अष्टछाप तथा ताल्लपाक के कवियों का तुलनात्मक अध्ययन (डॉ. आर. सुमनलता )

 

अष्टछाप तथा ताल्लपाक के कवियों का तुलनात्मक अध्ययन

डॉ. आर. सुमनलता

दक्षिणांचलीय साहित्य समिति,

1-1-405/7/1, गाँधी नगर,

हैदराबाद- 500380

प्रथम संस्करण- 1989, पृष्ठ- 406, मूल्य- 170 रुपए

 

जिस प्रकार हिंदी में अष्टछाप के कवि अपनी भक्ति पद्धति और साहित्य साधना के लिए प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार तेलुगु भाषा के ताल्लपाक के कवि भी अपने जीवन-वैशिष्ट्य, भक्ति-वैशिष्ट्य तथा साहित्य साधना के लिए जाने जाते हैं। हिंदी साहित्य में अष्टछाप के कवियों के रूप में जो कवि आते हैं, उनके नाम हैं- सूरदास, कुंभनदास, परमानंद दास, कृष्णदास, नंददास, चतुर्भुज दास, गोविन्द स्वामी और छीत स्वामी। इसी प्रकार ताल्लपाक के कवियों में जो कवि आते हैं, वे हैं- अण्णमाचार्य, पेद तिरुमलाचार्य, चिन तिरुमलाचार्य, चिन्नन्ना तिरुवेंगलप्पा और तिम्मक्का। अष्टछाप के कवियों का समय संवत् 1525 से 1642 के मध्य पड़ता है और ताल्लपाक के कवियों का समय संवत् 1481 से संवत् 1622 के मध्य। यह समय उत्तर तथा दक्षिण दोनों ही क्षेत्रों में अपने धार्मिक तथा सामाजिक वैशिष्ट्य के लिए जाना जाता है। राजनैतिक दृष्टि से अकबर तथा कृष्णदेव राय ने इस काल के साहित्य, संस्कृति, कला, धर्म, दर्शन और जन-जीवन को प्रभावित किया। तत्कालीन साहित्य में सामाजिक और राजनैतिक चेतना की अभिव्यक्ति दोनों ही क्षेत्रों में दिखाई देती है। उत्तर के तुलसी और कबीर तथा दक्षिण के ताल्लपाक इन विषयों पर विस्तार से विविध अभिव्यक्तियाँ करते हैं। उस काल पर ध्यान जाते ही एक और विचार भी उत्पन्न होता है वह यह, कि उस काल में अष्टछाप और ताल्लपाक के कवियों ने साहित्य संगीत और किसी हद तक नृत्य को भी उत्कृष्ट रूप प्रदान किया।

डॉ. आर. सुमनलता ने इन्हीं अष्टछाप तथा ताल्लपाक के कवियों को अपने अध्ययन का विषय बनाया है। उन्होंने इन कवियों के साहित्य, जीवन, भक्ति-पद्धति, दर्शन आदि सभी को तुलनात्मक अध्ययन पद्धति का प्रयोग करके मूल्यांकित किया है। लेखिका ने प्रारंभ में युगीन परिस्थितियों पर प्रकाश डाला है और उत्तर तथा दक्षिण दोनों में उनके प्रभाव का चित्रण किया है। इसके पश्चात् इन दोनों कवियों के जीवन तथा रचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका ने सूरदास के विषय में बताया है कि उनका जन्म संवत् 1535 में हुआ था। उन्हें घर में प्रेम नहीं मिला और वे बचपन में ही घर छोड़कर एक तालाब के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगे। वहीं इन्होंने गायन में कुशलता प्राप्त की तथा भक्ति और विरह के पदों का गायन करने लगे। वल्लभाचार्य ने अष्टाक्षरी मंत्र से सूरदास को अपने संप्रदाय में दीक्षित किया। सूरदास ने वल्लभाचार्य के सिद्धांतों के अनुसार बड़ी मात्रा में पदों की रचना की। सूरदास मंदिर की संकीर्तन सेवा का कार्य करते थे (पृ. 53) अष्टछाप के कवियों में सूर सबसे अधिक सिद्ध भक्त थे। उन्हें तनजा, वित्तजा और मनसा सेवा में से मानसी सेवा का अधिकारी सिद्ध-भक्त माना जाता है।

ताल्लपाक के कवियों में अण्णमाचार्य को सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। डॉ. सुमनलता के अनुसार अण्णमाचार्य के पूर्वज आंध्र प्रदेश के कड़पा जिले में बसे ताल्लपाक ग्राम के निवासी थे। उनका जन्म कब हुआ इस विषय में थोड़ा मतभेद है, किंतु  साक्ष्यों को माना जाए, तो उनका जन्म संवत् 1481 में हुआ था। उन्होंने छोटी आयु में ही अनेक विधाओं में कुशलता प्राप्त कर ली थी। यह भी माना जाता है कि अण्णमाचार्य का बचपन बहुत सुखी नहीं था। जो भी रहा हो, अण्णमाचार्य ने संसार से विरक्त होकर तिरुपति की राह पकड़ी। जब वे पहाड़ पर चढ़ रहे थे तो अचेत हो गए। उसी अवस्था में उन्हें जगन्नमाता का साक्षात्कार हुआ तथा प्रसाद भी मिला। चेतना लौटते ही उन्होंने देवी के नाम पर एक शतक कहा। भगवान बालाजी के दर्शन के समय भी उन्होंने शतक कहा। भगवान ने घनविष्णु नामक वैष्णव आचार्य को आज्ञा दी कि वे अण्णमाचार्य को वैष्णव धर्म में दीक्षित करें। परिणाम स्वरूप उन्हें शंख-चक से चिह्नित करके वैष्णव बनाया गया। अण्णमाचार्य प्रतिदिन एक नये पद की रचना करके स्वामी के सम्मुख गाते थे। कुछ दिन के पश्चात् परिवार के लोग उन्हें घर ले आए तथा उनका विवाह कर दिया। इसके बाद भी अण्णमाचार्य भक्तिसाधना में तल्लीन रहे। तेलुगु तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में अण्णमाचार्य ने रचनाएँ कीं।

डॉ. सुमनलता ने इसी शैली में अष्टछाप तथा ताल्लपाक के कवियों का परिचय दिया है। इस प्रकार की सरल और सुबोध शैली का प्रयोग साधारण पाठकों को भी दोनों कवियों के विषय में उपयोगी जानकारी उपलब्ध करा देता है। शोधार्थियों को ध्यान में रखकर इन कवियों के जीवन के साम्य तथा वैषम्य का अध्ययन किया गया है।

अष्टछाप तथा ताल्लपाक के कवियों की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि ये दोनों कवि दिन-रात साधना करते हुए रचनारत रहते थे। इन दोनों ही कवियों ने भक्ति को केंद्र में रखा है और दोनों ने ही आराध्य देव की बाल, किशोर व यौवन संबंधी लीलाओं में अनुरक्ति प्रदर्शित की है।

डॉ. सुमनलता द्वारा की गई खोज के अनुसार- "अष्टछाप तथा ताल्लपाक के कवियों ने संस्कृत से अपरिचित पाठकों के लिए संस्कृत के कोश आदि का लोकभाषा में परिचय तथा अनुवाद तैयार किया; जैसे--- नंददास की रचनायें-- अनेकार्थ भाषा और नाममाला। इसी प्रकार ताल्लपाक तिरुवेगलप्पा कृत गुरुवाल प्रबोधिक (अमरकोश की व्याख्या), सुधानिधि (काव्यप्रकाश की व्याख्या), पेद तिरुमलाचार्य की तेलुणु भगवतगीता व्याख्या (पृ. 158)। इस समानता के साथ इन कवियों में एक मौलिक भिन्नता भी है। वह है, विषय वस्तु के विस्तार और वैविध्य से संबंध रखने वाली भिन्नता। ताल्लपाक के कवियों के यहाँ अधिक वैविध्य दिखाई देता है, जबकि अष्टछाप के कवि कुछ सीमित जान पड़ते हैं। इसके मूल में विद्यमान कारण की खोज करते हुए डॉ. सुमनलता कहती हैं— "अष्टछाप का काव्य क्षेत्र सीमित था; क्योंकि उन्होंने ब्रज को छोड़ कर दूर-दूर के प्रदेशों में भ्रमण नहीं किया था। अतः उन्होंने ब्रज के बालकृष्ण की लीलाओं का ही गान किया, किंतु  ताल्लपाक के कवियों ने आंध्र प्रदेश के ही नहीं वरन् दक्षिण भारत के समस्त वैष्णव क्षेत्र का दर्शन किया और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति दर्जनों रचनाएँ भी की हैं। इसी कारण अष्टछापी कवियों की तुलना में ताल्लपाक के कवियों की रचनाओं में क्षेत्रों की विभिन्नता अधिक है।" (पृ. 159)

अष्टछाप और ताल्लपाक के कवियों की भक्ति पद्धति किसी भी शोधार्थी की रुचि का विषय हो सकती है। इन दोनों कवियों ने जिस प्रकार अपने-अपने आराध्य की सेवा में अपने हृदय को समर्पित किया है, वह उनके उदात्त तथा भावाकुल हृदय का प्रतीक है। अष्टछाप के कवि वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैत दर्शन के आधार पर ब्रह्म को व्यापक, नाश रहित, सर्वशक्तिमान, स्वतंत्र, सर्वज्ञ मानते थे। वे सगुण और निर्गुण ब्रह्म में कोई अंतर स्वीकार नहीं करते थे। ताल्लपाक के कवि भी सगुण-निर्गुण के मध्य अंतर स्वीकार नहीं करते थे। आध्यात्म संकीर्तन के अनुसार अन्नमाचार्य जी भगवान वेंकटेश्वर को ही अनेक रूपों में देखते हैं। वे यह भी उपदेश देते हैं कि उन्हें ही बौद्ध लोग बुद्ध और वेदान्ती ब्रह्म मानते हैं। अष्टछाप तथा तल्लपाक के कवियों की भक्ति साधना के क्षेत्रों में भी आंतरिक साम्य दिखाई देता है; क्योंकि उनके मंतव्य परस्पर साम्य रखते हैं। इन दोनों कवियों ने यद्यपि भिन्न दार्शनिक संप्रदायों को माना था किंतु  उनके दार्शनिक विचार एक जैसे थे। इससे अधिक क्या होगा कि "अष्टछाप एवं ताल्लपाक के कवियों ने हरि और हरिभक्ति ही सच्चा धन माना है।" (पृ. 255)

डॉ. सुमनलता ने भक्ति पद्धति के साथ-साथ दोनों कवियों की रचनाओं को साहित्यिक दृष्टि से भी मूल्यांकित किया है और दोनों की तुलना की है। साहित्यिक मूल्यवत्ता की दृष्टि से अष्टछाप और ताल्लपाक के कवि अपने-अपने क्षेत्रों में अनुपमेय हैं। इनमें अनेक समानताएँ हैं, किंतु  इन दोनों के साहित्य में कुछ ऐसी भिन्नतायें भी हैं, जो अध्ययन का विषय बन सकती हैं। उदाहरण के लिए डॉ. सुमनलता ने शृंगार चित्रण संबंधी महत्त्वपूर्ण अंतर को रेखांकित करते हुए कहा है कि "अष्टछाप का शृंगार अलौकिक होकर भी लौकिकता की परिधि में ही प्रदर्शित हुआ है। उनके नायक और नायिका दिव्य होकर भी अक्सर मानव रूप में उपस्थित होते हैं। ताल्लपाक के कवि अपने आलंबन की अलौकिकता को कभी नहीं भूलते। उनका शृंगार लौकिकता की परिधि को अक्सर पार कर लेता है।" (347) दोनों कवियों का यह अंतर दो अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित होने वाली रचना परंपराओं के वैशिष्ट्य को ही प्रकट नहीं करता, परिवेश को भी चित्रित करता है। डॉ. सुमनलता ने बड़ी सूझबूझ से इस पक्ष का रेखांकन किया है। इसी प्रकार इस ग्रंथ में कला पक्ष के संदर्भ में एक रोचक निष्कर्ष यह निकाला गया है कि "अष्टछाप के कवियों से ताल्लपाक के कवियों की प्रतिभा बहुमुखी है। इसका कारण उनका विस्तृत शास्त्रीय अध्ययन तथा पांडित्य है।" (पृ. 389) यहाँ मन में यह विचार आता है कि सूरदास ने लोक संपदा का आश्चर्यजनक उपयोग करके अपनी कला को जो लोक व्यापी रूप दिया था, वह क्या उनकी बहुमुखी प्रतिभा का परिचायक नहीं था? तुलनात्मक अध्ययन के प्रसंग में लेखकों का ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए।

हिंदी शोध के क्षेत्र में डॉ. सुमनलता का यह कार्य तुलनात्मक शोध की दृष्टि से हीं नहीं, भारत के भावात्मक ऐक्य के मूल आधार की खोज की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। मध्य युग में दक्षिण से लेकर उत्तर तक भक्ति की जो धारा बही, उसने पहली बार इस देश की साधारण जनता को समान भावों में बाँधकर एक बनाया। उसी भक्ति धारा ने तत्कालीन जीवन में व्याप्त वैषम्य और दिशा हीनता का सामना करने की शक्ति भी प्रदान की। संगीत तथा साहित्य का संगम तो उस काल में हुआ ही। इन सबको मिलाकर सांस्कृतिक ऐक्य का वातावरण बना, यही आगे चलकर भारतीय नवजागरण का एक महत्त्वपूर्ण सूत्र भी सिद्ध हुआ।

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