छायावाद में आत्माभिव्यक्ति (डॉ. शशि मुदीराज)
छायावाद में
आत्माभिव्यक्ति
डॉ. शशि मुदीराज
परिमल प्रकाशन
743, मोतीलाल
नेहरू नगर,
इलाहाबाद- 211002
प्रथम संस्करण- 1980, पृष्ठ- 394, मूल्य- 75 रुपए
डॉ. शशि मुदीराज
साहित्यिक विषयों पर गंभीर शोध के लिए जानी जाती थीं। उनका ग्रंथ 'छायावाद में आत्माभिव्यक्ति' इस तथ्य को और
भी पुष्ट करता है। इस ग्रंथ में उन्होंने छायावाद युगीन काव्य में आत्माभिव्यक्ति का
विश्लेषण किया है और स्पष्ट टिप्पणी दी है कि "छायावाद आत्मपरक काव्य है।"
(पू. 368)। यदि ध्यान से
देखा जाए, तो छायावादी काव्य बहुत कुछ ऐसी अनुभूति का काव्य है, जिसे कवियों ने केवल अपने परिवेश से ही ग्रहण नहीं किया था, बल्कि उसे इस
देश की सांस्कृतिक परंपरा से भी ग्रहण किया था। लेखिका ने तो यह भी माना है कि उन अनुभूतियों
के गठन में पाश्चात्य मान्यताओं की भूमिका भी थी। छायावाद की आत्माभिव्यक्ति के संबंध
में वे कहती हैं- "आत्माभिव्यक्ति विषयक भारतीय एवं पाश्चात्य मान्यताओं का समन्वित
क्रियात्मक स्वरूप है छायावादी आत्माभिव्यक्ति। इस काव्य में आत्माभिव्यक्ति जहाँ आत्माभिव्यक्ति
विषयक पाश्चात्य मान्यताओं,
काव्य का कवि
व्यक्तित्व प्रसूत होना कवि की मानसी दशा एवं संवेदनाओं से संप्रेरित होना, अंतःस्फूर्त अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति की
सहजरूपता, निष्प्रयोजनीयता, कवि के भाव-बोध
की विलक्षणता आदि विशेषताओं को प्रतिफलित किया, वहीं व्यक्तित्व प्रक्षेपण के विषय
में वह भारतीय काव्य-शास्त्रीय मर्यादाओं का भी निर्वाह करते चलता है।" (पृ. 386)।
छायावाद की आत्माभिव्यक्ति
विषयक विशेषता को समझने के लिए पहले आत्माभिव्यक्ति के स्वरूप को समझना आवश्यक है।
आत्माभिव्यक्ति वह है, जिसके अंतर्गत कवि अपने आपको अभिव्यक्त करता
है। यह उसके काव्य-सृजन की प्रक्रिया का वह रूप है, जो उसके अंतर
को उसके बाह्य के साथ प्रकट करता है। रचना की प्रक्रिया सामान्य रूप से तीन चरणों में
संपन्न होती है। पहले चरण में रचनाकार अनुभव एकत्र करता है। दूसरे चरण में कला, कल्पना, सौन्दर्य-दृष्टि, विचार आदि का
प्रयोग करके उन्हें परिष्कृत बनाता है और तीसरे चरण में अनुभवों का पुनः सृजन तथा प्रकटीकरण
करता है। डॉ. शशि मुदीराज भी सूजन प्रक्रिया का विश्लेषण उसे तीन चरणों में बाँट कर
ही करती हैं। पहले चरण को वे जिज्ञासा का चरण कहती है। इसमें जीवन के उत्कट अनुभव खंड
अपना कार्य करते हैं। मुक्तिबोध इसे कलाका प्रथम क्षण कहना पसंद करते हैं, दूसरे चरण को
वे जिज्ञासा अथवा अनुभव क्षण की सार्थकता के लिए बिम्ब की खोज का चरण बताती हैं। इस
चरण में ऐसा लगने लगता है कि भोक्ता अपनी अनुभूति को अपने से अलग करके जीवित रखने के
लिए संघर्ष कर रहा है। इसके पश्चात् ही तीसरा चरण प्रारंभ होता है तथा कविता निश्चित
रूपाकार लेकर सामने आ जाती है।
आत्माभिव्यक्ति
का सैद्धांतिक विश्लेषण करते हुए डॉ. शशि मुदीराज कविता और कवि तथा कविता और पाठक के
बीच विद्यमान संबंध की बात भी करती हैं। वे कहती हैं- "कविता की स्थिति कवि और
पाठक के मध्य है। कविता अनुभूति के धरातल का कवि और आस्वादक के बीच संवाद है।"
(पृ. 33)। इसके पश्चात् वे कहती हैं कि काव्य ही वह बिन्दु
है, जहाँ कवि का आत्म वस्तु जगत के साथ तादात्म्य बनाता है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि कवि अपने आत्म या निजीपन
से परे चला जाता है, बल्कि इसका अभिप्राय केवल यह है कि कवि संपूर्ण
जगत को अपने निजी अनुभवों की सीमा में समेट लेता है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि
काव्य सृजन प्रक्रिया में कवि को वैयक्तिकता से निर्वैयक्तिकता की ओर बहना तो होता
है किंतु निवैयक्तिकता के मूल में व्यक्तिगत
अनुभूतियाँ होती हैं। यही कारण है कि जब कवि आत्माभिव्यक्ति करता है, तो वह अनिवार्यतः आत्मविस्तार प्राप्त करता है।
आत्माभिव्यक्ति
और वैयक्तिक अनुभवों के संदर्भ में डॉ. मुदीराज ने एक सटीक प्रश्न जीवनानुभवों के प्रति
प्रतिबद्धता का उठाया है। वे कहती है- "कविता की आत्माभिव्यक्ति के विषय में विविध
विद्वानों के दृष्टिकोणों के परिशीलन एवं काव्य सृजन में कवि व्यक्तित्व की भूमिका
विषयक विवेचन के क्रम में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि काव्य किस सीमा तक
कवि के व्यक्तिगत जीवनानुभवों से प्रतिबद्ध है तथा काव्य में इसका हस्तक्षेप किस मात्रा
में होना चाहिए।" (पृ. 34-35)। यह प्रश्न उन विचारकों के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण
है, जो यह मानते हैं कि काव्य सृजन निर्वैयक्तिक होकर ही किया जा सकता है, किंतु जो लोग निर्वैयक्तिकता की पृष्ठभूमि में निजी अनुभवों
की सत्ता स्वीकार करते हैं उनके लिए वैयक्तिक अनुभवों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक
है। डॉ. मुदीराज इस प्रतिबद्धता को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह मानती हैं कि कवि का
परिवेश अनिवार्य रूप से वैयक्तिक अनुभवों को भी प्रभावित करता है और आत्माभिव्यक्ति
को भी।
काव्य और आत्माभिव्यक्ति
के संबंध में आत्माभिव्यक्ति के प्रयोजन का प्रसंग उठाकर लेखिका ने इस संपूर्ण विश्लेषण
को बहुत उपयोगी बना दिया है। आज जब काव्य को आनंद से परे रखकर भी देखा जाने लगा है
तो आत्माभिव्यक्ति के प्रयोजन का प्रश्न और महत्त्वपूर्ण बन गया है। यद्यपि डॉ. शशि
मुदाराज अपने अवचेतन में काव्य को आनंद से जोड़कर देखने वाले आग्रह से युक्त लगती है, किंतु वे परिवेश, विस्तृत जीवन और व्यापक
समस्याओं की भी उपेक्षा नहीं करना चाहतीं।
डॉ. मुदीराज ने
जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी
निराला, सुमित्रानंदन
पंत और महादेवी वर्मा के काव्य को आत्माभिव्यक्ति की कसौटी पर कस कर देखा है। ये चारों
कवि छायावाद के प्रतिनिधि हैं और इन्होंने जीवन और जगत को विशिष्ट सौन्दर्य बोध प्रदान
किया है। जयशंकर प्रसाद गंभीर सांस्कृतिक दृष्टि संपन्न कवि थे। उनके सामने एक गहन
सांस्कृतिक लक्ष्य था, जिसमें मानव-मुक्ति और भारतीय अस्मिता का स्वर
प्रमुख था। वे घोर वैयक्तिक अनुभूति के कवि भी थे तथा अनुभव के असीम विस्तार के भी।
निराला राष्ट्रीय उद्बोधन, जन-चेतना और आक्रामकता के कवि थे।
उन्होंने अपने निजी संदर्भों को काव्य रूप देते समय भी अपने युग का विशेष ध्यान रखा।
वे मनुष्य की मुक्ति और कविता की मुक्ति को परस्पर निकट रखकर देखने वाले कवि थे। उनकी
यथार्थवादी कविताएँ युगीन जीवन की सच्चाई बयान करती हैं। पंत और महादेवी कलात्मक जीवन
सौन्दर्य के प्रति विशेष आग्रह रखने वाले रचनाकार थे। पंत के यहाँ हमें निरंतर एक असंतोष
भी दिखाई देता है। जिसके कारण वे अपने काव्य में विचारधारा की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते
दिखाई देते हैं। कहने को यह असंतोष उनका निजी था, किंतु इसमें जो अकुलाहट थी, उसका
संबंध युग के हृदय से था। डॉ. मुदीराज ने इन समस्याओं का व्यापक विश्लेषण किया है और
दो टूक निष्कर्ष दिया है कि- "छायावादी कवि जोवन की वास्तविकता के प्रति उदासीन
नहीं थे। न ही वे वैयक्तिक भाव-कारा में बद्ध हुए। छायावादी काव्य व्यक्तिगत व वैयक्तिक
अनुभूतियों से अनुप्रेरित, अनुप्राणित व अनुस्यूत है तथापि इसके विकास की दिशा समष्टि बोध
की ओर ही रही है।" (पू. 222)। यह निष्कर्ष छायावादी कवियों की आत्माभिव्यक्ति
के एक उल्लेखनीय पक्ष को सामने लाता है।
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