अभिनव मेघदूतम् (महाकवि वसंत त्र्यम्बक शेवडे , अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा )
अभिनव
मेघदूतम्
महाकवि वसंत त्र्यम्बक शेवडे
अनुवाद : स्वयं
कवि द्वारा
चौखम्बा
सुरभारती प्रकाशन
के-37/117,
गोपाल मंदिर लेन,
पोस्ट
बॉक्स नं. 1129, वाराणसी- 221001
प्रथम
संस्करण- 1990, पृष्ठ- 160, मूल्य-
50 रुपए
काश्मीर
नरेश महाराजाधिराज अनंतदेव ने कोई महत्त्वपूर्ण राजकार्य संपन्न करने के लिए अपने
एक दूत को मलय देश की राजसभा में भेजा। कार्य कुछ अधिक लंबा था, इसलिए उस दूत को कुछ अवधि मलय देश में ही विश्राम करना पड़ा। प्रवास काल
में उसका विरहाकुल मन सुदूर स्थित अपनी विरहिणी पत्नी का स्मरण करने लगा। जब विरह
की पीड़ा अधिक बढ़ी तो वह अपना मन बहलाने के लिए राजमहल की छत पर चढ़कर इधर-उधर
टहलने लगा। वहाँ उसने वर्षाकालीन मेघ को देखा। तब उसे अकस्मात् स्मरण आया कि कभी
यक्ष ने इसी मेघ को दूत बनाकर विरहिणी प्रिया के पास भेजा था। महाराजाधिराज
अनंतदेव के उस विश्वासपात्र दूत ने सोचा कि वह भी इस उपकारी मेघ के माध्यम से अपने
हृदय का संदेश अपनी विरहदग्ध प्रिया तक पहुँचा सकता है। वह नम्र होकर मेघ से कहने
लगा- "हे जलधर (मेघ)! पहले तुमने यक्ष द्वारा दिये हुए संदेश को कुबेर की
नगरी (अलका) में जाकर उसकी पत्नी के पास
पहुँचाया था, तो तुम मेरी प्रार्थना का अनादर कैसे कर सकते
हो? अर्थात् इस बार मैं अपनी पत्नी को आश्वस्त करने के लिए
जो संदेश भेज रहा हूँ, उसे ही मेरी पत्नी को सुना देना,
क्योंकि स्वभाव से ही महान प्रकृति वाले पुरुष दान के अवसर पर
याचकों के साथ भेदभाव नहीं रखते।" (पृ. 7)। इसके
पश्चात् काश्मीर के सौंदर्य और वहाँ तक
पहुँचने के मार्ग की विशेषताओं का परिचय मेघ को प्राप्त होता है तथा महाराजा का वह
दूत अपने हृदय में बसे प्रेम तथा उसकी स्मृतियों का विस्मयकारी चित्रण करता है।
महाकवि
वसंत त्र्यम्बक शेवडे ने विश्व कवि कालिदास के मेघदूत की परंपरा में यह काव्य रचा
है। श्री शेवडे संस्कृत के ही विश्व प्रसिद्ध विद्वान नहीं हैं, बल्कि वे पाश्चात्य साहित्य के भी मर्मज्ञ विद्वान हैं। इतिहास, भूगोल, काव्य-शास्त्र, परंपरागत
एवं आधुनिक सौंदर्य -शास्त्र, दर्शन जैसे विषयों पर उनका
असाधारण अधिकार है। उनका यह संपूर्ण ज्ञान अभिनव मेघदूतम् की रचना में काम आया है।
यद्यपि इसमें संदेह नहीं, कि वे विश्व कवि-कुल गुरु कालिदास
की रचना शैली और परंपरा से अलग नहीं हटे हैं। फिर भी कालिदास के मेघदूत और महाकवि
शेवडे के अभिनव मेघदूतम् पर तुलनात्मक दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि कुछ भिन्न
वैशिष्ट्य रखने के कारण इन दोनों को अलग-अलग पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए एक
वैशिष्ट्य अभिव्यक्ति चित्रण संबंधी है। जहाँ कालिदास का मेघदूत अभिव्यक्ति के
क्षेत्र में एक परंपरा का निर्माण करता हुआ प्रतीत होता है वहीं अभिनव मेघदूतम्
पूर्व निर्मित परंपरा को अधिक उज्ज्वलता, अधिक लाक्षणिकता और
अधिक वैभव प्रदान करता हुआ लगता है। काव्य के प्रारंभ में ही कवि ने मेघ को सावधान
करते हुए कहा है- "यहाँ (मलय पर्वत पर) यदि कोई मदमत्त हाथी तुमको जंगली
गजराज समझ कर क्रोध से तुम्हारे ऊपर अपने तेज दाँतों का प्रहार करे, तो तुम बिजली की चकाचौंध द्वरा उसकी दृष्टि को बार-बार विकृत करके और
सिंह के समान ज़ोर से दहाड़ कर उसे डराकर भगा देना।" (पृ. 10)। यह चित्रण प्रकृति के मानवीकरण का सामान्य उदाहरण भर नहीं है, बल्कि इसमें मनोवैज्ञानिक सौंदर्य-चित्र भी है। इसी प्रकार के अभिनव
प्रभाव वाले चित्र इस काव्य में स्थान-स्थान पर विद्यमान हैं। ऐसा ही एक चित्र
काश्मीर महाराजा की राजसभा का भी है- "क्षेमेन्द्र आदि कविवर जिनकी राजसभा
में विराजमान हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मणों को दियेगए अग्रहार
प्रत्येक दिशा में पाये जाते हैं, धानों की देख-रेख करने
वाली कृषकों की स्त्रियाँ जिनके हिम धवल सुयश का उच्च स्वरों में गान किया करती
हैं, ऐसे महाराज अनंतदेव इस समय काश्मीर देश पर शासन कर रहे
हैं।" (पृ. 116)। यह चित्र सामान्य यश गायन नहीं है, बल्कि इसमें ऐतिहासिक और साहित्यिक ज्ञान भरा हुआ है। महाकवि शेवडे ने
अपने इस ज्ञान को अपने लोकानुभव से मिलाकर एक नया सौंदर्य बोध प्रस्तुत किया है।
अभिनव
मेघदूतम् मूलतः संस्कृत भाषा का काव्य है। महाकवि ने पहले संस्कृत में ही इसकी
व्याख्या प्रस्तुत की है और फिर हिंदी तथा
अंग्रेजों में मूल श्लोकों का अनुवाद प्रस्तुत किया है। संस्कृत व्याख्या— अन्वय तदुपरांत व्याख्या क्रम में दी गई है। संस्कृत व्याख्या की यही
पुरानी परिपाटी है। हिंदी अनुवाद हिंदी पाठकों के लिए उपयोगी है। अंग्रेजी अनुवाद
संस्कृत व हिंदी न जानने वालों के लिए है।
इस प्रकार यह ग्रंथ विशाल वृत्त क्षेत्र में अपनी उपस्थिति अंकित कराने और रचयिता
को यश प्रदान करने वाला है।
महाकवि
शेवडे ने ही इसका हिंदी अनुवाद भी किया है, इसलिए इसका
अनुवाद मूल के अधिकतम निकट है। इसे पढ़कर मूल रचना की आत्मा का दर्शन करना कोई
श्रम साध्य कार्य नहीं है। महाकवि ने संस्कृत पदों में जो लालित्य संजोया है, वही लालित्य हिंदी में भी दिखाई देता है। यदि पाठक थोड़ी संस्कृत भी समझ
लेता है, तो वह अनिर्वचनीय काव्यानंद का भागी बन जाता है।
उदाहरण के लिए, एक पद का अनुवाद लिया जा सकता है— "हे
सुंदरी! कहीं कुंद कुसुमों के रमणी कुंज में, कहीं मल्लिका
के मंडप में, घनी छाया वाले किसी बगीचे में अथवा कहीं फुहारे
के पास या कहीं घने कदली वृक्ष समूह से निर्मित गर्भ गृह में विहार करने से हमारे
वे चिन्तारहित (सुखमय) दिन एक क्षण के समान व्यतीत हो गये।" (पृ. 148)। हिंदी भाषा का जो ललित, परिनिष्ठित और श्लिष्ट सौंदर्य
युक्त रूप इन पंक्तियों में है, वह मूल भाषा के सौंदर्य को प्रत्यक्ष करने में बहुत सीमा तक सफल है। यह
संस्कृत के साथ-साथ हिंदी पर महाकवि वसंत
त्र्यम्बक शेवडे के असाधारण अधिकार को भी प्रमाणित करता है।
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