इतिश्री (के.एस. सोमनाथन नायर)
इतिश्री
के.एस.
सोमनाथन नायर
लोकभारती
प्रकाशन,
15-ए, महात्मा गाँधी मार्ग, इलाहाबाद-1
प्रथम
संस्करण- 1993, पृष्ठ- 101, मूल्य- 40 रुपए
‘इतिश्री’ कथानक की दृष्टि से अभिनव और वर्तमान युग
की ज्वलंत समस्या पर रचा गया नाटक है। इसके कथानाक के केंद्र में एक ऐसे परिवार की
कहानी है, जो पूँजीवादी सभ्यता के दुष्प्रभाव से उत्पन्न
समस्याओं का शिकार हो गया है। डाक्टर राजगोपाल कहने को तो बड़ा प्रसिद्ध डॉक्टर है, किंतु उसका व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन यौन-अपराधों से घिरा हुआ है। वह
उस क्लब-कल्चर को मानता है, जिसमें 'वाइफ़
स्वैपी' को एक मनोरंजक खेल के रूप में संपन्न किया जाता है।
इस
खेल के लिए लोग क्लब में इकट्ठे होते हैं। शराब पीते हैं। इसके पश्चात् अपनी-अपनी
कारों की चाबियों का एक जगह ढेर लगा देते हैं। क्लब का बैरा उन्हें मिला देता है।
फिर नशे में चूर सदस्य एक-एक चाबी उठाने को झपटते हैं। सदस्यों की पत्नियाँ
अपनी-अपनी कारों में जाकर बैठ जाती हैं। क्लब में जिस सदस्य के हाथ जिस कार की चाबी
लगती है, वह उस कार को स्टार्ट करता है और उसमें बैठी महिला को लेकर किसी विलास
स्थल के लिए रवाना हो जाता है। सुबह महिला अपनी कार के साथ अपने घर पहुँच जाती है।
तब तक उसका पति भी लौट आता है। किंतु गेम के नियम का पालन करते हुए दोनों एक दूसरे
से कोई प्रश्न नहीं करते। इस गेम में उस सदस्य को दुर्भाग्यशाली माना जाता है, जिसके हाथ अपनी ही कार की चाबी लगती है। यह क्लब-कल्चर यूरोपीय देशों के
साथ ही साथ हाँगकांग जैसे स्थानों पर काफी प्रचलित है।
डाक्टर
राजगोपाल, उनके मित्र तथा मित्रों की पत्नियाँ इस कल्चर से परिचित हैं।
परिणामस्वरूप ये सब चारित्रिक पतन की पराकाष्ठा को प्राप्त होते हैं। राजगोपाल
अनेक छल-छंदों का सहारा लेकर अनेक स्त्रियों को पथ-भ्रष्ट करता है। यहाँ तक कि
अपने मित्र जैक़ब की पत्नी ग्रेसी को भी संतान प्राप्ति के इलाज के बहाने अपनी
वासना का शिकार बनाता है।
डाक्टर
राजगोपाल एक जघन्य कार्य यह करता है कि वह अपनी पत्नी को फ्रिजिडिटी के रोग से
ग्रस्त प्रचारित करता है। एक दिन जब वह क्लब में बैठ कर सबके सामने अपनी पत्नी का
अपमान करता है, तो उसमें बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया जन्म
लेती है। वह अपने पति से बदला लेने का निश्चय करती है और उसके मित्र जैक़ब के साथ दैहिक-संबंध
बना कर अपने स्वस्थ होने का प्रमाण देती है। एक प्रकार से वह अपराध का बदला अपराध
करके चुकाती है।
इस
वीभत्स और विकृत परिवेश का रहस्य कभी नहीं खुल पाता, यदि डाक्टर
राजगोपाल की कार का युवा ड्राइवर, श्याम योजनाबद्ध ढंग से
इसका भंडाफोड़ न करता। अपने स्वामी-स्वामिनी और उनकी मित्र मंडली को पथ-भ्रष्ट होने
से तो वह नहीं रोक सकता था, किंतु राजगोपाल की पुत्री नीरजा
को उस दलदल में न गिरने देने का दृढ़ निश्चय कर लेता है। अपने मन में योजना का
पूरा प्रारूप तैयार करके वह एक दिन अचानक नीरजा के समक्ष प्रणय-निवेदन करके विवाह
का प्रस्ताव करता है। नीरजा और उसकी माँ पर इस प्रस्ताव की ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया
होती है, जैसी श्याम ने सोच रखी थी। वे दोनों उसे अपने से
नीच सिद्ध करते हुए धमकाने लगती हैं। इस पर श्याम पुत्री से माँ के संबंध में और
माँ से पुत्री के संबंध में, उन्हीं के सामने कुछ ऐसी
टिप्पणियाँ कर देता है कि वे दोनों एक दूसरे के अतीत को जानने के लिए व्याकुल हो
जाती हैं। थोड़े से शील-संकोच के पश्चात नीरजा की माँ यथार्थ स्थिति का उद्घाटन
करती है। इसके पश्चात् नीरजा अपने अतीत का बयान करती है। घटना प्रसंग कुछ इस
प्रकार घटता है कि नीरजा के मन में क्लब-कल्चर और अपने पिता के प्रति विद्रोह भाव
जन्म ले लेता है। वह अपने पिता के मित्रों को फोन करके उस दिन प्रस्तावित कॉकटेल
पार्टी निरस्त कर देती है। इसके बाद वह अपनी सूझ-बूझ और साहस के बल पर डाक्टर
राजगोपाल को सही मार्ग पर लौट आने को बाध्य कर देती है।
नाटक
के कथानक में श्याम का चरित्र उसे आदर्श और दूरदर्शी युवक के रूप में सामने लाता
है। जो नीरजा उसका प्रणय-प्रस्ताव सुनकर पुलिस बुलाना चाहती थी, वही उसे अपना जीवन साथी बनाना चाहती है। किंतु श्याम के मन में ऐसी कोई
भावना नहीं थी। वह तो एक अबोध लड़की तथा पतन के गर्त में गिरे एक परिवार का उद्धार
भर करना चाहता था। इसीलिए अपनी भूमिका पूर्ण होते ही श्याम दूर चला जाता है।
चलते-चलते कह जाता है— "यह रही आपकी कार की चाभी। इसे आप सँभाल कर रखियेगा और
किसी क्लब में मेज पर और साहबों की कारों की चाभियों के बीच कभी भी मत रखियेगा। आप
सभी के लिए मेरी मंगलकामनाएँ। मेरी भूल-चूक आप लोग क्षमा कीजिए। आज आप लोगों के
विषाक्त जीवन की इतिश्री हो गई और अब आप लोग एक नये सुंदर जीवन में प्रवेश कर रहे
हैं।" (पृ. 101)।
हिंदी
में इस प्रकार की सामाजिक समस्याओं पर बहुत अधिक नाट्य रचनाएँ प्राप्त नहीं होतीं।
इस दृष्टि से नाटककार सोमनाथन का यह प्रयोग महत्त्वपूर्ण भी है और ध्यानाकर्षक भी।
उन्होंने जिस समस्या को उठाया है, वह बहुआयामी है। उसका
सबसे बड़ा आयाम पूँजीवाद की गोद में पलने वाली उपभोक्ता व उपभोग प्रधान संस्कृति
है। पूँजीवाद के साथ दुनिया भर में नव धनाढ्य वर्ग कुकुरमुत्ते की भाँति उग आया, जिसने यह मान लिया कि मनुष्य का जीवन केवल भोग के लिए है। इस दृष्टिकोण
का घृणित पहलू यह है कि नव धनाढ्य पुरुष वर्ग ने स्त्री को केवल भोग की वस्तु मान
लिया। यह सब इस दावे के बावजूद हुआ कि आधुनिक सभ्यता नारी स्वातंत्र्य की पक्षधर
है और नारियों को उनके शरीर पर स्वामित्व का अधिकार देती है। प्रगति और समृद्धि के
नाम पर इतनी विकृति तथा अंतर्विरोध की कल्पना भी कठिन है।
यहाँ
इस तथ्य का संकेत करना भी आवश्यक है कि क्लब कल्चर को और वाइफ़ स्वैपी जैसे कृत्य
को प्रगति की निशानी मानने वाले वर्ग ने इसकी बुराइयों पर कभी ध्यान नहीं दिया।
उन्होंने यह भी नहीं देखा कि इससे उनकी और उनकी संतान की आत्मा कलंकित हो रही है।
यह अलग बात है कि क्लब के सदस्य यह कोशिश अवश्य करते हैं कि उनकी हरकतें उनकी
संतान के समक्ष न खुलें। नीरजा की माँ इसी रहस्य को खोलते हुए कहती है— "तुम
कैसे जानोगी? यह पार्टी रात में दस व ग्यारह बजे होती
है। तब तक तुम सो जाती हो। यों भी तुम्हारे पापा नहीं चाहते कि तुम उनकी पार्टी का
दृश्य देखो। वे लोग नशे में ऐसी-ऐसी बातें और हरकतें करते हैं, जिनकी सभ्य लोगों से आशा नहीं की जा सकती।" (पृ. 32)।
इतिश्री
में एक और सूक्ष्म बिन्दु को उठाया गया है। वह है,
स्त्री की प्रतिक्रिया। एक पुरुष अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अपनी ही पत्नी (अथात
एक स्त्री) को फ्रिजिडिटि की शिकार के रूप में प्रचारित करता है। दूसरी ओर स्त्री, अपने पति (अर्थात पुरुष) से बदला लेने के लिए दूसरे पुरुष का सहारा लेती
है— "जगा दूँगी आज मैं, अपना इलाज करवाऊँगी। (बढ़कर
दरवाजा बंद कर देती है। फिर जैकब का हाथ पकड़ कर कहती है) आओ! तुम देखो कि मुझे
कौन सा रोग है?" (पृ. 54)। यह डाक्टर राजगोपाल की पत्नी
है, जो बदले की भावना से ग्रस्त होकर अपने पति के मित्र के
साथ वही सब कुछ करती है, जो उसका पति उसे धोखा देकर अन्य
स्त्रियों के साथ करता है। यह बदला किसी भी दृष्टि से पीड़ित स्त्री द्वारा पीड़क
पुरुष से लिया जाने वाला बदला नहीं है। यह घृणित और विवेकहीन आत्म-प्रतारणा भर है।
इसमें न साहस है न स्वाभिमान, न संघर्ष है न दूरदर्शिता। इसे
केवल मनोवैज्ञानिक विकृति भर कहा जा सकता है, किंतु आधुनिक युग में अनेक तथाकथित प्रगतिशील
स्त्रियाँ यही कर रही हैं। नाटककार ने बहुत कलात्मक और धारदार शैली में इस समस्या
को उठाया है। यदि नाटक का अंत आदर्शवादी न होता, तो ये
समस्याएँ और भी अधिक प्रभावशाली ढंग से पाठक अथवा दर्शक के मन में प्रतिक्रिया
उत्पन्न कर सकती थीं।
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