कवियों का कवि शमशेर (डॉ. रंजना अरगड़े)
कवियों का कवि
शमशेर
डॉ. रंजना अरगड़े
वाणी प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-2
प्रथम संस्करण- 1988, पृष्ठ- 242, मूल्य- 85 रुपए
शमशेर ‘कवियों के कवि’ के रूप में बहुत पहले ही प्रसिद्ध हो
गए थे। रंजना आरगड़े ने अपने शोध ग्रंथ का शीर्षक भी चुना है,
'कवियों का कवि
शमशेर'। यह अकादमिक
जगत में किसी रचनाकार के शक्तिशाली हस्तक्षेप का उदाहरण कहा जा सकता है।
शमशेर हिंदी के
ऐसे सधे हुए कवि हैं, जो एक साथ बड़े निकट और बड़े दूर लगते है। उनकी
एक कविता दैनिक जीवन में होने वाले वार्तालाप का-सा आभास देती है, तो दूसरी कविता
कोई ऐसा प्रयोग प्रतीत होती है, जो आसानी से समझ में नहीं आता। कई बार
शमशेर पाठक के हाथ में कोई ऐसी कविता थमा देते हैं, जिसमें वे
स्वयं गाँव भर के किसी मुखिया की तरफ डाँटते-डपटते, सावधान करते दिखाई
देते हैं और पाठक चुपचाप वह सब सहन करता है। शमशेर कभी-कभी अलमस्त कविताएँ मी लिखते
हैं। इन कविताओं में उनके किसी भी मित्र की उपस्थिति हो सकती है। वे कभी यह भी दिखा
सकते हैं कि हाँ, वे किसी से कम नहीं हैं। कभी-कभी शमशेर ऐसी
कविताएँ भी रचते हैं, जिनमें देश-विदेश के इतिहास और सांस्कृतिक
जीवन को नये सिरे से प्रस्तुत किया जाता है। सिकंदर के प्रसंग को लेकर रची गई कविता
या फिर मणिपुर के प्राचीन जीवन को आधार बनाकर लिखी गई कविता इसी प्रकार की है।
शमशेर दरअसल काव्य-तकनीक
या कहें, कविता के फार्मेट पर बहुत अधिक ध्यान देने वाले कवि हैं। प्रारंभ से लेकर
अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले तक लिखी गई अपनी कविताओं में उन्होंने फार्मेट के संबंध
में अनेक प्रयोग किये हैं। मणिपुर की राज्यतंत्रात्मक व्यवस्था से संबंधित काव्य पंक्ति
को लेकर उन्होंने अपनी मृत्यु से केवल कुछ ही वर्ष पहले एक काव्य प्रयोग किया था। यह
प्रयोग स्वरलिपि से संबंधित था और मणिपुर की तत्कालीन संस्कृति का प्रभाव-चित्र प्रस्तुत
करने वाला था। शमशेर को कविता में बिंबों से बहुत प्रेम रहा। यदि हिंदी में काव्य-बिंब
की दृष्टि से समर्थ कवियों की खोज की जाए, तो मुक्तिबोध, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल
और केदारनाथ सिंह का नाम सबसे पहले ध्यान में आएगा। इन चारों में भी शमशेर के बिंब
कुछ अलग किस्म के हैं। ऐसा नहीं है कि यह अलगाव उन्हें अन्य कवियों में श्रेष्ठ बनाता
है, बल्कि उनका अलगाव
यह है कि वे अपने बिंब को अपने हाथ से निकलने नहीं देते। केदारनाथ सिंह और केदारनाथ
अग्रवाल अपने बिंबों को मुक्त छोड़ देते हैं, जबकि शमशेर उन्हें पकड़े रहते हैं या फिर उनकी उपस्थिति बिंब के ठीक सामने
दर्ज रहती है। यह बात उनके अलावा मुक्तिबोध में भी है। इसका कारण उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता
है या कुछ और- इस विषय में शोधार्थियों को खोज करनी चाहिए।
डॉ. रंजना अरगडे
ने अपने शोधग्रंथ में शमशेर से जुड़े विभिन्न पक्षों को उभारने की चेष्टा की है। वे
यद्यपि प्रश्नों में उलझी नहीं हैं, न ही उन्होंने आमने-सामने होकर टकराने
वाली शैली का प्रयोग किया है; फिर भी यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि शमशेर के काव्य
व्यक्तित्व पर अपने समय की यह पहली ऐसी प्रामाणिक पुस्तक है,
जो परिश्रम और आत्मीयता के साथ लिखी गई। शमशेर के यहाँ संवेदना और शिल्प का जो निरंतर
संघर्ष है उसे रंजना अरगड़े ने व्याख्यायित करने और समझाने की कोशिश की है। उन्होंने
सिद्ध किया है कि शमशेर अपनी कविता में संवेदना के विविध स्तर जीते हैं और अनेक संभावनाओं
वाली भाषा का प्रयोग करके सामाजिक जीवन के अंतर्विरोधों को सामने लाते हैं। इस संदर्भ
में शमशेर की प्रेम और सौंदर्य संबंधी कविताओं
को लिया जा सकता है। रंजना अरगड़े लिखती हैं- "शमशेर प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। प्रेम का रंग उनकी कविताओं में गहरा
है। यह प्रेम अनेक स्तरों पर उनकी कविताओं में आलेखित हुआ है।" (पृ. 24)। यह तथ्य
उनकी दूसरी कविताओं पर भी लागू होता है। लेखिका ने एक प्रभावशाली निष्कर्ष यह दिया
है कि शमशेर अपनी कविताओं में सबसे पहले अपने से जूझते हैं और फिर दूसरों को संबोधित
करते हैं। इसका सीधा प्रभाव यह होता है कि वे जो कुछ कहना चाहते हैं, उसकी कोमलता या कठोरता से पहले स्वयं परिचित होते हैं, उसके बाद इन स्थितियों को दूसरों के आगे सरका देते हैं। शमशेर की व्यंग्यात्मक
कविताएँ ये ही प्रभाव उत्पन्न करती हैं। विशेषकर उन्होंने धर्म और सांप्रदायिकता को
आधार बनाकर जो रचनाएँ की हैं, उनका व्यंग्य भी इसी प्रकार का
है।
शमशेर मार्क्सवाद
के प्रति प्रतिबद्ध कवि थे। वे अपनी इस प्रतिबद्धता से कभी नहीं डिगे। यहाँ तक कि अन्य
लेखकों का मूल्यांकन भी वे अपनी प्रतिबद्धता के आधार पर ही करते थे। इसका एक उदाहरण
स्वयं रंजना अरगड़े प्रस्तुत करती है- "वे मुक्तिबोध में भाषायी कलात्मक कमजोरी
मानते हुए भी उन्हें इस युग का निराला के बाद सबसे बड़ा साहित्यकार मानते हैं। मोहन
राकेश को एक सच्चा कलाकार मानते हुए भी उसकी रचनाओं में सामाजिक जागरूकता का जो अभाव
(उनके तैं) है, उसके प्रति ध्यान
आकर्षित करते हैं।" (पृ. 19) शमशेर की यह दृष्टि अनेक लोगों को नापसंद भी हो सकती
हैं, किंतु फिर भी इसका अपना महत्त्व है। कम कम शमशेर की अनुकरणीय
साफगोई तो इससे प्रकट होती ही है।
शमशेर की कविता
पर लिखा जाए, तो उनके बिंबों की चर्चा
के बिना कार्य अधूरा ही रहता है। इस ग्रंथ में भी शमशेर के बिंब-विधान पर विस्तृत व्याख्या
उपलब्ध है। उनके बिंबों के विषय में रंजना
अरगड़े का कहना है- "शमशेर की कविताओं में बिंब उनकी कविता के अर्थ विकास में
योग देते हैं और इसीलिए उनके बिंब कई बार वर्गीकरण की सीमा को लाँघ जाते हैं। क्योंकि
शमशेर की रचना प्रक्रिया जटिल है और अभिव्यक्ति संकेतात्मक । इसीलिए उनके बिंब अधिकतर
संकुल होते हैं। वे ऐन्द्रिय और अतीन्द्रिय दोनों अनुभूतियों को अपनी रचनाओं में बिंबों
के द्वारा प्रस्तुत करते हैं।" (पृ.
47)। यह निष्कर्ष शमशेर के बिंबों को समझने
में सहायता देता है। इसे लेखिका ने उदाहरण और व्याख्या से पुष्ट भी किया है; फिर भी यह प्रश्न और उसका उत्तर कहीं नहीं है कि शमशेर के बिंब अक्सर आतंकित
क्यों करते हैं। हिंदी समीक्षा को कभी न कभी शमशेर के काव्य से जुड़े इस पक्ष का विवेचन
करना ही पड़ेगा। बिल्कुल ऐसा ही एक सवाल शमशेर द्वारा अपनाई गई काव्य शैलियों के विषय
में भी है। शमशेर ने बड़ी महत्त्वपूर्ण ग़ज़लें रची हैं। उन ग़ज़लों में वे ग़ज़ल कहने
के अनुशासन को पूरा का पूरा मानते हैं; फिर भी शमशेर की ग़ज़लों
के विषय में यह अनुभव होता है कि वे पाठक के मन में कम से कम भाषा को लेकर आतंक पैदा
करती हैं। दूसरे, उनकी ग़ज़लों पर भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों
से उर्दू का मुहावरा इतना हावी रहता है कि उन्हें बड़ी आसानी से उर्दू ग़ज़ल के इतिहास
में स्थान दिया जा सकता है। और, यदि हिंदी के समीक्षक शमशेर की
ग़ज़लों को हिंदी की ग़ज़लें ही मानने पर तुले हैं, तो फिर ऐसी
सैकड़ों ग़ज़लें हिंदी की मानी जा सकती हैं, जो आज उर्दू साहित्य
के अंतर्गत पढ़ी-पढ़ाई जा रही हैं। निष्कर्ष यह, कि शमशेर के
रचना-शिल्प और शैली के संबंध में गंभीर शोध की आवश्यकता है। डॉ. रंजना अरगड़े ने बड़े
परिश्रम से जो सामग्री तैयार की है, वह इस विषय में दिशा निर्देशक
बन सकती है।
इस ग्रंथ में
शमशेर का एक लंबा साक्षात्कार भी दिया गया है। यह इस शोधग्रंथ की सबसे महत्त्वपूर्ण
सामग्री है; क्योंकि इसमें शमशेर स्वयं अपने विषय में बोलते हैं। वे कुछ ऐसे
विषयों पर भी बात करते हैं, जो प्रायः विवादास्पद माने जाते हैं
और हिंदी के लेखक जिनसे डरते हैं। ऐसा ही एक विषय हिंदी और उर्दू की निकटता का है।
शमशेर कहते हैं- "मैं यह मानता हूँ कि उर्दू हिंदी के अधिक निकट है संस्कृत की
बनिस्बत । हो सकता है मेरा education उर्दू में था, इसलिए मैं ऐसा मानता हूँ, लेकिन उर्दू वास्तव में हमारे भावों
को जन के साथ अधिक निकटता से प्रकट करती है। ये पता नहीं व्यर्थ झगड़े होते हैं भाषा
के नाम पर, संस्कृति के नाम
पर... मुझे बड़ा बुरा लगता है।" (पृ. 210)। उर्दू को हिंदी की एक शैली मान कर
उसकी उपेक्षा में प्रसन्न होने वाले और उर्दू को भाषा के रूप में हिंदी के विरोध में
खड़ा रखने वाले उत्साही लोग शमशेर के इस विचार पर ध्यान दें, तो हिंदी और उर्दू का ही नहीं, बल्कि इस देश का बहुत
भला हो सकता है। इसी प्रकार की एक स्पष्टोक्ति शमशेर ने अपनी और मुक्तिबोध की कविता
की दुरूहता के संबंध में भी की है। वे रंजना आरगड़े से कहते हैं--- "मेरी दुरूहता
को आप पार भी कर लेती हैं, तो ज्यादा कुछ पाएँगी नहीं। पर मुक्तिबोध
को आप पढ़िये।
अवश्य पढ़िये।
उनकी दुरूहता को पार करेंगी तो you will enrich your life, your experiences. आप जरूर पढ़िए उनको। उनकी कविता में जो डिक्शन की जो कमजोरी है, वह अहमियत नहीं रखती; क्योंकि उनकी कविता जीवन के बहुत
करीब है। उनके images बहुत concrete हैं। Flesh and
Blood के। मेरी कविताएँ बहुत वायवीय हैं। शायद उसमें diction और art की छोटी से छोटी बारीकी भी महत्त्व रखती है। और अगर उसमें
flaw है तो बहुत अखरता है।" (पृ. 211)। अपनी कविता का
ऐसा स्वस्थ मूल्यांकन हिंदी के कम ही कवियों ने किया है। अज्ञेय ने अपने साक्षात्कारों
में अपनी कविता के विषय में बहुत अधिक कहा है, किंतु उनके कहे को पढ़ कर लगता है कि अपने जीवन की भाँति
ही वे अपने साहित्य के विषय में भी दो टूक बताने से कतरा रहे हैं। शमशेर ऐसा कुछ नहीं
करते। वे मन में आई सच बात भीतर रख ही नहीं पाते। तमाम दुरूहता के बावजूद उनकी कविताओं
में भी यह साफगोई दिखाई देती है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें