बाकी सब कुशल है (नीर शबनम)

 

बाकी सब कुशल है

नीर शबनम

 

अरविन्द प्रकाशन,

2/सी-6, सेक्सरिया कंपाउंड,

सखाराम लांणेकर मार्ग, परेल

मुम्बई- 400012

प्रथम संस्करण- 1992, पृष्ठ- 124, मूल्य- 90 रुपए

 

'बाकी सब कुशल है' में नीर शबनम (कुमारी निर्मला शंकर राव चाँदेकर) की कुल 12 कहानियाँ हैं। इनमें से चार कहानियाँ युद्ध को केंद्र में रखकर रची गई हैं। किसी एक ही संकलन में एक साथ चार कहानियाँ युद्ध के विषय में विद्यमान हैं— इससे यह पता चलता है कि लेखिका युद्ध की समस्या को वर्तमान लेखन के लिए एक गंभीर चुनौती मानती है। साठोत्तरी कथा साहित्य में अनेक ज्वलंत विषयों तथा समस्याओं पर लेखन कार्य किया गया है। इस दौर में सामाजिक यथार्थ, राजनीति और अस्तित्व को लेकर बहुत अधिक मात्रा में उपन्यासों और कहानियों की रचना की गई, किंतु जहाँ तक युद्ध का प्रश्न है, उसे कम ही लोगों ने छुआ है। कथा साहित्य की अपेक्षा कविता में युद्ध कुछ अधिक आया है। नौवें दशक में अवश्य ही युद्ध को कुछ लेखकों ने मनुष्य के विरुद्ध एक हिंसक स्थिति के रूप में देखकर अच्छी रचनायें की हैं। नीर शबनम ने अब एक साथ इतनी युद्ध विरोधी कहानियाँ लिखकर अपने समय के हिंदी कथा साहित्य के एक निर्बल पक्ष को सबल बनाने का प्रयास किया है।

इस संग्रह में युद्ध के प्रभाव को दिखाने वाला पहला कथानक 'वह गुलमोहरी शाम' शीर्षक कहानी में है। इसमें कथा नायक को एक ऐसी फ्रांसीसी स्त्री मिलती है, जो एक सैनिक से प्यार करती थी। दोनों का विवाह हुआ, किंतु छः महीने बाद ही युद्ध छिड़ गया और सैनिक उस युद्ध में चला गया। उसके बाद वह कभी नहीं लौटा। स्त्री के माता-पिता बचपन में ही मर चुके थे। अब वह एकदम अकेली और निस्सहाय हो गई। उस पर जर्मन जासूस होने का आरोप लगाकर उसे जेल में डाल दिया गया, जहाँ एक अधिकारी ने उस पर बलात्कार किया। जेल से निकल कर उसने कुली का काम करना चाहा, किंतु असफल रही। अंततः उसे ऑक्सेल की रखैल बन जाना पड़ा। वह ऑक्सेल से विवाह करना चाहती थी, किंतु ऑक्सेल इसके लिए तैयार नहीं हुआ। स्त्री घृणा से भर उठी तथा उसने ऑक्सेल की निशानी को गर्भ में ही नष्ट कर देना चाहा। उसकी यह कोशिश भी बेकार गई। समय से पूर्व जन्म लेकर एक लुंज-पुंज पुत्र उसकी गोद में आ गया। अब वह उसे जीवित रखने के लिए अपना शरीर बेचने लगी। उसके जीवन में एक दूसरा पुरुष आया, जिसने चाहा कि वह अपने पुत्र की हत्या कर दे, ताकि आनंद के बीच में आने वाली बाधा समाप्त हो जाए। इस घटना से स्त्री का मातृत्व घायल नागिन की तरह उठ खड़ा हुआ और उसने उस व्यक्ति को लताड़ते हुए कहा, "बंद कर बकवास कमीने × × × × आइंदा फिर कभी इधर का रुख मत करना समझे? हरामी की औलाद × × × × गिन लो तुम्हारे महीने भर के पैसे और दफा हो जाओ यहाँ से।" (पृ. 17)। इसके बाद लियन नाम की यह स्त्री अपने लुंज-पुज बच्चे को बार-बार चूमने लगी।

युद्ध से जुड़ी दूसरी कहानी है 'सर्प दंश'। इसका नायक जॉय जब से वियतनाम युद्ध से लौटा है, तभी से मानसिक रूप से परेशान है और बार-बार नींद में बड़बड़ाता है— "मैंने उसे मार डाला आह! मैंने उसे मार डाला। रोको-रोको हेनरी फायरिग बंद कर दो।" (पृ. 37)। जॉय बहुत कुशल योद्धा था। वह जेनेट से बहुत प्यार करता था। उसे युद्ध और मृत्यु से कभी भय नहीं लगता था। वह सच्चा देशभक्त सैनिक भी था और मानता था कि सच्चे देशभक्त सैनिक को वैयक्तिक भावनाओं से मुक्त होना चाहिए (पृ. 38)। युद्ध में लड़ते हुए उसने वीरता और शौर्य का प्रदर्शन किया। युद्ध से लौट कर वह हमेशा उत्साह में रहता था, किंतु  जब से वियतनाम के युद्ध से लौटा है, तभी से पता नहीं उसे क्या हो गया है। उसकी पत्नी और बच्चे उसके बदले हुए व्यवहार से परेशान हैं। उसका बेटा जार्जी अपनी माँ से कहता है, "क्या तुम समझ नहीं पा रही हो कि पिताजी कितने अस्वस्थ हैं, परेशान हैं, उनसे हमें वैसा ही कोमल व्यवहार करना चाहिए, जैसा एक बच्चे के साथ सहृदयता से किया जाता है। उन्हें इस समय प्यार की जरूरत है माँ। उनसे पूरी हमदर्दी रखो। मुझे लगता है कि इन पर कोई बहुत बड़ा मानसिक आघात हुआ है।" (पृ. 39)।

सचमुच जॉय पर मानसिक आघात हुआ था। वियतनाम के युद्ध में उसने टॉम को मारा था। वह एक घायल वियतनामी नौजवान था, जो अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध लड़ रहा था। टॉम की प्रेमिका रोजेना भी अपने प्रेमी को बचाते हुए घायल हो गई थी। तब उसने मेजर जॉय से एक गोली मार देने की प्रार्थना की थी और उसने रोजेना पर पिस्तौल दाग कर उसे टॉम से मिलने के लिए मुक्त कर दिया था। इस घटना क्रम में रोजेना ने जॉय को मनोवैज्ञानिक स्तर पर इतना प्रभावित कर दिया था कि वह उसमें अपनी बेटी पामेला को देखने लगा था। युद्ध भूमि में उसे लगा था कि रोजेना नहीं, बल्कि उसकी बेटी पामेला ही अपने प्रेमी की लाश गोद में लिए बैठी रो रही है। अब जब वह घर आ चुका है, तब उसे पामेला में रोजेना दिखाई देती है। वही रोजेना, जिसे उसने मृत्यु दी थी। यही जॉय की व्याकुलता का रहस्य है। यह व्याकुलता केवल उसी में नहीं, दूसरे लागों में भी है। कैथी का पति भी इसी व्याकुलता से गुजर रहा है; इसीलिए तो उसकी स्थिति भी जॉय जैसी है।

युद्ध संबंधी तीसरी कहानी है, 'जड़ों की गंध'। जब इराक और अमेरिका (अन्य कई देश भी अमेरिका के साथ थे) के बीच युद्ध होता है, तो एक भारतीय सिविल इंजीनियर अजिताब अपनी ईराकी पत्नी नसरीन को वहीं छोड़कर भारत लौट आता है। उसने प्रारंभ में नसरीन को भी ईराक छोड़ देने के लिए मनाया था, किंतु  नसरीन ने साफ इंकार कर दिया था। युद्ध बंद होने पर, जब अजिताब फिर से बगदाद लौटता है, तो वहाँ उसे उसका फ्लैट तो मिलता है, जबकि नसरीन को वह खो देता है। नसरीन उसे अपमानित करके हमेशा के लिए छोड़कर चली जाती है।

युद्ध की समस्या को उभारने वाली चौथी कहानी 'मास्टर पीस' है। इसमें एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण है, जिसका जीवन युद्ध ने पूरी तरह नष्ट कर डाला था। अब्राहम कैसल वियतनाम का सामान्य, किंतु संपन्न नागरिक था। वह अपनी पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराता है। जिस रात उसकी पत्नी पुत्री को जन्म देती है, उसी रात अस्पताल पर बमबारी हो जाती है। चारों ओर बच्चों और बड़ों के शव पतंगों की तरह इधर-उधर उड़कर जमीन पर छितरा जाते हैं। अब्राहम की पत्नी मर जाती है। उसकी पुत्री एक ऐसी स्त्री को मिल जाती है, जिसका बच्चा बमबारी में मर गया था, किंतु  वह इस तथ्य से अनजान थी और अब्राहम की पुत्री को ही अपनी संतान समझ रही थी। मेटून इस तथ्य को जानती है, किंतु  फिर भी वह उस स्त्री की मानसिकता और बच्ची के भविष्य के विषय में सोच कर चुप रह जाती है। दूसरी ओर अब्राहम अपनी पत्नी और संतान के वियोग में विक्षिप्त हो जाता है। जीवन के अंतिम क्षणों में अब्राहम अपनी बेटी से मिलता है, किंतु  मौत के मुँह में जाते समय भी वह इस तथ्य को जान पाया था या नहीं— यह किसी को नहीं पता। उसे मृत्यु से कुछ क्षण पहले ऐन निकाल्सन की पेंटिंग को देखकर यह अनुभूति अवश्य होती है कि उसमें चित्रित आकृति उसकी बेटी की है; इसीलिए वह निकाल्सन को दुलारना चाहता है।

युद्ध से जुड़ी ये चारों कहानियाँ पाठक के मन को अनेक प्रश्नों से झिंझोड़ डालती हैं। 'वह गुलमोहरी शाम' स्त्री जीवन पर युद्ध के ऐसे प्रभाव को दर्शाती है, जो उन्हें नर्क-कुंड में धकेल देता है। युद्ध में जो सैनिक मारे जाते हैं, उनकी विधवाएँ जीवन की गाड़ी खींचने के लिए किस प्रकार यौन-शोषण का शिकार होती हैं और किस प्रकार वेश्या-वृत्ति के मार्ग पर जाने को विवश होती हैं, यह इस कहानी से पता चलता है। इससे भी अधिक यह कहानी स्त्री-पुरुष संबंधों के उस घिनौने यथार्थ को प्रकट करती है, जिसमें पुरुष कुछ पैसों के बदले संपूर्ण स्त्रीत्व को खरीद लेता है और अपने स्वामित्व के अहंकार में इतना स्वार्थी हो जाता है कि एक माँ पर उसके विकलांग बच्चे की हत्या करने पर दबाव डालता है— "मेरी शामें इस चमगादड़ के लिए खराब न करो, मेरा पैसा बर्वाद न करो, इसके रिरियाते रहते मैं तो तुम्हें छूने से रहा, अजीब उबकाई आने लगती है। इस साँप के पिल्ले को पहले खत्म करो। तुम परेशान क्यों हो? बड़ा आसान काम है, गोलियाँ लाने का काम तुम मुझ पर सौंप दो, दूध में मिलाया और बस!" (पृ. 17)।

युद्ध के संबंध में बहुत बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर युद्ध का उद्देश्य क्या है— विश्वशांति ? देशभक्ति? मानवाधिकारों की रक्षा? या फिर किसी तानाशाह अथवा साम्राज्यवादी मस्तिष्क की मानसिक विकृति? जिस युद्ध को बड़ा महिमा-मंडित किया जाता है, क्या वह सचमुच उस महिमा के योग्य है? हर युद्ध देशभक्ति अथवा विश्वशांति का उन्माद उत्पन्न करके लड़ा जाता है और हर युद्ध में समझौते की मेज पर बड़े-बड़े घोषणा-पत्र तैयार होते हैं, जिनमें विनाश की दाहक भयावहता को भुलाकर मैत्री की कसमें ली जाती हैं। ऐसे में किसी के भी मन में युद्ध को लेकर सवाल उठ सकता है 'सर्प दंश' कहानी में बहुत ठीक कहा गया है— "इस वियतनाम के युद्ध के समय हमें स्वयं यह नहीं मालूम कि हमसे युद्ध क्यों करवाया जा रहा है? हम जो कर रहे हैं, वही सही है—ऐसा हम अपने मन को समझा नहीं पा रहे थे ऐसी स्थिति में हमें लड़ने के लिए बाध्य करना हमें पशु बनाना है। हम अपराध भावना से ग्रस्त हैं। आत्मग्लानि हमें खाये जा रही है।" (पृ. 42)।

यह आत्मग्लानि केवल पीड़ित ही नहीं करती, बल्कि सैनिकों से बहुत कुछ छीन लेती है। अपराध बोध से युक्त सैनिक अपने बच्चों, अपनी पत्नी तक से सामंजस्य बैठाने योग्य नहीं रहते। इस बिंदु पर युद्ध अपने में एक ऐसा घातक हथियार बन जाता है, जो आक्रमण झेलने वाले के साथ-साथ आक्रमणकारी को भी क्षत-विक्षत कर डालता है। 'सर्पदंश' में यही होता है, "जेनेट लगता है, हमने अपने पतियों को खो दिया है। हाँ इस युद्ध की विभीषिका ने उन्हें हमसे छीन लिया है। जेनेट दुश्मनों पर वार करते-करते उसी तलवार से स्वयं वार करने वाला ही घायल हो जाए ऐसी दुधारी तलवार है युद्ध।" (पृ. 43)। युद्ध की इससे अधिक सच्ची और खुली परिभाषा भला और क्या हो सकती है!

जो लोग युद्ध में भाग नहीं लेते, उनके बीच स्थाई दरारें उत्पन्न करने का काम भी युद्ध करता है। शांतिकाल में व्यक्ति के मन में देश, जाति, धर्म, क्षेत्र आदि की बातें नहीं आतीं, किंतु जब युद्ध होता है, तो व्यक्ति के मन में सबसे पहले एक देश जन्म लेता है। यह ऐसा देश होता है, जिसकी रक्षा के लिए किसी दूसरे देश का विनाश आवश्यक बन जाता है। कई बार संयोगवश व्यक्ति ऐसे युद्धग्रस्त देश में होता है, जहाँ वह रोजी-रोटी की तलाश में गया होता है, लेकिन युद्ध काल में वहाँ भी उसके मन में एक देश जन्म लेता है। यह ऐसा देश होता है, जहाँ व्यक्ति युद्धग्रस्त देश से भागकर पहुँचना चाहता है। यह दशा कहीं अधिक संकट भरी होती है; क्योंकि इसमें फँसा व्यक्ति भीतर से पलायनवादी होते हुए भी देशभक्ति के आदर्श, देश-प्रेम, जड़ों से जुड़ने के उत्साह आदि से बना मुखौटा पहन लेता है। इतना ही नहीं, मौत उसे इतना डरा देती है कि वह अपनी पत्नी तक को छोड़कर अपने देश (?) लौट आता है। युद्ध उसके दाम्पत्य को हमेशा के लिए लील जाता है। 'जड़ों की गंध' कहानी में अजिताब भारतीय है और नसरीन इराकी। अजिताब जान बचाने के लिए भारत आना चाहता है और नसरीन ईराक नहीं छोड़ना चाहती। दोनों के बीच देश और जड़ों से जुड़ाव का झगड़ा इतना बढ़ता है कि वे हमेशा के लिए एक दूसरे को खो देते हैं। नसरीन कहती है— "यह रहा तुम्हारा घर, तुम्हारी दौलत, तुम्हारा फर्नीचर, वह सब कुछ, जो तुमने खरीदा था, जिसे तुम अपना कहते थे, तुम्हारे सुपुर्द करने ही मैं आज यहाँ आई हूँ।" (पृ. 67)। दाम्पत्य नष्ट करने वाला युद्ध मनुष्य से और क्या नहीं छीन सकता? सब कुछ छीन सकता है--- माता-पिता, मित्र, पत्नी, बच्चे, घर, सभी कुछ और अंत में व्यक्ति की वह चेतना भी, जिसके बल पर व्यक्ति समाज से जुड़ता है, परिवेश से जुड़ता है, वस्तुओं से जुड़ता है, अपने आप से जुड़ता है। युद्ध आदमी की संवेदना भी छीन लेता है। फिर बचता है एक ऐसा आदमी, जिसकी जगह सामान्य जीवन जीने वाले समाज में न होकर पागलखाने में होती है। युद्ध का लक्ष्य ही है इस समाज को श्मशान और पागलखाना बना डालना।

'नीर शबनम' के इस संग्रह की शेष आठ कहानियाँ अलग-अलग प्रभाव छोड़ने वाली है। 'अन्वेषण' आध्यात्मिक स्तर पर मनुष्य की आत्मखोज की कहानी है। 'केंचुल' ऐसी रोमानियत प्रधान कहानी है, जिसमें नारी मनोविज्ञान और उसके भावुक चरित्र को कुशलता से चित्रित किया गया है। 'भाव जो न पढ़ सका' भी रोमानियत लिए हुए है। यह प्रेम के संदर्भ में स्त्री के बदले पुरुष के चरित्र को दिखाती है। इन दोनों कहानियों में यथार्थ की दृष्टि से केंचुल अधिक प्रभावित करती है; क्योंकि जब निर्मला के मन से पुराने प्रेम-स्वप्न की केंचुल उतर जाती है, तो वह अपने जीवन के यथार्थ को स्वीकार करके सहज हो जाती है तथा सचीन्द्र को पत्नी का प्यार देने लगती है। 'चित्र एक सूरज का' कहानी के माध्यम से लेखिका ने मानवतावादी आदर्श स्थापित करने का प्रयास किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कहानी किसी विशेष परिस्थिति में, किसी विशेष उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है। इसीलिए कहानी के शिल्प की दृष्टि से यह अपेक्षाकृत एक कमजोर कहानी है। तथ्य की दृष्टि से भी इस कहानी की बनावट सजग पाठक को प्रभावित नहीं करती। इस कहानी में कला और सौन्दर्य के संबंध में जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है, बस वही थोड़ा आश्वस्त करता है— "सौंदर्य तो देखने वाले की दृष्टि में होता है। आखिर कला है क्या? या तो आर्टिस्ट के सोचने का ढंग या फिर दर्शक के देखने का अंदाज, बस।" (पृ. 46)।

'वंशबीज' में लेखिका ने बंगाल के सामंती परिवेश, पुरुष सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था, स्त्रियों की हीन दशा और कन्याओं को जन्म लेते ही मार डालने जैसी बुराइयों को आधार बनाया है। यह कहानी अपने प्रभाव में और अपनी बुनावट में एक अच्छी कहानी की शर्तों को पूरा करती है। 'जसुमति' जिस योजनाबद्ध ढंग से कुसंस्कारों में जकड़ी सामंती व्यवस्था की नींव पर प्रहार करती है, वह कहानी लेखिका के कौशल का प्रमाण है। 'दुराव' कहानी एक ओर तो मराठी संस्कृति का दिग्दर्शन कराती है, दूसरी ओर चारित्रिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। एक आदिवासी लड़की कैसे एक पुरुष को जीवन भर अपनी आस्था का विषय बनाये रखती है और कैसे शिक्षित समाज का एक पुरुष भावुक होते हुए भी व्यावहारिकता और सांसारिकता के दबाव में आ जाता है, यह इस कहानी में बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से चित्रित किया गया है। 'लाल किला' संस्कारों की टकराहट और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव को दिखाती है। नवाबी शान शौकत मिट्टी में मिल जाने पर भी एक व्यक्ति नवाबी संस्कारों का दास बना रहता है। यहाँ तक कि अपनी पुत्रियों तक को उसकी भेंट चढ़ाने के लिए तैयार हो जाता है— "मैं अहद करता हूँ हक़ीम साहब कि अगर मौत से पहले मैं इनके हाथों में मेंहदी न रचवा सका, तो... तो पूरी हवेली को आग लगवा दूँगा और बेटियों समेत ज़िन्दा इस घर में ढेर हो जाऊँगा। मैं इस जहाज का कप्तान हूँ। डूबते हुए जहाज को किनारे पर लाकर इसलिए खड़ा न कर जाऊँगा कि इसके बाशिन्दे चूहों की तरह इधर-उधर बिखर जायें।" (पृ. 96)।

भारतीय समाज में कभी नवाबी और सामंती संस्कार इसी प्रकार के हुआ करते थे। बेटियाँ ता-जिंदगी बिन ब्याही रह जाती थीं, किंतु  नवाबी अहंकार उन्हें साधारण परिवारों में ब्याहने या स्वेच्छा से जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं देता था। इस कहानी में भी जब जमाल साहब की बेटी सईदा खुदकुशी कर लेती है, तो उसे उसकी मौत का मलाल होने के बदले यह खुशी होती है कि वह किसी के साथ भागी नहीं थी— "तो फीरोज से कहो उसकी लाश लाकर मय्यत की तैयारी करे। या खुदा, बच्ची ने बदनामी से बचा लिया मुझे। मेरी आबरू रख ली खुदारा! (पृ. 100)। इस बाप को बदनामी का इतना डर है कि वह बड़ी सहजता से अपनी ही बेटी की लाश को न पहचानने का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है। लाश पहचानने से भी उसकी इज्जत धूल में मिल जाने का खतरा था। इस संग्रह की शीर्षक कहानी 'बाकी सब कुशल है' ग्रामीण जीवन और नगरीय व्यवस्था के यथार्थ चित्र उकेरती लगती है। शहर आर्थिक समृद्धि के बावजूद तमाम विडंबनाओं के शिकार हैं और गाँव तमाम अभावों के बावजूद मानवीय संबंधों की रसमयता से युक्त हैं। जीवन की ऊष्मा आज भी गाँवों में बाकी है। दो सभ्यताओं का यह अंतर इस कहानी को विशिष्ट स्तर प्रदान करता है।

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