बीसवीं शती के सिंधी कवियों का हिंदी में योगदान (डॉ. दयाल आशा)
बीसवीं
शती के सिंधी कवियों का हिंदी में योगदान
डॉ.
दयाल आशा (डॉ. दयाल कोटुमल धामेजा 'आशा')
अंजलि प्रकाशन, विष्णु कुञ्ज, 1974
उल्हास नगर-5 (महाराष्ट्र)
प्रथम संस्करण-
1979
, पृष्ठ-256, मूल्य 40 रुपए
हिंदी भाषा और उसकी साहित्यिक समृद्धि में सिंधी कवियों
ने जो योगदान किया है वह इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने
योग्य है। ये कवि हिंदी में केवल रचनाएँ नहीं
कर रहे थे, बल्कि सिंध की समृद्ध सांस्कृतिक सामाजिक
और धार्मिक थाती के प्रकाश से हिंदी संसार
को प्रकाशित भी कर रहे थे। सिंध वह क्षेत्र है जहाँ वेदों की रचना हुई और प्राचीन
वैदिक संस्कृति मुक्त वातावरण में पनपी उसी सिंध प्रदेश में वेदान्त भी पल्लवित
पुष्पित हुआ। ऐसे समृद्ध प्रदेश के युगद्रष्टा कवियों ने राष्ट्रभाषा हिंदी को वह पुष्ट आधार दिया जिस पर खड़ी होकर उसने
राष्ट्रभाषा के गौरव को प्राप्त किया। डॉ. दयाल आशा ने अपने इस महत्वपूर्ण ग्रंथ
में उन स्वनाम धन्य कवियों का परिचय दिया है। इससे पहले उन्होंने सिंधी भाषा, साहित्य और लिपि का परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत किया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से चौदहवीं शताब्दी का प्रथम वीर काव्य- 'दो-दो चनेसर' सिंधी साहित्य के इतिहास का पहला उपलब्ध स्तम्भ है।
इससे पहला साहित्य राजनैतिक और भौगोलिक कारणों से लुप्त हो चुका है, किंतु दो-दो चनेसर को देखकर यह कहा जा
सकता है कि सिंधी का प्राचीन साहित्य विषय
वस्तु और शिल्प दोनों दृष्टियों से समर्थ तथा वैविध्यपूर्ण रहा होगा। इसके पश्चात्
शाह अब्दुल लतीफ भिटाई, शाह इनायत, संत रोहल गुलामअली दरियाखान, दलपतराय, सूरतसिंह, महाराज बसंतराम आदि ने सिंधी साहित्य को विश्व के समक्ष सम्मानजनक स्थान
दिलाया।
सन् 1843 में अंग्रेजों ने सिंध पर विजय
प्राप्त कर ली तथा 1853
में अरबी लिपि को सिंधी भाषा की लिपि
घोषित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सिंधी लिखने के लिए नागरी लिपि का प्रयोग किया जाता
था। जॉर्ज कैप्टन स्टैक ने जो सिंधी-इंग्लिश और इंग्लिश-सिंधी शब्दकोश संपादित
किये थे, उनमें भी सिंधी लिखने के लिए नागरी
लिपि का ही प्रयोग हुआ था, किंतु अंग्रेजों की सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत नागरी के
स्थान पर अरबी लिपि बैठ गई। डॉ. दयाल आशा द्वारा दी गई यह जानकारी राष्ट्र की
भावात्मक एकता के समक्ष आने वाली समस्याओं के ऐतिहासिक कारणों पर प्रकाश डालती है।
हिंदी कवियों के परिचय से पूर्व एक संक्षिप्त लेख सिंधियों
की हिंदी गद्य के विकास में निभाई गई
भूमिका पर भी है। इसमें स्वामी ग्वालानंद महाराज, स्वामी सर्वदानंद महाराज, पं. द्वारिका प्रसाद शर्मा, पं. देवदत्त शर्मा, पं. कृष्णचंद्र जेतली, संत आशाराम, डॉ. परसराम गिदवाणी, डॉ. मोतीलाल जोतवाणी आदि लेखकों और उनके
कार्यों के साथ स्वयं इस ग्रंथ का परिचय भी दिया गया है।
सिंधी कवियों के काव्य में योगदान विषयक शीर्षक के
अंतर्गत 54
कवियों का परिचय प्रस्तुत किया गया
है। स्वामी गंगाराम सन् 1860 में उत्पन्न हुए थे। वे गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी
आध्यात्मिक वृत्ति वाले थे। इन्होंने अपना मुख्य लेखन सिंधी में किया, किंतु कुछ पदों की रचना हिंदी में भी की। ये पद गुरु महिमा, जीव, ब्रह्म, मोक्ष आदि पर प्रकाश डालते हैं। साधु
टी.एल. वासवाणी (दादा साधु वासवाणी) का जन्म 1879 को हुआ था। इन्हें सिंध में ज्ञान, भक्ति, प्रेम और करुणा का चंद्र माना गया।
इनके चरित्र में दार्शनिक, विचारक और समाज सुधारक के गुण विद्यमान थे। उनकी रचना नूरी
ग्रंथ को सिंधी की अनमोल कृति माना जाता
है। इसी ग्रंथ में उनके हिंदी में रचित
फुटकर पद भी हैं। इन पदों में गुरु महिमा, माया, जगत, ब्रह्म, नामस्मरण, प्रेम-तत्व, संत संगति आदि के संबंध में बताया गया है। संत संगति के
विषय में ये कहते हैं- "संत जनाँ का पकरा पैरा/संतन चरनन पावो विसराम/संत जनाँ
के संग निवास/गाओ-गाओ निर्मल नामा" (पृ. 51 पर उधृत) इनके काव्य में नाद सौंदर्य
और सहज प्रवाह विद्यमान है। सेठ उद्धवदास
सन् 1870 में माझु गाँव में जन्मे थे। उन्होंने हिंदी भाषा में दोहे, काफियाँ आदि रचे और प्राचीन छंद शास्त्र के आधार पर भी कुछ
रचनाएँ कीं। ये भी स्वभाव से आध्यात्मिक थे किंतु इनमें कबीर जैसी अक्खड़ता भी थी।
संत स्वामी टेऊँराम महाराज का जन्म सन् 1888 में हुआ था। उनका पारिवारिक वातावरण
आध्यात्मिकता से भरा हुआ था। अतः वे भी आरंभ से ही वीतरागी स्वभाव के थे। उन्होंने
प्रेम प्रकाश मंडली की स्थापना की थी। साहित्यिक दृष्टि से वे व्यापक अनुभवों के
रचनाकार थे। उन्होंने नानक, कबीर, सूर, तुलसी आदि का अनुकरण करते हुए
वैविध्यपूर्ण रचनाएँ की हैं। उनकी समूची वाणी प्रेम प्रकाश नामक ग्रंथ में है।
उनकी हिंदी रचनाएँ दार्शनिकता से भरपूर
हैं तथा उन पर नाथ संप्रदाय का प्रभाव भी दिखाई देता है। उनके काव्य का कलापक्ष भी
समृद्ध है, जिसमें उपमा और रूपक अलंकारों की छटा
देखते ही बनती है। तोलाराम आजिज़ का जन्म सन् 1888 में नोशहरे फेरोज़ नगर में हुआ
था। वे ईश्वर भक्त के साथ-साथ परम देशभक्त भी थे। वे मुख्यतः सिंधी में लिखते थे, किंतु उन्होंने दो-तीन पद हिंदी में भी लिखे थे। स्वामी अटलराम सन् 1889 में
जन्मे थे। कहा जाता है कि वे स्वामी धर्मदास के पश्चात् उनके धर्मपीठ के अधिकारी
बने और जब सन् 1921 में गाँधीजी ने अछूतोद्धार आंदोलन चलाया तो उन्होंने अपने
मंदिर के दरवाजे हरिजनों के लिए खोल दिये। स्वामी अटल राम ने सिंधी के साथ-साथ हिंदी भाषा में भी काव्य रचना की। उन्होंने प्रमुख रूप
से सतगुरु की महिमा का गान किया। इसके अतिरिक्त वे सेवा और ध्यान योग पर भी बल
देते हैं। डॉ. परमानंद बदलाणी का जन्म सन् 1889 में सिंध प्रदेश के खंडू गाँव में
हुआ था। वे यूनानी हिक़मत का अभ्यास करके डॉ. बन गए थे। फिर उन्होंने संत स्वामी
टेऊँराम महाराज से गुरुमंत्र की दीक्षा ली। वे सिंधी और हिंदी दोनों भाषाओं में काव्य रचना करते थे। उनके हिंदी
काव्य में गुरु महिमा के साथ-साथ
माता-पिता के प्रति अनन्य भक्ति भी चित्रित हुई है- "मात-पिता सम देव नहीं
क्यों न प्रगट भये भगवान/ परमानंद मोक्ष ओबे नहीं वेद पढ़ो न पुरान/मात-पिता सम
तीर्थ नहीं, काशी करो कैलाश / परमानंद संतोष नहीं
गगन मंडल आकाश" (पृ. 98 पर उद्धृत) श्री लालचंद पमनाणी सन् 1890 में जन्मे
थे। वे पहले अध्यापक बने और फिर व्यवसायी। विभाजन के पश्चात वे उलहास नगर में आ
बसे थे। उनका हिंदी काव्य अन्य आध्यात्मिक
विशेषताओं के साथ मनुष्यों को यह चेतावनी भी देता है कि मनुष्य अपने कर्म के
अनुसार ही फल भी प्राप्त करेगा। स्वामी भक्त प्रकाश का जन्म नजमत गाँव में सन्
1895 में हुआ था। हिंदी में उन्होंने
थोड़े-बहुत पदों की रचना की है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे भगवान शंकर की स्तुति
में अपना मन अधिक लगाते थे। संत स्वामी ग्वालानंद महाराज का जन्म सन् 1898 ई. में सिंध
के खंडू गाँव में हुआ था। किंवदन्ती है कि वे एक बार अपने खेतों के नज़दीक एक
दुकान में सोये हुए थे। तभी किसी ने उन्हें पुकारा और कहा, उठो ग्वाल उठो जागो, बहुत सोये हो अब जागो। यह ध्वनि सुन कर ग्वालानंद बाहर आये किंतु
वहाँ कोई नहीं था। इस घटना का प्रभाव यह हुआ कि वे टेऊँराम महाराज से दीक्षा लेकर
भगवद्भक्ति में लीन हो गये। उनकी रचनाओं का संग्रह श्री ग्वालानंद ग्रंथ में हुआ
है। इसमें उनकी हिंदी रचनाएँ भी हैं। संत
स्वामी सर्वानन्द महाराज का जन्म भिटशाह गाँव में सन् 1898 ई. में हुआ था। उनका
अधिकांश समय ऋषिकेश और हरिद्वार में व्यतीत हुआ। देश विभाजन के पश्चात् उन्होंने
जयपुर में स्वामी टेऊँराम प्रेम प्रकाश आश्रम अमरापुर दरबार की स्थापना की। उनका
संपूर्ण काव्य दर्शन से भरा हुआ है, किंतु उनकी भाषा में संगीतात्मकता तथा
अलंकारिकता को प्रभावित करती है। योगीराज स्वामी परमानंद सिंध के सितारपुर नगर में
सन् 1898 में जन्मे थे। वे स्वतः स्फूर्त भाव से सिंधी और हिंदी दोनों भाषाओं में कविता करते थे। गीता हृदय तथा
भजन आनंद में उनकी हिंदी रचनाएँ देखी जा
सकती हैं। स्वामी चिदघनानंद सक्खर नगर में सन् 1898 में जन्मे थे। उनके आध्यात्मिक
गुरु स्वामी बोद्धानंद थे और वे नानकदेव को अपना इष्ट मानते थे। उनका प्रसिद्ध
ग्रंथ चिद्घन चमन हिंदी भाषा और गुरुमुखी लिपि में प्रकाशित हुआ। कवि स्वामी
पहिलाज राम सक्खर जिले के खाड़ी गाँव में जन्मे थे। वे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य संबंधी रचनाएँ करते थे।
प्रहलाद पुष्पांजलि नाम से उनकी हिंदी भजनों की पुस्तक प्रकाशित हुई। उन्होंने हिंदी में अरबी, फारसी एवं सिंधी शब्दों का समावेश भी किया था। श्री ठारूमल बजाज
का जन्म 1902 ई. में सिंध के उबावड़े नगर में हुआ था। प्यास जी पुकार, ईश्वर उपासना,
सरल श्लोक आदि पुस्तकें उनकी वाणी से
भरी हुई हैं। उनका अधिक बल बिनय भावना पर रहता था। स्वामी बसंत राम महाराज 1903 ई.
में जन्मे थे। उन्होंने गुरुज्ञान भक्ति और कर्म संबंधी रचनाएँ की। हिंदी में बसंत विज्ञान माला नाम से उनकी पुस्तक
प्रकाशित हुई, जिसमें उनके द्वारा रचित दोहे
संग्रहीत हैं। कवि बसंतराम की भाषा संस्कृत निष्ठ है। उन्होंने मात्राओं के
निर्वाह के लिए कहीं-कहीं शब्द रूपों में परिवर्तन भी किया है। श्री फतेहचंद शर्मा
परबस का जन्म सन् 1906 ई. में हुआ था। वे सिंधी और हिंदी दोनों में समान रूप से लिखते थे। हिंदी में उनके दोहों का संग्रह ज्ञानदीप नाम से
प्रकाशित हुआ। कवि फतेहचंद के काव्य का कला पक्ष सबल है। ज्ञानदीप में 895 दोहे
हैं जो भाषा और शैली की दृष्टि से उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनके काव्य में शांत
रस प्रमुख है। स्वामी शांतिप्रकाश महाराज सन् 1907 में जन्मे थे। चेचक निकल आने के
कारण उनके बाह्य चक्षु चले गए थे। किंतु उन्हें आंतरिक दृष्टि प्राप्त हो गई थी। उनके
हिंदी काव्य में भक्ति और करुणा विद्यमान
है। उन पर नाथ संप्रदाय का प्रभाव भी दिखाई देता है। स्वामी केवलराम सन् 1908 ई.
में जन्मे थे। उन्होंने लगभग 25 ग्रंथों की रचना की। हिंदी भाषा में उन्होंने अधिकांशतः दोहे रचे। पं. शीतल
दास 1908 में सिंध के मेहड़ गाँव में जन्मे थे। हिंदी में उन्होंने संक्षिप्त अमरलाल कथा की रचना की।
कवि साबलदास का जन्म 1908 में सुल्तानकोट में हुआ था। वे मुख्यतः भजन रचते थे जो
सत्गुरु सार वचन ऐं सत उपदेश में संग्रहीत हैं। कवि हूँदराज दुखायल का जन्म सन्
1910 ई. में लाड़काना में हुआ था। उन्हें राष्ट्रीय कवि कहा जाता है। वे स्वाधीनता
संग्राम में छः बार जेल गए थे, जहाँ रहकर उन्होंने राष्ट्रीय गीतों
की रचना की। विनोबा और जयप्रकाश नारायण जैसे व्यक्ति उनकी प्रशंसा करते नहीं अघाते
थे। उनके राष्ट्रीय गीतों का एक उदाहरण इस प्रकार है- "जागो भारत की
संतान/नवयुग आशाओं से आया लेकर नया विधान/पूरब से उजियारा लेकर निखरे सुनहली
भान/जाग उठा संसार न जागा अब तक हिंदुस्तान /जागो भारत की संतान" (पृ. 198 पर
उद्धृत)। पं. कृष्णचंद जैतली का जन्म सन् 1910 ई. में हुआ था। उन्होंने हिंदी व संस्कृत का विशेष अध्ययन किया था। उन्होंने हिंदी
में खोजपूर्ण निबंध लेखन के साथ-साथ नई
शैली की रचनाएँ भी की हैं। श्री जीवणदास आहूजा का जन्म सन् 1910 में सक्खर जिले के
चक गाँव में हुआ। जब वे बड़े हुए तो उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए
क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया तथा पाँच बार जेल गये। उन्होंने सिंधी के साथ-साथ हिंदी में भी रचनाएँ कीं। प्रो. रामपंजवाणी का जन्म
सन् 1911 में हुआ। बड़े होकर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया।
उन्होंने विभिन्न साहित्यिक विधाओं में रचनाएँ की हैं। रामपंजवाणी का विशेष अनुराग
कृष्ण के प्रति है। साथ ही उनका हिंदी काव्य आधुनिक यथार्थवादी चेतना से भी युक्त है।
इन पच्चीस कवियों के अतिरिक्त डॉ.
दयाल आशा ने जिन हिंदी सेवी साहित्यकारों
का परिचय दिया है, वे हैं- स्वामी रामकृष्ण, प्राचार्य हरि दिलगीर, कवि देवीदास, दादा जे.पी. वास्वाणी, कवि वासुदेव, गोविन्द भाटिया, महंत स्वामी, गणेश दास महाराज, डॉ. अर्जुन सिकायल, गोवर्धन भारती,
स्वामी गणपति प्रसाद महाराज, स्वामी रघुनंदन प्रसाद, प्राचार्य आसनदास वासवाणी, कृष्णलाल बजाज,
प्राचार्य कन्हैयालाल तलरेजा, डॉ. मोतीलाल जोतवाणी, कवि हेमनदास, मनोहर वेदी, वेदप्रकाश, प्रभुदास बाधवा, भास्कर शर्मा,
गोवर्धन शर्मा, तुलसी आनंदाणी,
नारायण दास, मायाराम कुकडेजा,
जीवितराम सेतपाल, किशोर वासवाणी,
ढोलण राही, खिलूमल गंगवाणी और स्वयं लेखक डॉ. दयाल आशा। लेखक ने इन सभी
का जीवन परिचय और इनके काव्य का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया है। विवेचन के
अंत में अधिकांश लेखकों के काव्य में प्राप्त शैल्पिक विशेषताओं का उल्लेख भी किया
है।
आचार्य स्वामी गणेशदास जी साधु बेला
महंत ने इस ग्रंथ के संबंध में महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। उनकी सबसे ध्यानाकर्षक टिप्पणी इस प्रकार है—"हमारे देश के विभिन्न
अंचलों में हिंदी के ऐसे अनेक सेवकों, लेखकों, कवियों और मनीषियों की वाणियाँ बिखरी
पड़ी हैं, जिन्होंने विशाल भारत साथ संपर्क करके
उन्नत भारत के जन-जीवन को प्रभावित करने के लिए उस हिंदी का आश्रय लिया, जिसकी व्यापक प्रतिष्ठा अनेक संत देश भर में कर चुके थे, क्योंकि देश भर के विशेषतः उत्तर भारत के जन मानस तक
पहुँचने का आधार वही भाषा थी।" डॉ. दयाल आशा ने ही मनीषी सेवकों की प्रामाणिक
जानकारी प्रस्तुत करके हिंदी की भी महान
सेवा की है और भारत राष्ट्र की भी।
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