन प्रसंगों को नाट्य-शैली में प्रस्तुत किया है, जो आधुनिक युग के दिग्भ्रांत जीवन को दिशा दे सकते हैं। प्रसाद के नाटक मंचन की दृष्टि से कठिन, किंतु सांस्कृतिक और वैचारिक वैभव की दृष्टि से संपन्न हैं।

प्रसाद की परंपरा में ही सांगलीकर का नाटक इतिहास साक्षी हैभी रखा जा सकता है। नाटककार ने इसमें प्रसाद की भाँति इतिहास का प्रयोग एक ऐसी खान के रूप में किया है, जहाँ ऐसे घटना-रत्न दबे पड़े हैं, जिन्हें निकाल कर अनेक आधुनिक समस्याओं के समाधान की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

नाटक की मूल कथा का संबंध चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य और अश्वक जाति की वीर कन्या विशाखा से है। घटना तब की है, जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। उसका पहला युद्ध अश्वक जाति से हुआ। सिकंदर को घायल होना पड़ा। दुर्भाग्यवश अश्वक नरेश अश्वकर्ण भी घायल हो गए, जिसका लाभ उठा कर सिकंदर ने भारतीय जनता पर अत्याचार किए। यह देख कर अश्वक नारियों ने क्रूर यवन-सेवा के विरुद्ध हथियार उठा लिए। सांगलीकर के अनुसार- "विश्व इतिहास का यह प्रथम उदाहरण है, जहाँ पुरुषों के धराशायी होने पर अश्वक स्त्रियों ने युद्ध को निरंतर रखा। सिकंदर यहाँ क्रूर हो उठा तथा उसने भारतीयों का सामूहिक नर-संहार कर डाला। वीर अश्वकों ने अपनी स्त्रियों सहित राष्ट्र-रक्षार्थ स्वयं को स्वाह कर दिया।" (भूमिका)। अश्वकों की वीरता ने सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य को भी प्रभावित किया था; इसीलिए चंद्रगुप्त ने मगध के सैनिक अभियान और सेल्यूकस के विरुद्ध अभियान में अश्वक वीरों को प्रमुख स्थान दिया। प्रस्तुत नाटक के कथानक में इसी जाति की काल्पनिक नाम वाली नारी विशाखा प्रमुख पात्र के रूप में उपस्थित हुई है। उसकी मित्र श्वेता भी अश्वक जाति की ही वीर कन्या है। दोनों की भेंट चाणक्य और चंद्रगुप्त से होती है जिसके बाद पारस्परिक फूट और आत्महीनता तथा विलासिता के जबड़ों में फँसे देश में राष्ट्रीय भावना फूँकने का अभियान प्रारंभ होता है। अंत में सघर्ष होता है और विशाखा राष्ट्र-रक्षा तथा वचन के लिए बलिदान हो जाती है।

नाटककार ने इतिहास के इस अल्पज्ञात प्रसंग को अपनी कल्पना से पल्लवित किया है और आधुनिक भारतीय जीवन में राष्ट्रीयता का मंत्र फूँकने का प्रयास किया है। नाटककार की मूल दृष्टि यह है कि आज तक भारत की पराधीनता तथा निर्बलता का कारण आपस की फूट, अविश्वास तथा राष्ट्रघात जैसी प्रवृत्तियाँ हैं। यदि ये न होतीं, तो न यवनों के आक्रमण सफल होते, न म्लेच्छों के और न गोरों के। तब विदेशी आक्रांताओं के हाथों भारत की नारियों का सम्मान भी खंडित नहीं होता। विशाखा एकदम ठीक कहती है— "श्वेता तुम्हारा कथन सत्य है। इन राष्ट्रघाती शासकों की नीति के कारण भारतीय कुल-वधुएँ अपमानित हुईं। इन्हीं शासकों की मर्खतापूर्ण नीति से, क्षुद्र स्वार्थ के कारण तथा अति विलासिता ने संपूर्ण देश की प्रतिष्ठा को कलंकित किया है। राष्ट्र के आर्थिक संकट के क्षणों में तथा प्रजा के आर्थिक अभाव के समय इन शासकों ने देश और प्रजा दोनों की सहायता नहीं की, किंतु  विदेशी सिकंदर की सहायता देश का धन बहाकर की जा रही है। हतभाग्य! (एक क्षण मौन) हमारे शासक विदेशियों को सर्व प्रकार से प्रसन्न रखने के लिए भारतीय नारियों को उनकी सेवा करने को विवश कर रहे हैं; अतः हमारा क्रोध विदेशियों के प्रति कम तथा उन शासकों पर अधिक है, जिन्हें सत्ता-सुख देश, धर्म और संस्कृति से भी श्रेष्ठ है, प्रिय है।" (पृ. 17)।

स्पष्ट है कि सत्ता-सुख और द्वेष ने हमारे देश को गुलामी की व्यथा भोगने के लिए विवश किया। यदि ऐसा न होता, तो आधुनिक भारत का स्वरूप बहुत कुछ बदला हुआ हो होता। "प्राचीन भारत वर्तमान भारत से विस्तृत एवं विशाल था। हमारी पारस्परिक फूट के लिए इतिहास ने हमें सिकंदर के आक्रमण के रूप में तथा उत्तरवर्ती विदेशी आक्रमणों के रूप में दंडित किया। सिकंदर को जब मात्र अश्वकों ने ही धूल चटा दी, तो यदि वीर पोरस, वीर अश्वकों, मालवों तथा शक्तिशाली मगध राज्य इत्यादि संयुक्त रूप से युद्ध करते, तो संभवतः भारत पर विश्व का कोई भी देश आक्रमण करने की कल्पना तक नहीं करता।" (भूमिका, पृ. 6-7)।

विशाखा का संवाद और नाटककार की धारणा, दोनों ही ऐसे सत्य का उ‌द्घाटन करते हैं, जिसका आज भी अपूर्व महत्त्व है। आधुनिक काल में अंग्रेजों द्वारा थोपी गयी दासता के मूल में भी वही कारण थे, जिन्होंने सिकंदर या म्लेच्छों के समय निर्णायक भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ऊपर से भले ही भारत एकता के सूत्र में बँधा हुआ दिखाई देता हो, किंतु इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय लोग मानसिक दृष्टि से विभाजन के शिकार हैं। वे वैमनस्य, भेदभाव, स्वार्थ, सुविधावाद, सत्ता लोलुपता आदि बुराइयों से इस प्रकार घिरे हुए हैं, कि यह देश ऊपर से उन्नति करता हुआ भी भीतर से खोखला होता जा रहा है। कई बार तो यह भय सताने लगता है कि यह देश कहीं फिर से दासता की शृंखलाओं में न जकड़ जाए। स्वयं लेखक भी इसी चिंता में घुला जा रहा है। इसीलिए वह अनुभव करता है कि "इतिहास के इसी पक्ष को समाज के सम्मुख रखना साहित्य का कर्तव्य है।" (भूमिका, पृ. 7)।

लेखक की यह चिंता और उसका कर्तव्य बोध नाटक के रचना लक्ष्य को भी स्पष्ट करने में सहायक हैं। प्रश्न यह है कि इन समस्याओं का सामना किस प्रकार किया जाए। लेखक इसके उत्तर के लिए किसी दर्शन, सिद्धांत या रहस्य के गह्वर में नहीं उतरता, वह सीधे जनता के पास जाता है; क्योंकि "जब किसी देश की दशा जर्जरित हो जाती है, शासकगण सामान्य प्रजा जनों से उदासीन हो जाते हैं, उस आसन्न समय में स्वयं प्रजा को आगे आना पड़ता है।" (पृ. 17)। प्रजा के इस अभियान में या कहें कि प्रजा को संगठित करके राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक आदर्शों की रक्षा के लिए प्रेरित करने का कार्य कवि ही करते हैं। चाणक्य रुद्रायण को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहते हैं— "राष्ट्र के संकट के क्षणों में कवि शक्ति के मंत्र फूँकता है। कवि राष्ट्र का सजग प्रहरी होता है। समाज का शुभेच्छु होता है × × × × कवि का प्रयत्न होता है कि प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रीय माला में बँधा रहे एवं राष्ट्र पर संकट न आए । अतः कवि प्रजाजनों को राष्ट्रभक्ति की माला में संगठित रखता है।" (पृ. 26)।

यहाँ नाटककार सांगलीकर केवल कवि को नहीं, बल्कि समस्त बुद्धिजीवियों को उनका कर्तव्य समझा रहे हैं। चाणक्य का यह कथन आज के बुद्धिजीवियों को यह प्रेरणा देता है कि वे विचारधाराओं, मतवादों, राजनैतिक प्रतिबद्धताओं आदि के घेरों से ऊपर उठ कर राष्ट्र की भावात्मक एकता और राष्ट्रीय भावना के लिए कार्य करें।

राष्ट्र की दुर्दशा के संबंध में नाटककार ने नारी शक्ति पर भी ध्यान दिया है। वस्तुतः किसी भी राष्ट्र की अस्मिता को सुरक्षित रखने में पुरुषों के समान ही स्त्रियों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है। जब नारी क्रूर सत्ता का सामना करने के लिए संकल्पबद्ध होकर हथियार उठा लेती है, तो उसके सामने बड़ी से बड़ी पाशविक सत्ता भी टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाती है। विशाखा ऐसे ही राष्ट्रभक्त और संकल्प के धनी नारी-वर्ग का प्रतीक है। नाटककार ने एक रंगमंचीय निर्देश के अंतर्गत विशाखा की वीरता इस प्रकार प्रदर्शित की है— "सैनिक आगे बढ़ते हैं। विशाखा अपने खड्ग से सैनिकों को मार गिराती है। सैनिक लोग नीचे गिरते हैं और कराहने का अभिनय करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं।" (पृ. 13)। यही विशाखा देश की दुर्दशा के लिए पुरुषार्थ हीनता को सबसे अधिक उत्तरदायी मानती है। वह कहती है, "प्राणों की रक्षा भगवान से नहीं पुरुषार्थ से होती है! (चिंतन की मुद्रा में) और इसी पुरुषार्थ के अभाव में भारतीय समाज दयनीय बनता जा रहा है!" (पृ. 14)। विशाखा इसी संवाद में यह घोषणा भी करती है कि यदि भारतीय लोगों में पुरुषार्थ का पूर्ण अभाव हो गया, तो न धर्म सुरक्षित रहेगा और न संस्कृति। निश्चय ही विशाखा की यह चेतावनी आधुनिक कालीन भारत के लिए कहीं अधिक प्रासंगिक और ध्यान देने योग्य है।

इतिहास साक्षी है कि शेष घटनाएँ चाणक्य और चंद्रगुप्त के चारों ओर घूमती हैं तथा इन सबका लक्ष्य देश में राष्ट्रीयता की लहर उत्पन्न करना है। विशाखा मणिसेन आदि मिलकर चाणक्य के राष्ट्रवादी अभियान को जन-जन तक पहुँचाते हैं। यहाँ तक कि नंद जैसे शासक का मन भी अंततः राष्ट्र की दिशा में गतिमान हो जाता है। नाटक के अंत में चंद्रगुप्त एक वीर राष्ट्रवादी शासक के रूप में उभरता है तथा आने वाले इतिहास के समक्ष राष्ट्रीय भावना प्रधान राजनीति की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। विशाखा चंद्रगुप्त के प्राणों की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान कर देती है और चाणक्य बलिदानी राष्ट्र-भक्तों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करके मातृभूमि की वंदना में अन्य करबद्ध खड़े लोगों के साथ गायन करने लगते हैं।

जहाँ तक नाट्यशिल्प का प्रश्न है, यह नाटक किसी प्रयोग को आधार नहीं बनाता। यह ऐतिहासिक नाटक लिखने की प्रसादीय परंपरा के अनुसार है। इसमें रंगमंचीय निर्देश हैं, विचार बोझिल वक्तव्यनुमा संवाद हैं और प्रसंगानुसार गीतों का प्रयोग है। हो सकता है, ऐतिहासिक नाटकों के साथ यह विडंबना जुड़ गई हो कि वे तुरंत जयशंकर प्रसाद की शरण में चले जाते हैं, जगदीश चंद्र माथुर की ओर नहीं देखते। फिर भी, इतिहास साक्षी है नाटक हिंदी के ऐतिहासिक नाटकों में महत्त्वपूर्ण स्थान का अधिकारी है।

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