शब्दों के जंगल और जुगनू (राकेश प्रेम)

 

शब्दों के जंगल और जुगनू

राकेश प्रेम

 

प्रतिभा प्रकाशन,

11/22, टैगोर नगर,

होशियारपुर- 146001

प्रथम संस्करण- 1995, पृष्ठ- 80, मूल्य- 60 रुपए

 

राकेश प्रेम की कविताओं की पृष्ठभूमि खुद उन्हीं की ज़बानी यह है— "कहीं भी कुछ भी सुरक्षित नहीं है/आप/मैं या/हमारे/आपके जैसा/कोई भी/सही सोच-समझ वाला जिन्दा जागता इंसान।" (पृ. 20)। सचमुच आज कहीं भी कोई भी सुरक्षित नहीं है। किसी भी रूप में, किसी भी स्थान पर, किसी भी समय एक मौत हर आदमी की ओर लार टपकाते हुए बढ़ रही है। जो गोली से मारे जा रहे हैं, वे दिखाई दे रहे हैं और जिन्हें दूसरे तरीकों से मारा जा रहा है, वे अदृश्य हैं। यह संसार सीधे-सीधे दो वर्गों में बँट गया है— मारने वाला वर्ग और मरने वाला वर्ग। मारने वाले राजनीति को, सत्ता को, कानून को, सब कुछ को खरीदने की ताक़त रखते हैं। मरने वालों के पास अपनी साँसों के अलावा कुछ नहीं है। दुनिया का यह त्रासद और विस्मयकारी परिदृश्य लंबे समय से सही सोच-समझ वाले ज़िन्दा इंसानों को अपने बाड़े में घेरे हुए है। कोई नहीं जानता किस दिन, कौन वध की ओर धकेल दिया जाए ।

मृत्यु, भय और असुरक्षा से उत्पन्न यह बेचैनी राकेश प्रेम की कविताओं में जगह-जगह मिलती है। उनकी कविताएँ भले ही उस काल में छपीं, जब पंजाब में शांति लौट आई थी और सत्ता के शिखरों पर बैठे हुए लोग अन्य प्रदेशों में आतंकवाद की जड़ें खोद डालने का दंभ प्रदर्शित कर रहे थे, किंतु  ये कविताएँ अपने रचना-काल की दृष्टि से उस अवधि की हैं, जब पंजाब के जीवन को आतंकवादी गतिविधियाँ ढके हुए थीं। उन दिनों आतंकवाद के मुकाबले एक सरकारी आतंकवाद भी था, जो फर्जी मुठभेड़ों में वास्तविक अपराधियों के साथ-साथ ऐसे लोगों को भी गोली से उड़ा रहा था, जिन पर कभी कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ था। मानवाधिकारवादी संस्थाएँ इस प्रति-आतंक के विरुद्ध संघर्ष कर रही थीं, जबकि शोषक सत्ता के पक्षधर लोग इसे शक्ति का उपाय बना रहे थे। सत्ता में बैठे लोग चाहे न मानें, किंतु  इस सरकारी आतंकवाद ने साहित्य पर बहुत अधिक प्रभाव छोड़ा। राकेश प्रेम कहते हैं- "बच्चे गुस्सैल हो रहे हैं/एक पूरी की पूरी पीढ़ी/सूरज जिसकी रगों में अभी/तपिश बन नहीं फूटा/अपने दाँत किटकिटा रही है" (पृ. 24)। बच्चे ही क्यों, वे सभी स्त्री-पुरुष गुस्सैल हो रहे हैं, जिन्हें उनकी सुरक्षा के नाम पर उनके घरों में सील कर दिया गया है और जिनकी फसलों को फौजी बूटों से कुचल दिया गया है— "अपनी सुरक्षा का हथियार/ढूँढ़ते हुए/मेरी मुट्ठियाँ/खाली हवा से/भर आई हैं/अँगुलियाँ उग आई हैं नागफनी सी" (पृ. 34)। असंतोष जब इतना बढ़ गया हो, तो फिर मनुष्य को शांति कहाँ से मिलेगी। फिर वह सूरज के उगने और पहली किरण के छूने का अनुभव कैसे पहचानेगा। उसे तो यही महसूस होगा कि सूर्य अब अपने निर्धारित रास्ते से जाता ही नहीं। हम अनुमान कर सकते हैं कि ऐसे अशांत समाज की पीढ़ियाँ सौंदर्य, कल्पना और कोमलता के सहज-स्वाभाविक रूप को समझ भी सकती हैं या नहीं? जो जातियाँ युद्ध का शिकार रही हैं और शत्रु सैनिकों के पैरों के नीचे कुचली गई हैं, उन्होंने ही अपना प्रकृत सौंदर्यबोध बड़ी सीमा तक खो दिया है। फिर जो जातियाँ अपने ही लोगों के अत्याचारों का शिकार हों, उनसे कैसे आशा की जा सकती है कि वे अपने हृदय की कोमलता बचाये रख पाएँगी? इसके बावजूद सूर्य किरण के स्पर्श की आकांक्षा मानवमात्र की सहज आकांक्षा है। यह स्पर्श उसे जीवन का अर्थ बताता है, उसे ऊर्जावान और सक्रिय बनाता है, उसे निरंतर जीवन की धरती से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है और उसके मन में बाहरी संसार के प्रति रागात्मकता तथा निजता का भाव उत्पन्न करता है। यह किसी समाज के लिए मूल संकट का बिंदु भी है; क्योंकि सूरज की निरंतर प्रतीक्षा के पश्चात भी उसे सूरज नहीं मिलता। दूर तक बहती हुई रक्त की धारा मिलती है। कवि ऐसे ही समाज से कहता है— "किस प्रतीक्षा में खड़े हो दोस्त/उगते सूर्य की/पहली किरण/छूने की इच्छा से बेताब/सूरज अब इन रास्तों से होकर नहीं आता/उसके कोणों की दिशाएँ/पृथ्वी लोक से/फिर गई हैं/सूर्य की पहली किरण अब/फूल में सुगंध और भोर में मोती बन/नहीं खिलती। (पृ. 65)। यह दरअसल इतिहास और आदमी के बीच का सनातन संघर्ष है। अक्सर आदमी का रचा इतिहास उसी के विरुद्ध घातक षड्यंत्र रचता है। लगता है इतिहास समय-समय पर आदमी से बदला लेता है। इस तरह दोनों एक दूसरे के विरुद्ध युद्धरत रहते हैं— "इतिहास की साजिश पर/निहत्था हो जाता है आदमी/आदमी की साजिश पर/पंगु हो जाता है इतिहास/समय की दस्तक पर/दोनों ही हो जाते हैं/गुत्थमगुत्था/बघनखे पहन।" (पृ. 78)।

राकेश प्रेम की कविताएँ इस आतंक भरे माहौल का सामना करते-करते चुक नहीं जातीं। वे इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि किसी डाकू या शासक की बंदूक उन्हें चुप कर दे। वे एक अनथक यात्रा पर निकले हुए संघर्षशील व्यक्ति की सहयात्री कविताएँ हैं। यह यात्रा केवल बाहर ही हो रही हो, यह भी नहीं है, यह यात्रा अंदर भी है, अंतर्मन में भी संपन्न हो रही है। अपने असली रूप में यह यात्रा भीतर से प्रारंभ होकर बाहर की ओर आ रही है। यही इस यात्रा का सौंदर्य  है। ऐसी यात्रा से ही जीवन में कोंपले फूटती हैं— "भीतर की यात्रायें/लौटती हैं जब बाहर/कोंपलें ही कोंपलें/खिलती हैं/गूँजती हैं जल तरंग/कलकल सा/ बहता है/मन आँगन में/जीवन संगीत।" (पृ. 22-23)। कविता की यही शक्ति व्यक्ति को और पाठक को बाँध लेती है। ऐसी समर्थ कविता रचने वाला कवि ही यथार्थ की ज़मीन पर चलते हुए कड़वी और नंगी सच्चाइयों को समझने तथा उनका बयान करने का साहस कर सकता है। कविता के सहारे अपनी ज़मीन से भी ऐसा कवि ही जुड़ा रह सकता है। वही यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि कविता का काम कोई नया सूरज उगाना नहीं है, बल्कि उसका काम सूरज उगने की ज़मीन तैयार करना है। वही कह सकता है कि कविता का काम कोई युद्ध लड़ना नहीं है। उसका काम युद्ध के विरुद्ध मनुष्य को खड़ा करना है। यह तभी हो सकता है, जब कविता स्थितियों को समझने की कोशिश करे। उन्हें महिमा मंडित करके आदमी की समझदारी से बाहर न ले जाए । कविता असल में आदमी की आवाज़ से जुड़कर लिखी जाती है, उसकी आवाज़ को आकार देने के लिए लिखी जाती है। उसे समझने के लिए लिखी जाती है— "चीख का चुप्पी में ढल जाना/जंग खा जाना लोहे का/लहू का सिल्ली बन जाना/उबलते आदमी का काठ हो जाना/जबकि चुप होने के लिए नहीं है आदमी/मैं तो अपनी कलम से/यह सब/समझने की कोशिश में हूँ" (पृ. 28)। राकेश प्रेम की कविताओं का यह एक दूसरा मूड है, जो उनके रचना कर्म के प्रति आश्वस्त करता है। वे पाठक को यह विश्वास दिलाने में सफल रहते हैं कि कविता आदमी की भाषा है और भाषा केवल जीभ पर ही नहीं रहती। एक भाषा ऐसी भी है, जो जीभ से परे होती है। कविता ऐसी ही जीभ से परे की भाषा है। वह आदमी की नाड़ियों में बहती है, उसके रक्त को ऊष्ण बनाती है। कुल मिला कर आदमी को दुर्धर्ष व्यक्तित्व प्रदान करती है। जब कविता आदमी की भाषा हो जाती है (जो कि सही कविता की मूल प्रकृति है) तो आदमी जीभ न रहने पर भी गूँगा नहीं होता— "बा अदब/बा मुलाहिजा/की मत कहो बात/हाँ चाहो तो/काट लो मेरी ज़बाँ/लेकिन ठहरो/जीभ/कट जाने से/आदमी/गूँगा नहीं होता।" (पृ. 33)।

यहाँ तक आते-आते राकेश प्रेम की कविताओं का विद्रोह और उनके कवि कर्म का लक्ष्य काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है। यह साफ-साफ लगने लगता है कि वे हर परिस्थिति में इस देश की जनता के कवि बने रहना चाहते हैं। यह सचमुच बड़े जोखिम और साहस का काम है। बिल्कुल नंगी तलवार पर नंगे पैर लगातार चलने के बराबर। अब तक जनता के कवियों को सत्ता ने या सत्ता की सहायक शक्तियों ने या फिर सत्ता के दलालों ने कभी बख्शा नहीं। अफ्रीकी कवि बेंजामिन मोलाइस से लेकर पंजाबी कवि पाश तक के साथ जो कुछ हुआ, उससे इसी तथ्य की पुष्टि होती है। राकेश प्रेम के सामने इन सबका इतिहास है, फिर भी वे जनता के कवि बने रहने में गर्व का अनुभव करते हैं और सत्ता के अत्याचारों के विरुद्ध पूरी शक्ति से चिल्लाते हैं- "सुनो! प्रजा जनो सुनो!!/तुम सबके शरीरों में/अब बढ़ जाएगा लहु/तुम सबके शरीरों में/लगाई जाएँगी जोंकें/तुम सब आत्मघात करोगे/तुम सब तिल-तिलकर जलोगे/तुम सब चाटोगे लहु अपना/तुम प्रजा हो/भोगोगे अवश्य/प्रजा की नियति। (पृ. 39)। राकेश प्रेम के जनता का कवि होने का ही दूसरा प्रमाण यह है कि वे अपने शब्दों पर कृत्रिम सभ्यता में पले शहराती रंग को नहीं चढ़ने देना चाहते। उन्हें कच्ची मेंड़ों को छूकर आते हुए शब्द अच्छे लगते हैं। उन्हें ऐसे शब्दों से परहेज है, जो इत्र-फुलेल पसंद करें या प्रशीतन के आदी हो जाएँ। कवि अपने देहाती प्रकृति के शब्दों को ही इस देश के आम आदमी को देना चाहता है। कवि की दृष्टि में ये ऐसे शब्द हैं। जो साधारण आदमी की मुस्कान का अर्थ समझते हैं, उसके सहयात्री बनाते हैं और उसका तथा साथ-साथ कवि का भी आँगन महकाने की शक्ति रखते हैं (पृ. 50)।

राकेश प्रेम ने अपनी कविताओं को सिरजने में पौराणिक पात्रों और संदर्भों का प्रयोग भी किया है। द्रोपदी का संताप, युधिष्ठिर का आत्म मंथन, अभिमन्यु से यक्ष प्रश्न जैसी कविताएँ इसी कोटि में आती हैं। हिंदी की साठोत्तरी कविता में पौराणिक सामग्री का प्रयोग आधुनिक संदर्भों को उजागर करने के लिए पर्याप्त मात्रा में हुआ है। राकेश प्रेम ने अपनी इन कविताओं में उसी परंपरा का अनुपालन किया है। राकेश की ऐसी कविताएँ अन्य समकालीन कवियों की भाँति उन पात्रों को भी कटघरे का रास्ता दिखाती है, जिन्हें अंध श्रद्धा के कुछ कवि ऊँचे आसन पर प्रतिष्ठित करने से बाज नहीं आते।

राकेश प्रेम की कविताएँ अपने मूड के कारण क्रांतिकारी कवि पाश की याद दिलाती हैं--- लेकिन केवल याद, वे राकेश को पाश बना कर पेश करने की भूल नहीं करतीं। राकेश तो अपनी विशिष्ट प्रकृति के अनुकूल ही कहते रहते हैं— "मैं/खोजता हूँ कहीं कोई/जुगनू की चमक/और उड़ेल देना चाहता हूँ/अपनी काव्य सिसृक्षा/उसके भीतर।"

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