दिशा (सी. भास्कर राव)
दिशा
सी.
भास्कर राव
हिमाचल
पुस्तक भंडार
IX/221, सरस्वती भंडार,
गाँधी
नगर, दिल्ली-31
प्रथम
संस्करण- 1989, पृष्ठ- 174, मूल्य- 60 रुपए
'दिशा' के विषय में विस्तार से कुछ कहने से पहले दो
पात्रों के विषय में बताना आवश्यक है। एक पात्र है, संजय का
पिता, जो अपने पुत्र को डाँटते हुए कहता है; “उनके भ्रष्टाचार या सदाचार से तुम्हें क्या लेना-देना है, जो काम तुम्हें सौंपें, उसे करो। चुनाव में जीत
जाने के बाद वे और भी प्रभावशाली हो जाएँगे, फिर तुम्हारा
काम करना उनके लिए कितना आसान हो जाएगा और तुम्हें भी तो कुछ अधिकार मिल जाएगा उनसे
अपना काम करवाने का।" (पृ. 70-71)। एक दूसरा पात्र है खीश, जिसके विषय में मनीषा कहती है, "यहाँ सैकड़ों
मजदूर काम करते हैं, सबके साथ कोई न कोई समस्या बनी ही रहती
है। वे भैया की प्रकृति जानते हैं, उन्हीं के पास अपनी
समस्याओं को लेकर सीधे कंपनी के अधिकारियों से भिड़ जाते हैं। इससे वे उनसे नाराज़
रहते हैं। दूसरी ओर मजदूर इन मामलों में अपनी यूनियन की उपेक्षा करते हैं और
यूनियन के नेता भैया से अलग जलते हैं। मजदूर भैया को छोड़ते नहीं और भैया हैं कि
इधर प्रबंधन और उधर यूनियन दोनों से टकराते रहते हैं।" (पृ. 87)।
दिशा
उपन्यास का मूल कथानक उसी महत्त्वपूर्ण संघर्ष पर आधारित है, जो ऊपर उल्लिखित दो पात्रों से संबंधित उद्धरणों से प्रकट हो रहा है। यह
संघर्ष इस समाज के समस्याग्रस्त धरातल पर रात-दिन होने वाले संघर्ष का प्रतीक है।
इस समाज में अहर्निश शोषक और शोषित के मध्य एक संघर्ष चल रहा है। इन दोनों के बीच
दो और वर्ग भी हैं, जो प्रतिपल उस बिन्दु पर खड़े रहते हैं,
जहाँ उन्हें अपना स्वार्थ पूरा होता हुआ दिखाई देता है। इनमें एक
वर्ग स्वार्थी नेताओं का है और दूसरा वर्ग ऐसे लोगों का, जो
घोर अवसरवादी हैं, किंतु हैं साधारण समाज के सदस्य ही।
आइए, इन चारों के चरित्र पर एक दृष्टि डालें। संजय का पिता निम्न मध्यवर्ग का
प्रतिनिधि है। अभावों, असफलताओं और विवशताओं की रस्सी पर
झूलने वाला एक सामान्य पात्र। हो सकता था कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति होता, तो वह अव्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष की दिशा में जाता, किंतु संजय का पिता ऐसा नहीं
करता। वह जी हुजूरी और अवसरवाद के मार्ग पर चलता है तथा ऐसे नेताओं की शरण में
जाता है, जो भ्रष्ट होते हुए भी उसकी जाति के हैं। वह अपने
पुत्र को समझाता है, "कितने लोग हैं समाज में, जो सजातियों के लिए इतनी सहानुभूति रखते हैं। यह ठीक है कि विश्वनाथ जी
के विषय में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। प्रतिकूल धारणाएँ भी रखते हैं, लेकिन जब वे उनके परिवार के प्रति इतने सदय हैं, तो
उनके विषय में ऐसे विचार मन में रखें ही क्यों, लेकिन यह
लड़का तो कुछ समझता ही नहीं।" (पृ. 71)। लगता है, हमारे
आसपास का ही कोई पात्र यह सब कह रहा है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अपना हित साधने के लिए इस बात से चिन्तित नहीं होते कि वे अनुचित
मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। ऐसे लोग जाति, पारिवारिक संबंध
या अन्य प्रकार के भावनात्मक संबंधों को भुनाने में बड़े कुशल होते हैं। विस्मय तब
होता है, जब ऐसे लोग अपने स्वार्थ, कौशल
और अवसरवाद के साथ साधारण समाज के सदस्य बने रहते हैं तथा इससे भी ऊपर अपने छल-प्रपंच
को जीवन व्यवहार सिद्ध करने पर तुले रहते हैं।
ये
लोग जिन नेताओं की शरण में जाते हैं, उनका चरित्र
विश्वनाथ के रूप में हमारे सामने आता है। वह संजय से कहता है— "आखिर अपनी
जाति के हो, कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा। (पृ. 64)। यह है, आधुनिक भारत के लोकतंत्री नेताओं का चरित्र और दर्शन। वे जनता और देश
जैसे महिमामय क्षेत्रों को छोड़कर धर्म, जाति, वर्ग और इसी प्रकार के संकुचितताओं से भरे जंगल में आ गए हैं। इनके लिए सेवा और त्याग जैसे शब्दों का न
औचित्य है न महत्त्व। ये जो कुछ करते हैं, अपनी जाति के लिए।
विश्वनाथ संजय से कहता है— "जातीय संबंध नहीं होता, तो
तुम मेरे पास इस तरह आते ही क्यों? मैंने अपने सजातीय युवकों
से यही अपील की है कि जहाँ तक हो सके, अपनी ही जाति बिरादरी
वालों का उपकार करते चलो।" (पृ. 64)।
लेखक विश्वनाथ के इस चारित्रिक पक्ष को उजागर
करके आज के उन सब नेताओं की कलई खोल रहा है, जो अपने
क्षेत्र में केवल उन अधिकारियों को चाहते हैं, जो उनके
सजातीय होते हैं। विजातीय लोगों पर उनका कोई विश्वास नहीं होता। ऐसे नेता चुनाव के
समय अपने जन कल्याण संबंधी कार्यों पर कोई भरोसा नहीं करते। उनका विश्वास अपनी
जाति के वोटों पर सबसे अधिक होता है। जातिवाद का यह रोग व्यक्तियों के साथ-साथ
दलों में भी प्रविष्ट हो गया है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण,
चुनाव के समय टिकट वितरण के अवसर पर मिलता है। लगभग सभी दल जातीय बाहुल्य का ध्यान
रखकर अपने उम्मीदवार घोषित करते हैं।
विश्वनाथ अपने चुनाव में सबसे अधिक भरोसा सजातीय
लोगों पर ही करता है। संजय को भी वह अपने चुनाव प्रचार में सजातीय होने के कारण ही
लगाना चाहता है। पार्टी कार्यकर्ता रजनीश इस दूषित प्रवृत्ति को और विस्तार के साथ
समझाता है— "समाज में नेतागिरी को ऐसे ही लोग दूषित और विकृत बनाते हैं।
इन्हें सिर्फ अपने स्वार्थ से सरोकार होता है। ऊपर से ये जितने उदार और मानवीय
दिखाई पड़ते हैं, भीतर से उतने ही संकुचित और अमानवीय
होते हैं। नेतागिरी इनका पेशा है, अपने निहित स्वार्थों को
पूरा करना इनका काम होता है।" (पृ. 67)। नेता विश्वनाथ की अमानवीयता, स्वार्थपरता और चरित्रहीनता का पता भी इसी उपन्यास में लग जाता है। वे
अपनी पत्नी की अनुपस्थिति में घर पर वेश्या बुलाते हैं और उनकी पत्नी उन्हें रंगे
हाथों पकड़ लेती है। (पृ. 74)। यह आज के नेताओं का घिनौना, किंतु
असली चरित्र है। ऐसी घटनाएँ आए दिन होती
रहती हैं, किंतु फिर
भी ये नेता बाज नहीं आते।
मजदूरों
का शोषण करने वाला वर्ग आधुनिक भारत में बहुत शक्तिशाली है। वह कूटनीतिक चालों का
व्यवहार करने वाला है। पूँजीपति कारखाना चलाता है और जिनके बल पर मशीनों के पहिये
घूमते हैं, उन्हें जीवन के लिए अनिवार्य सुविधाओं से
भी वंचित कर देता है। रजनीश इस स्थिति का बयान करते हुए कहता है, "इन कंपनियों को जितना मुनाफा होता है, उसका बहुत ही
कम प्रतिशत मज़दूरों के हित में खर्च किया जाता है, जबकि
दिखाया यह जाता है कि लाभ का अधिकांश प्रतिशत उन्हीं के लिए खर्च कर दिया जाता
है।" (पृ. 29)। पूँजीवादी व्यवस्था में मजदूरों का शोषण पूँजीपति अकेले दम पर
नहीं करता। वह नेताओं को खरीदता है, अधिकारियों को अपना
समर्थक बनाता है और यूनियन के नेताओं को टुकड़े डालकर पूँछ हिलाने के लिए मजबूर
करता है। इसमें सबसे दुःखद भूमिका यूनियन के नेताओं की ही होती है। वे अक्सर
पूँजीपति के हाथ बिक कर भेड़ की खाल ओढ़ लेते हैं और मजदूरों के हितों को लगातार
नुकसान पहुँचाते रहते हैं। जब रवीश भूख हड़ताल पर बैठता है,
तो मिल मालिक दबाव में आ जाता है। अंततः "इन दबावों के कारण ही मालिक को एक
आपातकालीन गुप्त बैठक बुलानी पड़ी। बैठक में मालिक के अतिरिक्त महाप्रबंधक,
प्रबंधक, दो-तीन वरिष्ठ अफसर तथा यूनियन के दो
नेता थे।" (पृ. 140)। मिल मालिक घोषणा करता है कि उसने मजदूरों की सभी माँगें
मानने का फैसला किया है। यह सुनकर यूनियन के नेताओं को बहुत झटका लगता है। यह
उन्हें सीधे-सीधे अपनी पराजय प्रतीत होती है। उन्हें शायद भय है कि रवीश जैसा
ईमानदार और संघर्षशील मजदूर अपने प्रयत्न में सफल हो जाएगा, तो
उनकी नेतागीरी की दुकान बंद होने पर आ जाएगी। मालिकों की मेज पर मजदूर-हित की बलि चढ़ा
कर अपने हित साधने वाले यूनियन के नेताओं के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती देख जब मालिक माँगें मान लेने के रहस्य का संकेत
करता है तो— "उन्होंने अनुभव किया कि तत्काल भले ही उन्हें अपनी पराजय झेलनी
पड़े, पर अंतिम विजय उन्हीं को मिलेगी।" (पृ. 141)।
उन्हें विजय मिलती भी है। रवीश हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाता है— "दूसरी
सुबह लोगों ने रास्ते में उसकी क्षत-विक्षत लाश ही देखी। साफ पता चल रहा था कि
किसी भारी भरकम गाड़ी ने रवीश को बुरी तरह कुचल डाला है।" (पृ. 143)। यह
वास्तव में रवीश का कुचला जाना नहीं था, बल्कि भारत के ट्रेड
यूनियन आंदोलन की संघर्षशीलता और ईमानदारी का कुचला जाना था। यह इस देश की आम जनता
के संघर्ष का कुचला जाना भी था।
रवीश
के रूप में लेखक ने एक ऐसा पात्र गढ़ा है, जो ईमानदार
और संघर्षशील ही नहीं है, अपूर्व मानवीय भावना से युक्त
करुणा की मूर्ति और सहृदयता का अवतार भी है। एक साथी मजदूर की मृत्यु पर उसके
परिवार के प्रति रवीश जिस सक्रिय सहानुभूति का प्रदर्शन करता है, वह बड़े-बड़े त्यागियों के लिए, अनुकरणीय है। उसका
संघर्षशील चरित्र भी विवेक और सहृदयता से पूर्ण था। वह सिद्धान्ततः मजदूर यूनियन
के विरुद्ध नहीं था, बल्कि यूनियन के नेताओं के मज़दूर
विरोधी चरित्र के कारण उसके मन में यूनियन या नेताओं के प्रति सहानुभूति नहीं बची थी।
वह मानता था कि यूनियन के नेता मज़दूरों के हितों की बात नहीं सोचते। "उस
यूनियन को वह मान्यता देता ही नहीं था। वह जानता था यूनियन के सारे नेता मालिक और
प्रबंधक से मिले हुए हैं। वे मज़दूरों के हित की बात सोच ही नहीं सकते। उनके लिए
तो मात्र अपने और मालिक के हित ही अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।" (पृ. 94-95)। उसका
यह आकलन गलत भी नहीं था। जब वह एक मजदूर परिवार के हित के लिए संघर्ष के मार्ग पर
चलता है, तो यूनियन के नेता उसके इस कार्य को नहीं पचा पाते।
वे रवीश को तरह-तरह के प्रलोभन देकर अपने जाल में फँसाना चाहते हैं। जब रवीश किसी
भी प्रकार बिकने के लिए तैयार नहीं होता, तो मजदूरों के हित
का दम भरने वाले वे नेता उस पर पत्थर से वार करवाते हैं। (पृ. 103)। यह अलग बात है
कि रवीश फिर भी पीछे नहीं हटता और यूनियन के नेताओं को मालिक के माध्यम से उसकी
हत्या करानी पड़ती है। दिशा उपन्यास अपने इन पात्रों के माध्यम से आधुनिक व्यवस्था
के एक पक्ष का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है। भारत में मजदूर, मजदूर संगठन, मिल मालिक, नेता
जिस प्रकार अलग-अलग रूप में अपने-अपने यथार्थ को जीते रहे हैं और जिस प्रकार
संघर्षशीलता की परंपरा को कुचला जाता रहा है, उसका जीवंत
विश्लेषण इस उपन्यास में विद्यमान है।
इस
उपन्यास में संजय और रजनीश जैसे पात्र निरंतर ध्यान खींचते हैं। रजनीश शुद्ध रूप
से संघर्षशील, विद्रोही और पार्टी के लिए समर्पित
कार्यकर्ता है। संजय की स्थिति ऐसी नहीं है। उपन्यासकार ने उसे नायक के स्थान पर
प्रतिष्ठित करना चाहा है। वह इस देश के लाखों-करोड़ों बेरोजगार, वर्तमान
अर्थव्यवस्था से असंतुष्ट तथा दिशाहीन युवकों का प्रतिनिधित्व करता है। उपन्यास के
संपूर्ण घटना क्रम से वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में जुड़ा हुआ है। अंत में जाकर
जब वह रजनीश से दिशा की अलमारी की चाबी माँगता है, तो उसे
जीवन की दिशा मिल जाती है। इस प्रसंग में दिशा उपन्यास का शीर्षक या एक पत्र का
नाम भर नहीं रहता, बल्कि एक संपूर्ण प्रतीक की सत्ता से
जगमगा उठता है। वह अव्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देने वाला दिशावाहक बन
जाता है।
इस
उपन्यास में एक कथा रंजना और अरोड़ा से संबंधित भी है। उपन्यास की शिल्प-विधि की
दृष्टि से यह कथा मुख्य कथा का सहयोग करने वाली अथवा उसे गतिशीलता प्रदान करने
वाली नहीं बन पाती। एक आचरण भ्रष्ट व्यक्ति एक भावुक लड़की का दैहिक शोषण करता है, फिर उसे छोड़कर चला जाता है। लड़की आत्महत्या कर लेती है। लेखक ने इस
प्रसंग को जितना लंबा खींचा है और जिस उद्देश्य से गढ़ा है वह पूरा नहीं होता; क्योंकि इस कथा में जो सामाजिक यथार्थ है, वह
उपन्यास के केंद्रीय कथ्य से बहुत दूर है। लेखक इस कथा को एक स्वतंत्र उपन्यास के
रूप में लिखता तो अधिक अच्छा रहता।
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