चित्रप्रिया (अखिलन, अनुवादक : डॉ. के.ए. जमुना)
चित्रप्रिया
अखिलन
अनुवादक
: डॉ. के.ए. जमुना
राजपाल
एण्ड संस
कश्मीरी
गेट, दिल्ली
द्वितीय
संस्करण- 1980, पृष्ठ- 311, मूल्य- 35 रुपए
अखिल
तमिल भाषा के ऐसे लेखक हैं, जिनकी कृतियाँ साधारण जीवन के
यथार्थ को प्रस्तुत करती हैं और विभिन्न वर्गों के चरित्र में छिपे अंतर्विरोध को
प्रस्तुत करके उन मोर्चों की तलाश करती हैं, जिन पर पहुँचकर
विषमताओं और बुराइयों के विरुद्ध लड़ा जा सकता है। चित्रप्रिया उनका ऐसा ही समर्थ,
सशक्त तथा असाधारण उपन्यास है। इसमें वे समाज की अच्छाई और बुराई को
पाठक के सामने लाते हैं। उन्होंने इस उपन्यास की भूमिका में लिखा है— "मुझे
यह देखकर बहुत दुःख होता है कि इन नीच कपटी लोगों के प्रयत्नों से हमारे जीवन के
विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी तेजी से छल कपट की भावना का समावेश होता जा रहा है।
मैं देख रहा हूँ कि हमारे देश में परोक्ष रूप से जो अनेक परिवर्तन हो रहे हैं, वे इन कपटियों को एक खोखले समाज का निर्माण करने का अच्छा अवसर प्रदान
करेंगे। आज बहुत से लोगों पर आसान तरीकों से धन कमाने और धन से पाए जा सकने वाले
अधिकारों को पा लेने की धुन सवार है।" अखिलन का यह वक्तव्य इस उपन्यास के
कथानक के मूल भाव को प्रकट करता है। लेखक ने समाज की इसी कड़वी सच्चाई को प्रकट
करने के लिए इस कृति की रचना की है।
उपन्यास
के मुख्य पात्रों की कोटि में माणिक्कम्, अण्णामलै,
आनंदी, सुंदरी शारदा, चिदम्बरम
(मिस्त्री) आदि आते हैं। अण्णामलै एक चित्रकार है, जो अपनी
कला को विश्व की संपूर्ण संपदा से बड़ी मानता है। उसकी जन्मजात कला प्रतिभा उसके
संपूर्ण आंतरिक और बाह्य जीवन पर छाई हुई है। उसी का प्रभाव है कि अण्णामलै स्वभाव
से कोमल, परोपकारी, परिश्रमी तथा
स्वाभिमानी है। दूसरी ओर माणिक्कम् है, जो भौतिक सुख-सुविधा,
संपत्ति संग्रह तथा स्वार्थसिद्धि को ही जीवन का लक्ष्य मानता है।
उसके लिए कला का कोई अर्थ नहीं है, सिवा इसके कि मनुष्य को
धन कमाने की कला आनी चाहिए। सौंदर्य का भी
उसके लिए इतना ही अर्थ है कि संसार का सारा सौंदर्य वासनापूर्ति के लिए है। इसके लिए यदि किसी से
विश्वासघात भी करना पड़े, तो कोई हर्ज नहीं। उपन्यास के अन्य
सब पात्र इन्हीं दोनों के बीच घटने वाली घटनाओं से विभिन्न रूपों में जुड़े हुए
हैं। आनंदी के पिता कदिरेशन समाजव्यापी दुरवस्था के परिणाम को भोगने को विवश लोगों
के प्रतिनिधि हैं।
उपन्यास
के कथानक के अनुसार अण्णामलै और माणिक्कम् परस्पर प्रतिकूल परिस्थितियों में
अपनी-अपनी जीवन यात्रा आरंभ करते हैं। अण्णामलै कला साधना के मार्ग पर निकलता है
और माणिक्कम् चिदम्बरं की सहायता से धन कमाने के मार्ग पर। अण्णामलै का विवाह उसकी
इच्छानुसार नहीं होता। वह मन ही मन प्रख्यात चित्रकार कदिरेशन की पुत्री आनंदी को
चाहता था। स्वयं आनंदी भी अण्णामलै को ही अपने जीवन साथी के रूप में देखती थी, किंतु परिस्थितियाँ कुछ ऐसी जटिल
हो जाती हैं कि आनंदी का विवाह माणिक्कम् के साथ होता है। माणिक्कम् वास्तव में
यही चाहता था। इस प्रकार जीवन क्षेत्र में प्रवेश के समय ही त्रासदीपूर्ण संयोग
घटित होते हैं। अण्णामलै का विवाह सुंदरी से होता है। यहाँ वैशिष्ट्य यह है कि
अण्णामलै सुंदरी को पूरे समर्पण और जुड़ाव के साथ स्वीकार कर लेता है, जबकि आनंदी और माणिक्कम् के मध्य इस प्रकार का कोई संबंध नहीं बन पाता।
माणिक्कम्
धनपति होने के लालच में तरह-तरह के षड्यंत्र करता है। यहाँ तक कि अण्णामलै को
जमानती बनाकर एक बड़ी रकम कर्ज के रूप में ले लेता है। अपने स्वभाव के अनुसार वह
रकम नहीं लौटाता, जिस कारण अण्णामलै के घर और
सामान की कुर्की हो जाती है। माणिक्कम् के कारण ही मिस्त्री चिदम्बरम को जेल जाना
पड़ता है और बाद में अकाल मृत्यु का शिकार होना पड़ता है। माणिक्कम् आनंदी का जीवन
भी नष्ट कर डालता है। पहले वह उसके दैहिक सौंदर्य पर मुग्ध होकर उससे विवाह करता
है, किंतु बाद में
उसे धोखा देकर मुत्तम्माल नामक लड़की से अपने संबंध बनाता है। यह धूर्तता वह अन्य
स्त्रियों के साथ भी करता है। जब आनंदी उसकी चोरी पकड़ लेती है, तो वह सीनाजोरी पर आ जाता है और अपनी माँ को ढाल बनाकर आनंदी पर अत्याचार
करता है।
चित्रप्रिया
के ये सभी पात्र वर्गीय प्रतिनिधि हैं। इनमें से प्रत्येक आधुनिक समाज के विभिन्न
वर्गों के वास्तविक चरित्र तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित बनाने वाली प्रवृत्तियों
को प्रस्तुत करता है। अखिलन ने इन सभी को इतनी कुशलता से गढ़ा है कि वे अपने-अपने
स्थान पर विभिन्न घटनाओं के माध्यम से पूरे-पूरे संदर्भों को आकार दे रहे हैं।
लेखक ने धूर्त व्यक्तियों के चरित्र को चित्रित करने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं
जाने दिया है। माणिक्कम् आनंदी और उसके पिता के समक्ष अण्णामलै को अपने से हीन
सिद्ध करता है, "बातों ही बातों में माणिक्कम् ने
अपनी शिक्षा, व्यवसाय आदि के बारे में भी सब कुछ बता दिया।
उसने कहा कि अण्णामलै उन मूर्खों में से है, जो दो बार
परीक्षा में फेल हो चुका है। यदि उसे इस तरह पढ़ने का मौका मिला होता, तो वह अब तक बी.ई. की परीक्षा पास कर इंजीनियर बन गया होता।" (पृ. 29)। माणिक्कम् यह सब आनंदी पर अपना प्रभाव जमाने के उद्देश्य से कह रहा था।
यही हरकत वह मिस्त्री चिदाम्बरं के सामने भी करता है। वह उसे अण्णमलै के विरुद्ध
भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ता। यही माणिक्कम् अण्णामलै को आनंदी का चित्र बनाते
हुए देखकर नितांत विपरीत व्यवहार करता है। लेखक के अनुसार— "सहसा माणिक्कम्
अण्णामलै की कला पटुता की प्रशंसा करने लगा। उसने कहा कि वह चित्रकला के विषय में
कुछ भी नहीं जानता; इतने पर भी उसके द्वारा बनाये गए आनंदी के चित्र ने उसे अत्यंत प्रभावित किया
है।" (पृ. 59)। यह सब वह अण्णामलै को प्रसन्न करके उससे
आनंदी के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए कर रहा था। समाज में ऐसे पाखंडी
चरित्र बहुतायत से पाए जाते हैं।
अखिलन
ने अपने इस उपन्यास में आधुनिक जीवन के यथार्थ को बड़ी सहजता, स्वाभाविकता और प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। हमारे समाज में
भौतिकवाद, उपभोक्तावाद और उपयोगितावाद जीवन का चरम लक्ष्य बन
गए हैं। आज अधिकांश लोगों की समझ में
तकनीकी शिक्षा का महत्त्व तो क्षण भर में आ जाता है, किंतु साहित्य या कला के अध्ययन का महत्त्व बहुत कोशिश
करने पर भी मुश्किल से ही आता है। मिस्त्री चिदम्बरम् ऐसे ही लोगों का
प्रतिनिधित्व करता है। अखिलन कहते हैं, "मिस्त्रीजी की
समझ में नहीं आया कि साहित्य क्या बला है, कौन-सी नौकरी पाने
के लिए साहित्य पढ़ा जाता है, स्वतंत्रता के बाद देश में
उभरी आर्थिक चेतना और चर्चा के कारण बहुत से लोग विज्ञान, इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र आदि पढ़ने लगे, जिनका व्यवसाय से सीधा
संबंध था। साहित्य जिसका सीधा संबंध दाल चावल आदि भौतिक जीवन की आवश्यकताओं से
नहीं था, उन्हें एक कोने में धकेल दिया गया।" (पृ. 70)।
अखिलन
ने बड़ी सहजता से स्वतंत्र भारत के सामाजिक जीवन की सच्चाई भी चित्रित कर दी है।
स्वतंत्रता के पश्चात् नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का जो ह्रास हुआ है, वह इसी भौतिक संस्कृति के बढ़ते प्रभाव का परिणाम है। इस मूल्य ह्रास ने
मनुष्यों में अवसरवादी प्रवृत्ति को जन्म दिया है। स्वार्थी लोग और जुआरी
प्रवृत्ति के शिकार लोग निरंतर अपने हित-साधन में लगे हुए हैं। उन्हें अभावों और
अभिशापों से पीड़ित जनता का कोई ध्यान नहीं है। चित्रप्रिया के कदिरेशन के मन में
आता है— "यहाँ का हर व्यक्ति मौके का लाभ उठाने में लगा हुआ है। यही कारण है
कि यहाँ एक तरह की आँधी चलने लगी है। व्यक्ति की जुआरी प्रवृत्ति के कारण ही भोजन,
कपड़ा और मकान का मूल्य विष-ज्वर के समान बढ़ता जा रहा है।
झोंपड़ियों में सड़कों के किनारे रहने वाले दीन-दुःखी गरीब लोगों की साँस घुट रही
है।" (पृ. 179)। इस देश के गरीब लोगों की साँस किस
प्रकार घुट रही है, इसका अनुमान उस बूढ़ी को देखकर लगाया जा
सकता है जो चावल पकाने के लिए चिता में से लकड़ियाँ खींचने को विवश हो जाती है। जब
चौकीदार उसे चिता की लकड़ियाँ खींचने से रोकता है तो वह कहती है— "बेटा ऐसा
मत कर। चावल के लिए पैसे होते हैं, तो लकड़ी के लिए नहीं
होते और लकड़ी के लिए पैसे होते हैं, तो चावल के लिए पैसे
नहीं होते। यहाँ बेकार पड़ी लकड़ी को ही तो मैं चूल्हा जलाने के लिए अपने घर ले
जाती हूँ। इस बार मुझे छोड़ दे इसके बाद मैं यहाँ नहीं आऊँगी।" (पृ. 188)। माणिक्कम् इस निर्धनता को भी अपमानित करने से बाज नहीं आता। वह बुढ़िया
की विवशता को उस शहर के लोगों के चरित्र का अंग सिद्ध करता है। यह हृदयहीनता उस
समय भी दिखाई देती है, जब अण्णामलै के पास कर्ज वसूलने का
नोटिस आता है और माणिक्कम् बेईमान हो जाता है। असल में कर्ज माणिक्कम् ने लिया था, अण्णामलै केवल जमानती था। इस पर भी माणिक्कम् कहता है— "कानून और
न्याय के हिसाब से यह कर्ज तुझे ही चुकाना चाहिए। तुझसे मेरा मतलब है कि तेरे पिता
को चुकाना चाहिए। उनके कारण मुझे तीस हजार रुपये का घाटा उठाना पड़ा था।"
(पृ. 295)।
अखिलन
का यह उपन्यास यथार्थ के केवल इसी पक्ष का उद्घाटन नहीं करता, बल्कि हमारे राष्ट्रीय सोच की चीरफाड़ भी करता है। हम भारत के लोग अपनी
पहचान, धर्म, जाति अथवा प्रदेश के आधार
पर स्थापित करना चाहते हैं। हमें यह ध्यान ही नहीं आता कि हमारी कोई राष्ट्रीय
पहचान भी है। इसी का परिणाम है कि हमारे भीतर से हमारा देश निरंतर फिसलता जा रहा
है तथा उसके स्थान पर संकुचित भावनाएँ घर करती जा रही हैं। अखिलन ने उपन्यास के एक
पात्र भाभानि के माध्यम से हमारी इसी प्रवृत्ति को चित्रित किया है— "भारत
देश में भारतीयों का दर्शन बहुत-बहुत कठिन है। यहाँ अपने को सिंधी, बंगाली, मराठी, गुजराती,
तमिलभाषी, तेलुगुभाषी या मलयाली कहने वाले लोग
ही अधिक हैं। इन सब बातों से ऊपर उठकर 'मैं 'भारतवासी हूँ' या 'मैं मनुष्य
हूँ' इस तरह की भावना यहाँ के लोगों में से बहुतों के मन में
नहीं है।" (पृ. 91)। इस प्रसंग में अखिलन ने बड़ा
ज्वलंत प्रश्न यह उठाया है कि यदि हमारी इस विभाजित मानसिकता के कारण भारत देश ही
नहीं रहेगा, तो जाति, कुल, धर्म आदि ही कहाँ रह जाएँगे? यह निःसंदेह एक ऐसा
राष्ट्रवाद, है जो किसी आदर्श पर आधारित न होकर एक ऐसे
यथार्थ पर आधारित है, जिसे जानकर हर भारतीय की आँखें खुलनी
चाहिए।
डॉ.
के.ए. जमुना ने चित्रप्रिया उपन्यास को हिन्दी में अनूदित करके अभिनंदनीय कार्य
किया है। हिन्दी क्षेत्र से निकट संपर्क होने के कारण वे हिन्दी की भाषिक संस्कृति
से बहुत गहरे जुड़ी हुई हैं। इस कारण चित्रप्रिया पढ़ते समय यह नहीं लगता कि पाठक
कोई अनूदित उपन्यास पढ़ रहा है। वैसे भी अखिलन ने इस उपन्यास को इस ढंग से लिखा है
कि यदि पात्रों के नाम बदल दिये जाएँ, तो इसे किसी
भी भाषा का उपन्यास मान लिया जा सकता है।
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