अपना होना (अपर्णा टैगोर)

 

अपना होना

अपर्णा टैगोर

 

समानांतर प्रकाशन

7/7, दरियागंज, नई दिल्ली-2

संस्करण- 1993, पृष्ठ- 107, मूल्य- 50 रुपए

 

अपर्णा टैगोर बड़ी समस्याओं से लेकर छोटे से छोटे जीवन प्रसंग पर समान कौशल से कहानी बुनने वाली रचनाकार थीं। उन्होंने बेरोजगारी पर कहानियाँ लिखी हैं। पिता के अकारण क्रोध की मार से तड़पती पुत्री के मन की कहानियाँ लिखी हैं। भूख के सामने खड़ी अवश स्त्री की कहानियाँ लिखी हैं। धन के आधार पर अपना अवमूल्यन होने के कारण व्यक्ति के मन में उत्पन्न हीनता और कुंठा की कहानियाँ लिखी हैं तथा पति-पत्नी के बीच उग आये अहं की कँटीली झाड़ी से लगी खरोंचों की कहानियाँ लिखी हैं। दूसरी ओर अपर्णा टैगोर ने दो भाइयों के बीच छोटी-छोटी झड़पों या फिर माता-पुत्र के बीच होने वाली कहा-सुनी पर भी कहानियाँ लिखी हैं। इन वैविध्य भरी कहानियों को रचते समय उन्होंने अपनी कला को कहीं भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होने दिया। भाषा से लेकर बिंब तक हर कहानी में वैसे के वैसे ही रहे। अपर्णा की कहानियों को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि वे किसी एक प्रसंग को या किसी एक घटना को उसके निकट जाकर लंबे समय तक देखती रहती हैं। जब उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि जिस प्रसंग के पास वे खड़ी हैं, वह सचमुच अपने साथ कोई बड़ा सरोकार, कोई गंभीर चेतावनी लिए हुए हैं, तब वे उसे लेकर कहानी लिखने बैठ जाती हैं। कहानी लिखते समय वे उसके साथ अपने अनुभवों को भी जोड़ती चली जाती हैं। इस प्रकार उनकी कहानी पक्की लकड़ी के रचाव की तरह सबके सामने आ जाती है।

अपना होना संग्रह में अपर्णा टैगोर की नौ कहानियाँ हैं। शीर्षक कहानी— 'अपना होना' बेरोजगारी की भयावहता को आधार बनाकर लिखी गयी है। शंकर पढ़ने में तो कुशाग्र बुद्धि था, उसने बड़े-बड़े प्रमाण-पत्र भी प्राप्त किये थे, किंतु  जब वह नौकरी की खोज में निकला, तो उसकी पढ़ाई, बुद्धिमानी, सर्टिफिकेट कुछ भी उसके काम नहीं आया— "कॉलिज की डिग्री हाथ में लेकर निकले हुए उसे एक अरसा हो गया था और इस अरसे के बीच वह एकाएक ही इंटेलीजेंट स्टूडेंट से एक निकम्मा और बेकार युवक बन गया था। जो माँ-बाप उसकी तारीफ करते नहीं अघाते थे, वे ही अब उससे बुरी तरह ऊब चुके थे, हताश हो चुके थे। बाप तो उसे देखते ही घृणा से मुँह बिचका लेता और शायद मन ही मन शंकर को हजार-हजार गालियाँ निकाल कर अपने को हल्का कर लेता।" (पृ. 10)। अपर्णा सेन ने कहानी यहीं से बनाई है। नौकरी क्यों नहीं मिलती, साक्षात्कार का यथार्थ क्या है, सिफारिशें कितने प्रकार की और कैसी होती हैं, ये सब बातें अब किसी विस्मयबोधक कहानी का विषय नहीं रही हैं। विस्मय बोधक है, बेरोजगार व्यक्ति के प्रति परिवार और समाज की दृष्टि तथा उससे भी विस्मयबोधक है, इस व्यवहार की वह प्रतिक्रिया, जो बेरोजगार व्यक्ति के मन में उत्पन्न होती है। इन्हीं प्रसंगों से बनती है वह विस्मयबोधक कहानी, जिसका विस्मय बोध यथार्थ के पर्त-दर-पर्त उभरने से निर्मित होता है। अपर्णा टैगोर ने अपनी कहानी में ये ही किया है। जब शंकर का बाप शंकर को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हुए अपनी सीमाओं का भी ध्यान नहीं रखता तो, "उसे सहसा याद आया कि इसी वक्त एक दम अभी ही उसे बाप नामक शख्स का अस्तित्व मिटा देना चाहिए, पर बाप का अस्तित्व मिटाने की जगह वह गरम-गरम चाय की घूँट भरकर रह गया था।" (पृ. 17)।

'उस सुबह का इंतजार' ऐसी नारी के मनोविज्ञान का परिचय देती है, जो अपनी बीमारी के कारण लंबे समय के लिए अस्पताल में भर्ती कर दी गई है। उसका पति इससे प्रतिदिन मिलने आता है, उसे दिलासा देता है, लेकिन भोजन पकड़ा कर चला जाता है। वह काफी दिनों से इस एकरस जिन्दगी से जूझ रही है। सोचती है, पता नहीं और कब तक उसे इसी प्रकार जूझना पड़ेगा। उसके भीतर की व्याकुलता उससे प्रश्न करती है कि आखिर वह कब तक अपने मनुष्य होने के अर्थ को पाने से वंचित रहेगी? यह प्रश्न कहानी के शब्द-शब्द में पिरोया हुआ है। सीमा बार-बार एक-एक शब्द के पीछे दौड़ती है, किंतु  निराश, "उसे अपने ऊपर हँसी आ गई। अभी तो खाकर सोना है, फिर उठ कर चाय पीकर अजय का इंतजार करना है, उसके बाद रात का खाना खाकर दवा पीना है, तब कहीं जाकर बिना सोये यूँ ही करवट बदलते हुए दूसरे दिन का इंतजार करना है।" (पृ. 23-24)।

'दबा हुआ आक्रोश' एक ऐसी लड़की, नीरा की कहानी है, जो अपने परिवार के आर्थिक सहयोग के लिए जी-तोड़ मेहनत करती है। ट्यूशन पढ़ाती है, दिन-दिन भर भोजन नहीं करती, किंतु फिर भी जिसे पारिवारिक वातावरण में शांति नहीं मिलती। यह कहानी आर्थिक विवशता के ऐसे मोड़ से उठाई गई है, जिस पर अचानक आर्थिक तंगी में फँसा हुआ परिवार आ खड़ा हुआ है। नीरा अपनी क्षमता भर मेहनत से उस निर्धनता का सामना करना चाहती है, किंतु संकट यह है कि नीरा का पिता निर्धनता का शिकार होते हुए भी पिछले ठाट-बाट को नहीं भूल पाता। इससे भी बड़ा एक संकट यह है कि वह नीरा की सहायता तो लेता है, किंतु उसे कोई मानसिक स्वाधीनता नहीं देना चाहता। उसके लिए नीरा अधिक महत्त्व नहीं रखती। यह स्थिति पिता और पुत्री के बीच व्यक्तित्व और अस्तित्व का संघर्ष उत्पन्न कर देती है। बात-बात पर बहस और झड़पें होती हैं तथा अंत में— "पापा आई हेट यू" (पृ. 39)।

'मूर्त-अमूर्त तकलीफों के बीच' एक ऐसी कहानी है, जिसमें आर्थिक विवशता एक स्त्री के शोषण का मुक़ाबला करने के साहस को दीमक की भाँति धरि-धीरे चाट जाती है। गिरीश मृदुला के घर में उसके पति द्वारा पेइंग गैस्ट बनाकर रख लिया जाता है। वह हर महीने निर्धारित धनराशि का भुगतान करता है। धीरे-धीरे वह परिवार की विवशता को समझ लेता है, इसीलिए मृदुला के निकट आने की कोशिश करता है। "गिरीश अपना मुँह उसके कान के पास ले जाकर फुसफुसाया, 'आज इतवार का दिन है, भाभी कुछ स्पेशल पकाइये और दोपहर को पिक्चर का प्रोग्राम बनाइये और हाँ, वह मेरून रंग की साड़ी पहनना न भूलें'। अंतिम वाक्य पूरा करते हुए गिरीश ने धीरे से अपने होठों का स्पर्श मृदुला के कपोल से करा दिया।" (पृ. 45)। मृदुला गिरीश के इस व्यवहार का उद्देश्य अच्छी तरह समझती है। वह इसका भरपूर विरोध भी करना चाहती है। उसे ऐसे व्यवहार से बहुत चिड़ भी होती है, किंतु  जब पूरा परिवार गिरीश का अहसानमंद है, यहाँ तक कि उसकी सास गिरीश की एक-दो बेजा हरकतें देखकर भी आँखें बंद कर लेती है, तो अकेली मृदुला क्या करे। वह इस भयावह परिस्थिति में असहाय हो जाती है। "आज राशन नहीं, कल दूध नहीं, परसों किराया नहीं और इन नहीं-नहीं के बीच सारे परिवार की घूमती हुई निगाहें तो उसे समूचा निगल ही जायेंगी। लाख कोशिशें करने पर भी मृदुला अपने भीतर इतना साहस नहीं जुटा सकी कि वह उस अदृश्य, पर भयावह व्यक्ति से अकेले लड़ सके।" (पृ. 50)। अपर्णा टैगोर ने इस कहानी में नारी की विवशता को एक अलग संदर्भ में देखा है। इसमें एक स्त्री अपनी रक्षा करना चाहती है, किंतु केवल इसलिए नहीं कर पाती कि वैसा करने से परिवार का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

'दौड़' कहानी वर्तमान सभ्यता में धन की दौड़ तथा पारिवारिक रिश्तों के बनते बिगड़ते घरौंदों पर आधारित है। लेखिका ने बहुत साधारण प्रसंग से इसके ताने-बाने में रंग भरा है। नवल एक दुकानदार है, जो अधिक कमाई नहीं कर पाता, यहाँ तक कि साप्ताहिक खर्च के लिए उसे अपनी माँ को जो पैसा देना होता है, लगातार वह भी पूरा नहीं दे पाता। परिणाम यह होता है कि नवल की माँ, पत्नी तथा अन्य सदस्य उसके विरुद्ध हो जाते हैं। केवल नवल का बाप है, जो उसके प्रति सहानुभूति रखता है। नवल जब भी घर लौटता है, तो पत्नी और माँ से उसका झगड़ा हुए बिना नहीं रहता। एक बार वह जब पचास रुपए की जगह केवल बीस रुपए दे पाता है और उसकी माँ नाराज होती है, तो पत्नी व्यंग्य करती हैं, "ले लो अम्मा ये बीस रुपये, कल शायद आपको पचास का राशन बीस में ही मिल जाएगा।" (पृ. 55)। यह नवल के विरुद्ध उसकी पत्नी और माँ का संयुक्त मोर्चा था। लेखिका ने इस साधारण सी कहानी में एक असाधारण समाजार्थिक यथार्थ प्रस्तुत किया है।

'कुछ भी तो नहीं' एक भिन्न स्तर पर आर्थिक दृष्टि से मनुष्य का मूल्यांकन करती है। यह स्तर आधुनिक भौतिकवादी तथा सुविधा परस्त दृष्टिकोण से निर्मित हुआ है। आज के भौतिकता प्रधान और चमक-दमक वाले युग में कला का मूल्य नहीं है, जबकि कला के प्रदर्शन तथा बिक्री की संभावनाओं का मूल्य है। शंखधर और वर्मा भले ही बचपन के मित्र हों और भले ही शंखधर श्रेष्ठ कलाकार हो, किंतु  वर्मा एक बड़ी कंपनी का अधिकारी है; इसलिए उसकी दृष्टि में शंखधर का कोई मूल्य नहीं। यहाँ तक कि वह शंखधर के बच्चों को भी समझाता है, "साहित्य, कला, संस्कृति यह सब मनुष्यों के लिए बहुत ही आवश्यक है, पर सबसे ज़रूरी चीज़ है रोटी, समाज और अपना अस्तित्व, असली चीज़ तो यह देखना है कि समाज में हमारा स्थान कहाँ है? साहित्य और कला मनुष्य की मानसिक भूख को तो मिटाती है, पर उसे कोई सुरक्षा तो नहीं दे पाती है न!" (पृ. 74)। यह दृष्टि आज के युग में कला के साथ-साथ मनुष्य का भी अवमूल्यन कर रही है।

'ऐसा भी' में लेखिका ने रमाकांत, शोभा और कमला के माध्यम से पुरुष तथा नारी दोनों के मनोविज्ञान को प्रदर्शित किया है। पुरुष की उच्छृंखलता और स्त्री का दुस्साहस मिलकर इस कहानी को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं।

'चेहरा' उन व्यक्तियों की वास्तविकता बताने के लिए रची गई कहानी है, जो अनैतिक कार्य करते हुए भी भलमनसाहत का नकली चेहरा चिपकाए रहते हैं। ऐसे व्यक्ति यौन अपराध करके बेनीरियल डिज़िज़ तक के शिकार हो जाते हैं, किंतु  यह कभी नहीं चाहते कि उनका वह भेद परिवार के सदस्यों के समक्ष खुले। ऐसे लोग कई बार यह भी चाहते हुए देखे जाते हैं कि परिवार के जो सदस्य उनसे अच्छे हैं, वे भी गलत रास्ते पर चले जायें, ताकि उन्हें टोकने वाला कोई न रहे। इस कहानी का नायक ऐसा ही है— "पर मैं अपने वास्तविक रूप को पहचानता था और रमण को भी मेरे सारे कार्य-कलापों का थोड़ा-बहुत अता-पता तो था ही, सो जब मैं उसे डाँटता वह सिर्फ मुस्करा कर मुझे टाल जाता था और यहीं पर मैं अपने को पराजित पाता। मैं अपने अंतःकरण से यह चाहने लगा था कि रमण भी वही कुछ करे, जो मैं करता हूँ, जिससे मेरे चोर को एक साथी मिल जाए और मैं अपने पराजित होने की भावना से इस तरह उबर जाऊँगा।" (पृ. 94)। रुग्ण मानसिकता और दोहरा व्यक्तित्व रखने वालों का यह मनोविज्ञान इस कहानी का वैशिष्ट्य बन गया है।

संग्रह की अंतिम कहानी 'मुट्ठी में कैद आकाश' पति-पत्नी संबंधों के माध्यम से नारी की स्वतंत्रता और उसके स्व-निर्णय के अधिकार से जुड़ी हुई है। तमाम शिक्षा और प्रगति के बावजूद स्त्री को पुरुष द्वारा किसी बड़े निर्णय में भागीदार नहीं बनाया जाता। उल्टे उस पर इच्छाएँ और आज्ञाएँ लादी जाती हैं। इस कहानी की स्मिता इसी प्रकार के मानसिक शोषण की शिकार है। वह यद्यपि खुले रूप में अपने पति का विरोध नहीं कर पाती, किंतु  अपने मन में बहुत घुटन अनुभव करती है। वह सोचती है, "क्योंकि वह पुरुष है, क्योंकि वह एक अच्छे पोस्ट पर काम करने वाला पुरुष सिंह है और क्योंकि स्मिता उसकी ब्याहता है; इसलिए वह जो चाहे जिस तरह चाहे कर सकता है। स्मिता बाध्य है वैसा ही करने के लिए। आलोक अगर पिक्चर न जाकर घूमने जाना चाहे, तो स्मिता को भी उसके साथ घूमने जाना होगा, फिर चाहे उसके साथ इस तरह बेमन से घूमने जाना स्मिता के लिए कितना ही उबाऊ ही क्यों न हो।" (पृ. 102)। आधुनिक स्त्री के जीवन की यह घुटन भरी व्याकुलता अहम्, स्वामित्व और बल पर आधारित संपूर्ण पुरुष व्यवस्था को चुनौती देने वाली है।

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