धार के आर-पार (पी. आदेश्वर राव)

धार के आर-पार

पी. आदेश्वर राव

 

पराग प्रकाशन, 3/114, कर्ण गली, विश्वास नगर,

शाहदरा, दिल्ली-32

प्रथम संस्करण- 1986, पृष्ठ- 104, मूल्य- 35 रुपए

 

धार के आर-पार डॉ. पी. आदेश्वर राव की छप्पन कविताओं का संग्रह है। पुरोवाक् के अंतर्गत कवि ने अपनी कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहा है— "इस संग्रह की कविताओं में मेरी काव्य धारा के दो तट स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। एक तट प्रेम और सौंदर्य संबंधी है और दूसरा लोक बोध से युक्त" इस टिप्पणी के आधार पर आदेश्वर राव की कविताओं तक पहुँचने का मार्ग मिल जाता है। सुंदरी शीर्षक कविता में वे कहते हैं— "मेरे कवि के ये भाव नयन/तन्मय हो तुमको रहे देख/सखी! तुम्हारा यह विमल रूप/पा चुका हृदय में अमर टेक" (पृ. 19)। देखना यह है कि कवि के हृदय में सुंदरी का जो विमल रूप अमर टेक बन गया है वह सौंदर्य  के किस स्तर का परिचायक है। साधारणतः सौंदर्य अमर नहीं होता। अपरिवर्तित भी वह नहीं रहता। प्रतिक्षण नई आभा और रसमयता से भरते जाना तथा क्षण-क्षण नूतन छवि आँकते हुए स्वयं उनमें ढलते जाना ही सौंदर्य  की प्रकृति है। कवि ने उसकी इसी प्रकृति को पकड़ा है; इसीलिए वह अमर सौंदर्य  की बात नहीं करता, बल्कि सौंदर्य  की टेक को अमर कहता है। यह टेक नित-नूतन छवियों और भंगिमाओं की टेक है। इस टेक को पहचानने के लिए सुघड़  सौंदर्यबोध अनिवार्य है। वही मनुष्य के हृदय को सौंदर्य का आग्रही बनाता है। आग्रह की इस दशा को प्राप्त करने के बाद सुंदरी का सौंदर्य मात्र दैहिक आकर्षण तक बंधा नहीं रहता। वह उन्मुक्त होकर देह की सीमायें पार करके आत्मिक सौंदर्य  बन जाता है। कवि इसी संस्कारशील आत्मिक सौंदर्य  को सुंदरी का वास्तविक सौंदर्य  मानता है तथा उसी की टेक में अमरता अनुभव करता है।

यह संकेत करना आवश्यक है कि आदेश्वर राव ने सौंदर्य  की अमर टेक के साथ ही मांसल सौंदर्य  से भी आँखें नहीं चुराई हैं। वे एक कविता में कहते हैं— "नयन तुम्हारे नवनीलोत्पल/केश तुम्हारे चंचल अलि दल/चरण तुम्हारे रक्तिम शत दल/रूप तुम्हारा है लोकोत्तर!/रूप तुम्हारा मधुर मनोहर!" (पृ. 20)। यह मांसलता और भौतिक रूप की चकाचौंध परंपरागत सौंदर्य चित्रण के अनुकूल है। इसमें केवल एक अभिनवता है कि कवि ने भौतिक सौंदर्य  में भी इतना विशाल अनुभव संजोया है कि वह लोकोत्तर हो गया है। यह अलग बात है कि मांसल के बीच लोकोत्तर का अनुभव अनेक सवाल भी खड़े करता है। कवि की 'अप्सरि' शीर्षक कविता में भी यह लोकोत्तर अनुभूति विद्यमान है।

धार के आर-पार में प्रेम संबंधी कविताओं की संख्या काफी है। इन सब कविताओं से गुजरते हुए यह अनुभव होता है कि आदेश्वर राव प्रेम के संबंध में छायावादी अनुभूतियों की ओर अधिक आकर्षित हैं। हिंदी कविता में छायावादी कवियों ने प्रेम संबंधी कविताएँ बड़ी मात्रा में रची हैं। छायावादी प्रवृत्ति के अधिकांश कवि प्रेम को एक ऐसा तत्त्व मानते हैं, जो मनुष्य को इस भौतिक-संसार से लोकोत्तर जगत और इसके आगे अध्यात्म की ओर ले जाता है। ऐसा मानना अस्वाभाविक होगा कि ये कवि भौतिक प्रेम को अनुभव नहीं करते होंगे अथवा दैहिक-प्रेम-आलंबनों के प्रति उनके मन में कोई आकर्षण नहीं रहा होगा। फिर भी यह देखने में आता है कि छायावादी कवियों में एक ऐसा अज्ञात आत्म-गोपन था, जिसके वशीभूत वे प्रेम जैसे तत्त्व का भौतिक संसार के परिप्रेक्ष्य में अधिक महत्त्व नहीं मानते थे। उनकी कविता में प्रेम का आलंबन अरूप अवस्था में है। प्रारंभिक चरण में वह भौतिक आकार लेता दिखता अवश्य है, लेकिन तुरंत ही रूप की सीमाओं के परे चला जाता है। बाद में तो वह लोकोत्तर सौंदर्य का स्वामी ही हो जाता है। कवि-प्रेमी उसके प्रति आकर्षित होता है, किंतु  उसे कभी भी प्रिया का सानिध्य सुख नहीं मिलता, उसके हिस्से में विरह आता है। यह विरह भी लोकोत्तर ही है, इसलिए छायावादी कवि हमेशा लोकोत्तर-विरह में जलता है। आदेश्वर राव की प्रेम कविताएँ बहुत गहरे स्तर पर इसी छायावादी प्रेम से प्रभावित हैं। इन कविताओं में कुटिल अलकों में उलझ जाने की चाह है (पृ. 25), उषा की लालिमा में नायिका के दैहिक सौंदर्य को देखने और उसकी मुस्कान में सत्व को भूल जाने की कवि-दशा है (पृ. 26), प्रेयसी को ऐसे इंद्रधनुष के रूप में देखने की आकांक्षा है, जो स्वयं कवि रूपी नीलघन मंडल में शोभित हो (पृ. 27), निशि के अँधियारे में सजनी को सुलाकर मधुर गीत लिखने की इच्छा है; लेकिन कवि न तो नायिका के रूपाकार को जानता है और न उसे उसकी कोई पहचान है। इसीलिए वह कहता है— "स्वप्र की अमराइयों में क्यों मुझे तुम अंक धरती?/हृदय तल पर कहो क्यों निज मधुर कोमल भार धरती/स्वर्ग के नव नंदनों में अधर मधु तुम क्यों पिलाती?/कौन तुम निज नाम कह दो लाज अपनी त्याग करती" (पृ. 30)। कहने की आवश्यकता नहीं, कि प्रेयसी से इतना अपरिचय कविता की आज की परंपरा से कोई मेल नहीं खाता। इसीलिए आदेश्वर राव की प्रेम से जुड़ी ये कविताएँ उस छायावादी धारा की प्रतिनिधि कही जा सकती हैं, जो साहित्य में छायावाद के पतन के बाद भी आज तक किसी न किसी रूप में बह रही है।

धार के आर-पार का कवि प्रकृति के प्रति भी आकर्षित है। वह कभी बादल का चित्रण करता है और कभी सागर का। कवि की दृष्टि में जलधर स्वयं पिघल कर ग्रीष्म के ताप से झुलसे हुए लोकों को सरसित करते हैं। उनका हृदय करुण सुधा रस से भरा हुआ है और यह सौभाग्य है कि हम बादलों में बस जाने के अवसर प्राप्त करते हैं (पृ. 78)। सागर को कवि लहराते हुए देखता है और उसे अनुभव होता है कि लहराता हुआ सागर थके हुए जीवन पथिकों के तन-मन को सहला रहा है। कवि ने संध्या के चित्रण में भी अनुकरणीय कल्पना से काम लिया है। वहाँ भी वह संध्या के मनोहर वातावरण से प्रभावित होता है तथा सिन्धु पुलिन पर टहलते हुए जीवन के बिखरे पलों को सहेजने का प्रयास करता है— "मनमोहक उस संध्या समय में/मानस में मैं उमंग भर कर/चला टहलने सिन्धु पुलिन पर/बिखरे जीवन पल समेट कर" (पृ. 80)। बादल, सागर और संध्या संबंधी ये कविताएँ  अनायास सुमित्रानंदन पंत, नागार्जुन और जगदीश गुप्त की इसी प्रकार की सौंदर्य मयी कविताओं का स्मरण जगा देती हैं। हिंदी  में बादल और समुद्र पर बहुत कम लिखा गया है। बादल पर सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ निराला ने की हैं। समुद्र पर जीवंत भावबोध वाली कविताएँ नागार्जुन ने रची हैं। आदेश्वर राव इन कवियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी प्रकृति संबंधी कविताओं में नवीन भाव-भंगिमाएँ भी खींच लाए हैं।

धार के आर-पार में दस कविताएँ ऐसी हैं, जिनका संबंध विभिन्न महान कवियों और जन-नायकों से है। इस प्रकार की कविताओं को सीधे-सीधे दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक भाग में वे कविताएँ आती हैं, जो महान कवियों से संबंधित हैं। इनमें सूर, तुलसी, जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत और बच्चन पर रची गई कविताएँ हैं। कवि ने इन सभी कवियों के प्रदेय को स्वीकार किया है तथा उनके प्रति समर्पण प्रदर्शित करते हुए उनका महिमा-गायन किया है। ये महान कवि भारत की आत्मा के प्रतीक हैं, विषपान करने वाले हैं, हा-हाकार करती जनता के पक्षधर हैं, शिथिल रक्त प्रवाह वाले पुरुषों में ऊर्जा भरने वाले हैं और इस जगत को औदात्य देने वाले हैं। कवि की दृष्टि में ये सभी कवि भारतीय साहित्य की गरिमा बढ़ाने वाले और अनेक संघर्ष झेलकर उसे अभिनंदनीय विशेषताएँ देने वाले भी हैं। कवि स्वयं इन कवियों से दृष्टि पाना चाहता है— "जिसने शिशु की क्रीड़ाओं में/बालकृष्ण की छवि देखी है/जिसने मनहर मधुर रूप में सुषमा लोकोत्तर देखी है/यमुना तट के लता कुंज में/गोपी माधव लीला देखी है/विरह विदग्धा गोप वधू के पीड़ा अंतर की अवलोकी/वही सूर की आँख चाहिए/मुझे सूर की आँख चाहिए/मन मधुकर की पाँख चाहिए" (पृ. 81)।

लोकनायकों में लालबहादुर शास्त्री तथा जयप्रकाश नारायण के संबंध में रची गई कविताएँ बहुत  प्रभावित करती हैं। चौधरी चरणसिंह, नंदमूरि तारक रामाराव, संजय गाँधी आदि को आधार बनाकर रचित कविताओं का औचित्य किसी भी पाठक की समझ से परे है। इनमें से कोई भी न तो लोकनायक था, न वास्तविक अर्थ में जनसेवक और न पूरी तरह ईमानदार। ये सभी अवसरवादी और कुर्सी प्रधान राजनीति के खिलाड़ी थे। इनकी महानता को प्रदर्शित करने वाली रचनाएँ कविता होने की शर्त को भी शायद ही पूरा करती हों! किसी कवि को व्यक्ति विशेष को कविता का विषय बनाते समय अत्यधिक सावधान, निर्भीक और कठोर होना चाहिए। राजनैतिक व्यक्तियों पर रची गई कविताओं में आदेश्वर राव कवि-कसौटी पर आंशिक रूप में ही खरे उतर सके हैं।    

पी. आदेश्वर राव ने भारतीय लोकतंत्र की दुरावस्था का जो चित्रण किया है, वह निश्चय ही हिंदी  कविता के कैनवस को विस्तृत करता है। वे स्पष्ट कहते हैं— "चुनाव के उस समरांगण में/विज्ञापन के रंग-ढंग से/प्रलोभनों के जाल बिछा कर/मतदाताओं को उलझा कर/नोटों से वोटों को भरकर/सत्ता को हाथों में लेकर/लागत को सौ बार बढ़ा कर/लोकतंत्र व्यापार बन गया" (पृ. 98-99)। इस कविता में आदेश्वर राव पुनः समकालीन कविता की जमीन पर खड़े दिखाई देते हैं। इस जमीन पर जमे रहना धार के आर-पार को प्रशंसा का पात्र बनाता है।

आदेश्वर राव विस्तृत अनुभव संसार के कवि हैं। उनके यहाँ शिल्प भी सौंदर्य-छटा बिखेरता मिलता है। इस सब के अलावा, जिस तत्त्व की अधिक चर्चा होनी चाहिए, वह है राव की भाषा। अपने समकालीन कवियों में आदेश्वर राव को संप्रेषणीय, सहज और अर्थ भरी भाषा के लिए सबसे अलग पहचाना जाएगा।   

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