एक नाटक : मूक नाटक (जि.जे. हरिजीत )

 

एक नाटक : मूक नाटक

जि.जे. हरिजीत

 

वाणी प्रकाशन,

21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-2

प्रथम संस्करण- 1985, पृष्ठ- 52, मूल्य- 12 रुपए

 

नाटककार हरिजीत की इस पुस्तक में दो लघु नाटक हैं, पहला एक नाटक रेल सत्याग्रह और दूसरा मूक नाटक: खामोश! इमरजेंसी जारी है। लेखक ने स्वयं ही इन्हें लघु नाटक कहना पसंद किया है, किंतु  पाठकों और समीक्षकों को यह स्वतंत्रा भी दी है कि यदि वे चाहें, तो इन्हें एकांकी भी कह सकते हैं। हिंदी  साहित्य में विभिन्न विधाओं के लघु संस्करण स्वतंत्र नामों से स्थान पाने का प्रयास करते रहे हैं। लघु कथा, लघु उपन्यास, लघु नाटक, लघु कविता अर्थात् सभी के लघु रूप सामने आए हैं। इनमें से लघुकथा ही एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित होने में सफल रही है। लघु कथाकारों ने उसका स्वतंत्र, सैद्धांतिक ढाँचा खड़ा कर लिया, किंतु उपन्यास और नाटक के लघु रूप की कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बन पाई। जब तक उपन्यासकार और नाटककार कोई निश्चित सैद्धांतिक आधार न खोज लें, तब तक कोई रचना आकार में छोटी होने से ही लघु उपन्यास या लघु नाटक नहीं बन सकती। इसलिए हरिजीत ने जिन्हें लघु नाटक माना है, वे एकांकी ही कहे जा सकते हैं।

एक नाटक मूक नाटक में संग्रहीत पहला नाट्य प्रयोग एक सशक्त व्यंग्य है, जिसमें नाटककार ने राजनैतिक रोटियाँ सेकने के लिए सत्याग्रह जैसे पवित्र मूल्य के दुरुपयोग की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया है। नेताजी अपने राजनैतिक लाभ के लिए अपनी पत्नी के माध्यम से रेल सत्याग्रह का नाटक रचते हैं। जैसे कि वर्तमान राजनीति की चारित्रिक विशेषता है, नेताजी सत्याग्रह से पहले संवाददाताओं को आमंत्रित करते हैं और अपना वक्तव्य प्रसारित करते हुए कहते हैं, "हमारा प्रांत हमेशा शांतिप्रिय रहा है। किसी पर इसे द्वेष या बैर नहीं है। अन्य प्रांतों के समान हमारा प्रांत भी राष्ट्र की प्रगति में अपना योगदान दे रहा है। परंतु हमारी शांतिप्रियता को गलत समझ कर हमारे पड़ोसी प्रांत हमारे इस प्रांत को टुकड़े-टुकड़े करके आपस में बाँट लेने की योजना बना रहे हैं × × × × इसका विरोध करने के लिए सर्वत्र रेल सत्याग्रह जो चल रहा है, वह आपको विदित ही है × × × × मुझे आपके सन्मुख यह घोषणा करने में अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि आज के रेल सत्याग्रह का नेतृत्व मेरी पत्नी श्रीमती ऊषा देवी करेंगी।" (पृ. 18)।

नाटककार हरिजीत ने नेताजी द्वारा बुलाए गए इस संवाददाता सम्मेलन के माध्यम से समकालीन भारतीय राजनीति और उसका संचालन करने वाले नेताओं के मुखौटों को उतार दिया है। एक समय था जब राजनीति का अर्थ था, देश की सेवा। आज उसका अर्थ एक ऐसा व्यवसाय हो गया है, जिसे अपनाकर व्यक्ति तमाम अपराध करते हुए भी सफेदपोश बना रह सकता है। उसमें वे सब बुराइयाँ आ गई हैं, जो किसी भी अधिक लाभ वाले व्यवसाय में होती हैं। इन्हीं बुराइयों में से एक बड़ी बुराई है, आत्मप्रदर्शन। नेता लोग निरंतर इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि कैसे किसी सार्वजनिक हित के कार्य को व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि का साधन बनाया जाए । इसी क्रम में दूसरी बुराई नेताओं द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में स्थापित करने का प्रयास भी है। इस नाटक में ऊषा देवी नेताजी की पत्नी हैं, जो न राजनीति समझती हैं और न भीड़ के समक्ष अपनी बात रख सकती हैं। फिर भी नेताजी उसे रेल सत्याग्रह की नेत्री बनाने पर तुले हुए हैं। वे स्वयं ही ऊषा देवी की ओर से वक्तव्य भी जारी करना चाहते हैं। सबसे बढ़कर तो वे ऊषा देवी की अभिव्यक्ति संबंधी अयोग्यता को कर्मठता और योग्यता के रूप में प्रतिष्ठ करना चाहते हैं।

संवाददाता सम्मेलन से राजनीति का प्रांतीयतावादी सांप्रदायिक चेहरा भी उजागर होता है। यह भी समकालीन भारतीय राजनीति की घृणित बुराई है। प्रांतीयतावाद अब इतना बढ़ गया है कि दो प्रांतों के रिश्ते दो देशों के रिश्तों की भाँति तटस्थ और कभी-कभी वैमनस्य व शत्रुतापूर्ण भी दिखाई पड़ने लगे हैं। इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय दलों की बाढ़ आ गई है और चुनाव तक क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर लड़े जाने लगे हैं। नाटककार हरिजीत ने नेताजी के पुत्र रमेश, नेताजी और श्याम के माध्यम से इस स्थिति पर बहुत धारदार व्यंग्य किया है। रमेश जैसा अबोध बच्चा सिखाने-पढ़ाने पर कहने लगता है, "जिन्दाबाद, जिन्दाबाद। हमारा प्रांत जिन्दाबाद, पड़ोसी प्रांत मुर्दाबाद!" (पृ. 22)। अत्यधिक कष्ट का विषय तो यह है कि श्याम और नेताजी अपने इस कुकृत्य पर तनिक भी लज्जित नहीं हैं, बल्कि नेताजी बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि उन्हें रमेश को देखकर अपने बचपन के वे दिन याद आ रहे हैं, जब वे महात्माजी की पुकार सुनकर स्वतंत्ररता संग्राम में कूद पड़े थे। वे कहते हैं, कि अब उन्हें देश के लिए नहीं, प्रांत के लिए लड़ना पड़ रहा है (पृ. 22)।

हरिजीत ने इस नाटक में बड़ी कुशलता से नेता और शासन-सत्ता के अपवित्र गठजोड़ को भी प्रकट किया है। जब ऊषा देवी सत्याग्रह की नेत्री बन जाती हैं, तो नेताजी पुलिस इंस्पेक्टर को फोन करते हैं और कहते हैं— "आज आपका लाठी चलाने का कार्यक्रम तो नहीं है न?.. ठीक है, अगर लाठी चलायें भी तो मैंने जैसा कहा था, वैसा ही हो।... दूसरे सत्याग्रहियों को चाहे मार पड़े, लेकिन हमारी श्रीमती जी उससे बची रहें।" (पृ. 26)।

राजनैतिक गतिविधियाँ चलाने की यह भी एक शैली है जिसमें, अँगुली से रक्त भी नहीं निकलता और शहीदों में नाम भी आ जाता है। ऐसे ही नेता ईमानदार अधिकारियों के सबसे बड़े शत्रु होते हैं। उनकी दृष्टि में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा अधिकारियों का गुण नहीं है, उनका गुण है, नेताओं की जी हजूरी करना और उनका हुकुम बजा लाना। नेताजी कहते हैं— "ऐसे लोगों का तबादला बहुत आसान है। अगर वह योग्य है, तो तुरंत बदली हो जाएगी" (पृ. 38)।

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खामोश इमरजेंसी जारी है हिंदी नाटक साहित्य के ध्यान आकर्षित करने वाले नाट्य प्रयोगों में से एक है। पूरा नाटक आपातकाल पर व्यंग्य है और बिना किसी संवाद के केवल नाटककार द्वारा दिये गए  रंगमंचीय निर्देश के अंतर्गत ही पूरा हो जाता है।

यह प्रयोग बहुत संकट भरा है। नाटक लेखक के   लिए एक गंभीर आमंत्रण भी। संवाद बहुल नाटक लिखते समय जो निर्देश दिये जाते हैं, उनके साथ भाषा की अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता नहीं होती, किंतु जब पूरा नाटक ही रंगमंचीय निर्देश में संपन्न हो रहा हो, तो नाटककार को बहुत सावधान रहना होता है। उसे ध्यान देना होता है कि निर्देश की भाषा चित्रात्मक हो, विम्बात्मक हो और साथ-साथ ध्वन्यात्मक भी हो। भाषा ऐसी हो, जिसे पढ़कर पाठक नाटक की घटनाओं को अपने समक्ष घटता हुआ अनुभव कर सके। इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि अभिनेता उस भाषा के जरिये मूल चरित्र की आत्मा में प्रविष्ट हो सके। ऐसी भाषा नाट्य निर्देशक के लिए भी इतनी संपूर्णता युक्त होनी चाहिए कि वह नाटक के दृश्य विधान की मूल कल्पना तक भी पहुँच सके और भीतर ही भीतर बहने वाले कथानक के अंतरंग का स्पर्श भी कर सके। कहना होगा कि हरिजीत इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे हैं।

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