सृजन-सुख तथा अन्य कहानियाँ (डॉ. अर्जुन शतपथी)

 

सृजन-सुख तथा अन्य कहानियाँ

डॉ. अर्जुन शतपथी

 

पराग प्रकाशन,

3/114. कर्ण गली, विश्वास नगर,

शाहदरा, दिल्ली-32

पृष्ठ-108, मूल्य-25 रुपए

 

अपने इस संग्रह की कहानियों के विषय में अर्जुन शतपथी ने एक पते की बात कही है। वे कहते हैं— "ये कहानियाँ एक मननशील अध्यापक के बहुशः घटे हुए जीवन का एक ऐसा टुकड़ा है, जिसमें सृजन सुख है और शोध, समीक्षा, आलोचना आदि से समय-समय पर विरति की मुक्ति है।" (दो शब्द)। फिर भी, पाठकों को ऐसा नहीं मान लेना चाहिए कि अर्जुन शतपथी का कहानी लेखन किसी विरति या रिक्ति से छुटकारा पाने के लिए ही संपन्न होता है। हो सकता है, वे शोध और आलोचना के समय कहानियाँ न लिखते हों, किंतु  जब कहानियाँ लिखते हैं, तो उनका मन अपने लेखन में पूरी तरह रमता है। मैं स्वयं उन्हें एक सजग और जिम्मेदार कहानी लेखक के रूप में जानता रहा था। वे अपने पत्रों एवं बातचीत में समय-समय पर इस बात को स्वीकार करते थे कि साहित्य-रचना विरति से मुक्ति का नहीं बल्कि, उससे परे का काम है।

उदाहरण के लिए शतपथी के इसी संग्रह की शीर्षक कहानी को लिया जाए, जो बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से सृजन-सुख और उसके आधारभूत तत्त्वों की व्याख्या प्रस्तुत करती है। कहानी में चिकित्सा क्षेत्र से सूत्र ग्रहण करके एक अदृश्य मिथक गढ़ा गया है, जो धरि-धीरे आकार लेते हुए सृजन की आवश्यकताओं, स्वरूप, विविधताओं और प्रभाव को प्रत्यक्ष करता चलता है। यह कहानी स्वयं में अर्जुन शतपथी की उत्तरदायी रचना-धर्मिता का प्रमाण है तथा उनके कहानीकार के प्रति पाठक को आश्वस्त करती है।

संग्रह की पहली कहानी 'स्वाद' आधुनिक नगरीय व्यवस्था तथा पुलिस तंत्र की लोलुपता और हृदयहीनता के माध्यम से उस परिवेश को प्रस्तुत करती है, जिसमें पारस्परिक असम्पृक्ति, आत्मकेंद्रितता और स्वार्थ पूरी तरह भरा हुआ है। कहानी का नायक आरपुटी शहर में आकर अपने देहातीपन से पूरी तरह मुक्त होना चाहता है, किंतु वह जिस नगरीकरण के मोह में गाँव छोड़ता है वही उसका सब कुछ लूट लेता है। यहाँ तक कि उसकी जवान लड़की चंद्रा को भी निगल जाता है। वहाँ न स्टेशन मास्टर उसकी मदद करता है, न ठेकेदार और न पुलिस— "साला क्या बकबक करता है! पंद्रह साल की लड़की गुम हो गई। अरे जा, जा... शाम तक वापस आ जाएगी। जवान लड़की को क्यों लाया था शहर, पैसे कमाने? शहर की परी बनाने? साला पुलिस को बेवकूफ बनाता है।" (पृ. 16)। आजादी के बाद भारत में ऐसे ही चरित्र वाला नगरीकरण तेजी से बढ़ा है और आम जनता को रात-दिन आरपुटी बना कर लूट रहा है।

'कला की प्रेरणा' सच्ची कला और सामंती संस्कारों की टकराहट से उत्पन्न कहानी है। भारतीय जीवन में लंबे समय तक कला साधकों को सम्मान नहीं मिला। कला सजावट, आनंद और उपभोग की वस्तु तो रही, किंतु सामंती व्यवस्था ने कभी उसे सम्मानजनक दृष्टि से नहीं देखा। लेखक कला की इसी दशा का उ‌द्घाटन करता है। साथ ही साथ यह घोषणा भी करता है कि "कला की कोई जाति नहीं होती। कला का उपासक सामाजिक जाति धर्म को खोकर ईश्वर पुत्र हो जाता है।" (पृ. 26)।

इस संग्रह की, पाठक पर मजबूत पकड़ बना सकने वाली कहानी है— 'मत्थु बनाम मथुरा प्रसाद'। इस कहानी का मूड यथार्थ की गहरी लेखकीय-समझ को सामने लाता है। कहानी शासन तथा राजनीति के आम आदमी के विरुद्ध बने गठबंधन को सरे बाजार नंगा करती लगती है। इस कहानी में आग लग जाने की एक घटना राजनैतिक विवाद का एक कारण बन जाती है। उसी संदर्भ में मत्थु बनाम मथुरा प्रसाद की खोज शुरू हो जाती है। प्रशासन उसका हुलिया तैयार करता है। सत्ताधारी और विपक्षी विधायक आरोपों-प्रत्यारोपों में उलझ जाते हैं। इस विवाद में पत्रकार भी शामिल हो जाते हैं। इसका प्रभाव यह होता है कि प्रशासन का आतंक निरंतर फैलने लगता है। फिर भी मथुरा प्रसाद पुलिस के हाथ नहीं लगता। मथुरा प्रसाद की हत्या की आशंका चारों ओर दौड़ने लगती है। अत्याचार से तंग जनता मथुरा प्रसाद का आदम कद फोटो लेकर प्रशासन के विरुद्ध जुलूस निकालती है, "ट्रकों और जीपों में नारे लगाने वाले खचाखच भरे थे, पैदल चलने वाले नेताओं का अनुसरण कर रहे थे, माइक की आवाज़ हलचल मचा रही थी, नारे पर नारे गूँज रहे थे—"शहीद मथुरा प्रसाद जिंदाबाद। राज्य सरकार मुर्दाबाद! पुलिस जुल्म बंद हो। हत्यारी सरकार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए।" (पृ. 35)।

मथुरा प्रसाद न शहीद हुआ था, न उसकी हत्या की गई थी। वह तमाम सरकारी खोजबीन और आतंक के बावजूद अपना रिक्शा लिए उसी शहर में सवारियाँ ढो रहा था। उसका जीवन अपने ढंग-ढर्रे पर चल रहा था। यहाँ तक कि उसे अपने जिंदाबाद होने का अहसास भी नहीं था। जब जुलूस निकला, तो वह भी जिज्ञासावश उस ओर बढ़ा, "दूर से झाँकी में कुछ-कुछ अपनी तस्वीर का अहसास किया था। झाँकी के पास जाने को कूद पड़ा, पर पुलिस के गार्ड ने रोक दिया। एक सिपाही ने डंडा चला दिया। पीछे हट कर वह जुलूस में शामिल हो गया। जोश में आकर मत्थु ने भी जोर-जोर से नारे लगाए— "शहीद मथुरा प्रसाद जिंदाबाद।" (पृ. 35)। इस देश की जनता की यही नियति है। हमारे समय के यथार्थ का इतना सटीक विश्लेषण इस कहानी को हिंदी की उल्लेखनीय समकालीन कहानियों में जगह देने के लिए पर्याप्त है।

'छुतहा भात' मृत्यु बोध पर भूख की विजय की कहानी है। रत्नी और मंशा निरंतर झगड़ते हैं, किंतु भूख उन्हें ऐसी स्थिति में ला पटकती है, कि दोनों पोते की मृत्यु हो जाने के बावजूद भात खाते हैं तथा एक जैसे तर्क गढ़ कर एक दूसरे की बातों का मौन समर्थन करते हैं। कहानी सुररियलिज़म की ओर तब बढ़ती है, जब वृद्ध दंपती खा-पी चुकने के बाद पोते के गम में छाती पीट-पीटकर रोने लगते हैं।

'धुँधलका' वैयक्तिक मनोविज्ञान प्रधान कहानी है। इसी प्रकार 'मृत्युबोध' भी ऐसे व्यक्ति के मनोविज्ञान को ही प्रस्तुत करती है, जो पत्नी, पुत्र, समाज, आयु, संस्कार यहाँ तक कि मृत्यु के साथ भी समझौता नहीं करता। वह अपने में डूबा हुआ जीवन की विवशता भोगता रहता है। 'लारमा' ऐसी नारी के मनोवैज्ञानिक चरित्र को दिखाती, है जो अपने देवर को माँ की भाँति असीम प्यार से पालती है और जब उसके जीवन के सभी सहारे चुक जाते हैं, तो उसी को अपने पति के रूप में अपना लेती है। यह कहानी अपने परिवेश और लारमा के जीवन में आए  उतार चढ़ावों के प्रभावशाली चित्रण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बन गई है। अर्जुन शतपथी ने इसमें भाषा के आश्चर्यजनक प्रयोग भी किए हैं। हिंदी के मुहावरे को उड़िया की चाशनी से और आकर्षक बनाने का कथाकार का प्रयास प्रशंसनीय है।

'धड़' इस संग्रह की ऐसी प्रतीकात्मक कहानी है, जो आधुनिक समाज के वैचारिक खोखलेपन को चित्रित करती है। आजकल हर क्षेत्र में धड़-ही-धड़ नजर आते हैं। सिर पूरी तरह अनुपस्थित हैं। कला हो या अन्य कोई क्षेत्र, सिर का जैसे कोई काम ही नहीं। ऐसा लगता है कि अब हमारे पास केवल धड़ बचा है। कहानी का नायक अपनी पत्नी को लिखे पत्र में ठीक ही कहता है— "मैं बिल्कुल ठीक हूँ, तुम लोग मेरी चिंता ना करो, यह समाज बेसिर है, इसका दिमाग नहीं है, सिर्फ धड़ बचा है।" (पृ. 67)। इसी सिरहीन समाज के दूसरे रूप को 'प्रतीक्षा' तथा 'गिरगिट' कहानी प्रत्यक्ष करती हैं। जो समाज केवल धड़ बनकर जीवित रहता है, उसी के सदस्य गिरगिटिया ढंग से चारों तरफ दौड़ते हैं।

इस संग्रह की 'पराजय' कहानी अपने व्यक्तित्व के लिए अतिरिक्त रूप से सचेत व्यक्तियों पर चोट करती है। यह बताती है कि किस प्रकार कुछ लोग अपने हर कार्य के पीछे परोक्ष अथवा अपरोक्ष स्वार्थपूर्ति या आत्मप्रदर्शन का उद्देश्य लिये होते हैं। प्रगति देवी सुमित्रा को सहारा देती है, किंतु  बदले में अपने उपकार को भुनाना नहीं भूलती। जब भी कोई उससे मिलता है, तो उससे यह जरूर कहती है कि "बेचारी का इकलौता बेटा है, पति को तब खोया, जब बच्चा पेट में था। लड़का आजकल किसी शहर में रहता है। बेचारी को पता नहीं। वह भीख मांगती फिरती थी। एक दिन भटकती हुई मेरे आँगन में आई, तो मैंने उसे अपने यहाँ रख लिया।" (पृ. 85)। यह वही प्रगति देवी है, जिसने कभी भिखमंगी सुमित्रा के कपड़े इसलिए जलवा दिए थे कि उसका संस्कार भी हो जाए और वह अतीत की परछाइयों से भी मुक्त हो जाए।

'अंधकार की सीढ़ी' स्त्री मन की अदम्य व्याकुलता को प्रकट करते हुए भी विवेकहीनता और काफी कुछ मानसिक विकृति का प्रदर्शन करती है। रहिता एक गंभीर दबाव के कारण व्याकुल हो जाती है और अपने ही बच्चे का गला दबाने की कोशिश करती है। जब उसे यह पता चलता है कि न उसे टी.बी. है, न कैंसर तो उसके पास अपने किए के लिए पछतावे के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहता। इसके विपरीत 'रेत का पहाड़' कहानी की मोरेसा आत्मिक-बल के सहारे जीवन का मुकाबला करने का साहस प्रदर्शित करती है। यहाँ तक कि वह अगली शताब्दी तक को एक निराला मानव भेंट करना चाहती है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आंध्र के लोकगीत (डॉ. कर्ण. राजशेषगिरि राव)

कन्नड साहित्य का वृहद् इतिहास (लेखक - त.सु. श्यामराव एवं मे. राजेश्वरय्या, हिंदी रूपांतर - डॉ. मे. राजेश्वरय्या)

असमिया लोक साहित्य की भूमिका (भूपेन्द्रनाथ रायचौधुरी)