हिंदी और तेलुगु की प्रगतिवादी काव्य धाराओं का तुलनात्मक अध्ययन (डॉ. के. रामानायुडु)

 

हिंदी  और तेलुगु की प्रगतिवादी काव्य धाराओं का तुलनात्मक अध्ययन

डॉ. के. रामानायुडु

10, II क्रांस स्ट्रीट, सी.आई.टी. नगर,

चेन्नई (मद्रास) 600035

प्रथम संस्करण- 1983, पृष्ठ- 339, मूल्य 85 रुपए

 

हिंदी  और तेलुगु साहित्य के विभिन्न पक्षों को आधार बना कर निरंतर शोध में लगे रहने वाले विद्वान लेखक डॉ. के. रामानायुडु ने अपने इस ग्रंथ में हिंदी  और तेलुगु की प्रगतिवादी काव्यधारा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रगतिवादी चेतना पर विचार करने के साथ ही साथ उन्होंने इन दोनों भाषाओं की कविता को उनके ऐतिहासिक और युगीन अवदान की दृष्टि से भी जाँचा-परखा है।

भारतीय भाषाओं में प्रगतिवादी चेतना का विकास बीसवीं शताब्दी के तृतीय दशक के आसपास हुआ। यह चेतना किसी एकाध भाषा को छोड़कर अन्य सब भाषाओं में विस्फोटक रूप में प्रकट हुई। यह अलग बात है कि इसके प्रस्फुटन और विकास में थोड़ा-थोड़ा काल भेद रहा। बंगला में काज़ी नज़रुल इस्लाम के माध्यम से इस नई चेतना धारा ने काव्य में अपना स्थान बनाया। सन् 1920 से ही साम्यवाद और रूढ़ियों के विरोध पर आधारित जो विचारधारा राजनैतिक बहसों के स्थान पर बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क में स्थापित होने लगी थी, उसी ने काज़ी नज़रुल इस्लाम से विद्रोही अग्निवीणा और प्रलय शिखा जैसी रचनाएँ  करवायीं। नज़रुल ने अपनी कविताओं से युवा वर्ग के हृदय में नवीन युग के आकर्षण और साम्राज्यवाद विरोध जैसी भावनाओं को जन्म दिया। बंगला की निकटवर्ती भाषा असमीया में भी लगभग उन्हीं दिनों प्रगतिवादी चेतना का विकास हुआ। उस भाषा के लेखकों ने सर्वहारा और शोषितों के समर्थन में अनेक कविताएँ रचीं। वहाँ प्राचीन छंदों के स्थान पर नई छंद व्यवस्था अपनाने के बहुत प्रयास हुए। महाराष्ट्र में 1930 के पश्चात ही मार्क्सवादी सिद्धांतों पर आधारित काव्य रचना प्रारंभ हो गई। वहाँ प्रगतिवादी काव्यधारा को प्रेरित और पोषित करने का कार्य काफी कुछ 'रविकरणमंडल' ने किया। उधर उड़ीसा में उड़िया भाषा के कवियों ने कविता का एक नया आंदोलन खड़ा कर दिया। इसका नाम प्रजा कविता रखा गया और इसके अंतर्गत पूँजीवाद का प्रबल विरोध तथा साम्यवाद का समर्थन करने वाली रचनाएँ बड़ी मात्रा में रची जाने लगीं। उर्दू में भी कविता के क्षेत्र में सन् 1931 से ही प्रगतिवादी रुझान दिखाई देने लगा था। 1935 तक तो इस रुझान ने आंदोलन का रूप ले लिया था। अकबर इलाहाबादी जोश मलीहा बादी, फैज अहमद फैज़, अली सरदार जाफरी आदि कितने ही ऐसे लेखक खड़े हो गए, जिन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांतों पर आधारित कविताएँ रचीं। उर्दू की प्रगतिवादी कविता वैविध्य और गुणवत्ता की दृष्टि से उस समय की असमिया, मराठी तथा उड़िया आदि भाषाओं से बहुत आगे थी। जहाँ तक दक्षिण भारतीय भाषाओं का संबंध है, उनमें भी साम्यवादी विचारधारा पर आधारित काव्य परंपरा का विकास हुआ। सन् 1939 के लगभग कन्नड भाषा में प्रगतिवादी काव्यान्दोलन प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका था। कन्नड के प्रगतिवादी आंदोलन को प्रसिद्ध कवि बेन्द्रे ने बहुत सहारा दिया था। मलयाळम भाषा में प्रगतिवादी आंदोलन 'पुरोगमनवाद' नाम से आया। इसका प्रारंभ 1936 में हुआ। इस आंदोलन को क्रष्ण वारीयार, अक्किट्टम् और भास्करम् जैसे कवियों ने सम्बल प्रदान किया। तमिल भाषा में व्यवस्थित अथवा कहें कि आंदोलनबद्ध रूप में प्रगतिवादी काव्यधारा अस्तित्व में नहीं आई, किंतु ऐसा नहीं है कि वहाँ उसका पूर्णतः अभाव है। भारती दासन, कर्ण दासन आदि कवियों की कविताएँ सिद्ध करती हैं कि वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे। तेलुगु भाषा में भी सन् 1930 के आसपास ही प्रगतिवादी काव्यधारा का प्रारंभ हो गया था। वहाँ इसे प्रगतिवादी कविता के स्थान पर 'अभ्युदय कविता' कहा गया। जब 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन हुआ तो तेलुगु के काव्य क्षेत्र में पहले से ही जन्म लेने वाली सुगबुगाहट आंदोलन के रूप में बदल गई। जहाँ तक हिंदी  का प्रश्न है उसमें भी 1930 के लगभग से ही प्रगतिवादी काव्य के दर्शन होने प्रारंभ हो गए थे। 1936 तक तो प्रगतिवाद हिंदी  कविता के मूड की पहचान बन गया था। प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में प्रगतिवाद को हिंदी  कविता का अभिन्न पक्ष बना दिया था।

नायुडु ने इस पूरे इतिहास को गंभीरतापूर्वक खोजा है और उसका विश्लेषण करके बताया है कि बीसवीं शताब्दी प्रारंभ होने के कुछ ही वर्षों बाद भारत की लगभग सभी भाषाओं का चरित्र बदल गया और वे प्रगतिवादी मार्ग पर आगे बढ़ने लगीं। इस इतिहास को खोजने के पश्चात् उन्होंने हिंदी  और तेलुगु कविता में आये प्रगतिवाद और उसके विकास का अध्ययन किया है। इस अध्ययन की सार्थकता तलाशने से पहले इसी ग्रंथ में उठाये गए एक विवादास्पद विषय की चर्चा करना भी आवश्यक है। यह मुद्दा प्रगतिवाद नाम से जुड़ा हुआ है। हिंदी  में प्रगतिवाद के साथ ही प्रगतिशील शब्द का प्रचलन भी है। कुछ लोग मानते हैं कि प्रगतिवाद और प्रगतिशील एक ही अर्थ को द्योतित करने वाले शब्द हैं, दूसरी ओर कुछ लोग इन्हें अलग-अलग अर्थों का द्योतक मानते हैं। लेखक के अनुसार जो लोग इन्हें एक मानते हैं, उनका कहना है कि ये दोनों ही सामाजिक वैषम्य और आर्थिक शोषण का विरोध करते हैं, अतः इन दोनों शब्दों को अलग-अलग करके देखने की आवश्यकता नहीं है। डॉ. रामविलास शर्मा, रांगेय राघव, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. शिवकुमार मिश्र आदि इसी वर्ग के विचारक हैं। रामविलास शर्मा ने तो 'प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ' शीर्षक पुस्तक में साफ कहा है— “जैसे छायावादी कवि की रचनाएँ , छायावाद से भिन्न नहीं हैं, वैसे प्रगतिशील या प्रगतिवादी लेखकों की रचनाएँ प्रगतिवाद से भिन्न नहीं हैं।" (पृ. 3 पर उद्धृत) इस विषय में डॉ. नामवर सिंह स्थिति को अधिक स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि 'वाद' की अपेक्षा 'शील' को अधिक अच्छा और उदार समझकर इन दोनों में भेद करना कोरा बुद्धिविलास है और कुछ लोगों की इस मान्यता के पीछे प्रगतिशील साहित्य का विरोध भाव छिपा है।" (पृ. 3 पर उद्धृत)। इन शब्दों पर विचार करने वाले विद्वानों का एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि ये दोनों एक ही कविता के दो नाम है, किंतु एक उसके संकुचित रूप को दर्शाता है और दूसरा व्यापक रूप को। हिंदी  में कुछ ऐसे विद्वान भी हैं जो प्रगतिवाद और प्रगतिशील को भिन्नार्थक मानते हैं। इनका कहना है कि जो साहित्य मार्क्सवादी प्रभाव से मुक्त है और जिसका उद्देश्य व्यक्ति व समाज के जीवन को प्रगति की दिशा में बढ़ाना है, वह साहित्य प्रगतिशील है। शिवदान सिंह चौहान और शिवकुमार मिश्र जैसे विद्वान् इसी श्रेणी में आते हैं।

डॉ. नायुडु इन दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करके ही चुप नहीं रह जाते। वे अपना निर्णय सुनाते हैं और कहते हैं कि वर्तमान में इन दोनों शब्दों को भिन्नार्थों में प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या ही अधिक है। उनका यह कथन उनकी सहानुभूति का संकेत कर देता है। इसके पश्चात् वे प्रगतिवाद और प्रगतिशील के मध्य साम्य तथा वैषम्य की सूची बनाते हैं। इस सूची के कुछ सूत्र इस प्रकार है

"रूढ़ि एवं परंपराओं के विरुद्ध दोनों ही का दृष्टिकोण खंडनात्मक है" (सूत्र संख्या-3)

दोनों ही साहित्य समाज के दुर्बल एवं असहाय अंग के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं (सूत्र सं. 4)

दोनों ही साहित्य मानवतावादी भावना से अनुप्राणित है (सूत्र सं.-7)

इसी प्रकार दोनों में वैषम्य दिखाने वाले कुछ सूत्र इस प्रकार हैं

प्रगतिवाद आधुनिक युग की एक विशिष्ट साहित्यिक विधा या धारा है जबकि प्रगतिशील साहित्य युग अथवा काल की सीमा से निरपेक्ष चिरंतन साहित्य की परंपरा है। (सूत्र सं.-1)

प्रगतिवाद शोषित वर्ग के प्रति आक्रोश एवं घृणा का भाव प्रकट करता है जबकि प्रगतिशील साहित्य समस्त मानव जाति के प्रति दया एवं उदारता का व्यवहार करता है। (सूत्र सं.-3)

प्रगतिवाद सामाजिक उन्नति एवं विकास के लिए क्रांति एवं हिंसा को साधन मानता है, जबकि प्रगतिशील साहित्य सुधार एवं हृदय परिवर्तन का समर्थन करता है, किंतु समय आने पर क्रांति से भी विमुख नहीं होता। मानवीय इतिहास स्वयं इसका साक्षी है। (सूत्र सं.-5)

प्रगतिवाद यथार्थमूलक अधिक है, जबकि प्रगतिशील साहित्य आदर्शवादी है। (सूत्र सं. 8) "

ये सूत्र समीक्ष्य ग्रंथ के पृष्ठ संख्या पाँच और छः से लिए गए हैं। यद्यपि विद्वान लेखक अपने निष्कर्ष और सूत्र निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है, किंतु यह अवश्य पूछा जा सकता है कि प्रगतिवाद और प्रगतिशील शब्दों के बीच साम्य और वैषम्य के जो सूत्र निर्मित किये गए हैं, उनका ठोस आधार क्या है? कम से कम वैषम्य से जुड़े सूत्रों को देखकर यह लगता है कि लेखक ने यथार्थ स्थिति की उपेक्षा करके वैषम्य की कल्पना की है। उदाहरण के लिए प्रगतिवाद और हिंसा के बीच जिस नाभिनालबद्ध संबंध को कल्पित किया गया है वह वास्तविकता से परे है। इसी प्रकार प्रगतिशील के साथ जिस प्रकार आदर्शवाद का गठबंधन किया गया है वह कोरी हठवादिता है। लेखक की यह हठवादिता राष्ट्रीयता और प्रगतिवाद के मध्य कल्पित संबंध के अवसर पर भी सामने आती है। इस हठवादिता का कारण चाहे जो हो, किंतु इससे हिंदी  शोध की वर्तमान दशा का पता अवश्य चलता है। पीएच.डी. उपाधि प्राप्त करने के लिए जो ग्रंथ रचे जाते हैं उनके कुछ पृष्ठ अतार्किक और अवास्तविक बातों के उल्लेख के लिए आरक्षित होते हैं। कई बार निर्देशकों की हठवादिता भी इसका मूल कारण बन जाती है।

प्रस्तुत शोध ग्रंथ में हिंदी  और तेलुगु की प्रगतिवादी काव्य धाराओं के इतिहास का विश्लेषण बहुत सटीक है। लेखक ने इस विकास के चार चरण निर्धारित किये हैं और प्रत्येक चरण की कालावधि में हिंदी  और तेलुगु की प्रगतिवादी कविता का इतिहास प्रस्तुत किया है। हिंदी  पाठक हिंदी  कविता के इतिहास से परिचित ही हैं। उनके लिए तेलुगु भाषा के इतिहास की जानकारी ही अधिक उपयोगी होगी।

डॉ. नायुडु के अनुसार पहला चरण 1934 से 1940 तक है। इस चरण में सबसे पहले रामेश्वर करुण की करुण सतसई और आचार्य रंगा के संपादन में प्रकाशित रैतु भजनावली का परिचय दिया गया है। इन कृतियों में धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक रूढ़ियों का खंडन किया गया है तथा पूँजीवाद, साम्राज्यवाद और अर्थ-शोषण का विरोध किया गया है। इस प्रसंग में लेखक ने श्री श्री की विशेष चर्चा की है, जिन्होंने अपनी कविताओं में नये प्रगतिवादी युग को आकार दिया। उनका प्रसिद्ध काव्य महाप्रस्थानम् प्रगतिवादी चिन्तन से प्रभावित है। तेलुगु में प्रगतिवादी काव्यधारा के विकास का दूसरा चरण भी श्री श्री से प्रेरित और प्रभावित है। इस युग में बेल्लकोण्ड रामदास कुंदुर्ति आंजनेयुलु तथा ऐल्चूरि सुब्रह्मण्यम् की कविताओं का संग्रह "नयागरा" सामने आया, जिसने यथार्थवादी दृष्टि को पूर्ण प्रतिष्ठित करते हुए नित्य जीवन की समस्याओं को कविता का विषय बनाया। नयागरा के बाद 'अनिसेट्टि' की उल्लेखनीय रचना अग्निवीणा, सोमसुंदर की कृति वज्जरायुधम्, दाशरथि की रचना अग्निधारा और रेण्टालगोपालकृष्ण की पुस्तक संघर्षण का विशेष महत्त्व है। इनके माध्यम से देश की पीड़ित और निर्धन जनता तेलुगु कविता के केंद्र  में आई।  यह चरण 1941 से 1950 तक माना जाता है।

प्रगतिवादी काव्यधारा के तृतीय चरण की अवधि 1951 से 1960 तक है। इस काल में प्रगतिवादी काव्य परंपरा में एक सूक्ष्म परिवर्तन देखने को मिला। डॉ. नायुडु के शब्दों में "सन् 1950 से 60 तक की हिंदी  के प्रगतिवादी काव्यों की तरह तेलुगु के कविता संग्रहों का भी प्रमुख विषय अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरोध की अपेक्षा राष्ट्रीय स्तर के शोषक-शासक शक्तियों का विरोध अधिक रहा है।" (पृ. 165) ऐसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि स्वतंत्रता के प्रारंभिक दस वर्षों में जन समस्याएँ बहुत बढ़ गई थीं। पं. नेहरू का तिलिस्म लगातार टूट रहा था और राजनीति का असली चेहरा सामने आने लगा था। तेलुगु भाषा में इस अवधि में विपुल मात्रा में काव्य रचा गया। इस क्रम में पुरोगमनं (पुट्टपर्ती), पुनर्नवम् (दाशरथि), युगे युगे (कुन्दुर्ति) आदि का उल्लेख किया जा सकता है। यहाँ तेलंगाणा का उल्लेख आवश्यक है, जो एक प्रबंध काव्य है और जिसमें निजाम नवाब के अत्याचारों तथा जनता के मन में उत्पन्न असंतोष व शासक-शासित संघर्ष का यथार्थ चित्रण है। यथार्थवादी काव्यकला काव्य-शिल्प को भी नये रूप में ढालती है। उदयतारा तथा चीकटि-नीडलु आदि से इसका प्रमाण भी मिलता है।

चौथा चरण 1961 से 1970 तक माना गया है। लेखक के अनुसार इस चरण का प्रगतिवादी साहित्य एकरसता की ओर बढ़ा। इसके मूल में संभवतः कवियों के सामने आक्रमण का एक ही लक्ष्य होना था। इस चरण के प्रमुख कवि थे मल्लारेड्डी। उन्होंने मल्लारेड्डी गेयालु तथा शंखाराव के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्याप्त विकृतियों पर कठोर प्रहार किये हैं। विशाद भारतम् (विजय लक्ष्मी) लच्चिकपदालु आदि इस युग के अन्य उल्लेखनीय ग्रंथ हैं। इस काल में प्रसिद्ध कवि श्री श्री का काव्य ग्रंथ खड्ग सृष्टि भी सामने आया। इसमें मूल तेलुगु कविताओं के साथ श्री श्री की अंग्रेजी कविताओं के तेलुगु अनुवाद भी हैं। चतुर्थ चरण का मूल्यांकन करते हुए डॉ. नायुडु कहते हैं- "प्रगतिवादी काव्यधारा के विकास के चतुर्थ चरण में लिखित प्रायः सभी तेलुगु रचनाओं की काव्य वस्तु एक सी है। सबमें सामान्य रूप से भारत देश की और विशेष रूप से विशालान्ध्र की पूँजीवादी अर्थनीति, सरकार की शासन नीति उन की धार्मिक एवं मर्मव्यवस्था और सबसे बढ़कर पूँजीवादी समाज के शोषित-शोषकों,  शासित-शासकों दोनों की भावगति आदि के विश्लेषण विवेचन से संबद्ध है। व्यंग्यात्मकता इस समय की सभी रचनाओं में प्राप्त होने वाली प्रमुख विशेषता है।" (पृ. 170)

यह ऐतिहासिक विवेचन इस शोध कार्य का सबसे अधिक सार्थक पक्ष है। विशेषकर हिंदी  पाठकों के लिए इसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। इसके सहारे हिंदी और तेलुगु प्रगतिवादी काव्य धारा के वैचारिक व शैल्पिक पक्ष तथा प्रगतिवाद की दार्शनिक पृष्ठभूमि के कुछ अन्य आधार स्रोत भी तलाशे जा सकते हैं।

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