हम सब एक हैं (कुंदुर्ति आंजनेयुलु , अनुवादक - डॉ. एम. रंगय्या)

 

 हम सब एक हैं 

कुंदुर्ति आंजनेयुलु

अनुवादक - डॉ. एम. रंगय्या

 

प्रतिभा प्रकाशन,

5-1-409, पुरानी घास मंडी

सिकंदराबाद।

प्रथम संस्करण- 1990, पृष्ठ- 50, मूल्य- 16 रुपए

 

'हम सब एक हैं' में तेलुगु भाषा की वचन कविता के प्रमुख स्तंभ और वचन कविता आंदोलन के पितामह कुंदुर्ति आंजनेयुलु की इक्कीस कविताएँ संग्रहीत हैं। इन सभी में विद्रोह का विस्फोट और जीवन के कटु यथार्थ का चित्रण है। ये कविताएँ वचन कविता धारा से संबंधित हैं; अतः हिंदी पाठकों को तेलुगु कविता के इस आंदोलन के विषय में जान लेना चाहिए।

जिन दिनों हिंदी में मार्क्सवाद से प्रभावित प्रगतिशील कविता की धूम थी, उन्हीं दिनों तेलुगु भाषा का काव्य भी आंदोलित हो रहा था। प्रगतिशील आंदोलन जहाँ छायावादी कविता को नकार रहा था, वहीं तेलुगु भाषा में भाव कविता की अतिशय वैयक्तिकता, अनंत से मिलने की आतुरता, अवास्तविक सौंदर्य चित्रण तथा अगम रहस्य के प्रति आग्रह का विरोध हो रहा था। श्री श्री, शिष्टला, नारायण बाबु, पटाभि, आरूद्रा और कुंदुर्ति आदि कवि भाववादी कविता के समक्ष विद्रोह का झंडा लेकर खड़े हो गए थे। ये युवा कवि भाव कविता के रूढ़िग्रस्त तथा कल्पनाजीवी ढाँचे को तोड़कर उसके स्थान पर मुक्त चिंतन, बुद्धि प्रधान चेतना, यथार्थजीवी सौंदर्यबोध और वास्तविक जीवन-अनुभव से निर्मित कविता रचना परंपरा का प्रारंभ करना चाहते थे। विषयवस्तु की भाँति ही ये कवि कविता का अभिव्यक्ति-शिल्प भी बदल डालना चाहते थे। इनकी आकांक्षा थी कि अलंकरण और आभरण वाली भाषा के स्थान पर व्यावहारिक जीवन की सरल भाषा प्रयोग की जाए। नवीन प्रतीक और बिंब विधान अपनाया जाए तथा शिल्प के बंधनों से मुक्त होकर परंपरागत छंद विधान में बँधे रहने की विवशता से पल्ला छुड़ाया जाए।

कुंदुर्ति इस कविता परिवर्तन के पुरोधा बने। इसलिए आज उन्हें वचन कविता का पितामह माना जाता है। उन्होंने छंद के रूढ़ अनुशासन से मुक्त होकर खंडकाव्य और महाकाव्य की रचना की। एक समय ऐसा आया, जब उन्हें वचन कविता का पर्याय माना जाने लगा।

यह पृष्ठभूमि प्रस्तुत संग्रह की कविताओं को समझने में सहायक होगी। संग्रह की पहली कविता का प्रारंभ इस प्रकार होता है- "पल्लवरहित पेड़ों पर पंखहीन सुमन खिलेंगे कभी वे फलेंगे/इस आशा से कब तक रुका रहूँ?/कब तक अघ का भरण करूँ?/आशा का वरण करूँ?" (पृ. 1)। इन पंक्तियों में पेड़, सुमन, फल आदि सभी प्रतीक शब्द हैं जो वर्तमान वातावरण को और व्यक्ति के असंतोष को चित्रित करते हैं। पुराने युग ने जो कुछ दिया है, उसका बड़ा भाग पल्लव रहित वृक्ष की भाँति ही है। उससे किसी फल की आशा करना व्यर्थ ही है। इसीलिए कवि के मन में असंतोष जन्म लेता है और वह अपने भीतर सुलगते हुए विद्रोह को प्रकट करने में नहीं हिचकता है। यदि वह चाहे, तब भी शायद ऐसा न कर सके। कारण यह कि प्राचीन रूढ़ियों को मथ कर किसी को आज तक कुछ नहीं मिला। जिस समुद्र मंथन का प्रसंग उठाकर नई पीढ़ियों को यह समझाया जाता है कि पहले विषपान करो फिर जीवन समुद्र से तुम्हारे लिए अमृत निकलेगा, वह समुद्र मंथन पुराण में छिपे अनेक अज्ञात रहस्यों की भाँति ही है। कवि इस समुद्र मंथन की भी वर्तमान जीवन की विसंगतियाँ प्रकट करने के लिए याद दिलाता है। यह वस्तुतः हमारी अपनी उन विवशताओं का चित्रण है, जिनके कारण हम जीवन युद्ध के मोर्चों पर असफल हो रहे हैं।

कुंदुर्ति बादल के लिए भी एक कविता रचते हैं, किंतु  यह कविता बादल के नैसर्गिक गुणानुवाद या उसकी उदारता की प्रशंसा में नहीं है। इस कविता में बादल से कहा गया है कि वह लोकतंत्र के मंत्रियों के पास जाए और यह बताए कि कवि के घर का निर्माण सागर के बिन्दुओं से नहीं, बल्कि किसानों के पसीने से हुआ है। कवि बादल को उन सारे लोगों के पास भेजना चाहता है, जो अभाग्य, अभाव और अभिशाप का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। "टूटे-फूटे बर्तनों में खाना पकाने वाले/चूती छतों तले जीवन यापन करने वाले/हमारे आजाद देश के इंसानों को देख (और) तब मेरी ओर देख" (पृ. 7)। प्रकृति से यथार्थ परिवेश को चित्रित करने का काम लेने की ऐसी विलक्षण कला कुंदुर्ति के अतिरिक्त बहुत कम लोगों के पास मिलेगी। उन्होंने अपनी इस कविता में बड़ी सहजता से इस आजाद देश के निर्धन लोगों का सच्चा चित्रण प्रस्तुत कर दिया है। कवि ने बादल की भाँति सागर, रेल आदि के प्रयोग से भी राष्ट्रीय जीवन और समाज के यथार्थ चित्र अंकित किये हैं। कुंदुर्ति की कविताओं के विषय में डॉ. एम. रंगय्या का मानना है कि "वे सच्चे अर्थों में सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।" (प्राक्कथन)। वास्तव में कुंदुर्ति ऐसे ही कवि हैं। उन्हें तमाम उन लोगों की चिन्ता है, जो विभिन्न शोषक संस्थानों के शोषण के शिकार हैं। उन्होंने एक स्थान पर कहा है- "मैं गीत हूँ/भूखे बंजर जीवन खेत की सकाल वर्षा हूँ ... भूख से मृत श्रमिक का प्रेत हूँ/बाबू के जीवन का/अपर्याप्त वेतन हूँ।" (पृ. 23)। इस देश के सर्वहारा से जुड़ा गीत ऐसा ही हो सकता है। कुंदुर्ति इस गीत में ढलकर सर्वहारा के कंठहार बन गए हैं। वे मनुष्यों से भरे इस समाज को रहने योग्य नहीं पाते। कारण यह है कि यह समाज मनुष्यों की जिस भीड़ से भरा है, वह भीड़ पशुओं से भी अधिक हिंसक और क्रूर हो गई है। उसे देख कर कवि जंगल में भाग जाना चाहता है। उसके अनुसार क्रूर बना सिंह भी आज के मनुष्यों से कहीं अच्छा है। इसलिए मनुष्यों के समाज को छोड़कर जंगल में जाना उचित है। कवि के अनुसार जंगल में अनंत सौंदर्य है, महाकवि की कल्पना के समान सुखद चाँदनी है और इंद्रधनुष के समान आभायुक्त दृश्य हैं (पृ. 16-17)। कुंदुर्ति जंगल में जाने की आकांक्षा ही नहीं करते, बल्कि वे यह भी अनुभव करते हैं, कि उन्हें सागर निमंत्रण दे रहा है, आकाश पुकार रहा है और जलद मालाएँ संकेत कर रही हैं। यही कारण है कि उनका मन कुछ दिन वीरान जंगल में रहने को कर रहा है- "वीरान जंगल में कुछ दिन/रहने को जी चाहता है/सागर मुझे निमंत्रण देता है/जल की तरंगें टेर रही हैं" (पृ. 18)।

ये पंक्तियाँ लिखने वाले कवि पर बड़ी सरलता से यह आरोप लगाया जा सकता है कि कवि पलायनवादी प्रवृत्ति का शिकार है; क्योंकि वह जीवन संघर्ष से मुख मोड़कर जंगल के सौंदर्य  की गोद में छिप जाना चाहता है। हिंदी  के छायावादी कवियों पर यही आरोप लगाया गया था, किंतु  देखना यह है कि कुंदुर्ति का यह पलायन सचमुच जीवन से पलायन है या फिर इसका कोई अन्य कारण है। इस प्रश्न का उत्तर स्वयं कंदुर्ति ने इन पंक्तियों में दिया है- "जीवन को भाग जाने से रोकने वाले तुम/मेरे इस साहस को देखकर भले ही हँस दो/सुदूर गिरि शिखरों से मिश्रित झरनों सा/जीवन को ढोने वाली/जनता के अभावों के प्रवाह में/मैं चला जा रहा हूँ साम्यवाद के विशाल सागर में/मैं चला जा रहा हूँ" (पृ. 35)। ये पंक्तियाँ बताती हैं कि कवि का यह पलायन साधारण जंगल की ओर पलायन नहीं है। यह पलायन उस जंगल की ओर है, जहाँ जनता के अभावों का अंत हो जाएगा यह पलायन साम्यवाद के विशाल सागर की ओर है। यह सागर ऐसा है, जो साम्यवादी व्यवस्था की राजनैतिक असफलता के बावजूद निर्धन किसानों और मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा दे रहा है। यह पलायन उस स्थान से पलायन भी है, जहाँ रेंगने वाली चीटियों की कतारें हैं, फन फैलाये फूत्कार भरते साँप हैं, कटीली राहें हैं और जीवन को मर्दित करने वाली व्यथाएँ हैं (पृ. 34)। सही अर्थों में यह पलायन दमन, भय और द्वेष पर आधारित व्यवस्था का अस्वीकार है। इसलिए कुंदुर्ति पर जीवन से पलायन करने वाले कवि होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

कुंदुर्ति के काव्य में राष्ट्रीय चेतना का ज्वार देखने को मिलता है। वे अपनी राष्ट्रीय भावना प्रधान कविताओं में एक ओर मातृभूमि के प्रति प्रेम प्रकट करते हैं, तो दूसरी ओर अपने कुकृत्यों से देश को नष्ट करने वाले लोगों का विरोध भी करते हैं। डॉ. एन.पी. कुट्टन पिल्लई ने लिखा है कि “कुंदुर्ति राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कवि हैं। जननी जन्म-भूमि के रक्षार्थ उत्तरी सीमा पर प्राण विसर्जन करने वाले वीर योद्धा उनके चिराराध्य हैं। उनकी कीर्ति ध्वजा फहराते हुए उनका कवि भारतीय जवानों, वीरों, समर योद्धाओं को प्राण हथेली पर धर कर भी जन्म-भूमि की स्वतंत्रता की रक्षा का आह्वान देता है, तो वही कवि भारत की भावात्मक एकता के लिए चिंतित हो यही संदेश देता है कि हम भारतीय भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय की तंग गलियों से बाहर निकल कर समता एवं एकता के विशाल प्रांगण में स्वच्छंद विचरण करें ....।" (पुरोवाक्)। इस संग्रह की उ‌द्बोधन शीर्षक कविता इस कथन को सही सिद्ध करती है। कुंदुर्ति लिखते हैं, "रोको! रोक दो!/अपने कोप ताप रोक दो!/मजहब के नाग से काटे गये/मतिहीन मानवो! पड़ोसी को मार कर/खुश होने वाले मानवो!/रोको रोक दो/ तुम्हारे तांडव से देश/नाश हुआ/जाता है" (पृ. 36)। यह इस संग्रह की दो बड़ी कविताओं में से एक है और इसमें कवि उन शक्तियों से सावधान रहने की अपील करता है, जो पीढ़ियों को दिग्भ्रमित कर रही हैं।

कुंदुर्ति आंजनेयुलु की इन कविताओं को ख्याति प्राप्त अनुवादक डॉ. एम. रंगय्या ने हिंदी  पाठकों के लिए सुलभ बनाया है। डॉ. रंगय्या का हिंदी  भाषा पर असाधारण अधिकार है। वे अपनी प्रतिभा और अपने परिश्रम से हिंदी  के व्यावहारिक मुहावरे के निकट से निकटतर आने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि उनके द्वारा अनूदित इस संग्रह की कविताएँ मौलिक रचना जैसा रसास्वादन कराती हैं। इतने सुंदर अनुवाद के अभाव में कुंदुर्ति का यह अद्भुत शिल्प प्रयोग हिंदी पाठकों को भला कैसे मिल सकता था--- "वीरों ने लड़ाई बंद कर दी है/गरीब के चूल्हे में सोई बिल्ली सा/नगर सिकुड़कर सो गया है" (पृ. 19)।

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