राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र (गोपालराव एकबोटे)
राष्ट्रभाषा
विहीन राष्ट्र
गोपालराव एकबोटे
मैसर्स एकबोटे ब्रदर्स,
24, वीर सावरकर
मार्ग, हैदराबाद- 500027
प्रथम संस्करण- 1987 , पृष्ठ- 242, मूल्य 100 रुपए
राष्ट्रभाषा हिंदी
के संबंध में अब तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित
हो चुकी हैं। कुछ विश्वविद्यालयों ने राष्ट्रभाषा के संबंध में तैयार किये गए शोध
ग्रंथों पर पीएच.डी. उपाधियाँ भी प्रदान की हैं। लेकिन वरिष्ठ न्यायाधीश एवं
विचारक श्री गोपालराव एकबोटे द्वारा लिखित पुस्तक ‘राष्ट्रभाषा विहीन
राष्ट्र’ इनमें सबसे अलग प्रतीत होती है। कारण स्पष्ट है कि
न तो यह पुस्तक किसी हिंदी प्रचारक या हिंदी
पढ़ाने वाले अध्यापक द्वारा लिखी गई है और
न किसी शोधार्थी द्वारा केवल शोध उपाधि प्राप्त करने के लिए। यह पुस्तक एक ऐसे
न्यायाधीश की कृति है जिसने अपने जीवन भर के अनुभवों के पश्चात् यह निष्कर्ष
निकाला था कि भारत राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए, ताकि भारत जाति बिना किसी असुविधा के विचारों का आदान-प्रदान कर सके और
अखिल भारतीय स्तर पर व्यापार तथा वाणिज्य की उन्नति हो सके।
न्यायशास्त्री
एकबोटे ने अपने इस निष्कर्ष को प्रस्तुत पुस्तक की रचना का प्रेरणा-स्रोत तो बनाया
है, किंतु पूरी पुस्तक में कहीं भी यह निष्कर्ष पाठक पर थोपने की कोशिश नहीं
की है। उन्होंने अपनी न्यायाधीश बुद्धि को ही आगे रखा है। न्यायालय में सुनाये
जाने वाले निर्णय की भाँति ही उन्होंने तमाम उपलब्ध तथ्यों की जांच पड़ताल की है
और उन्हें जो सच्चाई मिली है उन्होंने उसी के आधार पर संक्षिप्त निर्णय सुना दिए
हैं। पूरी पुस्तक में कहीं भी न तो निर्णय लंबे हैं और न भावनात्मक शैली में
प्रस्तुत किए गए हैं।
गोपालराव
एकबोटे राष्ट्रभाषा के प्रश्न को लेकर या फिर हिंदी के प्रश्न को लेकर अपने जीवन में भी अतिरिक्त
भावनात्मकता के शिकार नहीं थे। उनसे हिंदी के जितने समर्थक मिलने जाते थे, वे उनमें से किसी के साथ भी मन बहलाने वाली बातें नहीं करते थे। 1988
में जब मैं उनसे मिला और हिंदीतर भाषी लेखकों के साहित्य को एकत्रित
करके शोध संस्थान चलाने व पुरस्कार आयोजन के विषय में बातें कीं तो वे दो दिन तक
लगातार इस बात की छानबीन करते रहे कि मेरी बातों में कोई सच्चाई है भी या नहीं।
पहले दिन उनका व्यवहार बड़ा शुष्क और प्रश्न पूछने का ढंग बेध डालने वाला था। उस
दिन उन्होंने हिंदी या राष्ट्रभाषा को
लेकर किसी प्रकार की सकारात्मक बात करने का अवसर ही नहीं दिया। दूसरे दिन की भेंट
थोड़े से स्वाभाविक वातावरण में हुई, किंतु तब भी उनके भीतर
बैठा खोजी न्यायाधीश अपनी तीक्ष्ण दृष्टि मुझ पर गड़ाये रहा। तीसरे दिन वे आश्वस्त
हुए और उन्होंने हिंदी प्रचार आंदोलन, हिंदी की भावी भूमिका तथा शोध व
पुरस्कार संबंधी विषयों पर विस्तृत चर्चा की। तब मुझे लगा कि खैरताबाद से वीर
सावरकर मार्ग तक की तीन दिन की दौड़ सुफल देने वाली रही। जब मैंने राष्ट्रभाषा
विहीन राष्ट्र की सामग्री को पढ़ा तो मुझे यह लगा कि मेरी वह दौड़ तीन दिन के बदले
तीन वर्ष की हुई होती तब भी कम था, कारण साफ है एकबोटे हिंदी
के न अंध समर्थक लगे, न तो अति उत्साहित प्रचारक और न हिंदी के संबंध में अत्युक्तिपूर्ण बातें करने वाले
राजनेता। एकबोटे के रूप में मैंने ऐसे पहले व्यक्ति के दर्शन किये जो उच्च
न्यायालय के न्यायाधीश थे और मानते थे कि विधि की भाषा राष्ट्रीय स्तर पर एक होनी
चाहिए और वह इस देश की अधिसंख्य जनता की भाषा हिंदी होनी चाहिए। एक वरिष्ठ न्यायाधीश का यह निर्णय
भारत के विश्वविद्यालयों में कानून पढ़ाने वाले तथा कथित उच्च विधिवेत्ताओं और संसद
में बैठकर हिंदी की अक्षमता का रोना रोने
वाले राजनेताओं की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है। ऐसे लोगों को यह जानकारी देना
भी आवश्यक है कि राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र पुस्तक अंग्रेजी में भी उपलब्ध है। कोई
चाहे तो उस भाषा में भी राष्ट्रभाषा हिंदी के संबंध में जानकारी प्राप्त करके अपने
भ्रम का निवारण कर सकता है।
न्यायाधीश
एकबोटे ने अपनी पुस्तक में हिंदी से जुड़े
सभी संभव पक्षों का विश्लेषण किया है। वे प्रशासन में हिंदी के उपयोग का इतिहास प्रस्तुत करते हैं।
राष्ट्रीय नेताओं विशेषकर गाँधीजी, विनोबा, अय्यंगार आदि की राष्ट्रभाषा और लिपि विषयक दृष्टि का विश्लेषण करते हैं।
संविधान में हिंदी की स्थिति बताते हैं।
विधान सभाओं, न्यायालयों तथा विधि शिक्षण के संस्थानों में हिंदी
की भूमिका पर विचार करते हैं। भाषा नीति
और त्रिभाषा सूत्र की उपयोगिता परखते हैं तथा हिंदी व भाषिक अल्पसंख्यकों के अधिकार पर बहस छेड़ते
हैं। कुल मिलाकर वे हिंदी के संबंध में
भावात्मक एकता का नारा नहीं उछालते, बल्कि वास्तविक स्थिति
तथा तथ्यों की परीक्षा करते हुए हिंदी के
विस्तार का ठोस मार्ग तैयार करते हैं। उनके यहाँ स्वाधीनता संघर्ष और हिंदी संबंधी तथ्यों की पंक्ति है। विभिन्न आयोगों की
कार्यवाही है। संसद द्वारा पारित अधिनियमों की जानकारी है और अन्य भाषाओं से जुड़े
लोगों की चिंताएँ हैं। इस संपूर्ण उपलब्धता के साथ ही उन्होंने इस महत्त्वपूर्ण
सामग्री का निर्माण किया है।
हिंदी के संबंध में आज तक भी लोगों के मन में अनेक
भ्रम बने हुए हैं। जिन हिंदीतर भाषा-भाषी लोगों के बीच, हिंदी के राष्ट्रभाषा होने को लेकर, कुछ कठोर प्रतिक्रियाएँ
दिखाई देती हैं, वे भी बहुत कुछ भ्रांति की शिकार ही हैं।
इनमें से एक बड़ी भ्रांति यह है कि हिंदी केवल एक मत के आधिक्य से भारतीय संघ की राजभाषा
बनी। यह एक ऐसी भ्रांति है, जिसका सहारा लेकर हिंदी विरोधी लोग आम जनता को बहकाते रहते हैं।
न्यायाधीश एकबोटे ने इस भ्रम का निवारण किया है। वे कहते हैं— “हिंदी नाम विषयक निर्णय तो संविधान सभा में जुलाई 1947
में ही भारी बहुमत से लिया जा चुका था। केवल एक मत की अधिकता की कथा
इस गड़बड़ी के कारण पैदा हुई जिसका कि वास्तविक संबंध कांग्रेस संसदीय दल की 26
अगस्त, 1949 वाली बैठक में लिये गए इस निर्णय
अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय अंकों के बजाय नागरीय अंकों का इस्तेमाल करने के बारे में
था जो बाद में बदला भी गया। किस भाषा को राष्ट्रभाषा का स्थान दिया जाय वाली बात
से इस निर्णय का तो कोई संबंध ही नहीं। (पृ. 20) लेखक ने इस
संबंध में भाषा समस्या में विशेष रुचि रखने वाले श्री जसपाल राय कपूर की पुस्तक का
सहारा भी लिया है। उन्होंने अपने ग्रंथ, 'दि ट्रुथ अबाउट हिंदी
' के पृष्ठ दो पर लिखा है- "यह तो सर्व सम्मत बात थी कि
हिंदी केंद्र सरकार की राजभाषा हो। संविधान सभा के कांग्रेस दल की बैठक में ऐसा
कोई अवसर नहीं रहा जबकि इस प्रश्न पर मत गणना की आवश्यकता अनुभव हुई हो। बात,
जिस पर मत लिये गए और जिसमें तीव्र मत विभाजन भी रहा, वह अंकों के संबंध में थी।"
इस पुस्तक
में भारतीय भाषाओं के लिए एक लिपि का मुद्दा भी उठाया गया है। भारत में 179 भाषाएँ 20 लिपियों में लिखी जाती हैं। विनोबा जी कहा
करते थे कि हिंदुस्तान की समस्त भाषाएँ
देवनागरी में लिखी जाएँ। उनका यह मत भी अनुचित ढंग से प्रस्तुत किया गया और एक
लिपि को सांप्रदायिक या साम्राज्यवादी सोच सिद्ध करने का प्रयास किया गया। वास्तव
में लोग भूल गए कि विनोबा जी 'ही' वादी
नहीं थे, वे 'भी' वादी थे। वे कहते थे कि नागरी लिपि सब भाषा में चले। इसका मतलब दूसरी
लिपियों का निषेध नहीं, दोनों लिपियाँ चलेंगी। स्मरणीय है कि
सन् 1910 में जस्टिस कृष्ण स्वामी अय्यर ने इलाहाबाद में
लिपि विस्तार परिषद के वार्षिक समारोह में ठीक यही बात कही थी। उन्होंने कहा था-
"मैं यह भी कहता हूँ कि अपनी-अपनी भाषा लिपि के साथ-साथ अगर वे एक ऐसी लिपि
जो सारे भारत में चले, अपनायें तो एकात्मता को मजबूत करने
में सहायता मिलेगी। यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि लिपि का कोई संबंध किसी धर्म
से नहीं है।" न्यायाधीश एकबोटे ने लिपि के संबंध में
बाल गंगाधर तिलक, अस्टिस शारदा चरण मिश्र, महादेवी वर्मा आदि के मत भी प्रस्तुत किये। लिपि के संबंध में उन्होंने
पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रसंग का उल्लेख करते हुए एक अन्य भ्रम का निवारण किया है।
प्रसिद्ध है कि नेहरू रोमन लिपि के पक्षधर थे। हिंदी के अंध समर्थक इस बात को लेकर नेहरू की कड़ी
आलोचना भी करते हैं। लेखक ने पं. नेहरू की आत्मकथा का उद्धरण देकर स्थिति स्पष्ट
की है। नेहरू जी के शब्द है- "यद्यपि मैं कुछ समय तक भारतीय भाषा के संबंध
में रोमन लिपि के संदर्भ में सोचता रहा, इस कारण कि
तुर्किस्तान और मध्य एशिया में रोमन लिपि के अपनाने से वहाँ कुछ प्रगति हुई थी,
पर अब मुझे ऐसा लगता है कि रोमन लिपि का प्रचंड मात्रा में भारत में
विरोध होगा और ऐसा विरोध केवल भावुकता पर आधारित नहीं होगा, बल्कि
लिपि के सिद्धांतों पर भी भारतीय भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि ही हर दृष्टि से
उपयुक्त होगी। (पृ. 26 पर उद्धृत)
हिंदी के संबंध में राजाजी (राजगोपालाचार्य) की भूमिका
विवाद का विषय बनती रही है। एक ओर तो यह तथ्य है कि हिंदी का पहला प्रचार-केंद्र राजाजी के हस्तक्षेप से उनके घर पर ही प्रारंभ
हुआ था, जिसमें स्वयं उन्हीं की पुत्री लक्ष्मी पहली छात्रा बनी थी, दूसरी ओर यह भी प्रसिद्ध है कि दक्षिण में हिंदी विरोध के सूत्र उनसे
जुड़े हुए हैं। राजाजी की इस भूमिका को हिंदी विरोधी लोग बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं।
जस्टिस एकबोटे ने राजाजी की हिंदी विषयक भूमिका पर अलग से विचार किया है। यहाँ भी
उन्होंने स्वयं राजाजी द्वारा कही और लिखी गई बातें प्रस्तुत की हैं। राजाजी ने
स्पष्ट कहा था- "हिंदी भारत की
राष्ट्रभाषा बनना अनिवार्य है।" राजाजी हिंदी शिक्षण के विषय में कहते थे- "जो करना है
वह यह कि समस्त देश में हिंदी की शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाए। भाषा जो देश के
अधिकतर भाग में बोली जाती है, सिखाना आवश्यक है।" (पू.)
118 पर उद्धृत) श्री एकबोटे ने राजाजी के संबंध में अपना
निष्कर्ष देते हुए लिखा है- "राजाजी द्वारा व्यक्त किये गए विचारों से किसी
को उलझने की आवश्यकता नहीं। वे चाहते थे कि हिंदी का ऐसा पूर्ण विकास हो कि वह वैज्ञानिक तथा
तकनीकी क्षेत्रों में प्रयुक्त की जा सके। वे चाहते थे कि इस भाषा का राजभाषा के
तौर पर उपयोग आरंभ होने से पहले लोगों को इस बात का पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो कि वे
इसे राजकाज के विविध क्षेत्रों में प्रयुक्त करने के संबंध में तैयारी कर लें। वे
देश के सभी स्कूलों में द्वितीय भाषा हिंदी की अनिवार्य शिक्षा के पूर्ण समर्थक थे। (पृ. 120)
न्यायाधीश
एकबोटे अपनी पुस्तक में इस बात पर बल देते हैं कि देश के तमाम कानूनों की भाषा एक
होनी चाहिए। प्रश्न किया जा सकता है कि वह एक भाषा कौन सी होगी? इसके उत्तर के लिए वे समस्त नियमों, अधिनियमों,
धाराओं, उपधाराओं आदि का गंभीर दृष्टि से
विश्लेषण करके यह निष्कर्ष निकालते हैं कि- "देश में बने कानून एक सामान्य
भाषा में रहें और सर्वोच्च न्यायालय के उपयोग के लिए भी उसी भाषा का प्रयोग हो और
देश के सभी उच्च न्यायालयों के कमज़कम न्याय, निर्णय,
बिक्रियाँ तथा आदेश उसी सामान्य भाषा में रहे।" (पृ. 148)
। वे यह भी कहते हैं कि धारा 348(1) की उपधारा
(1) के होते हुए भी राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से हिंदी
अथवा किसी अन्य भाषा को राज्य के किसी सरकारी कारोबार में प्रयुक्त करने को अधिकृत
कर सकेंगे। (वही)।
अंत में यह भी, कि पहले से ही बने हुए राजभाषा कानून भी न्याय क्षेत्र में हिंदी के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें