द्वादशी (एन. रामन नायर)
द्वादशी
एन.
रामन नायर
वाणी
प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-2
द्वितीय
संस्करण- 1988,पृष्ठ- 111, मूल्य- 30 रुपए
'द्वादशी' डॉ. एन. रामन नायर का प्रथम कहानी संग्रह
है। इसमें कुल 12 कहानियाँ संग्रहीत हैं। जीवन के जिन पक्षों को लेकर इन बारह
कहानियों को बुना गया है, वे दूसरे हिंदी कहानीकरों ने भी छुए हैं, किंतु
नायर ने इन कहानियों में जो परिवेश
चित्रित किया है, वह अन्यत्र मिलना कठिन हैं। ठेठ केरलीय
जनजीवन, प्रकृति, जलवायु और परिवेश के
यथार्थ की जो झाँकी इन कहानियों में है, वह पाठकों को ज्वलंत
समस्याओं के साथ-साथ केरल के भी निकट परिचय में ले जाती है।
संग्रह
की पहली कहानी 'इंतजार' भावुकता और
रोमान प्रधान कहानी है। इसका वैशिष्ट्य यही है कि इसमें अंतर्जातीय और
अंतर्धार्मिक प्रेम का चित्रण किया गया है तथा नायिका खदीजा को अपने निर्णय पर
दृढ़तापूर्वक खड़ी दिखाया गया है। वह मनोज के लिए अपने परिवार और इस संसार से
संघर्ष मोल लेती है तथा मनोज को अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है। वह एक के बाद एक
उसकी सारी बातें मानती चली जाती है। यही खदीजा अंत में मनोज की प्रतीक्षा करती रह
जाती है, किंतु मनोज नहीं आता। खदीजा है कि अंतिम क्षण भी
सोचती है, "मैंने उसकी ख्वाहिश पूरी की थी... हाँ... अब
चाहेगी... मनोज... आए गा...। जरूर... आए गा।" (पृ. 23)। विषयवस्तु और शिल्प, दोनों ही दृष्टियों से यह साधारण कहानी है, किंतु इसकी साधारणता देश और काल की सीमाओं से परे है, क्योंकि यह कहीं भी घट सकती है।
'भ्रूण-हत्या' कहानी उस बहस को केंद्र में रखकर लिखी
गई है, जो गर्भपात को कानूनी ठहराए जाने के बाद इस्लाम और
ईसाई धर्म के लोगों द्वारा शुरू की गई थी। पाठकों को स्मरण होगा कि इस पर सबसे
अधिक बावेला चर्च की ओर से खड़ा किया गया था। धर्म के इन ठेकेदारों का मानना था कि
किसी को भी इस संसार में जन्म लेने से रोकना बहुत बड़ा नैतिक अपराध है। जन्म देने
या मारने का अधिकार इस ब्रह्मांड को रचने वाली सत्ता के पास है। यदि मनुष्य किसी
को जन्म लेने से रोकता है, तो वह उस परम सत्ता की व्यवस्था
में अनैतिक रूप से हस्तक्षेप करता है तथा जीव हत्या के पाप का भागी बनता है। दूसरी
ओर वे लोग थे, जो यह मानते थे कि जनसंख्या वृद्धि रोके बिना
इस संसार को भयानक विनाश के कगार से पीछे नहीं लौटाया जा सकता। उनकी दृष्टि में
जनसंख्या नियंत्रण के सभी संभव उपाय अपनाए जाने चाहिए।
भ्रूण
हत्या इन दोनों पक्षों को बड़े संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करती
है। डॉ. कमला को जब गर्भपात के संबंध में ड्यूटी पर जाना होता है, तो वह बहुत दुःखी होती है— "डॉ. कमला विक्षिप्त सी हो उठी, नहा धो के पतली काफी पाउडर के रंग की साड़ी पहनकर ऑपरेशन थियेटर की ओर चली।
बेहद दुःख के समय ही वह ऐसी साड़ी पहना करती थी। सखियों और बंधुओं की मृत्यु में
यही साड़ी पहनकर जाती थी।" (पृ. 26)। डॉ. कमला अपने उन संस्कारों के कारण
दुःखी है, जो बिना किसी तर्क का आधार लिए केवल धर्म और
नैतिकता के सहारे टिके रहते हैं। एक डॉक्टर होने के बावजूद उसके परंपरागत संस्कार
उसकी वैज्ञानिक चेतना से अधिक बलवान हैं।
जब
कमला अस्पताल पहुँचती है, तो उसके सामने गर्भपात के
अनेक यथार्थ कारण आते हैं। एक लड़की इसलिए गर्भपात कराना चाहती है कि वह अपनी
क्षणिक भूल के कारण कुमारी अवस्था में ही गर्भवती हो गई है। अब वह अनिश्चित वस्तु
को फेंक देने में ही भलाई समझती है। एक गृहिणी इसलिए गर्भपात कराना चाहती है कि उसके
पहले से ही नौ में से सात बच्चे जीवित हैं। इतने बच्चों का पालन पोषण पर्याप्त
कठिन है। एक अन्य स्त्री काफी उम्र की है। उसकी बेटियों का विवाह हो चुका है। छोटे
चार बेटे भी हैं। इन सबके बीच वह इस बोझ को लेकर कैसे रहेगी। इस प्रकार के बीस केस
डॉ. कमला के समक्ष आते हैं।
इसके
पश्चात् कमला कुर्सी से पीठ टिका कर आँखे बंद कर लेती है। तब बहुत सारे भ्रूण उसके
सामने आकर खड़े हो जाते हैं। वे सब उसे पापिनी, कलंकिनी,
हत्यारिनी आदि मानते हैं। कहानीकार अंत में दोनों स्थितियों को
निष्कर्ष की ओर ले जाता है। डॉ. कमला के मन में आता है, "मैंने अपना कर्तव्य निभाया है। बधिक भी अपने पेशे के कारण निष्पाप है।
अपने देश की रक्षा के लिए हत्या भी पाप नहीं है।" (पृ. 29-30)। यह निष्कर्ष
पाठक पर थोपा हुआ प्रतीत होता है। वैसे भी धार्मिक संस्थाओं और वैज्ञानिकों के बीच
गर्भपात को लेकर छिड़ी जंग अभी तक भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है।
'ऊपर मुक्त आकाश नीचे बंजर धरती' जान एब्राहम और
एलिजाबेथ की कहानी है। एलिजाबेथ कलक्टर है और एब्राहम एक साधारण आदमी। दोनों असीम
प्यार में बँधे हुए विवाह करते हैं। प्रारंभ में सब कुछ ठीक चलता है। डॉक्टर
एब्राहम को इम्पोटेंट घोषित करता है, तो एलिजाबेथ उसे दिलासा
देती है— "डार्लिंग चिंता मत करो, जो ईश्वर ने नहीं
दिया, उस पर दुःख काहे के लिए। हम एक बच्चे को वारिस बनाएँगे।"
(पृ. 33)। यही एलिजाबेथ कुछ दिन बाद स्त्रियोचित निर्बलता का शिकार हो जाती है। संतानवती
होने की इच्छा उसके पूरे चरित्र को बदल देती है। एक दिन वह जॉन से कहती है—
"जॉन संतान के अभाव से मुझे संसार सूना-सूना सा लगता है। पैसे की कमी नहीं है, पदवी की कमी नहीं है। सुख का भी अभाव नहीं है, किंतु
संतान न हो तो माता-पिता के जीने से क्या लाभ।" (पृ. 34) और एक दिन एलिजाबेथ
जॉन को छोड़ कर डी.एस.पी. थॉमस के साथ ड्यूटी पर चली जाती है। वहाँ से लौट कर अपना
बिस्तर दूसरे बैडरूम में बिछा लेती है। जॉन को उसके कमरे में अकेला छोड़ देती है।
इसके बाद तो ऐलिजाबेथ का घर वेश्यालय का रूप ले लेता है— सफेद पोश वेश्यालय का,
"साल बीतते गए। एलिजाबेथ के रूममेट भी बदलते गए । मैंने गिनने
की चेष्टा नहीं की।" (पृ. 36)। कहानी में त्रासदी भरा मोड़ आता है; क्योंकि अनेक पुरुषों का संग करने पर भी एलिजाबेथ को संतान प्राप्त नहीं
होती, उल्टे एक दिन जाँच-पड़ताल के बाद डॉक्टर जॉन से कहता
है— "आपकी पत्नी हिजड़ा है, उसमें संतान उत्पन्न नहीं
होगी।" (पृ. 37)। दो जीवन एक साथ बर्बाद हो जाते हैं। जॉन एलिजाबेथ के लिए
भार बन जाता है और एलिजाबेथ जॉन के लिए। लेखक ने अपने कहानी-कौशल से जॉन की
मनःस्थिति, एलिजाबेथ के चरित्र और त्रासद विरूपताओं से स्त्री-पुरुष
के जीवन में आने वाली स्थूल व सूक्ष्म समस्याओं का गंभीर चित्रांकन किया है।
'अकेली' एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो रूढ़ सामाजिक बंधनों में पूरी तरह जकड़ी हुई है। मालिनी एक ऐसे जड़
सामाजिक बंधनों वाले परिवार की लड़की है, जहाँ स्त्रियों को
अन्य पुरुषों से वार्तालाप करने का भी अधिकार नहीं होता। ऐसे पिछड़ी मानसिकता वाले
परिवारों में यह माना जाता है कि लड़की को बाहरी लोगों से संपर्क नहीं बनाना चाहिए
तथा किसी परपुरुष को आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहिए। मालिनी इन रूढ़ संस्कारों में
इस कदर जकड़ी हुई है कि वह हॉस्टल में किसी से भी बात नहीं करती। हर समय अपने
साथियों से खिंची-खिंची रहती है और जब उस पर बहुत दबाव पड़ता है, तब भी वह अपने आप से कह उठती है— "मालिनी जरूर माँ की इच्छा पूरी करेगी।
किसी परपुरुष को आँख उठाकर भी नहीं देखेगी।" (पृ. 48)। वह केवल उस लड़के की
प्रतीक्षा में है, जो कभी उसके घर आया था और मालिनी का हाथ
अनजाने ही उसकी ओर बढ़ गया था। रंजित नाम का वह लड़का उसके मामा का पुत्र था। लेखक
ने इस कहानी में सामाजिक पिछड़ेपन और पुरातन विचारधारा के खोखलेपन को बहुत अच्छी
तरह दिखाया है। ऐसी सामाजिक स्थितियाँ सचमुच स्त्री जीवन को मनोवैज्ञानिक स्तर पर
अभावग्रस्त बना देती हैं और मानसिक रोग उत्पन्न करती हैं। यह कहानी दक्षिणी समाज
में प्रचलित विवाह व्यवस्था का संकेत भी करती है।
'बड़ी बेटी' दहेज प्रथा पर करारा व्यंग्य है। इतनी
प्रगति के बाद भी भारत में लड़की के विवाह में बहुत धन खर्च करना पड़ता है। यदि धन
न हो तो या तो लड़की को बेमेल विवाह के लिए सहमत होना पड़ता है या आत्महत्या करनी
पड़ती है। यदि कम दहेज में किसी प्रकार विवाह संबंध बन भी गया तो ससुराल वाले लड़की
को जला डालते हैं। हर स्थिति में धन के अभाव में लड़की मर ही जाती है। इस कहानी
में रमेश का पिता उसकी बहन श्यामा के विवाह के लिए कुछ पैसा जमा करता है, किंतु रमेश उस पैसे को चुरा कर
मुम्बई भाग जाता है। फलतः श्यामा का विवाह नहीं हो पाता। वह 30 साल की है। उसकी
छोटी बहिन भामा भी विवाह योग्य है। धीरे-धीर श्यामा अपने और अपने परिवार के यथार्थ
को समझती है तथा भीतर ही भीतर घुटने लगती है। अंत में वह तालाब में डूब कर
आत्महत्या कर लेती है। यह कहानी सामाजिक यथार्थ और ज्वलंत समस्याओं की ओर हमारा
ध्यान दिलाती है। इस कहानी में केरल के घरों का चित्रण भी वहाँ के जीवन यथार्थ को
प्रस्तुत करता है। लेखक अपनी कथा के केंद्रीय पात्र के घर का चित्रण इस प्रकार
करता है "घर क्या, नारियल के पत्तों की झोंपड़ी थी। एक
कमरा, आगे-पीछे खुले वरांडे, पिछवाड़े
में रसोई होती थी। सामने में मर्द सोते थे, अतिथियों की पूजा
होती थी। घर के दो दरवाजे थे, एक सामने खुलता था, एक पीछे की ओर, दो झरोखे थे,
उनको बंद करने का उपाय नहीं था, मिट्टी की दीवारों पर छप्पर
नारियल के पत्तों से छाया हुआ था।" (पृ. 52)।
'नील गगन नील समुंदर' केरली समाज के मछुआरों में
व्याप्त अंधविश्वासों को सामने लाती है। मछुआरा समाज में दैनिक जीवन और व्यवसाय के
संबंध में अनेक प्रकार के अंधविश्वास प्रचलित हैं— "सारे अराये लोग
अंधविश्वासी हैं। नहाने के लिए शकुन देखते हैं। उनका एतबार है कि अशुभ शकुन पर
समुद्र की यात्रा करने से जोखिम होगा, सब डूब मरेंगे,
मछली को बुरे शकुन पर मारने-सुखाने से उसमें कीड़े पड़ते हैं।"
(पृ. 58)। अंधविश्वासों की यह एक झाँकी है।
और भी बहुत से अंधविश्वास केरल में प्रचलित हैं, जैसे- जब
पुरुष समुद्र में मछली पकड़ने जाते हैं, तो स्त्रियाँ पति की
पूजा करके घर में बैठ जाती हैं। एक धारणा यह भी है कि अल्वि के दिन यदि कोई अपनी
पत्नी को छूकर मछली पकड़ने जाएगा तो सागर माता क्रोधित हो जाएगी। सागर माता के
क्रोधित हो जाने पर उसे पेट भर ताड़ी पिलाने, पायस खिलाने और
मछली भून कर अर्पित करने से का अंधविश्वास भी अरय समाज में है। लेखक ने इस कहानी
में इनका चित्रण किया है।
'ऊपर जल था नीचे जल था' कहानी व्यक्ति की कल्पना, महत्त्वाकांक्षा और उसके टूट जाने पर उत्पन्न दारुण पीड़ा को प्रदर्शित
करती है। कथा-नायक बहुत से नारियल के पेड़ लगाता है, जिन्हें
वह अपनी संतान की भाँति पालता है। उसकी पत्नी उन पेड़ों और अपनी जमीन को पति से भी
अधिक प्यार करती है। वह उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहती। नारियल के वे पेड़
केवल भावनात्मक संतोष ही नहीं देते, बल्कि आर्थिक समृद्धि का
स्वप्न भी पूरा करते हैं। किंतु यही स्वप्न उस समय टूट जाता है, जब उस इलाके में भयंकर बाढ़ आ जाती है। नायक का नारियल का बगीचा
नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। उसकी पत्नी भी बाढ़ की चपेट में आ जाती है। नायक अकेला
खड़ा रह जाता है--- दुःखी, निराश,
हताश और बेबस। यह कहानी किसी सपने के टूटने या महत्त्वाकांक्षा के
ध्वस्त होने से उत्पन्न पीड़ा को ही प्रकट नहीं करती, बल्कि
इसमें अपनी मिट्टी, अपने परिश्रम और अपने लगाए पेड़ों से
बहुत गहरा जुड़ाव भी है। यह जुड़ाव ऊपरी नहीं, बल्कि आत्मा
का जुड़ाव है। अपने होने और अपनी सार्थकता के लिए व्यक्ति जिस प्रकार अपनी मिट्टी,
अपनी जड़ों की ओर लौटता है, वह जुड़ाव इस
कहानी में है। नायक की पत्नी कहती है- "मैं इन कामधेनुओं को छोड़ कहीं नहीं
जाऊँगी, मरूँगी तो भी इसी की मिट्टी में मिट्टी हो जाऊँगी।
ये नारियल के पेड़ मेरी संतान हैं। मेरी सुनते हैं, फल देते
हैं।" (पृ. 70)। अपनी मिट्टी से यह जुड़ाव इस कहानी को द्वादशी संग्रह को
विशिष्ट कहानी बना देता है।
'सुंदरिया' शुद्ध रूप से मानवी संवेदनाओं की कहानी
है। केरल के समाज में यह अंधविश्वास प्रचलित है कि जिस घर में बिल्ली आ जाती है,
वहाँ विवाह होता है और जिस घर में कुत्ता आ जाता है, वहाँ मौत होती है। कुत्ते को यमदूत कहा जाता है। कथा-नायक के यहाँ कुत्ता
और बिल्ली बारी-बारी से आते हैं। बिल्ली आने पर कथा-नायक की पत्नी बहुत प्रसन्न
होती है। उसकी संतानें भी स्वाभाविक प्रसन्नता प्रकट करती हैं। सुंदरिया को बड़े
लाड़-प्यार से रखा जाता है। किंतु कुत्ता
आने पर वह अपनी नाक-भौंह सिकोड़ती है। केवल कथा-नायक ही उसे प्रेम करता है और
सुंदरिया के वज़न पर उसका नाम सुंदर रखता है। इन दोनों प्राणियों को लेकर परिवार
भावनात्मक दृष्टि से विभक्त हो जाता है। सुंदर से कथानायक की भावनाएँ जुड़ जाती
हैं और सुंदरिया से परिवार के शेष सदस्यों की भावनाएँ। यहाँ तक कि सुंदर के भोजन
के लिए भी कथा-नायक को अनशन करना पड़ता है। अंत में सुंदर पागल हो जाता है और नायक
को छोड़कर सभी को काट लेता है, सुंदरी को भी। यह कहानी अन्य
प्राणियों के साथ मनुष्य के भावनात्मक संबंधों का चित्रण भी करती है और
अंधविश्वासों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को भी दर्शाती है।
'देवा मौसी' एक गूँगी स्त्री की कहानी है, जो अपने पति की मृत्यु पर भीतर से टूट जाती है और अपनी संतान के डूब कर मर
जाने पर भोजन-पानी छोड़कर स्वयं भी मर जाती है। यह कहानी भी मानवीय संबंधों के
अत्यधिक भावुक पक्ष तथा उसके मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को दर्शाती है। जब
व्यक्ति एक के बाद एक त्रासदी का शिकार होता है, तो वह इतना
अधिक क्षुब्ध हो उठता है कि अपने से ही प्रतिशोध लेने लगता है। कथा की केंद्रीय
पात्र के मन में उठा यह प्रश्न पाठक को झकझोरे बिना नहीं रहता कि "मर कर उसने
किससे प्रतिशोध लिया? अपने से? गाँव से?
संसार से? खुद से?" (पृ. 86)।
'कसाई की बेटी' अशिक्षा और अज्ञान से उत्पन्न मानसिक
पिछड़ेपन तथा चरित्र पर उसके प्रभाव को दिखलाती है। मुस्तफा एक कसाई है, जो अपने हिंसक व्यवसाय के बावजूद भीतर से कोमल है। इतना अवश्य है कि जब
उसे क्रोध आता है, तो वह हिंसक बाघ से भी अधिका भयंकर हो
उठता है। मुस्तफा अपने परिवार को बहुत प्यार करता है, विशेषकर
अपनी बेटियों को प्राणों से भी अधिक चाहता है। वह अशिक्षित होने के कारण यथार्थ
स्थितियों पर विचार नहीं करता। अपनी बेटियों का विवाह अपनी मर्जी से करने की पुरानी
परंपरा पर कायम रहना चाहता है। जब उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी विवाह के संबंध
में अपनी लड़की से भी राय लेना चाहती है, तो मुस्तफा पर
आसमान टूट पड़ता है। वह सोचता है कि उसने अपनी लड़की आयशा का विवाह अपनी दुकान पर
काम करने वाले लड़के हमीद से करने का विचार किया है। इसमें न आयशा से पूछने की
आवश्यकता है, न किसी अन्य से। उधर आयशा हमीद से विवाह नहीं
करना चाहती, क्योंकि वह एक अन्य युवक रशीद से प्रेम करती है।
जब वह कोई उपाय नहीं देखती, तो रशीद के साथ घर से भाग जाने
की योजना बनाती है। मुस्तफा इस दुस्साहस पर पागल जैसा हो जाता है और आयशा तथा रशीद
के सिर काट डालता है। इसके बाद वह भी कहीं चला जाता है।
'बेरोजगार' कहानी बेरोजगारी की समस्या के नितांत
मनोवैज्ञानिक पक्ष को उजागर करती है। विनोद बेरोजगारी से तंग आ गया है। वह एक दिन
झूठे हस्ताक्षर करके अपने पड़ोसी के नाम आए मनीआर्डर के पचास रुपये हड़प लेता है।
अंत में वह हिप्पियों के चंगुल में फँस जाता है। वहाँ से वह नशे की हालत में घर लौटता
है और हाथ में पकड़ी हुई बोतल मरी हुई माँ के मुँह में लगा देता है। यह कहानी
बेरोजगारी जैसी समस्या के शिकार लोगों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करती है। इसमें
दिखाया गया है कि भूख और अभावजन्य स्थितियाँ मनुष्य की ईमानदारी तथा उसके नैतिक
मूल्यों को खा डालती हैं। भूख का शिकार व्यक्ति पाप करने से पूर्व थरथराता है,
किंतु भूख के दबाव में उसे
कर ही डालता है। उसके बाद वह कहीं से भी सामान्य आदमी नहीं रहता।
संग्रह
की अंतिम व शीर्षक कहानी 'द्वादशी' है। यह मानवीय संबंधों के कोमल पक्ष को ही मुख्य रूप से चित्रित करती है।
इसमें माता-पुत्र के संबंधों को बहुत संवेदनशील ढंग से चित्रित किया गया है। यह
कहानी आज के सामाजिक वातावरण में संबंधों की गरिमा और उनके भावात्मक परिवेश की
सुरक्षा की आवश्यकता प्रतिपादित करती है।
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