पतित पावनी (आरिगपूडि)

 

पतित पावनी

आरिगपूडि

 

 

राजपाल एण्ड संस, दिल्ली

प्रथम संस्करण- 1959, पृष्ठ- 216, मूल्य- 3 रुपए 50 पैसे

 

लक्ष्मी जिस घर में पैदा हुई थी, वह अच्छा खाता-पीता, बाग-बगीचों वाला और पुराने खानदान की विरासत का आनंद भोगने वाला घर था। परिवार ब्राह्मणों का था। पारंपरिक, मंत्रपाठी, पवित्र, शुद्ध ब्राह्मणों का परिवार। छुटपन में ही उसका विवाह कर दिया गया। उसकी माँ के लाड़ले भाई से विवाह बहुत घूमधाम से हुआ। लक्ष्मी की माँ ने अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च किया, किंतु  होनी को कुछ और ही मंजूर था। लक्ष्मी का पति पहले से ही एक रखैल रखे हुए था। उसी के साथ गुलछर्रे उड़ाता था। लक्ष्मी कई-कई दिन बिना खाए-पिए पड़ी रहती थी। लक्ष्मी बहुत दुःखी हुई। उसने पैरों पर पड़ कर अपने पति को समझाया, किंतु उसने एक न सुनी। जब बात आगे बढ़ी, तो निर्णय सुना दिया— "मुझे क्या धमकी देती है, जाना हो तो जा, कहाँ जाएगी, आखिर कुएँ में, नहीं तो आग में।" (पृ. 68)। लक्ष्मी मन की इतनी भीरु नहीं थी। संस्कारों की पूरी तरह दास भी नहीं थी, बोली- "मैं दोनों में ही न जाऊँगी। मैं दिखाकर रहूँगी कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हूँ।" (पृ. 68)। लक्ष्मी अपनी माँ के पास आ गई। पति ने रोकने की आवश्यकता नहीं समझी। वह शायद यही चाहता था कि वह उसके रास्ते से हट जाए। लक्ष्मी की माँ ने पति के पास लौट जाने की ज़िद की। लक्ष्मी इतनी अपमानित हो चुकी थी कि उसका लौटना असंभव था। उसने निश्चय कर लिया था कि उस पतित आदमी के साथ घर नहीं बसाएगी। बंधु-बांधव बिगड़ने लगे। माँ भी जली-कटी सुनाने लगी। भोजन के लिए भी आनाकानी करने लगी। लक्ष्मी इससे अधिक सहन नहीं कर सकी। घर से निकल आई, किंतु  पति के पास न जाकर मद्रास चली आई। इसके बाद लक्ष्मी और जिन्दगी के बीच साँप और नेवले जैसे खेल शुरू हो गए । विवरण स्वयं लक्ष्मी के शब्दों में, "हाँ हाँ, फिर जिन्दगी ने मुझसे इस तरह बदला लिया कि मुझे कहते हुए शर्म आती है, याद करते हुए शर्म आती है। मैंने वह सब एक पुरुष से किया, जो मेरे पति किसी और स्त्री से कर रहे थे, मेरी हालत किसी बाजारू स्त्री से कम न थी। मैं पति के जिस दुर्व्यवहार से भाग कर आई थी, उसी में जा फँसी। गिर कर मैं उन्हें समझ सकी, फिर मैंने उनके पास जाने की सोची, पर हिम्मत न होती, किस मुँह से जाती। मैं गिरती गई। गिरती-गिरती इस पुल पर आई, वहाँ से भी गिरी। मौत के मुँह में, पर मौत ने भी मुझ पर कृपा न की।" (पृ. 69)। लक्ष्मी का जीवन उस नाव की तरह हो गया, जो एक भँवर में फँसती है और वहाँ से निकलकर दूसरी में फँस जाती है। फिर तीसरी में, चौथी में और इसी प्रकार जीवन-मृत्यु के बीच झूलती रहती है। कभी-कभी नाव टूटना चाहती है, ताकि समुद्र की गहराई में जाकर हमेशा के लिए विलीन हो जाए, किंतु  बार-बार उसे कोई न कोई लहर बचा लेती है। अंत में नाव लस्त-पस्त अवस्था में उसी किनारे पर आ लगती है, जिसे कभी छोड़कर चली गई थी। लक्ष्मी भी जीवन के सागर में लगातार गोते खाती है, पानी पीती है, तैरती है, डूबती है और अंत में जब एक दिन चिंघाड़ते हुए समुद्र में हमेशा के लिए विलीन होने पहुँचती है, तो कोई हाथ उसे बचा लेता है, "वह उसका पति था... मामा × × × × उसने पहचाना, वह उसकी पत्नी थी, लक्ष्मी थी, दोनों की आँखें मिलीं और लक्ष्मी की आँखें सहसा मूर्छा में मुँद गयीं। संयोग की बात थी, विधि की विचित्र नाटकीयता, अचिन्तित, अनिर्दिष्ट, पर वास्तविक, भौतिक । × × × × एक चक्र के दो सिरे, जो दूर हो गए थे, मुड़-मुड़ा गए थे, आ मिले।" (पृ. 215)।

लक्ष्मी का जीवन वस्तुतः एक ऐसी स्त्री का जीवन है, जो लगातार अपने अर्थ को खोजने में व्यस्त है। वह पुरुष द्वारा अपने साथ किए जाने वाले अत्याचार के विरोध के लिए विद्रोह करती है, किंतु  उसका विद्रोह कभी भी किसी सफलता की ओर नहीं बढ़ता। वह हमेशा अपने को खोजते-खोजते किसी सहारे को खोजने लगती है। उसे ऐसा लगता है कि वह इस बार अपने लक्ष्य को, अपने नारी होने के अर्थ को, अपने आकांक्षित जीवन-सौंदर्य को पा ही लेगी, किंतु  उसे कभी भी उसका प्राप्य नहीं मिलता। जो मिलता है, वह उससे उसके जीवन का संवेदन-खंड और उसका शरीर छीन कर चलता बनता है। त्रासदी यह भी है कि वह बार-बार इस छलावे को ही वास्तविक मानती है। उसे लगता है कि प्रतिशोध के जिस मार्ग पर वह निकली है, उस पर इसी रूप में बढ़ते जाना उचित है। शायद वह इस छलावे में अपने लिए कोई न कोई आकर्षण भी खोज लेती है। परिणाम यह होता है कि वह जब छली जा रही होती है, तो कुछ नहीं समझती। जब छलना की पीड़ा उसके मन को घावों के कीड़ों की तरह मथने लगती है, तब उसे पता चलता है कि वह जिन्दगी के एक और भँवर में फँस गई है। अंत में तो वह सब कुछ को छलावा अनुभव करने लगती है। छोटे बाबू के रूप में उसे एक ऐसा व्यक्ति मिलता है, जो उसका सच्चा और विश्वासपात्र जीवन-साथी बनना चाहता है, किंतु वह उसके प्रति भी प्रथम दृष्टि में निश्शंक नहीं हो पाती। जब तक निश्शंक होने की अवस्था में आती है, तब तक फिर से जीवन-समुद्र में एक और भँवर बन चुकी होती है। लक्ष्मी की कथा स्त्री-संवेदना की कथा है--- एक सामान्य, किंतु  जिजीविषा संपन्न स्त्री के जीवन की कथा। उसकी कथा में ऐसे मोड़ छिपे हुए हैं, जिन पर स्त्री के चरित्र का एक-एक रंग खुलता है।

लेखक ने लक्ष्मी के चरित्र को बड़े कौशल और परिश्रम से गढ़ा है। वह धर्मलिंगम के गाँव में एक निःशुल्क पाठशाला चलाती है। धर्मलिंगम उसके विषय में कहता है— "जी हाँ, बहुत अच्छी। एकदम गौ। इसी की मेहरबानी है कि हमारे बच्चे हम लोगों के नाम लिखने लगे हैं। बड़ी मेहनत करती है। दिन-रात उन्हीं को पढ़ाने-लिखाने में बिताती है।" (पृ. 49)। यह वही लक्ष्मी है, जो मद्रास आकर पैसे के बदले कभी शरीर बेचने लगी थी। यहीं तक नहीं, कमाए हुए पैसे से खूब ऐशो-आराम भी करने लगी थी, "ट्यूशन का नाम था, इधर-उधर की आवारागर्दी करती। जवानी को दाम पर बेचती। कई परवाने थे। काफी पैसा मिलता, मुश्किल से टिकता। पैसा आता, पैसा चला जाता। पाप का पैसा था, लक्ष्मी रखना भी न चाहती थी।" (पृ. 54)। यह जीवन लक्ष्मी ने अपने पति के अनैतिक व्यवहार और अपमान से उत्पन्न क्षोभ को शांत करने के लिए अपनाया था। अब उसे उसमें थोड़ा-थोड़ा आनंद भी आने लगा था। यदि ऐसा न होता, तो वह बार-बार धोखा खाने के बाद छोटे बाबू से मिलने पर इतनी प्रसन्नता अनुभव न करती, "लक्ष्मी मन ही मन मुस्करा उठी। दुनिया में वह आँख मूँद कर न रही थी। एक-एक चोट करके दुनिया ने उसको अपने रंग दिखाये थे। वह उसे समझ सकती थी। इसके बावजूद वह एक मस्ती में रही, नशे में रही... उम्र छोटी होती तो गाती नाचती... काश होती।" (पृ. 99)। इस भँवर में वह अपने को इस कदर भूल जाती है कि उसे सारी नैतिकता पुस्तकों की शोभा दिखाई देने लगती है। उसे सामाजिक परंपराएँ भी व्यर्थ लगने लगती हैं। उसे महसूस होता है कि सामाजिक नैतिकता के सामने उसकी वैयक्तिक नैतिकता भी है। उसे दबाना हृदय के साथ अन्याय करना है- "यह नैतिकता जाए भाड़ में। पुस्तकों की नैतिकता, बहुमत की नैतिकता, क्या मेरी वैयक्तिक नैतिकता नहीं है?" (पृ. 100)।

लक्ष्मी के चरित्र का यह पक्ष दिखाकर लेखक ने समाज मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मानव चरित्र का विश्लेषण किया है। उसने व्यक्ति और समाज के तथा व्यक्ति और नैतिकता के संबंधों को भी पुनर्व्याख्यायित किया है। लक्ष्मी के मन में जो प्रश्न उठा है, उसका संबंध लक्ष्मी के साथ-साथ व्यक्ति मात्र से है। संयम और दमन पर आधारित व्यवस्था को बनाये रखने के लिए नैतिकता जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। जिन्हें हम नैतिक मूल्य कहते हैं, उनमें से अनेक ऐसे हैं, जो हमारी स्वाधीनता के क्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं। लक्ष्मी नैतिकता के इन्हीं मूल्यों पर आक्षेप करती है। छोटे बाबू के साथ जुड़े प्रेम प्रसंग में लक्ष्मी इतनी मानसिक क्षमता अवश्य प्राप्त कर लेती है कि वह अपने साथ घटे दुःसंयोग का विश्लेषण कर सके और अपने जीवन का मूल्यांकन कर सके। नैतिकता के प्रसंग में ही वह तटस्थ होकर अपने पिछले जीवन पर दृष्टिपात करती है और अपनी निर्बलता तथा जमाने की क्रूरता को स्पष्ट रेखांकित करती है— "हर किसी ने मुझ पर दया की। कई ने दया के दाम वसूल किये। मैं बिकी दूसरों के भाव पर दूसरों की मर्जी पर। इसका मतलब क्या है? मैं बिगाड़ी गई, मैं महज कमजोरी की दोषी हूँ, पाप की नहीं।" (पृ. 100)। ऐसा लगता है कि लक्ष्मी के जीवन और चरित्र की यही यथार्थ स्थिति है। वह निरंतर गिरती जाती है, किंतु उसका मन हमेशा अर्थवत्ता की तलाश में व्याकुल रहता है। यही व्याकुलता अंत तक आते-आते स्वयं लक्ष्मी की पर्याय बन जाती है।

उपन्यासकार आरिगपूडि ने पतित पावनी में स्त्री जीवन के यथार्थ को बार-बार उ‌द्घाटित किया है। भारतीय समाज में स्त्री के लिए जितने सामाजिक बंधन हैं, उतने अन्य समाजों में शायद ही हों। घर से लेकर बाहर तक बंधन ही बंधन उसके जीवन को जकड़े रहते हैं। घर न हो या स्त्री घर छोड़ दे, तो उसका जीना दूभर हो जाता है— "स्त्री जनम ही बुरा। बेघरबार आवारा आदमी जैसे-तैसे ज़िन्दगी अपने ढंग से बसर कर लेता है— मगर स्त्री घर न रहे तो काठ हो जाती है, थपेड़े खाती है, धक्के खाती है। कहीं की नहीं रहती।" (पृ. 32)। जब स्त्री घर से निकलकर अकेली खड़ी होती है, तो समाज का डरपोक से डरपोक व्यक्ति भी अपने को शेर समझने लगता है। हर कोई अवसर पाकर उस स्त्री का शोषण करने की योजना बनाता है। लक्ष्मी के साथ बार-बार ऐसी ही घटनाएँ होती हैं और वह बार-बार पीड़ादायक अनुभवों से गुजरती है। वैसे भी समाज में भेड़ियों की कोई कमी नहीं है। वे हमेशा असहाय स्त्रियों को अपने जबड़ों में रखकर चबाने को तैयार बैठे रहते हैं। जब लक्ष्मी कुमार स्वामी रेड्डी के स्कूल में अध्यापिका होकर जाती है, तो वहाँ उसे राघव रेड्डी नाम का ऐसा ही भेड़िया मिलता है। वह उसे पत्र लिखता है— "लक्ष्मी तुम्हें क्या देखा कि मैं अंधा हो गया। हर जगह हमेशा तुम्हीं दिखाई देती हो और कुछ नहीं। यकीन करों मैं कुछ नहीं बिगाडूँगा। अँधेरा होने के बाद मंदिर के पास नाले के किनारे... मिलना– राघव।" (पृ. 128)। यही राघव एक बार यहाँ तक भी कहता है कि फूल को खिलने का अधिकार है तो भौरों को उस फूल के पराग को लूटने का अधिकार भी है (पृ. 146)। यहाँ उपन्यासकार ने सामाजिक व्यवस्था घुन की तरह खाने वाले लोगों और स्त्रियों के आजन्म शत्रुओं के चारित्रिक यथार्थ को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दिया है।

आरिगपूडि ने इस उपन्यास में विभिन्न सामाजिक समस्याओं को भी वाणी दी है। सौतेली माँ और उसके नियंत्रण में रहने वाले पिता का बच्चों के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार (पृ. 77) जन सेवा के नाम पर आत्मप्रदर्शन और पाखंड (पृ. 102) शराबी पिता द्वारा लड़कियों की कमाई लूटने में भी संकोच न करना (पृ. 150) जात-पाँत और छुआछूत (पृ. 158), प्राचीन परंपराओं से उत्पन्न मानसिक दासता (पृ. 169) आदि अनेक समस्याएँ हमारे सामाजिक वातावरण को नष्ट किये डाल रही हैं। लेखक ने विभिन्न प्रसंगों में इन समस्याओं के प्रभाव को दिखाया है तथा इन्हें समाप्त करने का आह्वान किया है। समस्याओं के प्रसंग में ही आरिगपूडि ने विधवा स्त्रियों की समस्या को भी बड़े यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया है।

पतित पावनी जून 1959 की रचना है। साहित्यिक और सामाजिक दृष्टि से यह काल कई तरह की हलचलों से भरा था। जहाँ जीवन में अनेक परिवर्तन हो रहे थे और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध वातावरण बन रहा था, वहीं कथा के क्षेत्र में भी नये-नये प्रयोग हो रहे थे। उन दिनों कथाकार फिर से और कुछ अधिक तेज़ी से जीवन यथार्थ को चित्रित करने का प्रयास कर रहे थे। यथार्थ के साथ-साथ मनुष्य के अस्तित्व के संबंध में भी अधिक सच्चाई और गहराई के साथ लिखा जाने लगा था। आरिगपूडि ने उसी युग की बाह्य और आंतरिक हलचल को पतित पावनी में प्रस्तुत किया है। लक्ष्मी और कुछ नहीं, उस काल की नारी का जीवंत यथार्थ है।

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