संत ज्ञानेश्वर : जीवन और कार्य (संपादक : चंद्रकान्त बांदिवडेकर)

 

संत ज्ञानेश्वर : जीवन और कार्य

संपादक : चंद्रकान्त बांदिवडेकर

 

मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई की ओर से,

वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-2

प्रथम संस्करण- 1988, पृष्ठ- 288,  मूल्य- 125 रुपए

 

संत ज्ञानेश्वर के जीवन और कार्यों से जुड़े इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ का संपादन डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर ने किया है। इसमें दो खंड हैं। पहले खंड में संत ज्ञानेश्वर के जीवन और उनके कार्यों की जानकारी है, जबकि दूसरे खंड में भारतीय भाषाओं में ज्ञानेश्वर शीर्षक से व्यापक परिप्रेक्ष्य में संत ज्ञानेश्वर को जाँचा परखा गया है। संत ज्ञानेश्वर अपने युग के सजग और क्रांतिकारी संस्कृति-पुरुष थे। वे समाज सुधारक, दार्शनिक और तत्त्वज्ञाता होने के साथ-साथ प्रतिभावान कवि भी थे। ज्ञानेश्वर का तत्त्वज्ञान विषयक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, ज्ञानेश्वरी। यह ग्रंथ अद्भुत सामाजिक दृष्टि संपन्न है। जिस समय ज्ञानेश्वर के आसपास का वातावरण पीड़ितों और वंचितों की आह से व्याकुल था, उस समय उन्होंने अपने इस ग्रंथ के माध्यम से शांति समानता और भेद-भाव विहीन धार्मिक आस्था का प्रचार किया। कहा जाता है कि संत ज्ञानेश्वर के साथ अनेक ऐसे संत जुड़ गए  थे, जिन्हें उन दिनों के समाज में हीन जातीय माना जाता था। ये सभी बिट्ठल भक्ति में मगन हो गए और समाज को नई दिशा दी। यह भक्ति के लोकपक्षीय होने का उल्लेखनीय उदाहरण है। संत ज्ञानेश्वर ने अपने भक्ति-दर्शन में सगुण-निर्गुण और द्वैत-अद्वैत के बीच समन्वय स्थापित किया। इसके साथ ही वे प्रवृत्तिपरता के भी पक्षधर थे। संत ज्ञानेश्वर ने भक्ति और साधना के क्षेत्र में ब्राह्मण और शूद्र को समान दर्जा दिया है। संत ज्ञानेश्वर का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि जब उनका जन्म हुआ, तो भक्ति आंदोलन एक जन-आंदोलन का रूप ले रहा था। ज्ञानेश्वर ने इस जन-आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

संत ज्ञानेश्वर ने दर्शन, भक्ति और नीति साहित्य के साथ ही पारंपरिक सृजनात्मक-साहित्य भी रचा है। उनके काव्य में प्रकृति प्रेम झलकता है। कहा जा सकता है कि संत ज्ञानेश्वर एक ओर दार्शनिक थे, तो दूसरी ओर कवि। उनके दोनों ही रूप लोकप्रिय हुए।  डॉ. बांदिवडेकर द्वारा संपादित इस पुस्तक में संत ज्ञानेश्वर के साहित्यिक महत्त्व पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

इस ग्रंथ में कुछ लेख ऐसे भी हैं, जिनमें संत ज्ञानेश्वर को अन्य संतों व महापुरुषों के समक्ष रखकर देखा गया है। डॉ. प्रभाकर माचवे का ज्ञानेश्वर और कबीर ऐसा ही लेख है। वे दोनों के जीवन में साम्य निर्धारित करते हुए कहते हैं- "दोनों के जीवन में बड़ा साम्य है। संन्यासी पुत्र होने के नाते ज्ञानेश्वर को सनातनी रूढ़िग्रस्त समाज से उसी तरह अपमान और उपेक्षा सहनी पड़ी, जैसी कबीर को" (पृ. 220)। हमें डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर का लेख एक लेख पढ़ने को मिलता है, जिसमें ज्ञानेश्वर के जीवन को आधार बना कर लिखे गए  उपन्यास 'मोगरा फुलला' के विश्लेषण से संबंधित है। यह उपन्यास मराठी के प्रख्यात उपन्यासकार डांडेकर ने लिखा है। इसमें ज्ञानेश्वर के परिवार की कथा है। यद्यपि तत्कालीन वातावरण को प्रस्तुत करना उपन्यासकार का उद्देश्य नहीं था, फिर भी ज्ञानेश्वर के जीवन पर लिखे गए उपन्यास में उस समय के सामाजिक चित्रण से नहीं बचा जा सकता था। प्रो. बांदिवडेकर तो परिवेश चित्रण को इस उपन्यास की सफलता का एक आधार ही मानते हैं। निश्चय ही जीवन के दिग्दर्शकों के विषय में रची गई इस प्रकार की कृतियों का महत्त्व है।

संत ज्ञानेश्वर को दूसरी भाषाओं में खोजने की कोशिश इस पुस्तक को शोधार्थियों के लिए ऐतिहासिक महत्त्व का बना देती है। हिंदी पर तो संत ज्ञानेश्वर का प्रभाव है ही, लेकिन यह जानना और भी महत्वपूर्ण है कि  ज्ञानेश्वर ने हिंदी में मौलिक रचनाएँ भी की थीं। डॉ. विनयमोहन शर्मा ने ज्ञानेश्वर द्वारा रचित हिंदी के दो पद खोजे हैं। इनमें से एक पद इस प्रकार है-

सोई कच्चा बेनही गुरु का बच्चा

दुनिया तजकर खाक रमाई, जाकर बैठा वन में।

खेचिर मुद्रा वज्रासन में ध्यान धरत है मन में।।

तीरथ करके उम्मर खोई जागे जुगति भो सारी

हुकुम निवृति का ज्ञानेश्वर को तिनके ऊपर जाना

सद्गुरु की जब कृपा भई तब आप आप पिछाना

संभव है संत ज्ञानेश्वर ने कुछ अन्य हिंदी पदों की रचना भी की हो, किंतु  अभी तक इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है।

भारत की अन्य भाषाओं में भी संत ज्ञानेश्वर अनेक रूपों में विद्यमान हैं। मराठी, बंगला, उड़िया, कन्नड, तेलुगु जैसी भाषाओं में संत ज्ञानेश्वर का अनुवाद हुआ है। उनके विषय में विविध विधाओं में साहित्य की रचना हुई है। वे बाल साहित्य का विषय भी बने हैं। प्रस्तुत पुस्तक में इस विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है।

संत ज्ञानेश्वर भारतीय जीवन की महान विभूति थे। उन्होंने केवल मराठी जनमानस को ही आंदोलित नहीं किया, बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर अपने चिन्तन का आलोक प्रसारित किया। प्रस्तुत पुस्तक इसी आलोक की आभा को वाणी देने का प्रयास है।

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