व्याकरणिक कोटियों का अध्ययन (डॉ. एस. तोम्बा सिंह)

 

व्याकरणिक कोटियों का अध्ययन

एस. तोम्बा सिंह

 

 

ज्ञान भारती, 4/14, रूपनगर, दिल्ली-7

प्रथम संस्करण 1984, पृष्ठ-233, मूल्य 70 रुपए

 

यदि राजनैतिक मतवादों की भीड़ से अलग हटकर सोचा जाए  तो हिंदी  शताब्दियों से इस देश की सांस्कृतिक भाषा का दायित्व निभा रही है। इसीलिए हिंदी सीखने-सिखाने की परंपरा कोई नई नहीं है और न उसका श्रीगणेश आधुनिक काल में हिंदी  प्रचार आंदोलन के साथ ही जुड़ा है। शताब्दियों पहले से भारत के, उनमें भी विशेषकर उत्तर भारत के धार्मिक स्थल लोगों को हिंदी  सिखाने का कार्य कर रहे हैं। तीर्थयात्री भाषा को लेकर किसी संकोच या सांप्रदायिकता के शिकार नहीं होते। वे आवश्यकता और सुविधा के नियम का पालन करते हुए कामचलाऊ हिंदी  सीख लेते हैं।

हिंदी प्रचार आंदोलन प्रारंभ होने और हिंदी  के भारतीय संघ की राजभाषा बनने के पश्चात् विधिवत् हिंदी  शिक्षण प्रारंभ हुआ। हिंदी  क्षेत्रों के साथ हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के लोगों को हिंदी  सिखाने के लिए सरकारी स्तर पर और हिंदी  की स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा बड़ी मात्रा में हिंदी  शिक्षण केंद्र  खोले गए। इससे हिंदी  का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ और लोगों में हिंदी  सीखने का उत्साह बढ़ा। जब से हिंदी  के माध्यम से नौकरियाँ मिलने के अवसर सामने आए, तब से हिंदी  पढ़ने-पढ़ाने और हिंदी  प्रचार के क्षेत्र में पर्याप्त गतिविधियाँ होने लगीं। आज स्थिति यह है कि भारत ही नहीं, विश्व भर में अनेक जगह द्वितीय भाषा या अन्य भाषा के रूप में हिंदी  शिक्षण संपन्न हो रहा है।

हिंदी  की इस प्रगति के साथ ही अनेक कठिनाइयाँ भी प्रकट हो रही हैं। जो शिक्षार्थी ऐसे भाषा परिवारों से संबंधित हैं, जिनका हिंदी भाषा से बहुत दूर का संबंध है, उनकी कठिनाइयाँ और भी अधिक हैं। इस दृष्टि से मणिपुरी भाषाभाषी लोगों के लिए हिंदी सीखना अपेक्षाकृत कठिन है। हिंदी भाषा भारोपीय परिवार को भाषा है, जबकि मणिपुरी तिब्बत बर्मी परिवार की उपशाखा कुकिचिन से संबंधित है। इन दोनों भाषाओं में समानताएँ बहुत कम हैं, जबकि विषमताओं की संख्या अधिक है। इस कारण मणिपुरी भाषी लोग हिंदी  से अगाध प्रेम रखते हुए भी उसे सीखते समय कष्ट का अनुभव करते हैं।

डॉ. एस. तोम्बा सिंह ने इसी कठिनाई को ध्यान में रखते हुए हिंदी  और मणिपुरी व्याकरणिक कोटियों का तुलनात्मक अध्ययन किया है। उनका मुख्य उद्देश्य यह है कि हिंदी  और मणिपुरी के व्याकरण की तुलना करके दोनों के साम्य वैषम्य को प्रस्तुत किया जाए, ताकि हिंदी सीखने के इच्छुक व्यक्ति सुविधा अनुभव कर सकें। जहाँ तक इन दोनों भाषाओं के व्याकरण का प्रश्न है, दोनों के संबंध में स्वतंत्र रूप से काफी कार्य हो चुका है। हिंदी  में तो व्याकरण संबंधी चिन्तन की समृद्ध परंपरा है ही मणिपुरी व्याकरण के संबंध में भी युमजाओ सिंह, नंदलाल शर्मा, कालाचाँद शास्त्री, द्विजमणिदेव शर्मा, डब्ल्यू पिटि गुरु आदि ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। अभी तक इन दोनों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं हुआ था; इसीलिए डॉ. तोम्बा सिंह का यह कार्य ऐतिहासिक महत्त्व का है।

इस शोध ग्रंथ में व्याकरण संबंधी तुलना के अतिरिक्त हिंदी  मणिपुरी प्रदेशों व दोनों भाषाओं की ऐतिहासिक जानकारी भी दी गई है। दोनों भाषाओं की ध्वनियों, रूप रचना, शब्दावली, वाक्य संरचना, पुरुष, वचन, कारक, काल आदि का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। अपनी विशेषताओं के कारण यह ग्रंथ अध्ययनीय है। इसे पढ़कर मणिपुर की भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक और सामाजिक स्थिति की जानकारी भी की जा सकती है। मणिपुर के इतिहास का परिचय देते हुए इस ग्रंथ में कहा गया है- "मणिपुर एक लंबे समय तक राजतंत्र प्रदेश रहा। समय के परिवर्तन ने इस परंपरावादी शासन प्रणाली को समाप्त कराया अर्थात् यहाँ के घरेलू कलह के कारण पड़ौसी साम्राज्यवादी अंग्रेजों को हस्तक्षेप करने का मौका मिला। फिर भी यहाँ की जनता और अंग्रेजों के बीच एक लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा, आखिर साम्राज्यवादियों के सामने झुकना पड़ा। 27 अप्रैल 1891 में मणिपुर पराधीन हो गया और यहाँ के राजा कुलचंद्र सिंह को आजीवन कारावास की सजा दी गई। (पृ. 4) लेखक ने मणिपुरी भाषा के इतिहास पर भी संक्षिप्त प्रकाश डाला है। उसने माना है कि यद्यपि ईसा की पहली शताब्दी में मणिपुरी भाषा अस्तित्व में आ गई थी, किंतु उसका वास्तविक रूप पाँचवीं से आठवीं शताब्दी के मध्य विकसित हुआ।

यह आवश्यक है कि इस प्रकार के तुलनात्मक अध्ययन अधिकाधिक मात्रा में किये जाएँ । इनसे समस्त भारतीय भाषाएँ हिंदी  के निकट आएँगी और हिंदी का अखिल भारतीय व्यक्तित्व पुष्ट होगा।

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