डॉ. गुलाबराय : व्यक्तित्व और कृतित्व (डॉ. क. सरोजिनी देवी )
डॉ. गुलाबराय
: व्यक्तित्व और कृतित्व
डॉ. क. सरोजिनी देवी
पद्मराज प्रकाशन मंदिर,
शृंगवृक्षम (पश्चिम गोदावरी जिला), आंध्र प्रदेश
प्रथम संस्करण- 1987, पृष्ठ- 375, मूल्य- 80 रुपए
आधुनिक युग में रस
सिद्धांत को नवीन दृष्टिबोध के प्रकाश में पुनर्व्याख्यायित करने तथा मनोवैज्ञानिक
दृष्टि से विश्लेषित करने का श्रेय दो विद्वानों को दिया जाता है- एक बाबू
गुलाबराय और दूसरे डॉ. नगेन्द्र। इनमें गुलाबराय ने आचार्य शुक्ल द्वारा
प्रतिपादित साधारणीकरण के सिद्धांत को भी प्रश्नांकित किया साथ ही उन्होंने शुक्ल
जी की व्याख्यात्मक समालोचना के साथ आई.ए. रिचर्ड्स के मूल्यवाद का संबंध जोड़कर
एक अभिनव समीक्षा पद्धति के विकास की पृष्ठभूमि निर्मित की।
बाबू
गुलाबराय समन्वय को जीवन की चरम सार्थकता का आधार बिन्दु मानते थे। उनकी दृष्टि
में यदि साहित्य ऐसे समाज के निर्माण का पक्षधर नहीं है, जो विभेदीकरण अथवा विशेषीकरण के स्थान पर समन्वय का पक्षपाती हो, तो वह सत्साहित्य नहीं है। समीक्षा में भी वे इसी मान-बिन्दु को
प्रतिष्ठापित करना चाहते थे।
डॉ. सरोजिनी
ने अपने शोध ग्रंथ 'डॉ. गुलाबराय
व्यक्तित्व और कृतित्व' में यही प्रतिपादित किया है। प्रारंभ में
गुलाबराय के जीवन के संबंध में प्रामाणिक जानकारी दी गई है,
जिसके अंतर्गत उनके बाल्यकाल, अध्ययन, गृहस्थ जीवन
और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के साथ उन्हें प्रभावित करने वाली परिस्थितियों का
संकेत किया गया है। गुलाबराय की आकृति भव्य और किसी दार्शनिक की आभा से मंडित थी।
वे वेशभूषा के संबंध में समयानुकूलता के पक्षपाती थे। पद्म सिंह शर्मा कमलेश ने इस
विषय में कहा है कि गुलाबराय ने एक साक्षात्कार में उन्हें बताया था- "घर में
चाहे मैं गाँधीजी का अनुकरण
कर लूँ, किंतु बाहर मैं समाज के अनुकूल वेशभूषा में ही जाता
हूँ।" (मैं इनसे मिला,
पृ. 14)। वेशभूषा के
प्रति गुलाबराय जी इतना ध्यान रखते हुए भी व्यक्तिगत जीवन में बड़ी सादगी से रहते
थे। डॉ. सत्येन्द्र,
डॉ. नगेन्द्र
और अन्य सभी लोगों ने उनकी सादगी तथा सौम्य स्वभाव पर अनेक जगह टिप्पणियाँ की हैं।
स्वयं डॉ. सरोजिनी भी मानती है कि- "बाबू जी सात्विक, सरल, सज्जन, ऋषि, योगी तथा
कर्तव्य परायण व्यक्ति थे। सहिष्णुता सौजन्यता और सविनम्रता की वे प्रतिमूर्ति ही
नहीं थे वरन् सौम्य तथा निर्लिप्त हृदय वाले भी थे।” (पृ. 25)।
बाबू
गुलाबराय ने विपुल मात्रा में साहित्य रचना की है। पाश्चात्य
दर्शनों का इतिहास,
अध्ययन और
आस्वाद, जीवन पथ, ठलुआ क्लब, फिर निराशा
क्यों, मेरी
असफलताएँ, मेरे निबंध, काव्य के रूप, रहस्यवाद और हिंदी
कविता, सिद्धांत और अध्ययन आदि उनकी कृतियाँ हिंदी साहित्य के गौरव ग्रंथों के रूप
में प्रतिष्ठित हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने संपादन, पाठ, संशोधन, जीवनी लेखन
आदि भी किया है। इस शोध-ग्रंथ में डॉ. सरोजिनी ने उनके समग्र साहित्य की सूची दी
है तथा कृतियों का समीक्षात्मक परिचय प्रस्तुत किया है। यह परिचय शोधार्थियों का
पथ प्रदर्शन करने वाला है। परिचय देने की शैली भी ध्यान आकृष्ट करती है, 'फिर निराशा क्यों' ग्रंथ का
परिचय देते हुए वे कहती हैं- "यह पुस्तक सन् 1918 में गंगा पुस्तक माला कार्यालय
लखनऊ से प्रकाशित हुई। बाबूजी की यह पुस्तक उच्च दार्शनिक और नैतिक विचारों से
भरपूर है। वे उदभट्ट दार्शनिक तो हैं ही, परंतु वे शुष्क दार्शनिक नहीं हैं।
अतः उनकी इस पुस्तक के दार्शनिक विचारों के साथ-साथ यह संसार नितांत दुःखागार तो
नहीं है, बल्कि इसमें
दुःख की अपेक्षा सुख की मात्र अधिक है।" (पृ.133)। बाबू गुलाबराय ने बाल साहित्य भी
रचा था। लेखिका ने इसका भी प्रामाणिक परिचय दिया है। परिचय की यह शैली साहित्य के
विषय में साधारण जानकारी ही प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि वैचारिक और
वैज्ञानिक विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। अध्ययन की यह पद्धति बहुत उपयोगी और
महत्वपूर्ण है।
गुलाबराय के निबंधों
का व्यक्तित्व उनके साहित्य के व्यक्तित्व के अन्य सभी पक्षों में अनूठा है।
उन्होंने गंभीर विचारात्मक निबंधों के साथ ही ललित और व्यंग्यात्मक निबंध भी रचे
हैं। डॉ. सरोजिनी का मानना है कि बाबू गुलाबराय के निबंधों को दस वर्गों में
विभक्त किया जा सकता है- समीक्षात्मक, विचारात्मक, मनोवैज्ञानिक, भावात्मक, वैयक्तिक
हास्य-व्यंग्यात्मक,
स्तोत्र शैली
में रचित राजनैतिक,
सामाजिक और
वैज्ञानिक। (पृ. 229)। लेखिका ने इन
सभी शैलियों के निबंधों पर भी उपयोगी टिप्पणियाँ की हैं, जैसे--- उनकी मान्यता है कि गुलाबराय जी द्वारा रचित समीक्षात्मक निबंध
सैद्धान्तिक और व्यावहारिक समीक्षा की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। इसी प्रकार वे
यह भी कहती हैं कि उनके विचारात्मक निबंधों को दो रूपों में देखा जा सकता है- शुद्ध
विचारात्मक और विचार तथा भाव मिश्रित। निबंधों का यह उपविभाजन कई अन्य स्थानों पर
भी दिखाई पड़ता है। लेखिका का निष्कर्ष है कि- "बाबूजी हिंदी साहित्य में एक
प्रतिभाशाली निबंधकार थे जिनकी समकक्षता करने वाला शायद ही कोई हो।" (पृ. 254)।
इस शोध ग्रंथ
में बाबू गुलाबराय के समीक्षक व्यक्तित्व को विश्लेषित करने के लिए एक पूरे अध्याय
की सामग्री निर्मित की गई है। इसमें बहुत विस्तारपूर्वक उनकी समीक्षात्मक कृतियों
का मूल्यांकन और विश्लेषण किया गया है। इस अध्याय में गुलाबराय के संबंध में यह
टिप्पणी महत्त्वपूर्ण लगती है कि बाबू गुलाब राय के समीक्षक व्यक्तित्व का निर्माण
करने में उनके अध्यापक व्यक्तित्व का बहुत बड़ा हाथ था। ग्रंथ का जो अध्याय
गुलाबराय की व्यावहारिक समीक्षा के विश्लेषण से संबंधित है उसमें भी इसी निष्कर्ष
को पुष्ट करने का प्रयास दिखाई देता है। गुलाबराय के सौ से अधिक ऐसे निबंध हैं, जिनमें व्यावहारिक समीक्षा के दर्शन होते हैं और जो उन्होंने एक आदर्श
अध्यापक के रूप में रचे हैं। ऐसे निबंधों में वीर कवि चंदबरदायी, संत कवि
महात्मा कबीर, राष्ट्रकवि
मैथिलीशरण गुप्त,
छायावाद हिंदी
काव्य की वर्तमान स्थिति आदि का उल्लेख किया जा सकता है।
यह
शोध-प्रबंध गुलाबराय के शैलीकार रूप का परिचय भी देता है। इस ग्रंथ में परिशिष्ट
के अंतर्गत दी गई सामग्री ऐतिहासिक महत्त्व की है। परिशिष्ट 'अ' में गुलाबराय
जी द्वारा प्रयुक्त सूक्तियों का संग्रह है। वे अपने लेखन में विचारों की
प्रभावशीलता के उद्देश्य से अनेक सूक्तियों का प्रयोग करते थे, जैसे- “अपने
अहं को संकुचित कर सदा विनय परायण, धन और आदर्शों से भी जन को अधिक
महत्ता देना सीखो,
प्रेम में
आत्मदान रहता है,
आत्मदान का
बदला आत्म-दान में ही चाहा जाता है, मधुर भाषण के पीछे माधुर्यपूर्ण मन
का होना आवश्यक है,
सज्जन अधिकार
रखते हुए भी हुकुम चलाने की अपेक्षा विनय करना अधिक पसंद करते हैं।"
गुलाबरायजी के साहित्य में ऐसी सूक्तियों की भरमार है। कोई शोधार्थी चाहे तो इस दिशा
में आगे बढ़ सकता है।
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