तमिल साहित्य एक झाँकी (डॉ. एम. शेषन )
तमिल साहित्य
एक झाँकी
डॉ. एम. शेषन
मीनाक्षी प्रकाशन
11, डॉ.
रामस्वामी सालै
के.के. नगर,
मद्रास- 600078
प्रथम संस्करण- 1989, पृष्ठ- 265, मूल्य- 80 रुपए
डॉ. एम. शेषन
तमिल और हिंदी के वरिष्ठ साधक तथा लेखक थे। वे समय-समय पर तमिल भाषा और साहित्य के
संबंध में खोजपूर्ण सामग्री हिंदी पाठकों को सुलभ कराते रहते थे। उनके ऐसे ही लेखों
का संग्रह ‘तमिल साहित्य एक झाँकी’ शीर्षक ग्रंथ में
उपलब्ध है।
तमिल शब्द का
प्रयोग प्राचीन ग्रंथों में अनेक अर्थों में प्राप्त होता है। कहीं वह ऐसे प्रदेश का
प्रतीक बना है, जहाँ लोग रहते हैं और कहीं माधुर्य तथा शीतलता का। यदि इन अर्थों
को साहित्यिक आधार प्रदान किया जाए, तो तमिल एक ऐसी भाषा के लिए
प्रयुक्त माना जाएगा, जिसमें जीवन बोध, माधुर्य और शीतलता से युक्त साहित्य
की रचना की गई हो। तमिल भाषा लगभग ढाई हजार वर्ष से अपने मूल रूप और गठन को बदले बिना
बोली और समझी जाती आ रही है। द्रविड़ परिवार की इस प्रमुख भाषा में प्राचीन साहित्य
की समृद्ध परंपरा विद्यमान है। इस भाषा के प्राचीन साहित्य में तमिलों की विश्व बंधुत्व
की भावना प्रकट हुई है। एम. शेषन ने अपने लेखों में तमिल जैसी प्राचीन भाषा और उसके
साहित्य का परिचय देने के साथ ही तमिल लोक संस्कृति का परिचय भी दिया है।
तमिल का प्रथम
प्रबंध काव्य माना जाता है- "शिलप्पदिकारम" इस ग्रंथ को न केवल तमिल बल्कि
द्रविड़ भाषा परिवार की चारों भाषाओं में प्रथम प्रबंध काव्य का गौरव प्राप्त है। इसमें
एक साधारण नारी की व्यथा भरी कथा है जिसका जन्म श्रेष्ठि कुल में हुआ था। डॉ. शेषन
के अनुसार इस प्रबंध काव्य की तीन प्रमुख विशेषताएँ है-
1.
महाकाव्य या प्रबंध काव्य की मान्य
परंपरा से यह काव्य इस दृष्टि से भिन्न है कि इसका नायक कोई राजपुरुष या राजपरिवार
की नारी नहीं, जिसके कार्य कलापों
जय-पराजय उत्थान-पतन का उल्लेख हुआ। इसके विपरीत इस प्रबंध काव्य का नायक एक साधारण
नागरिक वणिक व्यक्ति है।
2.
यह नायक प्रधान नहीं बल्कि नायिका प्रधान
काव्य है। और
3.
इस काव्य ग्रंथ में शारीरिक बल वीरतापूर्ण
कृत्यों आदि के स्थान पर मानसिक एवं नैतिक बल और वीरता का चित्रण हुआ है। (पृ. 11)
लेखक ने इस ग्रंथ
के विभिन्न प्रभावों की चर्चा भी की है। उनमें से दो प्रभाव उल्लेखनीय हैं। एक यह कि
इस ग्रंथ ने परवर्ती प्रबंध काव्य परंपरा के विकास में प्रेरणा-स्रोत का कार्य किया
और दूसरी यह कि इसमें लोक संपदा व लोक संस्कृति की झाँकी भी प्रस्तुत की गई है। डॉ.
शेषन ने अपने इस ग्रंथ में 'तिरक्कुरळ' का परिचय भी दिया है। यह तमिल से भी अधिक समग्र भारतीय साहित्य
का गौरव ग्रंथ है। इस ग्रंथ का महत्त्व इसलिए बहुत अधिक है कि इसकी रचना सीमित विचार
दृष्टि के स्थान पर अखिल मानव जीवन से जुड़ी दृष्टि के आधार पर की गई है। तिरक्कुरळ
के रचनाकार का मत है कि जीवन मूल्य शाश्वत होने चाहिए। निश्चय ही यह शाश्वतता सामाजिक
और सांस्कृतिक संदर्भों में भी उपयोगी है।
तमिल प्रदेश में
शैव भक्ति परंपरा का विश्लेषण करते हुए लेखक ने यह सिद्ध किया है कि पाँचवीं-छठी शताब्दी
से लेकर नौवीं शताब्दी तक वैष्णव भक्त अलवारों और शैव नायनमारों की साधना के बल पर
भक्ति आंदोलन का जो अंकुर फूटा था, वही विकसित होकर जन आंदोलन बन गया।
शैव नायनमारों ने भक्ति के सगुण रूप पर ही अधिक बल दिया और जाति-पाति व ऊँच-नीच का
खंडन करते हुए इस बात का प्रचार किया कि ईश्वर की शरण में बिना किसी भेदभाव के सभी
को आश्रय प्राप्त होता है।
डॉ. एम. शेषन
ने तमिल साहित्य में राम और कृष्ण काव्य परंपरा का भी गंभीर तथा खोजपूर्ण विश्लेषण
किया है। तमिल प्रदेश में कंबन रचित कम्ब रामायण राम कथा परंपरा की प्रौढ़ कृति मानी
जाती है, किंतु इसकी रचना से कई शताब्दी पहले भी वहाँ कुछ प्रकीर्ण
लोकगीतों में रामकथा विषय प्रसंग गाए जाते
थे। सर्व प्राचीन संघ कालीन साहित्य के अनेक लोकगीतों में रामकथा के कुछ ऐसे प्रसंग
हैं, जो वाल्मीकि रामायण में भी नहीं हैं। रावण द्वारा सीता को हर लिये जाने पर
सीता द्वारा अपने आभूषण नीचे डाल दिये जाने का प्रसंग तत्कालीन लोकगीत रचयिताओं की
मौलिक सूझ है। लेखक ने रामकथा के प्राचीनतम स्रोतों का विश्लेषण करने के साथ ही अठारहवीं
शताब्दी के राम नाटकम् ग्रंथ का परिचय भी दिया है, जिसमें रामकथा
को गीतात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।
तमिल प्रदेश में
रामकथा की भाँति ही कृष्णकाव्य परंपरा भी प्राचीन काल से ही विद्यमान है। प्राचीन तमिल
प्रदेश में कुछ ऐसी कथाएँ प्रचलित थीं, जिसमें कृष्ण और गोपियों
के नृत्यों का संकेत प्राप्त होता है। तमिल ग्रंथों में इन नृत्यों की चर्चा कुरवैक्कूत्तु
नाम से मिलती है। ये नृत्य रासलीला से साम्य रखते हैं। कृष्ण की दो महान उपासिकाएँ
हुई हैं, मीरा और आण्डाल। आण्डाल वैष्णव संत पेरियालवारर की पोषिता
कन्या थी। भक्तिपूर्ण परिवेश में रहने के कारण वह युवावस्था को प्राप्त होते-होते कृष्ण
को ही अपना पति मानने लगी। उसका यह समर्पण इतना आत्मीय हो गया कि वह पूजा करते समय
कृष्ण को पहनाई जाने वाली माला पहले स्वयं पहनने लगी। स्वयं नारायण भी वही माला स्वीकार
करने लगे,
जिसे पहले आंडाल
ने पहन लिया हो। उधर उत्तर भारत में जन्मी मीरा भी बचपन में ही कृष्ण के प्रति समर्पित
हो चुकी थीं। डॉ. शेषन ने इन दोनों साधिकाओं के जीवन और साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन
किया है। उन्होंने अपना निष्कर्ष दिया है कि "दोनों ने भागवद् धर्म का पालन और
अनुगमन किया है। दोनों ने बचपन से अपनी पारिवारिक परंपराओं के आधार पर वैष्णव संस्कारों
को अर्जित किया था। दोनों ने अपना समस्त नारीत्व कृष्ण के लिए समर्पित कर दिया और इस
प्रकार जीवन के परमोद्देश्य को प्राप्त कर लिया है।" (पृ. 76)।
डॉ. एम. शेषन
ने आंडाल और मीरा के साथ ही साथ कुलशेखर आलवार तथा रसखान और सूरदास व पेरियालवार के
संबंध में भी तुलनात्मक सामग्री प्रस्तुत की है। तमिल के बारह प्रसिद्ध आलवारों में
कुलशेखर आलवार का अपना अलग स्थान है। यद्यपि उनका जन्म राजपरिवार में हुआ था और वे
अस्त्र-शस्त्र चलाने में भी कुशल थे, किंतु बचपन से ही उनका मन भगवत् कथाओं को सुनने में रमता
था। इसीलिए वे एक समय राज्य-भार छोड़कर श्रीरंगम चले गए और भक्त मंडली में शामिल होकर
भगवान की स्तुति करने लगे। कुलशेखर आलवार ने तमिल के साथ-साथ संस्कृत में भी रचनाएँ
की हैं। वे भगवान के समक्ष इतने दीन भाव से जाना चाहते थे कि उनका मन वे सीढ़ियाँ बन
जाने को होता था, जिन पर चढ़ कर भक्त भगवान के दर्शन के लिए देवालय
में प्रवेश करते हैं। दूसरी ओर रसखान का समर्पण भी किसी प्रकार कम नहीं था। वे भी मनुष्य, पशु या पाषाण
के रूप में वहाँ जन्म लेने चलते हैं, जहाँ उन्हें कृष्ण का सानिध्य मिल सके।
लेखक का यह निष्कर्ष नितांत सही है कि- "प्रांतभेद भाषा-भेद आदि सीमाएँ भारतीय
भक्तों के हृदय में स्थित भाव साम्य को हृदय की एकता को किसी भी प्रकार विभक्त नहीं
कर सकते।" (पृ. 181)। लेखक ने सूरदास
और पेरियालवार की तुलना उनके काव्य में चित्रित वात्सल्य भाव के आधार पर की है। इन
दोनों कवियों ने यशोदा,
बालकृष्ण और बालकृष्ण
के शैशव को लेकर मनोयोगपूर्वक भाव चित्रांकन किया है। लेखक ने चित्रण की भिन्नता का
भी सूक्ष्म विश्लेषण किया है।
जहाँ तक तमिल
भाषा के आधुनिक साहित्य का प्रश्न है वह भी इस ग्रंथ में अनेक शीर्षकों के अंतर्गत
चर्चित हुआ है। उपन्यास, कहानी, नाटक, जीवनी आदि को
आधार बनाकर स्वतंत्र लेख लिखे गये हैं। इन लेखों का सम्मिलित निष्कर्ष यह है कि तमिल
भाषा का आधुनिक साहित्य समृद्धि की दृष्टि से किसी अन्य भाषा से पीछे नहीं है। तमिल
भाषी लेखक स्थानीय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय और विश्व जीवन की समस्याओं को अपने साहित्य
में चित्रित कर रहे हैं। आधुनिक तमिल के पास कल्कि जैसे विशाल दृष्टि वाले लेखकों की
परंपरा है, जिन्होंने तमिल साहित्य को विश्व साहित्य के समक्ष सिर उठाने योग्य
बना दिया है। इस ग्रंथ का एक विशिष्ट पक्ष यह भी है कि लेखक ने तमिल साहित्य में राष्ट्रीय
एकता, तमिल भाषा में पत्र-पत्रिकाओं के विकास और विदेशों में
तमिल भाषा के अध्ययन पर भी खोजपूर्ण सामग्री दी है।
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