मत्स्यगंधा (इंदिरा)

 

 

 

मत्स्यगंधा

इंदिरा

 

विवेक प्रकाशन,

7, यू.ए., जवाहर नगर, दिल्ली-7

प्रथम संस्करण- 1990, पृष्ठ- 199, मूल्य- 65 रुपए

 

मत्स्यगंधा कथानक की दृष्टि से कोई लंबा-चौड़ा उपन्यास नहीं है। इसका कथानक केवल इतना है कि यमुना नदी से केवट-मुखिया को एक कन्या मिलती है,  जिसका नाम सत्यवती, मत्स्या और योजन गंधा प्रसिद्ध होता है— "चंदोरी कुछ बोले इससे पूर्व ही एक वयोवृद्ध केवट ने कहा, मुखिया तुम मात्र हमारे मुखिया ही नहीं हो, केवटों की बस्ती में तुम सत्य के प्रतीक माने जाते हो। केवट तुम्हारे नाम की शपथ लेते हैं। यमुना मैया की इस अनोखी देन का नाम सत्यवती रख दो। दूसरी आवाज उभरी, जल में से मिली है यह कन्या, दार्श दादा, मछली के रूप में आकर यह तुम्हारे जाल में अटकी है, इसका नाम मत्स्या रख दो।" (पृ. 24)

यह कन्या अपूर्व सुंदरी है साथ ही वाक्पटु और व्यवहार कुशल भी। ऋषि पाराशर उसके मोह में पड़ जाते हैं। वह भी ऋषि को अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है— "कौन मुग्ध नहीं हो जाएगा  । सत्यविभोर भी ऋषि तल्लीन थे। दोनों एक दूसरे की बाहों में। चिर तृप्ति के क्षण। निर्वाण के क्षण भी शायद ये ही हों। दीप ज्योति दोनों की आँखों में जल उठी। इस प्रणयी युगल का पीछा चंद्रमा भी लगातार किये जा रहा था। चंद्रमा की दौड़ पीछे रह गई। देह संधियाँ जैसे एकाकार हो उठीं।" (पृ. 50)

सत्यवती ऋषि पाराशर का तेज अपने गर्भ में धारण कर लेती है और ऋषि पत्नी बनने की आकांक्षा पालती है, किंतु  केवट राज इसमें बाधा बनता है। वह तरह-तरह से अपनी पालिता कन्या को समझाता है। यहाँ तक कि उसके पुत्र के सामाजिक अपमान का भय भी उसे दिखाता है, "तूने जमदग्नि का नाम तो सुना ही होगा। उन्होंने उग्रा नाम की वर्ण और संस्कार से नीची जाति शम्बर की पुत्री से विवाह कर लिया था। दासी उग्रा का पुत्र होने के कारण उसके पुत्र को इन ऋषियों ने आर्य पुत्र नहीं माना।" (पृ. 92), किंतु  सत्यवती नहीं मानती दार्शराज अंतिम उपाय अपनाता है। वह ऋषि के पास जाता है और उनका अपमान करते हुए सत्यवती के गर्भ में पल रहे उनके पुत्र को मार डालने की धमकी देता है। ऋषि पाराशर विवश होकर सत्यवती के जीवन से हमेशा के लिए चले जाने का वचन देते हैं, किंतु  अपने पुत्र की माँग करते हैं, "तुम, तुम दार्शराज! मेरा पुत्र मुझे दे सकते हो? मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि अपना पुत्र लेकर चला जाऊँगा। तुम्हारी कन्या के जीवन में कभी नहीं आऊँगा।" (पृ. 105) 

ऋषि यह वचन तो दे देते हैं, किंतु  उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे उनका सब कुछ समाप्त हो गया है। मस्तिष्क में भयंकर तूफान उठ रहे हैं और शिराओं में विषभरी अग्नि जल रही है। उधर सत्यवती इस सबसे अनभिज्ञ है। वह अपने पिता के कृत्य को नहीं जानती; इसलिए ऋषि पाराशर को और उनके माध्यम से संपूर्ण पुरुष जाति को लांछित करती है, "उसके जीवन का प्रथम पुरुष, जिसे उसने अपनी आत्मा से चाहा था, बिना अपराध उसे छोड़ कर चला गया। नहीं, अब वह पुरुष के संबंध में विचार ही नहीं करेगी। पुरुष एक हीन निकृष्ट जीव है।" (पृ. 109)

कालांतर में इसी मत्स्यगंधा पर महाराज शांतनु मोहित होते हैं। भीष्म अपने पिता की इच्छा पूर्ति के लिए आजन्म ब्रह्मचारी रहने का व्रत लेते हैं। सत्यवती रानी बनकर महल में आ जाती है। वह चित्रांगद और विचित्र वीर्य नामक पुत्रों को जन्म देती है। पूर्व निश्चय के अनुसार चित्रांगद का हस्तिनापुर नरेश के रूप में अभिषेक होता है। भीष्म अपने संकल्प के अनुसार राजतिलक की व्यवस्था करते हैं। सत्यवती को पहली बार भीष्म को वास्तविक रूप में समझने का अवसर मिलता है।

यह कथानक प्रख्यात है। लेखिका ने इस मूल तानेबाने में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं किया है, किंतु  जिस ढंग से इसकी प्रस्तुति की गई है, वह विलक्षण और विस्मयकारी है। यहाँ इंदिरा (इंदिरा दीवान) के विषय में यह संकेत करना आवश्यक है कि उन्होंने हिन्दी उपन्यास-रचना के क्षेत्र में सर्वथा अभिनव शैली का प्रयोग किया है। उन्होंने अपने उपन्यास काव्यात्मक शैली में रचे हैं। ध्यान रहे कि ये उपन्यास गद्य काव्य में नहीं हैं। इनका गद्य काव्यात्मक विशेषताओं से युक्त अवश्य है। वे इसी काव्यात्मकता के सहारे गद्य में भावनाओं को विस्तार देती हुई चलती हैं। लालित्य का प्रयोग करके संवेगों के और भावनाओं के चित्र खींचती चली जाती हैं। काव्यात्मक गद्य की यह शैली पात्रों के मानसिक विश्लेषण में उनकी बड़ी सहायता करती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि वे एक मनःस्थिति के भी सारे रंग पकड़ लेती हैं और कई बार बहुत पहले की मनःस्थिति को बहुत बाद वाली मनःस्थिति से लाकर मिला देती है। इंदिरा का सामाजिक और अन्य भाषाओं के साहित्य का अध्ययन इसमें उनकी सहायता करता है।

इंदिरा जीवन के बाह्य पक्ष की अपेक्षा उसके आंतरिक पक्ष पर अधिक बल देती हैं। उनका लगभग सारा जोर मानस मंथन पर होता है। जब शांतनु योजन गंधा से विवाह का प्रस्ताव करते हैं, तो वह अवचेतन में छिपकर बैठे पाराशर को प्रकट होने से नहीं रोक पाती। शांतनु का प्रसंग उठते ही उसे तापस की स्मृति सताने लगती है— "कितने विचार उसके मन को रात-दिन झकझोरते रहते थे बिना किसी कारण...। हल्की सी आहट से वह डर जाती थी। वह तेजस्वी जोवन जीना चाहती थी। कर्मयोगी तपस्विनी बनना चाहती थी, पर कुछ न बन सकी। हताश! निराश! पीड़ित!" (पृ. 125)। यह मनस्ताप उसे शांतनु से विवाह के पश्चात भी सालता रहता है। इतना कि वह शांतनु को कभी भी अपना निजी अथवा आत्मीय नहीं समझ सकी। शांतनु की मृत्यु पर वह इस सच को साफ-साफ स्वीकार करती है, "शांतनु को वह कभी चाह नहीं सकी। आज जब वह नहीं रहा तब भी वह नहीं रोयी।" (पृ. 153)। मत्स्यगंधा के मन की परतें इंदिरा ने और भी गहराई तक जाकर उधेड़ी हैं। वह भीष्म को कभी भी अकुंठ और निश्शंक भाव से नहीं देख सकी थी। शांतनु के सामने उसके द्वारा की गई भीष्म की प्रशंसा भी कृत्रिम ही थी। प्रकारांतर में उसमें द्वेष और आशंका के भाव मिले हुए थे। शांतनु की मृत्यु के बाद तो वह भीष्म से भयभीत भी हो गई थी, किंतु  जब भीष्म अपने वचन का पालन करते हैं, तो वह पहली बार उनके प्रति निर्मल होती है। वह पहली बार गंगानंदन को मन से आशीर्वाद देती है— "पहली बार सत्यवती कभी झूठ नहीं बोलेगी। पहली बार मैंने गंगानंदन को हृदय से आशीर्वाद दिया। हज़ारों बार भीष्म ने पैर छुए होंगे, पर मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि मेरे होंठ कभी नहीं बुदबुदाये, पर आज मैं रोक ही नहीं सकी, आयुष्मान भव।" (पृ. 56)। सत्यवती इस प्रसंग में इतनी विगलित हो जाती है कि वह गांगेय की चरण रज अंगीकार करने तक की इच्छा करती है। पात्रों की मनोदशा और उनके आत्ममंथन का चित्रण लेखिका ने स्थान-स्थान पर किया है। जब शांतनु सत्यवती को अपने प्रासाद में ले आते हैं, तब उन्हें अपने कार्य की गंभीरता और संवेदनशीलता का पहली बार अनुभव होता है। उसी समय उन्हें लगता है कि उन्होंने अपने पुत्र भीष्म के अधिकार का हनन करके बहुत बड़ा पाप कर डाला है। वे अपराध बोध से भर जाते हैं और कहते हैं, "सत्यवती, तुम्हें पाने के लिए तो व्यक्तिगत स्वार्थ की कीच में फँस गया हूँ। हस्तिनापुर में बहुत कुछ खो दिया है।" (पृ. 136)

         इंदिरा के इस उपन्यास की एक और विशेषता ध्यान आकृष्ट करती है। वह है, गद्य में विलक्षण चित्रात्मकता और बिंबधर्मिता। यद्यपि ललित गद्य में भाषा का बिंबधर्मी प्रयोग पर्याप्त मात्रा में मिलता है, किंतु  उपन्यास के गद्य में कविता जैसे बिम्बों का प्रयोग इंदिरा के ही वश की बात है। इस विशेषता के कारण मत्स्यगंधा की भाषा इस युग के उपन्यासों की भाषा की भीड़ में काफी-कुछ अलग दिखाई देती है। एक और बात यह, कि ये चित्र और बिंब कहीं भी इकहरे नहीं हैं। ये हमेशा अंतर्जगत की ओर विभिन्न भंगिमाएँ और गतियाँ धारण करते हुए दौड़ रहे हैं।

मत्स्यगंधा में लेखिका की कल्पना शक्ति और वर्णन सामर्थ्य भी अनोखा प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मत्स्यगंधा के सौंदर्य चित्रण के प्रसंग में इंदिरा ने एक ही स्थान पर सौंदर्य को विविध क्षेत्रों में प्रभाव फैलाने वाला चित्रित किया है। अलग-अलग वर्गों के लोग मत्स्यगंधा को सम्मोहित दृष्टि से देखते हैं। उन सभी के मन में उसके प्रति रहस्यमय आकर्षण है, जिसे अनुभव में उतारने के लिए वे अपनी-अपनी भौतिक, आध्यात्मिक और काव्य-कलात्मक उपलब्धियों को न्योछावर करने की कामना करते हैं— "राजाओं को लगता कि अपनी पतवार से आलिंगन करती इस लड़की को मोती-माणिक्य से तोल दूँ, ऋषियों को लगता नियति के सभी आशीर्वाद इस गंभीर मूर्ति के आगे बिखेर दें, विद्वानों को लगता इसको शब्दों के अंबार में ढक दें, यात्रियों को लगता इसके एक क्षण के सामीप्य से जन्म-जन्मांतर सफल हो गए। धनिकों को लगता अपने कोश का मुख खोल दें--- मात्र एक आलिंगन के लिए, ऋषि महर्षियों को लगता कि कुछ पल तो अपनी दृष्टि बाँध लें!" (पृ. 26)। यह सौंदर्य का वह रूप है, जो अतिशय कल्पनाशील होकर सृष्टि के कोने-कोने को अपने आभा-मण्डल से आक्रांत कर डालता है।

मत्स्यगंधा में भीष्म का चरित्र भी है। भीष्म अपने प्राचीन चरित्र से किसी प्रकार इधर-उधर नहीं है। वे दार्शराज के समक्ष सौगंध खाते हैं कि आजन्म ब्रह्मचारी रहेंगे। इस सौगंध का पालन करते हैं तथा अपने चरित्र को सार्थक बनाते हैं। यही भीष्म का लीक-लीक चरित्र है, किंतु इंदिरा ने उस चरित्र को अपने ढंग से लोक के समक्ष प्रस्तुत करने की कोशिश भी की है। उन्होंने यह माना है कि भीष्म का यश उनके प्रतिज्ञा पालन से इतिहास के पृष्ठों में अनंत काल तक के लिए अंकित हो गया है। यह यश उन्हें इस रूप में नहीं मिलता, यदि वे राजगद्दी पर बैठते। सत्यवती इसी तथ्य को रेखांकित करती है, "भीष्म तो अमर हो गए । हस्तिनापुर का देवव्रत इतिहास के पृष्ठों पर अमर हो गया। किसी सीमा पर नहुष और ययाति की गद्दी पर बैठकर भी वह इतना यश अर्जित नहीं कर पाते, जितना कि आज उन्होंने पा लिया। चारों दिशाओं में उनके नाम की जय-जयकार है।" (पृ. 136)

लेखिका ने इस उपन्यास के संबंध में दो शब्द लिखते समय इसके कथानक में व्याप्त तनाव और मानस मंथन पर बहुत जोर दिया है। पढ़ते समय बार-बार यह लगता है कि लेखिका ने अपने जिस रचना-उद्देश्य का संकेत किया था, उसे पूरा करने में काफी परिश्रम किया है।

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