छोर (भैरप्पा, अनुवादक - भालचंद्र जयशेट्टी)

 

छोर

भैरप्पा


   अनुवादक - भालचंद्र जयशेट्टी

 

शब्दकार

159, गुरु अंगद नगर (पश्चिम)

दिल्ली- 110032

प्रथम संस्करण- 1992, पृष्ठ- 362, मूल्य- 125 रुपए

 

अमृता एक ऐस्टेट के मालिक के घर जन्म लेती है। उसका एक चाचा था, जो सांसारिक विद्या में बहुत ही अकुशल था। उसे अमृता के पिता ने सकलेशपुर में छोटी-मोटी दुकान करवा दी थी। वह जितना अकुशल था, अमृता की चाची उतनी ही कुशल थी। साधारण भाषा में कहें, तो अमृता की चाची जयलक्ष्मी इतनी चालाक औरत थी कि उसे चालाकी का उदाहरण कहा जा सकता था। जब अमृता की माँ की मृत्यु हुई, तो वह सकलेशपुर से दौड़कर ऐस्टेट आई। उसने अमृता को बाहों में भर लिया और क्रंदन करने लगी, "दीदी कम से कम इसके लिए तो तुम्हें जीना चाहिए था। इस फूल जैसी बिटिया को मेरी गोद में छोड़कर कहाँ चली गईं?" (पृ. 75)। उसका क्रंदन इतना प्रभावशाली था कि उसका पिता भी सोचने लगा, "इस घड़ी जब सगी माँ मर गई है, तब भगवान ने चाची के रूप में माँ को भेजा है?" (पृ. 75)। चाची के व्यवहार का अमृता के पिता पर ही प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि दूरदराज से उनके जो संबंधी आए थे, वे भी सोचने लगते हैं कि जय लक्ष्मी निश्चय ही अमृता की माँ का अभाव पूरा करेगी। यह चाची की पहली बड़ी सफलता थी।

इसके बाद चाची अमृता को अपने साथ सकलेशपुर ले जाने में सफल हो गई। उसका नाम वहीं के स्कूल में लिखवा दिया गया। जब अमृता का पिता अपनी पुत्री से मिलने सकलेशपुर जाता है, तो चाची उसका बहुत ध्यान रखती है। वह बीच-बीच में ऐस्टेट भी हो आती और रसाइयों को अनेक हिदायतें दे आती। अपने इस व्यवहार से जयलक्ष्मी ने अमृता के पिता को इतना अभिभूत कर लिया कि एक दिन अमृता के "पिताजी ने ही निर्णायक बात कही, जयम्मा, लोग चाहे कुछ भी कह लें, तुम बेकार वहाँ नहीं जा रही हो। बच्ची की देखभाल के लिए मैं खुद ले जा रहा हूँ। यहाँ दुकान भी ठीक तरह नहीं चल रही है। चुपचाप सभी लोग वहीं चलो।" (पृ. 77)। चाची सपरिवार ऐस्टेट चली आई, "लेकिन चाची जो आई थी, वह काम करके पेट भरने के लिए नहीं, वरन् धीरे-धीर कारोबार अपने हाथ में लेने के लिए।" (पृ. 77)। उसने उसी मार्ग पर चलना शुरू किया। छः महीने के अंदर ही बड़े बाबू के हिसाब की चोरी का पता लगाया और अमृता के पिता को बताया। बड़ा बाबू शर्मिंदा होकर काम छोड़कर चला गया। दो कारीगर भी इसी प्रकार काम से हट गए । ऐस्टेट के काम में लक्ष्मी का हस्तक्षेप बढ़ गया, किंतु वह यह कभी नहीं दिखाती थी कि ऐस्टेट के काम में अपने किसी स्वार्थ के कारण हाथ बँटा रही है, बल्कि वह अमृता के पिता को यही प्रदर्शित करती थी कि वह जो कुछ कर रही है, एक हितैषी के रूप में कर रही है।

अमृता जब चौदह वर्ष की थी, तो उसके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद चाची ऐस्टेट की एकछत्र शासिका हो गई। फिर भी, इतना भर ही उसे संतुष्ट करने को पर्याप्त नहीं था, वह तो स्वामिनी बनना चाहती थी। उसने अपने व्यवहार में और अधिक सदाशयता घोल ली। अमृता से बोली, "मरते समय तेरे बापू ने मुझसे कहकर प्राण छोड़े हैं कि जब तक अमृता जवान नहीं होती, उसकी पढ़ाई खत्म नहीं होती और किसी अच्छे लड़के से उसका ब्याह नहीं होता, तब तक मैं यहाँ रहकर निगरानी करती रहूँगी। मैं अपना कर्तव्य पूरा करूँगी।" (पृ. 79)। जयलक्ष्मी अमृता को पूरी तरह अपने वश में कर लेती है। वह उस पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अधिकार जमा लेती है और स्वघोषित जीवन निर्देशिका बन जाती है। बी.ए. के अंतिम वर्ष में पहुँचने के बाद अपने सगे भाई रंगनाथ से उसका विवाह करा देती है। इस विवाह में वह अमृता की सहमति लेने की भी कोशिश नहीं करती। विवाह के लिए वह जिन तर्कों का सहारा लेती है, वे उसकी मानसिकता को साफ-साफ दिखा देते हैं। एक ओर वह रंगनाथ से कहती है कि हमारी बच्ची कितनी सुंदर है, उसकी जायदाद के लालच में कोई ब्याहने आ जाए तो मैं नहीं दूँगी।" (पृ. 80), दूसरी ओर वह अमृता को समझाती है कि "आजकल के लड़कों का चाल-चलन कैसा होता है, यह कौन जाने। बाहर से देखने में तो बड़े भोले लगते हैं, लेकिन पता नहीं भीतर ही भीतर क्या गुल खिलाए रहते हैं। किसी अजनबी लड़के से अपनी बेटी का ब्याह रचाने की बात सोचती हूँ, तो डर के मारे मैं सिहर उठती हूँ x x अपना रंगनाथ घर का ही लड़का है, कुछ हेठी दिखाए, तो कान पकड़ कर लीक पर लाया जा सकता है।" (पृ. 80)।

 निष्कर्ष यह, कि जयलक्ष्मी अमृता को सोचने का अवसर दिये बिना ही उसका विवाह अपने भाई के साथ करने में सफल हो गई। यह उसकी योजना की सफलता थी। परिणाम यह निकला कि जयलक्ष्मी धीरे-धीरे अपनी एक समांतर ऐस्टेट खड़ी करने में सफल हो गई। अमृता को अपनी सहेली के माध्यम से पता चला कि उसने अपने बेटों के नाम पर बहुत संपत्ति खड़ी कर ली है। अमृता की संपत्ति तो पहले ही रंगनाथ के जरिए उसके मायके के पास चली गई थी। अमृता को यह जानकर बहुत गहरा धक्का लगा। उसने रंगनाथ के समक्ष अपने आवेश को प्रकट किया, तो उसे यह देखकर मर्मांतक पीड़ा हुई कि वह भी जयलक्ष्मी का ही पक्ष ले रहा था। उसने उत्तर दिया "उसने मेरी परवरिश की, इतने दिनों तक ऐस्टेट को बेदखल होने से बचाया। अपने बच्चों के लिए थोड़ा-बहुत किया होगा।" (पृ. 86)। अमृता के मन में रंगनाथ के प्रति हमेशा के लिए घृणा उत्पन्न हो गई। उसने अपनी चाची जयलक्ष्मी से भी समान्तर ऐस्टेट के विषय में और अन्य खर्चों के विषय में स्पष्टीकरण माँगा, किंतु  जयलक्ष्मी ने अपने धूर्ततापूर्ण व्यवहार के बल पर कोई भी साफ उत्तर नहीं दिया। अमृता के हृदय में भयंकर तूफान उठने लगा।

इन सब घटनाओं से अमृता नितांत असहाय और अकेली हो जाती है। उसके माता-पिता पहले ही उसे अकेली छोड़कर इस संसार से विदा ले चुके थे। अब उसे सहारा देने वाले के नाम पर जो पति था, उसके प्रति वह असीम घृणा से भरी हुई है। उसकी चाची और रंगनाथ उसके विरुद्ध होने वाले षड्यंत्रों के सूत्रधार तथा माध्यम हैं। उसे ऐसा लगता है कि इस संसार में उसका कोई नहीं है। इस एकाकीपन, असंतोष और क्षोभ का यह प्रभाव होता है कि अमृता स्वभाव से बहुत चिड़चिड़ी, क्रोधी, संशयशील और अस्थिर चित्त की हो जाती है। उसके दो छोटे-छोटे बच्चे उसका एक मात्र सहारा हैं। वह उन्हीं का मुख देखकर अपने तप्त हृदय में थोड़ी शीतलता का अनुभव करती है। अमृता अपने उन दो बच्चों के साथ मैसूर शहर के बाहरी क्षेत्र में ललित महल रोड के किनारे पर बनी अपने पिता की एक पुरानी कोठी में आकर रहने लगती है। वहीं उसकी भेंट वास्तुकार सोमशेखर से होती है। दोनों की यह भेंट पारस्परिक आकर्षण में बदल जाती है, किंतु अमृता के स्वभाव के कारण दोनों के संबंधों को कभी निश्चित कभी अनिश्चित आकार देती है।

कन्नड के विख्यात कथाकार एस.एल. भैरप्पा ने अपने इस विशाल उपन्यास में अमृता के माध्यम से एक ऐसी स्त्री की कथा कही है, जो जीवन में बहुत बड़े-बड़े मानसिक आघात सहन करती है, फिर भी उसके भीतर प्रेम, सौंदर्य , दैहिक आकर्षण, सहिष्णुता, हास-परिहास, वात्सल्य की भावना सूखती नहीं। सांसारिक जीवन के ये दो पक्ष ही अमृता के जीवन के दो छोर हैं। वह लगातार इन्हीं के बीच तैरती है। भैरप्पा ने इन्हीं छोरों के बीच उसकी यात्रा को वाणी दी है। अमृता सोमशेखर के प्रति भावनात्मक आकर्षण अनुभव करती है, किंतु  सांसारिक घात-प्रतिघातों के कारण संशय से आक्रांत उसका स्वभाव उसे इस आकर्षण को देह की ओर बढ़ाने से रोकता है। जब सोमशेखर उससे जुड़ा ही जुड़ा था, तो उसे मात्र एक ऐसा साथी चाहिए था, जिससे वह केवल भावना के धरातल पर मिल सके और अपना मन हल्का कर सके। इसीलिए वह सोमशेखर से कहती है, "जब मैं तुमसे एक श्रेष्ठ स्तर के नेह की प्रत्याशा कर रही थी, तब तुमने किस स्तर पर मेरी कल्पना कर ली? बताओ क्या मेरा बोध गलत था? ऐसे व्यक्ति के फूल अपने जूड़े से निकाल फेंकना क्या गलत था?" (पृ. 29)।

यही अमृता कुछ दिनों बाद सोमशेखर को इतना अधिक प्रेम करने लगती है कि उसके अधिकार न जताने पर नाराज़ हो जाती है। वह चाहती है कि सोमशेखर उसके घर औपचारिकता ओढ़ कर न आए । वह उसे अमृता का घर नहीं बल्कि अपना घर समझ कर आए । एक बार जब अमृता उसे चले जाने के लिए कहती है और वह चला जाता है, तो अमृता उसके इस व्यवहार को पचा नहीं पाती। वह सोमशेखर को एक पत्र में लिखती है, "आप उठकर हड़बड़ी में कपड़े पहनकर बाहर निकले और संयोग से मिले ऑटो में चढ़कर चले गए । यह बात भी उतनी ही सच है, तुम जो चाहे कह लो। तुम्हारी पागलों की सी बकवास सुनकर मैं जाऊँगा नहीं, यह घर मेरा है बाहर निकालने का अधिकार तुम्हें नहीं है— यों न कहकर क्यों आप चुपचाप नहीं रुक गए ?" (पृ. 199)।  एक दूसरे अवसर पर जब सोमशेखर और अमृता के बीच किसी भ्रम के कारण झगड़े की नौबत आती है और सोमशेखर उस पर प्रहार करते-करते रुक जाता है, तो अमृता नाराज़ हो जाती है। इसका कारण बताते हुए वह कहती है, "जब मारना शुरू किया तो बीच में ही अधीर होकर रोक दिया। जब पीटना शुरू किया था, तो यों पिटाई करते कि पूरी तरह बस में आ जाऊँ। मैं कोई मरती नहीं थी।" (पृ. 301)।

उपन्यासकार ने इन प्रसंगों की सृष्टि करके स्त्री मनोविज्ञान की गहराई में उतरने का प्रयास किया है। वस्तुतः अमृता जो कुछ सोमशेखर से चाहती है, उसकी आशा उसे रंगनाथ से रखनी चाहिए थी, किंतु  रंगनाथ तो उसके योग्य पुरुष है ही नहीं। उसे तो वह इतनी घृणा करती है कि शायद पति भी स्वीकार नहीं करती। वह अपने अवचेतन में सोमशेखर में ही अपने पति को कल्पित करती है इसीलिए वह सोमशेखर से कभी कोमल और कभी कठोर व्यवहार की आकांक्षा रखती है। रंगनाथ से उसे मतलब ही नहीं। वैसे भी वह मानती है कि रंगनाथ उसकी चाची के हाथ का खिलौना है; इसीलिए उससे मुक्ति पाने का साहस भरा प्रस्ताव भी करती है— "मिस्टर रंगनाथ आप सरकारी नौकर हैं। जहाँ कहीं ट्रांसफर होकर जाते हैं, उस हर जगह में चोरी छिपे संबंध बना लेने से बदनामी होगी। एक ब्याह कर लीजिए, उससे रोटी का भी कोई ठिकाना हो जाएगा। उसके लिए आवश्यक काग़ज़पत्रों पर हस्ताक्षर करके दे दूँगी। मेरे बच्चों की परवरिश के लिए आपको एक दमड़ी भी देने की आवश्यकता नहीं है।" (पृ. 342)।

छोर स्त्री मनोविज्ञान और उसके उतार-चढ़ाव भरे जीवन की कथा ही नहीं कहता, बल्कि वह इस संसार में सामान्य रूप से घटने वाले जीवन-संयोगों की कहानी भी कहता है। वरिष्ठ हिन्दी सेवी तथा कुशल अनुवादक भालचंद्र जयशेट्टी ने ऐसे विशाल कैनवस वाले उपन्यास को हिन्दी में अनूदित करके राष्ट्रभाषा के चरणों में सच्ची सेवा के पुष्प अर्पित किये हैं। अनुवाद में ऐसी भाषा का चयन किया गया है, जो किसी भी पाठक को मूल उपन्यास के निकट ले जाने में सक्षम है।

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