रवीन्द्र गीत-वितान (रवीन्द्र नाथ ठाकुर, अनुवाद - जलज भादुड़ी)

  

रवीन्द्र गीत-वितान

रवीन्द्र नाथ ठाकुर

अनुवाद - जलज भादुड़ी

 

कृष्णा ब्रदर्स

महात्मा गाँधी मार्ग,

अजमेर- 305001

प्रथम संस्करण- 1990, पृष्ठ- 205, मूल्य- 100 रुपए

 

जलज भादुड़ी ने विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों को हिंदी में सांगीतिक स्वर लिपि के साथ प्रस्तुत करके राष्ट्रीय महत्त्व का कार्य किया है। रवीन्द्रनाथ का साहित्य हिंदी में पहले से भी अनुपलब्ध नहीं है, किंतु  इतने सधे हुए और संगीत कौशल के साथ उनके गीतों की प्रस्तुति इससे पहले नहीं हुई थी। इस कार्य से स्वयं विश्व कवि के स्वप्न को आकार मिला है। उन्होंने कभी संगीत के विषय में कहा था कि "यदि मेरा वश चले, तो मैं कविता सहचर संगीत को शास्त्र की लौह-कारा से छुड़ा दूँ और उभय के बीच (कविता+संगीत) शादी करवा दूँ।" (पृ. 162)। जलज भादुड़ी ने इस पुस्तक में संगीत के संबंध में रवीन्द्र की जो उक्तियाँ दी हैं, उनमें से एक में संगीत और कविता का विशेषकर गीत और सुर का महत्त्व इस प्रकार समझाया गया है— "गीतों में सुर और शब्दों का संपर्क पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संपर्क के समान है या कहें शिव और शक्ति रूप है, जिसे हम अर्द्धनारीश्वर योग कहें, एक सुखी परिवार में जैसे कभी पति पत्नी पर कब्जा चलाए तो कभी पत्नी भी पति पर। उसी प्रकार सुर और शब्द एक दूसरे के स्वार्थक, अनुगामी या सहचर होने चाहिए।" (पृ. 204)। इससे रवीन्द्र के काव्य में ही नहीं, बल्कि उनके जीवन में भी गीत और संगीत की भूमिका का पता चलता है।

विश्व कवि गीत और संगीत को विश्व-आत्मा का रूपायन करने वाला मानते थे। इसीलिए उन्होंने अपने संगीत को किसी सीमा में नहीं बाँधा। वे शास्त्र की रूढ़ियों या भूगोल की सीमाओं को काव्य अथवा संगीत का अनुशासनकर्ता नहीं मानते। उनके यहाँ उन्मुक्ति है, आह्लाद है, उल्लास है, सह अनुभूति है और सबसे अधिक अन्तर्जगत का अनंत विस्तार है— कविता में भी, संगीत में भी। जलज भादुड़ी की दृष्टि में रवीन्द्रनाथ का संगीत साधारण संगीत न होकर त्रिवेणी संगम है— "उनके संगीत में जिन तीन धाराओं का मिलन हुआ, वे हैं, भारतीय राग संगीत की धारा, पाश्चात्य संगीत की धारा और बंगाल के लोक संगीत की धारा।" (पृ. 161)। उन तीनों को मिला कर रवीन्द्रनाथ ने एक अद्भुत संगीत धारा का सृजन किया। लेखिका ने विस्तार से यह बताया है कि रवीन्द्र की संगीत धारा में किस-किस स्रोत ने क्या-क्या भूमिका निभाई। उनका निष्कर्ष है कि रवीन्द्र संगीत सर्व भारतीय स्तर का समन्वयधर्मी संगीत हैं। (पृ. 163)।

रवीन्द्र नाथ को जीवन के असली संस्कार अपने परिवार से मिले थे। उनकी संगीत प्रतिभा का विकास तो उनके परिवार और कुटुंब के परिवेश के कारण हुआ। उनके बड़े भाई द्विजेन्द्रनाथ यद्यपि गा नहीं सकते थे, किंतु  विलायती वंशी बजाने में उनका सानी नहीं था। उनके मँझले भाई सत्येन्द्र नाथ बहुत अच्छे हारमोनियम वादक थे और तीसरे भाई हेमेन्द्रनाथ भारतीय और पाश्चात्य संगीत में बराबर की महारत हासिल किये हुए थे। उनके परिवार की प्रतिभा देवी इतनी अधिक संगीत कुशल थीं कि रवीन्द्रनाथ उन पर गर्व करते थे। रवीन्द्रनाथ के परिवार में इंदिरा देवी और सरला देवी को भी संगीत के क्षेत्र में स्मरण किया जाता है। उनके परिवार का संगीत प्रेम इसी से जाना जा सकता है कि एक समय ठाकुर परिवार का प्रत्येक सदस्य संगीत के लिए समर्पित माना जाने लगा था। संगीत के इस वातावरण का प्रभाव रवीन्द्रनाथ के काव्य पर सरलता से देखा जा सकता है। रवीन्द्रनाथ ने अपनी स्मृतियाँ लिपिबद्ध करते हुए लिखा है— "संगीत शिक्षा हेतु बाल्यावस्था में भी उस्तादों का अभाव हमारे घर में कभी नहीं हुआ। सुदूर अयोध्या, ग्वालियर और मुरादाबाद से भी हमारे घर में बड़े-बड़े हिंदुस्तानी संगीतविद् सदा आते-जाते थे। घर में हरदम हिंदुस्तानी राग संगीत का एक माहौल सा बना रहता था। भाई लोग सुबह से शाम तक संगीत अभ्यास किया करते थे।” (पृ. 195)।

जलज भादुड़ी ने रवीन्द्रनाथ के गीतों के प्रकारों पर भी शोधपूर्ण दृष्टि डाली है। उन्होंने यह विश्लेषण गीतों में प्राप्त विशेषताओं और रचना-शैली के आधार पर किया है। उन्होंने माना है कि रवीन्द्रनाथ के गीतों को मुख्यतः पूजा के गीत, स्वदेश गीत, प्रेम गीत, प्रकृति के गीत, नाट्य गीत आदि भागों में बाँटा जा सकता है। रवीन्द्रनाथ के पूजा के गीतों में रवीन्द्रनाथ की रहस्यवादिता प्रकट हुई है। ऐसे गीतों में भाषा के बंधन खुलते चले गए हैं। रवीन्द्रनाथ के स्वदेश गीत राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा राष्ट्रीय जागरण से संबंधित हैं। इन गीतों की एक विशेषता यह भी है कि इनमें मुक्ति का जो भाव है, वह केवल स्वदेश को ही मुक्त नहीं करना चाहता, बल्कि विश्व भर के मानवों को पराधीनता से मुक्ति देना चाहता है। रवीन्द्रनाथ के प्रेमगीत वैयक्तिक प्रेम और मानव प्रेम के अनूठे उदाहरण हैं। कहा जाता है कि रवीन्द्रनाथ के जीवन में तीन नारियों का बड़ा गहरा महत्त्व है। वे नारियाँ थीं— कादम्बरी, आन्ना और सिगनोर किटोरिया दि एस्ट्राडा। जलज भादुड़ी के अनुसार ये तीनों नारियाँ भावनात्मक दृष्टि से कवि के बहुत निकट थीं और उन्होंने उनके प्रेम संबंधी गीतों को प्रभावित किया था। कवि ने अपने कुछ गीत उन्हीं को केंद्र में रखकर रचे भी थे। रवीन्द्र को पार्थिव प्रेम से जो अनुभूतियाँ प्राप्त होती थीं, वे ही प्राकृतिक वातावरण तथा कवि के सौंदर्यबोध से मिलकर गीतों में ढल जाती थीं— "जो भी हो कवियों के प्रेम उपादान उनके सौंदर्य-बोध में विराजमान होते हैं। चाहे वह उपादान प्रकृति से मिले, चाहे मानवी से।" (पृ. 171)। लेखिका का यह कथन रवीन्द्रनाथ के प्रेम संबंधी गीतों पर पूरा लागू होता है।

रवीन्द्रनाथ ने अपने गीतों में प्रकृति को विलक्षण सौंदर्य प्रदान किया है। वे जब ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, वसंत आदि ऋतुओं को गीतों का विषय बनाते हैं, तो लगता है कि विश्व साहित्य में प्रकृति का उनसे श्रेष्ठ चित्रकार अन्य कोई नहीं हुआ, "क्या भाषा, क्या छंद, क्या चित्रकला, क्या अलंकरण, क्या ही व्यंजना और क्या ही दर्शन तत्त्व, हर दृष्टिकोण से कवि गुरु रवीन्द्रनाथ प्रकृति वर्णन में सर्वकाल में सर्वदेश में अद्वितीय माने जाते हैं।" (पृ. 173)।  

जलज भादुड़ी ने अपने इस ग्रंथ में विश्व कवि के गीतों की जो स्वरलिपि प्रस्तुत की है, वह भातखंडे स्वर लिपि पद्धति में तैयार की गई है। इसी से इन गीतों का सर्वभारती उपयोग बढ़ेगा। संगीतकार इन गीतों का उपयोग करके निश्चय ही अपनी संगीत साधना को संपूर्ण और सार्थक कर सकेंगे। जलज भादुड़ी के शब्दों में "जो कुछ भी कहें, भारत के सभी धर्म, जाति, देश, काल और पात्रों को एक इकाई का ही खंडित रूप यदि माना जाए, तो रवीन्द्र संगीत भी सर्वप्रकार के संगीत का सार है, जिसके लिए कवि ने स्वयं कहा है, "सभी धर्मावलंबी उसे अपना समझकर ग्रहण करेंगे।" ऐसे संगीत को भारत के घर-घर में पहुँचाने की चेष्टा ही मेरे अनुवादों का एक मात्र ध्येय है।" (पाठक के प्रति मेरा निवेदन)। निश्चय ही जलज भादुड़ी की यह साधना भारतीय भावात्मक एकता और साहित्य तथा संगीत की समृद्धि में एक महत्त्वपूर्ण आयाम सिद्ध होगी।

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