देश के लिए (सुदर्शन मजीठिया)

 

देश के लिए

सुदर्शन मजीठिया

 

नेशनल पब्लिशिंग हाउस,

23, दरियागंज, नई दिल्ली-2

प्रथम संस्करण- 1990, पृष्ठ- 90, मूल्य- 32 रुपए

 

'देश के लिए' लोकशैली और परंपरित नाट्य शैली के मिश्रण से निर्मित व्यंग्य प्रधान नाटक है। इसका नायक आत्माराम संपूर्ण शासन सत्ता से टकराता है। वह अकेला है और उसके विरोध में नेता, सरपंच, पुलिस इंस्पेक्टर, सिपाही, ब्रोकर, सेक्रेट्री आदि दीवार की भाँति खड़े हैं। शासन आत्माराम का घर लेकर उसे महात्माजी का स्मृति-स्थल बनाना चाहता है। महात्माजी वर्षों पहले कभी उसके घर में आए थे। इतने वर्षों तक शासन को यह ध्यान नहीं आया कि महात्माजी के लिए किसी स्मारक की आवश्यकता है, किंतु वर्षों बाद अचानक खलबली मच गई। आत्माराम को घर खाली कर देने तथा शासन द्वारा प्रदत्त मुआवजा स्वीकार कर लेने का सरकारी पत्र भेज दिया गया। पत्र की भाषा इस प्रकार थी— "अंडर दि रिक्विजिशन एक्ट इट हैज बीन डिसाइडेड बाई दि गवर्नमेंट टु एक्वायर यौर हाउस सिचुएटेड ऐट माधोपुर विलेज इन दि पब्लिक इंटरेस्ट टु बी कनवरटैड ऐज़ महात्मा मैमोरियल। इफ यू हैव ऐनी ऑब्जक्शन प्लीज़ फाइल दि सेम विदइन सैवन डेज़ फ्रॉम दि डेट ऑफ रिसीट ऑफ दिस लैटर।" (पृ. 10)।

इस प्रसंग में नेता और सरपंच प्रारंभ से ही एक धाँधली करते हैं। वह यह, कि वे इस पत्र को ही सरकारी आदेश बताते हैं। आत्माराम जब इस धाँधली को नियम विरुद्ध बताता है, तो नेताजी अपने असली स्वरूप में आ जाते हैं। कहते हैं— "आत्माराम तुम बेवकूफ हो, सरपंच जी एक प्रैक्टीकल आदमी है। तुम्हारी सहमति असहमति का सवाल ही नहीं उठता। तुम कुछ भी लिख कर दो, होगा तो वही जो हम चाहेंगे।" (पृ. 11)। वास्तव में वही होता है। आत्माराम यह सोचता है कि वह कानून का सहारा लेगा किंतु  असफल रहता है। प्रारंभ में पत्रकार उसकी सहायता के लिए आते हैं, किंतु  वे भी सत्ता के हाथों बिक जाते हैं। आत्माराम विपक्ष के नेताओं पर विश्वास करके उनके पास जाता है, किंतु  वे भी कोई बड़ा राजनैतिक लाभ न देखकर पीछे हट जाते हैं। यहाँ तक कि वह अपनी जिस जीवन संगिनी, शीला को अपने संघर्ष का साथी समझता था, उसे भी स्वार्थी लोगों द्वारा अधिक आर्थिक लाभ के बदले बहका दिया जाता है। अंततः सब ओर से निराश और हताश आत्माराम अकेला खड़ा रह जाता है। उसके हृदय में क्षोभ जन्म लेता है। वह उस घर में आग लगा लेता है, जिसके लिए उसने पूरी सत्ता से संघर्ष मोल लिया था। इस आग में स्वयं आत्माराम का मुँह झुलस जाता है। फिर भी वह अपने घर को अपनी मर्जी के खिलाफ किसी को नहीं देना चाहता।

नाटक का कथानाक प्रतीकात्मक है। इसके सभी पात्र विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि चरित्र हैं। आत्माराम साधारण जनता का प्रतिनिधि है। अन्य सभी पात्र सत्ता, सत्ता के पुर्जों, सत्ता रूपी मशीन में पड़ने वाले तेल, सत्ता की मशीन की रखवाली करने वाले पहरेदार, सत्ता को बनाए रखने में सहायक शक्तियों आदि के प्रतिनिधि हैं। पूरे नाटक में सुदर्शन मजीठिया ने पात्रों के वर्गीय चरित्र को कुशलता से निभाया है। वे अपने पात्रों को सच्चाई और वास्तविकता से जोड़े रखने में सफल रहे हैं।

देश के लिए आधुनिक राजनीति और समाज की सच्चाई के दस्तावेजीकरण का हिस्सा कहा जा सकता है। आत्माराम के साथ जो कुछ हुआ, वह जनता के अनेक लोगों के साथ हो रहा है। जो लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन के रूप में प्रसिद्ध है, उसी लोकतंत्र में आत्माराम रूपी जनता से जीने का नैसर्गिक अधिकार छीना जा रहा है। जो संविधान, उसमें दिये मौलिक अधिकारों और राज्यों के लिए निर्धारित नीति-निदेशक तत्त्वों की सहायता से जनता के अधिकतम कल्याण का की गारंटी है, राज्यसत्ता उसे ही निष्प्रभावी बना डालने की कोशिश करती दिख रही है। राजनीति आम आदमी के धन, यहाँ तक कि उसके रक्त पर भी अपना अधिकार समझती है। सत्ता अपने को बनाये रखने के लिए आम आदमी से सब कुछ छीन लेने में भी नहीं हिचकती। दुर्भाग्य यह है कि आम आदमी के विरुद्ध यह षड्यंत्र राष्ट्रीय महापुरुषों, आद‌र्शों, सिद्धांतों, मूल्यों, राष्ट्रीय विकास, जन-कल्याण आदि के नाम पर किया जा रहा है।

नाटक में मुख्यमंत्री जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण पद पर कार्य करने वाला व्यक्ति कहता है— "आत्माराम जी, हमारा फर्ज है कि आज़ादी के बाद हम महात्माजी का नाम बनाए रखें। हमने तो राजधानी का नाम ही महात्मा नगर रखा है। इस प्रदेश के हर शहर की मुख्य सड़क का नाम महात्मा रोड होगा। इसके अलावा महात्मा बेकरी, महात्मा होटल, महात्मा रेस्तराँ, महात्मा ड्राईक्लीनर्स, महात्मा पान हाउस, महात्मा केश कतरनालय नामक व्यापारिक संस्थान भी खुले हैं।" (पृ. 53)। लेखक ने यहाँ राजनीति का नक़ाब पूरी तरह उतार दिया है। हमारे देश में आज यही सब हो रहा है। जिस गाँधी को हम आज़ादी मिलते ही दूध की मक्खी की भाँति उपेक्षित कर चुके थे, उसी महात्मा का नाम अब बड़ी-बड़ी सड़कों से लेकर छोटी-छोटी पुलियों तक पर चिपका रहे हैं। यह केवल इसलिए कि नेताओं को उनके नाम पर चुनाव की वैतरणी पार करने में सुविधा हो।

 नाटककार सुदर्शन मजीठिया ने राजनीति के उस कठोर तथा निर्दयी चरित्र को भी उजागर किया है, जो सत्ता के मद में जनता को अपने पैर की जूती से अधिक नहीं समझता है। जब आत्माराम मुख्यमंत्री से गिड़गिड़ाकर कहता है कि एक रारीब की आह लेकर वे किस देश की सेवा करेंगे, तो मुख्यमंत्री का टका सा जवाब होता है— "तुम अदालत में जा सकते हो, जनवाणी समाचार पत्र के पास जा सकते हो, विरोध पक्ष वालों से मिल सकते हो। मैं तुम्हारे ही शब्दों को दुहरा रहा हूँ... वक्त खत्म हो चुका है, तुम जा सकते हो।" (पृ. 55)। आत्माराम इस क्रूरता और दंभ का सामना करके भी यही सोचता है कि उसे संघर्ष जारी रखना चाहिए। उसकी दृष्टि विपक्ष की ओर जाती है। उसे अनुमान है कि जो विपक्षी नेता सरकार के हर अन्याय का विरोध करने तथा जनता के हितों के प्रवक्ता और रक्षक होने का दावा करते हैं, वे उसका घर बचाने के लिए अवश्य ही आगे आएँगे, किंतु  परिणाम क्या निकलता है, यह निम्नांकित संवादों में देखिए—

आत्माराम – मेरे मामले में आप क्या कर सकते हैं?

विपक्ष का नेता – इस मामले में तुम हमारी क्या सहायता कर सकते हो?

आत्माराम – मतलब?

विपक्ष का नेता – कितने आदमियों का इंतजाम कर सकते हो? कितने पैसे की व्यवस्था कर सकते हो?

आत्माराम – मुझसे कुछ नहीं हो सकता।

विपक्ष का नेता – तो घर ही बैठना था, कच्चे खिलाड़ी हो, जाओ लौट जाओ। (पृ. 61)

यही भारत की विपक्षी राजनीति का असली चेहरा है।

नाटककार ने पत्रकारिता जगत के यथार्थ को भी इस नाटक में प्रस्तुत किया है। पत्रकारिता से जुड़े लोग जन समस्याओं के प्रस्तुतीकरण और जनहित के लिए संघर्ष की बात करते हैं। जनवाणी का पत्रकार प्रारंभ में आत्माराम का साथ देने की घोषणा करता है— "मैं आपको न्याय दिलवाऊँगा।" (पृ. 37), किंतु पुलिस का इंस्पैक्टर पत्रकारिता के न्याय और फ्रीप्रेस के गुब्बारे की हवा निकाल देता है— "न्यूज़ प्रिंट सरकार से लेते हो, समाचार तुम्हें पुलिस कंट्रोल रूम से मिल जाते हैं और विज्ञापनों के लिए सरकार का मुँह ताकते हो, तुम्हारा अपना है ही क्या? और ऊपर से तुर्रा यह कि प्रेस फ्री है!" (पृ. 36-37)। अंत में, आत्माराम को न्याय दिलाने का वचन देने वाला जनवाणी समाचारपत्र सत्ता के हाथों बिक जाता है। संपादक आत्माराम को समझाने लगता है— "आप गलत तरह की जिद पकड़े बैठे हैं, सरकार से अपने पैसे सीधे कर लीजिए और शहर चले आइए।" (पृ. 57)। इतना ही नहीं जनवाणी के उस प्रतिनिधि को भी नौकरी से निकाल दिया जाता है, जिसने पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुसार असहाय आत्माराम का साथ देने का वचन दिया था।

नाटककार ने विदेशी पत्रकारिता को भी व्यंग्य का निशाना बनाया है। पश्चिमी पत्रकारिता के मन में यह भ्रम व्याप्त है कि वह खोजी पत्रकारिता के सहारे संसार भर में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी है। इसी पत्रकारिता के प्रतिनिधि पत्रकार आत्माराम के पास आकर अनेक प्रश्न पूछते हैं। आत्माराम उनका-उल्टा सीधा उत्तर देता है और वे उन्हें ही सही मानकर नोट करते रहते हैं। नाटककार इस प्रसंग में व्यंग्य के साथ-साथ हास्य की सृष्टि करने में भी सफल रहा है।

देश के लिए नाटक का नाट्य-शिल्प प्रयोगधर्मी है। साठोत्तरी नाट्य-रचना में लोक प्रचलित गायन शैलियों और नाट्य शैलियों को बहुतायत से कच्ची सामग्री के रूप में प्रयोग किया गया है। इसका कारण यह है कि नाटक लेखक शास्त्रीय रचना परंपरा में आ गई जड़ता को तोड़ना चाहता है तथा जनता से जनता की बातें जनता की अभिव्यक्ति शैली में करना चाहता है। नाटककार मजीठिया ने अपने इस नाटक में लोक प्रचलित 'कहो जी—सुनो जी' शैली का प्रयोग किया है। दो लोकगायक (कहोजी—सुनोजी) डफ बजाते हुए आते हैं और आत्माराम की कहानी एक दूसरे को सुनाते हैं। घटनाएँ होती रहती हैं। लोकगायक कहन-सुनन का प्रयोग करके उनके मध्य संबंध सूत्र बोते रहते हैं। नाटक आगे बढ़ता रहता है। अपनी इस प्रयोगशीलता के कारण यह नाटक नुक्कड़ नाटक शैली में भी मंचित किया जा सकता है। इसके मूल रूप में इसका मंचन पहली बार नटरंग द्वारा मेरठ में हुआ भी था।

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