हिंदी व्यंग्य साहित्य (डॉ. ए. एन. चन्द्रशेखर रेड्डी)

 

हिंदी  व्यंग्य साहित्य

डॉ. ए.एन. चंद्रशेखर रेड्डी

शबरी संस्थान,

1/5971, कबूल नगर,

शाहदरा, दिल्ली- 32

प्रथम संस्करण- 1989 , पृष्ठ- 191, मूल्य- 100 रुपए

 

हिंदी  व्यंग्य साहित्य विषय पर कार्य प्रारंभ करते समय चंद्रशेखर रेड्डी के समक्ष तीन प्रश्न थे, पहला यह कि समकालीन जीवन में विद्रूपताओं का क्या रूप है, दूसरा यह कि इन विद्रूपताओं से आहत चेतना का स्वरूप कैसा है और तीसरा यह कि व्यंग्य चेतना की अभिव्यक्ति के लिए साहित्यिक उपकरणों का उपयोग कैसे किया गया है। इन प्रश्नों का उल्लेख इस ग्रंथ के प्राक्कथन में हुआ है और इनसे पता चलता है कि लेखक हिंदी व्यंग्य साहित्य का वस्तुपरक मूल्यांकन करना चाहता है। व्यंग्य साहित्य से भी अधिक व्यावहारिक जीवन से जुड़ा है। आधुनिक युग में मनुष्य जिन परिस्थितियों में जी रहा है, वे स्वयं अवसर निकाल निकाल कर उस पर व्यंग्य करती हैं। प्रजातंत्रीय व्यवस्था, चुनाव प्रक्रिया, सिद्धांतहीन दल-बदल, सामाजिक विघटन, शिक्षा जगत का विडंबनापूर्ण वातावरण और जनता के साथ प्रशासन द्वारा किया जाने वाला विद्रूप भरा व्यवहार मनुष्य के जीवन में व्यंग्य की सृष्टि ही करते हैं। यदि इस व्यंग्य को थोड़ा और विस्तार दिया जाए, तो यही जनता के सामूहिक असंतोष से भी जुड़ जाता है। लेखक ने इस पूरी परिस्थिति का विश्लेषण किया है। उसे जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ, वह यह कि "आज की परिस्थितियों में वास्तविक खलनायक यह या वह व्यक्ति नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था है। इस व्यवस्था का केवल यह या वह अंग खंडित नहीं हुआ है, बल्कि पूरी व्यवस्था जर्जरित हो गई है।" (पृ. 31) परिवेश और परिस्थितियों के इस विश्लेषण के साथ ही लेखक साहित्य और व्यंग्य की परंपरा पर ध्यान देता है। वह मानता है कि जब परिस्थितियाँ एकदम से असामान्य हो उठती हैं, तो साहित्य में व्यंग्य का प्रवेश होता है। ऐसा इसलिए कि साहित्यकार काल के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का निर्वाह कर सके।

चंद्रशेखर रेड्डी ने अचानक हिंदी  व्यंग्य साहित्य का विश्लेषण प्रारंभ नहीं कर दिया है, बल्कि उन्होंने यह भी खोज की है कि व्यंग्य का स्वरूप और उसका कार्य क्या है। व्यंग्य के इस सैद्धांतिक विश्लेषण के लिए चंद्रशेखर रेड्डी ने अनेक लेखकों और आलोचकों के विचारों की पड़ताल की है। व्यंग्य के संबंध में प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने 'सदाचार का ताबीज़' में बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने कहा है— "व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है जीवन की आलोचना करता है विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है… यह नारा नहीं है। मैं यह कह रहा हूँ कि जीवन के प्रति व्यंग्यकार की उतनी ही निष्ठा होती है, जितनी किसी भी गंभीर रचनाकार की, बल्कि ज्यादा ही वह जीवन के प्रति दायित्व का अनुभव करता है। जिन्दगी बहुत जटिल चीज है। इसमें खालिस हँसना या खालिस रोना जैसी चीज नहीं होती। बहुत सी हास्य रचनाओं में काव्य की धारा है... अच्छा व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।" परसाई जी ने व्यंग्य के स्वरूप को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। सचमुच व्यंग्य किसी प्रकार का परिहास या उपहास नहीं होता, न ही वह साधारण हास्य की कोटि में रखा जा सकता है। व्यंग्य विरूपता को उघाड़ने और उसे खरौंच कर साफ करने वाला हथियार होता है। वह यह नहीं कहना चाहता कि तुम खराब हो; इसीलिए अपमान सहने को अपनी नियति मान लो, बल्कि वह कहता है कि तुम में अमुख दोष है और तुम्हें उसका परिष्कार करके सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त करना चाहिए। साधारण भाषा में कहें, तो व्यंग्य व्यक्ति को उसका असली चेहरा दिखाता है तथा उससे सुधार के लिए सक्रिय होने की माँग करता है। चंद्रशेखर रेड्डी ने व्यंग्य के इस स्वरूप का उल्लेख किया है। उन्होंने एक ही स्थान पर परसाई, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, नरेन्द्र कोहली, रघुवीर सहाय, बेढब बनारसी गुलाम अहमद फुरकत, राम कुमार वर्मा, शेरजंग गर्ग, कृष्णदेव झारी, बालेन्दु शेखर तिवारी, गोपाल प्रसाद व्यास तथा सुबोध कुमार श्रीवास्तव के व्यंग्य संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया है। इन सभी विद्वानों के विचार निःसंदेह उपयोगी और उचित हैं, किंतु लेखक द्वारा इनकी व्याख्या करके इनके वास्तविक मंतव्य को न समझाना शोध प्रविधि के कारण थोड़ा खटकता है। लेखक को या तो इन विचारकों के विचारों का विश्लेषण स्वतंत्र रूप से करना चाहिए था अथवा इन सभी का एक ही स्थान पर भी विश्लेषण किया जा सकता था। ऐसा करके शोध के लिए आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया जा सकता था। इतने पर भी यह कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इस अध्याय में एकत्रित किए गए विद्वानों के विचार व्यंग्य पर शोध कर रहे अन्य शोधार्थियों का मार्ग निर्देशन कर सकते हैं।

लेखक ने एक अच्छा कार्य व्यंग्य की उसी जैसी प्रतीत होने वाली अन्य अभिव्यक्ति शैलियों से भिन्नता प्रदर्शित करने का किया है। उसने हास्य, उपहास, पैरोडी, वक्रोक्ति, प्रहसन, उपालंभ आदि से व्यंग्य की भिन्नता को दर्शाया है। यह इस शोध ग्रंथ की उल्लेखनीय विशेषता है, अन्यथा हिंदी  शोध का यह दुर्भाग्य है कि उसमें निबंध के नाम पर समीक्षा लेखों का अध्ययन किया जाता रहता है। समीक्ष्य शोध-ग्रंथ की केन्द्रीय सामग्री तीसरे और चौथे अध्याय में है। इन दोनों अध्यायों में हिंदी  व्यंग्य साहित्य का विस्तृत विश्लेषण है। लेखक ने दर्शाया है कि भ्रष्ट राजनीति, नेताओं की पद लिप्सा, अफ़सरशाही, विभिन्न सरकारी विभाग और उनके कार्यकलाप, आर्थिक विषमता, तस्करी, मिथ्याभिमान आदि बहुत कुछ हिंदी  साहित्य में व्यंग्य का निशाना बना है। इस सबका विश्लेषण भी हिंदी  व्यंग्य साहित्य में है।

चंद्रशेखर रेड्डी ने हिंदी  साहित्य में व्यंग्य के शिल्प विधान का जायजा भी लिया है। हिंदी  में व्यंग्य को अनेक शैलियों के सहारे दोषों और निर्बलताओं पर आक्रमण योग्य रूप दिया गया है। इन शैलियों में प्रमुख है वर्णनात्मक शैली, विवरणात्मक शैली, पत्राचार शैली, इंटरव्यू शैली, फंतासी शैली, मिथकीय शैली, अन्योक्ति शैली, पैरोडी शैली, पुराण शैली, रेखाचित्र शैली आदि। उधर कुछ अन्य शैलियाँ भी प्रचलन में आ रही हैं। लेखक ने इंटरव्यू शैली का उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है—

मैंने कहा, 'आपकी हार की खबर सुनकर मुझे बड़ा खेद हुआ।

वे बोले, 'यह बात मुझसे कई लोग कह चुके है- वे भी, जो मेरे खिलाफ वोट देकर आए हैं।

मैं समझता हूँ, मैंने कहा, पर कुछ दिन हुए अखबारों में छपा था कि आप राजनीति से संन्यास ले रहे हैं।

गलत छपा था। वास्तव में मैंने कहा था कि संन्यासियों को भी राजनीति में आना चाहिए (श्रीलाल शुक्ल, यहाँ से वहाँ, पृ. 20)

लेखक ने इस बात की परीक्षा भी की है कि व्यंग्य ने हिंदी  साहित्य की भाषा को किस रूप में और कहाँ तक प्रभावित किया है। यह इस शोध कार्य की अतिरिक्त विशेषता है।

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