भारदियार् कविदैहल् (सुब्रह्मण्य भारती, अनुवाद : आचार्य ति. शेषाद्रि)
भारदियार् कविदैहल्
सुब्रह्मण्य भारती
अनुवाद : आचार्य ति. शेषाद्रि
भुवनवाणी ट्रस्ट
मौसम बाग (सीतापुर रोड)
लखनऊ- 226020
प्रथम संस्करण- 1984-85, पृष्ठ- 1105, मूल्य- 100 रुपए
भारदियार्
कविदैहल् में भारतीय अस्मिता के प्रतिनिधि कवि सुब्रह्मण्य भारती की लगभग सभी
कविताएँ संग्रहीत हैं। भुवनवाणी ट्रस्ट की परंपरा के अनुसार मूल और अनुवाद
आमने-सामने मुद्रित किए गए हैं। इस ग्रंथ के अनुवादक आचार्य ति. शेषाद्रि
ने अपनी सारगर्भित भूमिका में यह स्पष्ट किया है कि भारती की कविताओं को वर्ण्य
विषय के आधार पर पाँच वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- (1) देश-प्रेम, देशभक्ति और राष्ट्र के अतीत एवं वर्तमान के महापुरुषों के गीत, (2) ईश्वर- प्रेम संबंधी गीत, (3) प्रकृति-प्रेम
संबंधी गीत, (4) प्रेम संबंधी गीत, (5)
विविध गीत।
समृद्ध
और मौलिक रचनात्मक प्रतिभा के धनी 'भारती'
का जन्म 11 दिसंबर, 1882 को तमिलनाडु के
तिरुनेलवेलि ज़िले के एट्टयपुरम् नगर में हुआ था। उनके पिता तमिल और अंग्रेजी के
प्रकांड विद्वान थे। स्वाभाविक रूप से परिवार का वातावरण विद्या और ज्ञान की सुगंध
से भरा हुआ रहा होगा। इसीलिए किशोरावस्था आते-आते भारती ने अपनी कवित्व प्रतिभा से
उन दिनों के स्थापित और प्रतिष्ठित कवियों पर प्रभाव छोड़ना प्रारंभ कर दिया था।
उनका जीवन बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा। वे कभी भी सुव्यवस्थित नहीं रह सके। वैसे भी
स्वभाव से ही विद्रोही और क्रांतिकारी होने के कारण वे अनवरत शांत जीवन नहीं जी
सकते थे। बचपन में उन्हें अंग्रेजी पढ़ने के लिए बाध्य किया गया, तो वे जीवन भर के लिए अंग्रेजी शिक्षा के प्रति अरुचि की भावना से ग्रस्त
हो गए । बड़े होकर उन्होंने ‘इंडिया’
नामक तमिल तथा ‘बालभारत’ नामक अंग्रेजी
पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। वे ‘स्वदेश मित्रन्’ से भी जुड़े, फिर भी उन्हें चैन नहीं मिला। उनके मन
में कुटिल-नीति का सहारा लेने वाले अंग्रेजी शासन के प्रति जो घृणा भरी हुई थी,
उसने उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध कर दिया। बदले में अंग्रेजी सरकार
उनके पीछे पड़ गई। परिणाम यह हुआ कि उन्हें मद्रास छोड़कर पांडिचेरी में शरण लेनी
पड़ी। वहाँ रहते हुए उन्हें और उनके परिवार को भयंकर आर्थिक कष्ट झेलने पड़े।
अंततः 11 सितंबर, 1921 ई. को वे यह संसार छोड़ गए ।
सुब्रह्मण्य
भारती की कविताओं की चर्चा करने से पहले उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय भारती के
काव्य के वास्तविक और विस्तृत फलक को समझने में सहायक बन सकता है। भारती के काव्य
का एक अंश ऐसा है, जिसमें तमिल भाषा और तमिलनाडु
के प्रति गौरवबोध भरा हुआ है। उदाहरण के लिए- "तमिलनाडु यह नाम घोलता सुधा
हमारे कानों में/पितृ देश यह नाम शक्ति भरता साँसों (की तानों) में/तिरुक्कुरल् के
अमर रचयिता हुए सुकवि वल्लुवर यहीं/मणिमाल शिलप्पाधिकार सदृश से समलंकृत शुचि भूमि
यहीं" (पृ. 99)। इसी प्रकार भारती ने तमिल भाषा का गुणगान तथा उसकी और अधिक समृद्धि
का आह्वान इन शब्दों में किया है- "तमिल समान मधुर भाषा नहीं विश्व में कोई
है/करो प्रचार विश्व में इसका (क्यों चेतनता सोई है)/अन्य देश के श्रेष्ठ ग्रंथ ले
तमिल में अनुवाद करो/नूतन श्रेष्ठ अमर ग्रंथों से तमिल का भंडार भरो" (पृ.
105)। भारती की कविताओं में तमिल जाति के प्रति भी अतिशय प्रेम की भावना प्रकट की
गई है। उन्होंने “भूमंडल के सब देशों में फैली तमिल जाति (सुंदर)" (पृ. 111)
तक कहा है। इस प्रकार की अभिव्यक्तियों का सहारा लेकर कई बार यह सिद्ध करने का
प्रयास किया जाता है कि भारती तमिल प्रदेश, तमिल भाषा और
तमिल जाति के प्रति बहुत अधिक अभिमान से भरे हुए थे; अतः
उनके काव्य का परिदृश्य विशाल नहीं था। लेकिन इस प्रकार के अभिमतों पर पुनर्विचार की
आवश्यकता प्रतीत होती है।
हमारा
स्पष्ट कहना है कि इस कसौटी को आधार बनाकर भारती का सही मूल्यांकन नहीं किया जा
सकता। इसका मुख्य कारण तो यह, कि भारती ने जितनी
कविताएँ तमिल प्रदेश, तमिल भाषा और तमिल जाति के लिए लिखी
हैं, उससे कहीं अधिक कविताएँ भारत देश के लिए रची हैं। वे एक
कविता में कहते हैं- "मंजु मुकुट मणि सब देशों में भारतवर्ष हमारा है/आन
(बान) में ज्ञान ध्यान में मान (शान) में श्रेष्ठ यही/अन्न दान में सुधा सरीखे
काव्य ज्ञान में श्रेष्ठ यही/(सभी सद्गुणों का सागर है सब देशों से न्यारा)"
(पृ. 49)। भारती अपनी इस कविता में बताते हैं कि ‘भारतवर्ष
वीरता, धीरता, कोमलता और संकल्प की
घरती है, यह धन-धान्य, वैभव, बल-विक्रम, उत्साह, विचार,
भुजबल आदि में श्रेष्ठ है। यह सत्यनिष्ठ कवियों, तपस्वियों, भक्तों, ज्ञानियों
की भूमि है। इसके वन-उपवन फल-फूलों से लदे हैं और यह प्रकृतिप्रिया का प्रिय
क्रीड़ांगन है।‘ भारत देश के विषय में भारती की यह कल्पना
उनकी दूसरी कविताओं में और नये-नये रूप धारण करके आई है। स्मरणीय है कि
सुब्रह्मण्य भारती ने बंकिम रचित गीतों के तमिल अनुवाद किए थे, इनमें से जातीय गीत ‘वंदेमातरम्’ को उन्होंने एकाधिक बार अनूदित किया था। यह अनुवाद इतना सक्षम है कि उस
अनुवाद के आधार पर आचार्य शेषाद्रि ने फिर से जो हिंदी अनुवाद किया है, वह भी अद्भुत आनंद प्रदान करता है। उदाहरण के लिए अग्रांकित अंश देखा जा
सकता है--- "शुभ्र चाँदनी से पुलकित रजनी वाली भारत माता/फूले फले दुमों के
दल से छविशाली भारत माता/मधुर भाषिणी सुहासिनी की सुखदाता वरदाता की/(एक साथ सब
करो वंदना) जय-जय भारत माता की।" (पृ. 95)।
इस
प्रकार की उदात्त भावनाओं वाली कवितायें यह सिद्ध करती हैं कि सुब्रह्मण्य भारती
सीमित परिदृश्य या संकुचित दृष्टि के कवि नहीं थे। वे संपूर्ण भारत और समग्र
भारतीयता के कवि थे। जिन लोगों को भारती के तमिल प्रेम और उनके राष्ट्र प्रेम में
विरोधाभास दिखाई देता है, उन्हें उन परिस्थितियों का
वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, जो भारती के जन्म के समय
थीं और जिनसे वे जीवन भर घिरे रहे। भारती के जन्मकाल का भारत 1857 के स्वाधीनता
संग्राम के परिणाम से उत्पन्न पीड़ा के साथ ही उससे उत्पन्न आत्म-सजगता की भावना
वाला भारत था। उस स्वाधीनता संग्राम के परिणाम ने भले ही भारतवर्ष को राजनैतिक
स्वतंत्रता से दूर रखा, किंतु उसने भारत के लोगों को अपने अतीत में झाँकने और
अपने भीतर स्वदेशाभिमान का भाव जगाने का अवसर भी दिया। यह एक प्रकार से इतिहास का
संक्रमण काल था। एक बड़ी घटना ने हमारी भीतरी शृंखलाओं को तोड़ डाला था। तत्कालीन
साहित्य में इन प्रभावों को सरलता से देखा जा सकता है। इतिहास के अध्येताओं को
स्मरण होगा कि 1857 के संग्राम के पश्चात हिंदी कवि भारतेन्दु ने स्वदेश और स्वभाषा का प्रश्न
बहुत गंभीरता से उठाया था। निज भाषा के प्रति गर्व का आह्वान करने वाले वे पहले
कवि थे। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि निज भाषा ज्ञान के बिना न तो उन्नति हो
सकती है और न हृदय की पीड़ाएँ शांत हो सकती हैं। उनका आह्वान इतना मनोवैज्ञानिक और
प्रभावशाली था कि उसने भारत के सभी क्षेत्रों के लोगों को प्रभावित किया।
सुब्रह्मण्य भारती के यहाँ तमिल भाषा का जो गौरव-गान मिलता है, वह वास्तव में ‘निज भाषा प्रेम’ से जुड़ा हुआ है। जैसे भारतेन्दु का निज भाषा प्रेम सांप्रदायिक या
संकुचित नहीं माना जाता, वैसे ही भारती का निज भाषा प्रेम भी
संकुचित नहीं है और जैसे भारतेन्दु निज भाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं के विरोधी
नहीं थे, वैसे ही भारती भी नहीं थे। हिंदी के लिए तो सुब्रह्मण्य भारती ने अनुकरणीय संघर्ष
भी किया था। ‘इंडिया’ में वे बार-बार
लिखते थे कि अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी को संपर्क-भाषा के रूप में स्वीकार किया
जाना चाहिए।
भाषा
की भाँति ही तमिल प्रदेश और तमिल जाति के प्रति भारती की कविताओं में जो गौरवबोध
मिलता है, वह भी संपूर्ण भारत जाति या मानव जाति अथवा संपूर्ण भारत या संपूर्ण
विश्व के विरोध पर नहीं टिका है। इसके विपरीत वह तमिल जाति और तमिल भाषा की साधना
करते हुए भारत जाति और समस्त भाषाओं के प्रति विशेषकर राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति
प्रेम प्रकट करते हैं। वस्तुतः उनके द्वारा प्रयुक्त जाति शब्द आधुनिक काल में
प्रयुक्त जाति की भाँति संकुचित नहीं है, बल्कि वह एक
विशिष्ट भाषा समाज का द्योतक है। ऐसे भाषा समाज हिंदी को छोड़कर दूसरे भी हैं,
जैसे कन्नड जाति, तेलुगु जाति (या आंध्र)
मराठी जाति आदि। ये सब जातियाँ भाषा और उसे बोलने वाले व्यापक समाज की सूचक हैं।
यही कारण है कि इन्हें राष्ट्र या मानवता के विरोध में खड़ा हुआ नहीं माना जा
सकता। अतः सुब्रह्मण्य भारती के यहाँ तमिल भाषा समाज और सर्वभारतीय समाज के बीच
समन्वयात्मक संबंध है।
भारती
ने अपनी राष्ट्रीय कविताओं में भारतीयों की दुर्दशा का पर्याप्त चित्रण किया है।
जब उन्होंने होश संभाला, तो अंग्रेजी शासक इस देश को
अपने अत्याचारों से खोखला करने में जुटे हुए थे। आर्थिक शोषण के साथ-साथ वे इस देश
के सांस्कृतिक और वैचारिक वैभव को नष्ट करने पर तुले हुए थे। भारती ने स्वयं ऐसे
वातावरण में अपने देश के लोगों को घुट-घुटकर मरते हुए देखा था। इस परिवेश की प्रतिक्रिया
भारती की कविताओं में देखने को मिलती है। वहाँ हम अत्याचारों की कथाएँ पाते हैं और
दासता की पीड़ा को व्यापक रूप में देखते हैं। ऐसी कविताओं का एक पक्ष और है। वह है, भारतीयों की दुर्दशा के लिए स्वयं उन्हें ही उत्तरदायी बताना। हमारी
दासता के लिए जितने अंग्रेज जिम्मेदार थे, उतने ही हम लोग
स्वयं भी। भारती स्पष्ट कहते हैं कि अशिक्षा, अज्ञान,
अंधविश्वास, कायरता आदि बुराइयाँ भारतीयों की
दुर्दशा का कारण हैं। पारस्परिक फूट, भेदभाव, शत्रुता और अंधविश्वास भारतीयों को स्वतंत्र होने से रोक रहे हैं। एक
स्थान पर वे कहते हैं- "भेदभाव शतकोटि (भिन्न हैं भाई-भाई)/साँप पाँच सिर
वाला है यदि पिता बताता/छः सिरवाला साँप पुत्र उसको बतलाता/बीज सदा के लिए बैर का
है पड़ जाता/(दीन दशा को देख) नहीं है मन सह पाता।" (पृ. 85)। समाज और
राष्ट्र की दुर्दशा के मूल कारण को खोजकर स्वाधीनता के मार्ग का निर्माण करना
भारती की कविताओं की प्रमुख विशेषता है। इसी के पश्चात उनकी वे कविताएँ आती हैं, जिनमें स्वतंत्रता की व्याकुलता विद्यमान है। वे स्वतंत्रता की प्यास
शीर्षक कविता में कहते हैं "स्वतंत्रता की प्यास बुझेगी कब
(परमेश्वर!)/छूटेगा दासता मोह कब (हे अखिलेश्वर!)" (पृ. 123)।
भारती
के यहाँ राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े महापुरुषों पर भी कविताएँ मिलती हैं तथा उस
आंदोलन को प्रेरणा देने वाले इतिहास पुरुषों पर भी। छत्रपति शिवाजी, साधु गोखले, गुरु गोविन्द सिंह, चिदम्बरम पिल्लै, महात्मा गाँधी, दादाभाई नौरोजी आदि से संबंधित कविताएँ इसी प्रकार की हैं। भारती ने
देशभक्तों का भाँति-भाँति की भावनाओं से सम्मान करते हुए ढोंगी देशभक्तों की
निन्दा भी की है। उनकी एक कविता इस प्रकार प्रारंभ होती है- "मन में साहस
नहीं सरलता चतुराई से कोसों दूर/अरे शुकी! ये वंचक वक्ता हैं केवल बातों के
शूर/भीड़-भाड़ में बहुत बकेंगे पर न ध्यान में लायेंगे/अरी शुकी ये पल भर में ही
बातें सभी भुलायेंगे!" (पृ. 157)। ये
पंक्तियाँ भारती की सूक्ष्म यथार्थपरक दृष्टि और उनकी व्यंग्यात्मक क्षमता को भी
प्रमाणित करती हैं।
सुब्रह्मण्य
भारती का मुख्य स्वर यद्यपि राष्ट्रीयता का है, किंतु उन्होंने दर्शन, नीति,
समाज, प्रेम, प्रकृति
आदि से संबंधित कवितायें भी रची हैं। उनके यहाँ नारी मुक्ति संबंधी कविताओं का भी
अभाव नहीं है। इस प्रकार वे अपने समय की कव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते
हैं।
आचार्य
शेषाद्रि ने भारती की समस्त कविताओं का अनुवाद जिस रूप में प्रस्तुत किया है वह
उनके भाषा ज्ञान के साथ-साथ उनकी राष्ट्रीय निष्ठा को भी दर्शाता है। तमिल के
साथ-साथ ही हिंदी भाषा पर भी उनका असाधारण
अधिकार है। ये कविताएँ निश्चय ही हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि में सहायक होंगी।
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