सोनिया (दुर्गाप्रसाद श्रेष्ठ)
सोनिया
दुर्गाप्रसाद
श्रेष्ठ
प्रचारक
बुक क्लब
हिंदी
प्रचारक संस्थान
पोस्ट
बॉक्स-106, पिशाच मोचन
वाराणसी-
221001
संस्करण-
1981, पृष्ठ- 111, मूल्य- 6
रुपए
हिंदी
कथा साहित्य में ऐतिहासिक महत्त्व रखने
वाली पत्रिका 'सारिका' ने
दुर्गाप्रसाद श्रेष्ठ पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, "दुर्गाप्रसाद
श्रेष्ठ नेपाली और हिंदी लेखन में एक खासा
परिचित नाम है…श्रेष्ठ अनिवार्यतः निम्न मध्यवर्गीय पात्रों
की परिस्थितियों और दुविधाओं-पीड़ाओं के कथाकार हैं। उनके अधिकांश पात्र आर्थिक विडंबनाओं
के शिकार हैं। बहुधा मानसिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं—और इसी कारण संभवतः प्रकृति भी उनका शोषण करती है... दुर्गा की लेखकीय
पकड़ और दृष्टि निश्चय ही सम्यक और स्पष्ट है।"
'सारिका' की यह टिप्पणी दुर्गाप्रसाद श्रेष्ठ के कथा
संग्रह, 'सोनिया' की पंद्रहों कहानियों पर भी लागू होती है। इस संग्रह की शीर्षक कहानी 'सोनिया' एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो पहाड़ी वातावरण में पलने और बढ़ने के कारण बहुत सरल तथा सहजविश्वासी
स्वभाव की है। कथानायक संयोगवश उसके संपर्क में आता है और भीतर ही भीतर उससे
जुड़ाव अनुभव करता है। वह लड़की भी नायक के साथ मानसिक लगाव अनुभव करती है,
किंतु दोनों ही इस लगाव को
कोई स्पष्ट आकार नहीं दे पाते। दुर्भाग्यवश सोनिया एक पेड़ के नीचे दबकर मर जाती
है। वह उस समय किताब और स्लेट लेकर कथानायक से पढ़ने आई थी। कथानायक मानसिक आलोड़न
अनुभव करता है।
'संदर्भ' एक ऐसी कहानी है, जो
वास्तविक चेहरे को छिपाकर नकली चेहर लगाए रखने वाले लोगों की यथार्थ दशा चित्रित
करती है। सुब्बाबाजे कृत्रिम जीवन जीने वाला व्यक्ति है। वह तरह-तरह के आश्वासन देकर
और भिन्न-भिन्न प्रकार से आत्म-प्रदर्शन करके प्रशंसा तथा प्रतिष्ठा पाना चाहता है,
किंतु यह सब कितने दिन तक चल सकता है! मुखिया उसकी स्थिति को भाँप
ही लेता है और सुब्बाबाजे मानसिक संकट में फँस जाता है। 'केटी'
उन लड़कियों की व्यथा कथा कहती है, जिन्हें
कुछ चालाक लोग दूर दराज के पहाड़ी गाँवों से बहका-फुसला कर ले आते हैं और किसी
जनरल या नेता की रखैल बना देते हैं। ऐसे लोग खुद तो बड़े-बड़े लाभ प्राप्त कर लेते
हैं, किंतु भोली-भाली लड़कियाँ जीवन की सहज और स्वाभाविक
संभावना से हाथ धो बैठती हैं। 'गंगाचाची' नितांत भिन्न किस्म की औरतों के विषय में बहुत कुछ बताने वाली कहानी है।
गंगा को एक ब्राह्मण ने रख लिया था। इसलिए वह नीच जात से ऊँची जाति में आ जाती है,
किंतु इस यात्रा में उसे
बहुत लोगों को अपनी देह सौंपनी पड़ती है। गंगा इसे अभिशाप नहीं मानती। वह इस
स्थिति का और इस प्रकार के जीवन का पूरा फायदा उठाती है। जब उसकी उमर ढल जाती है, तो वह भगवत भजन में डूब जाती है और आस-पास कुमार्ग पर चलने वाली लड़कियों
पर ध्यान देने लगती है। वह अपने अनुभव के आधार पर तथा अपने साहस के बल पर मन माया
का उद्धार करती है।
'टाटा' सामान्य रोमांस की कहानी है जो नेपाल में नहीं,
बल्कि भारत में घटती है। पारस्परिक परिचय, प्रेम, वियोग तथा नायिका की मृत्यु के साथ कहानी संपन्न हो जाती है। 'रनिंग कामेंट्री' कार्यालयीन जीवन पर क्रिकेट मैच के
प्रभाव को दर्शाती है। 'नीमा-पेम्मा' दो
ऐसी नेपाली बहनों की कहानी है, जो विधवा होने पर भी सधवा
होने का नाटक करती हैं। उन दोनों के पति बहुत साल पहले सगरमाथा, अर्थात् माउंट ऐवरेस्ट चढ़ने चले गए थे। मौसम खराब हो जाने के कारण वहीं
मारे गए । अब उनके सामने सामाजिक सुरक्षा की समस्या है। वे दुनिया भर के लोगों की
अपवित्र दृष्टि से बचने के लिए यह नाटक करती हैं। 'खंडित'
एक ऐसे व्यक्ति का मनोविज्ञान दर्शाती है जो अपनी पूर्व प्रेमिका के
समक्ष पड़ जाता है। दोनों ही सहज होने की कोशिश करते हैं, किंतु
असहजता से नहीं बच पाते। 'फुलिया' नेपाल में रहने वाली सीधी सादी लड़की की
कहानी है। फुलिया स्कूल के मास्टरजी को सब्जी पहुँचाने आती है और अपने भोलेपन से
मास्टरजी के मन में स्थान बना लेती है। एक दिन उसकी मृत्यु हो जाती है और उसके बाएँ
हाथ पर 'मास्टरजी' गुदा हुआ निकलता है।
'मकल' एक वृद्धा के जीवन के विषय में बताती है। यह
वृद्धा कोयले की कमी के कारण ठंड से मर जाती है। 'त्योहार'
में एक बेबस दुकानदार एक भोले-भाले देहाती को ठगता है तथा मन में
पश्चाताप करता है। वह निर्धनता के हाथों पराजित हुआ। मानव मनोविज्ञान देखिये कि
त्योहार मनाने की उसकी आकांक्षा उसे अनुचित कार्य करने को बाध्य करती है और वह
अपने उस कार्य पर पश्चाताप स्थगित करके परिवार को खुशी देने निकल पड़ता है। 'शिनाख्त' एक वृद्ध स्त्री के मनोविज्ञान को दर्शाती
है। वृद्धा का बेटा दूसरे महायुद्ध के दौरान युद्ध में चला गया था। उसके बाद वह
कभी नहीं लौटा। वृद्धा को विश्वास है कि उसका बेटा कभी न कभी उसी होटल में अवश्य
लौटेगा, जहाँ वह एक समय काम करता था। वृद्धा अक्सर उस होटल
में आती है और स्नान करते हुए पुरुषों के शरीर पर वह निशान देखती है, जो उसके बेटे के शरीर पर था। वह वृद्धा कथानायक के शरीर पर वैसा ही निशान
देखकर उसे अपना बेटा समझती है, किंतु अपने संशय को मिटाने के
लिए अपनी पुत्र-वधू को लेकर आती है। कथानायक उसके आने का कारण जानकर भावुक हो जाता
है।
'लिफ्ट' आधुनिक सभ्यता में पलने वाले लोगों का चरित्र
दिखाती है। यह आत्म-केंद्रित बनाने वाली इस सभ्यता का ही प्रभाव है कि एक स्त्री
प्रसव के निकट सड़क पर पड़ी रहती है और कार में आराम से बैठकर जाने वाला व्यक्ति
उसे लिफ्ट नहीं देता। उस व्यक्ति को अपनी सुरक्षा की चिंता है, अपनी पत्नी की सुरक्षा
की चिंता है, फिर
चाहे दुनिया में कुछ भी घटता रहे। 'हाराँचा' बचपन में उग आए ऐसे प्रेम की कहानी है जो किसी रोमांटिक वातावरण में
उत्पन्न नहीं होता, बल्कि गरीबी का कंधा पकड़कर खुरदरी सड़क
से आता है। यह प्रेम हृदय के किसी कोने में जीवन भर काँटे की तरह कसकता रहता है। 'नांगले' एक दुर्भाग्यशाली व्यक्ति का चित्रण करती
है। उसकी पत्नी छोटी बच्ची को लेकर अस्पताल में बैठी होती है और वह 'पुष्टकारी' बेचने के लिए स्कूल के सामने खड़ा रहता
है। कारण यह है कि उसके पास सुई लगवाने के पैसे नहीं हैं। जो थे, उन्हें उसने कल 'रक्सी' पीकर
खर्च कर डाला था।
दुर्गाप्रसाद
श्रेष्ठ की ये कहानियाँ पढ़कर 'सारिका' की टिप्पणी की याद आती है और यह भी लगता है कि इन कहानियों में नेपाली
जनजीवन का अधिकांश अपने यथार्थ के साथ जीवंत हो उठा है। पहली ही कहानी में लेखक ने
नेपाल का एक चित्र इस प्रकार दिया है- "पूर्वी नेपाल का एक पहाड़ी गाँव।
चारों तरफ हरे-भरे वृक्षों से ढके ऊँचे-ऊँचे पहाड़। गाँव की तलहटी में जोर शोर से
बहती हुई नदी— साँपिन की तरह बल खाती हुई। पानी इतना वेगवान कि कोई फिसल जाए, तो रुके ही नहीं कहीं। दूर-दूर बसे मिट्टी के लाल-लाल रंग वाले छोटे-बड़े
झोंपड़े। हर झोंपड़े में कुम्हड़े की बेल छप्पर को ढके हुए। हर एक झोंपड़े के साथ
एक छोटा-सा गोट, जिसमें दो-तीन गायें, बछड़े
हमेशा रम्भाते हुए।" (पृ. 1)।
नेपाल
के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ केवल आलू ही उपलब्ध होता
है। ऐसे में खाने को और क्या मिलेगा!, "और क्या खाएँगे
तब, यहाँ खाली आलू ही तो पैदा होता है। उसने कहा और खाने बैठ
गई।" (पृ. 54)। नेपाल पहाड़ों का देश है। वहाँ पहाड़ों पर चढ़े बिना किसी का
काम नहीं चल सकता। लेकिन क्या पहाड़ इतनी आसानी से चढ़ा-उतरा जा सकता है! जब लोग
पहाड़ पर जाते हैं, तो उनके सकुशल लौटने के लिए प्रार्थनाएँ
की जाती हैं— "देखते नहीं मौसम कितना खराब हो गया है, पहाड़
पर चढ़ना जान पर खेलना है, हालाँकि हम डरते नहीं, लेकिन जब भी ऐसा होता है, हम लोग 'गुम्बा' जाकर प्रार्थना करते हैं, ताकि जो लोग पहाड़ पर चढ़ने गए हैं, वे सकुशल लौट आयें।"
(पृ. 58)।
कहानीकार
ने नेपाल के जीवन के बाह्य रूप को ही चित्रित नहीं किया है, बल्कि उसके अंदर बहती सूक्ष्म धारा को भी प्रत्यक्ष किया है। लोकगीत
जनमानस के सच्चे प्रतिबिंब होते हैं। वे जन-साधारण के हृदय को खोलकर रख देते हैं।
कहानीकार ने इन कहानियों में जहाँ भी अवसर पाया है,
लोक-गीतों का प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए— "मोहिनी लाई जाने को होला,
हो मलाई लै जाने को होला" (पृ. 2),
"लै जाऊँ मलाई रेली माई सिऊँ दोमा सिन्दूर हालेर" (पृ. 20) आदि को लिया
जा सकता है। ये गीत नेपाली स्त्री के हृदय को खोल कर रख देते हैं। लेखक ने नेपाली
जीवन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए भाषिक प्रयोगों का सहारा भी लिया
है। पाठकों की सुविधा के लिए नेपाली शब्दों और वाक्यों का अनुवाद देकर इन कहानियों
के लेखक ने एक और अच्छा कार्य किया है। इससे पाठकों की सुविधा के साथ-साथ हिंदी भाषा
की शब्द संपदा भी बढ़ी है।
ये
सभी कहानियाँ जीवन की विभिन्न समस्याओं को इस तरह प्रस्तुत करती हैं कि जैसे किसी
ने खुले हुए घाव में ढेला मार दिया हो। 'गंगा चाची'
ऐसा ही एक जोरदार ढेला है। वह समाज और व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने
वाली विकृति खोल कर रख देती है। इतना ही नहीं, उसका साहस
अन्य लोगों को भी प्रेरित करने की शक्ति रखता है। जब वह कहती है— "जा कमीने
कुत्ते, बस तुझसे यही कहलवाना था, अब
मेरी बच्ची को कोई डर नहीं...तू इसे न भी स्वीकारेगा, तो
ज़माना स्वीकारेगा कि हाँ, उसके बच्चे का कोई बाप था। स्साला,
कमीना, कायर निकल गया... छोड़ कर भाग
गया।" (पृ. 34), तो लगता है कि गंगा चाची अकेली ही इस
पूरे समाज की चेतना को झकझोर रही है। 'रनिंग कमेंट्री'
समय और श्रम नष्ट करके खेल का आनंद लेने की घातक प्रवृत्ति पर चोट
करती है। इस प्रवृत्ति के चलते प्रगति में नियोजित हो सकने वाले कितने ही
श्रम-दिवस बर्बाद हो रहे हैं। कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ वातावरण भी प्रस्तुत
करती हैं, समस्यायें भी और जीवन का यथार्थ भी— अर्थात् ये
कहानियाँ एक परिवेश बुनती हैं और उससे पाठक को घेर लेती हैं।
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