दक्षिण भारत की काव्य कथाएँ (उपदेश कथाएँ : र. शौरिराजन)

 

दक्षिण भारत की काव्य कथाएँ

(उपदेश कथाएँ)

र. शौरिराजन

 

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्

संस्करण- 1990, पृष्ठ- 48, मूल्य- 6.50 रुपए

 

भारतीय संस्कृति बड़ी वैविध्यपूर्ण है। यह विविध क्षेत्रों, विविध भाषाओं तथा विविधतापूर्ण परिवेश में आगे बढ़ रही है। इस संस्कृति के सच्चे दर्शन हमें लोकजीवन में होते हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में जनजीवन का जो रूप दिखाई देता है, उसके पीछे सदियों से चले आने वाले लोक-विश्वास और ऐतिहासिक-पौराणिक प्रसंग हैं। इन्हीं के सहारे लोक-मानसिकता बनती है और जनजीवन का निर्माण होता है। आवश्यकता इस बात की है कि आज के युग में लोक संस्कृति तथा उन ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों को जाना जाए, जिनमें महत्त्वपूर्ण जीवन-मूल्य तथा मनुष्य के विश्वास भरे हुए हैं।

ऐसा करना लोक संस्कृति को बचाने की दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हमारे मूल्य आधारित सामाजिक वातावरण को सही दिशा देने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आज के व्यक्ति के मन में जो दिशा-भ्रम है, उसे समाप्त करने और सुदृढ़ चरित्र का निर्माण करने की दृष्टि से भी ऐसा होना आवश्यक है। दक्षिण की काव्य-कथाएँ इसी प्रकार का प्रयास है। श्री र. शौरिराजन की यह पुस्तक ऊपर संकेतित उद्देश्यों की पूर्ति करती है। इसमें दक्षिण भारत की छः काव्य कथाएँ हैं— नूपुर का न्याय, मणिमेखला, किशोर राजा का फैसला, दानी कुम्णन, नेत्र दान और मन में बना मंदिर। ये काव्य कथाएँ गद्य में प्रस्तुत की गई हैं। इनका उद्देश्य पाठकों, विशेषकर किशोर पाठकों को शिक्षा देना है। इन्हें हम उपदेश-कथाओं और बोध-कथाओं की श्रेणी में भी रख सकते हैं; क्योंकि इनसे धार्मिक आस्था तथा सामाजिक सहिष्णुता की सीख मिलती है। एक प्रकार से ये इस पलायनवादी युग में हमें आदर्श जीवन जीने को प्रेरित करती हैं।

विख्यात हिंदी सेवी, भाषाविद और संस्कृतिकर्मी शौरिराजन द्वारा प्रस्तुत ये कथाएँ दक्षिणी भारत के सांस्कृतिक जीवन और वहाँ की विशिष्ट परंपराओं की जानकारी भी देती हैं।

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